Delhi to Chandigarh

तय समय के मुताबिक चौदहवीं चेतना यात्रा की शुरुआत हुई 5 सितंबर 2018 को सुबह लगभग सात बजे.. रिमझिम बारिश की फुहारों ने मानों रास्ता साफ करने का बीड़ा उठाया हुआ था.. कार्यक्रम के मुताबिक हम सबसे पहले पंहुचे भगवान शिव के दरबार में मत्था टेकने, उत्तर-पश्चिम दिल्ली के आदर्श नगर के ऐतिहासिक प्राचीन शिव मंदिर में. उनका आशीर्वाद लेकर यात्रा शुरु करने हम पहुंचे सेंट्रल दिल्ली जहां से यात्रा की औपचारिक शुरुआत होनी थी. केंद्रीय विज्ञान-प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने हरी झंडी दिखायी और केंद्रीय ग्रामीण-विकास, पंचायती राज व खनन मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने. दिल्ली के कई केबल ऑपरेटर संगठनों और आविष्कार ग्रुप के सदस्यों ने विदाई दी और हम चल पड़े देश का मूड समझने एक लंबी यात्रा पर.. बारिश और ट्रैफिक ने यात्रा के मार्ग में कई बदलाव किये.. हालांकि हमारी पूरी कोशिश रही कि यात्रा हरेक मुकाम तक जरूर पहुंचे. इस बार चेतना यात्रा का उद्देश्य सिर्फ केबल जगत ही नहीं आम लोगों से भी जुड़ा है. हमने एक देशव्यापी सर्वे का भी बीड़ा उठाया है जिसमें लोगों का चुनावी मिजाज जानना है. सर्वे का नाम है - 'मूड देश की जनता का 2019' जिसमें हम ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर वोटर के मन में क्या है और देश में अगली सरकार किसकी बन सकती है. हरियाणा में हमने प्रवेश किया सोनीपत के रास्ते. पहला पड़ाव रहा रोहतक. छोटा और सुव्यवस्थित शहर. केबल टीवी उद्योग से जुड़े व अन्य सभी लोगों ने यात्रा का स्वागत किया. लोगों से बातचीत करने और उनके चुनावी मिजाज का जायजा लेने के बाद वहां से हम पहुंचे हिसार. पुराने और ऐतिहासिक महत्त्व के इस शहर के केबल ऑपरेटरों ने यात्रा का स्वागत किया और अपनी भरपूर शुभकामनाएं दीं.. वहां से हमारी यात्रा पहुंची भिवानी.. जहां लोगों ने फिर अगला पड़ाव बना सिरसा जहां से आगे पंजाब की सीमा शुरु होती है. सिरसा में हमारी मुलाकात हुई शहर के कुछ प्रमुख लोगों से.. और हमारी यात्रा चल पड़ी पंजाब की ओर.. पंजाब और हरियाणा के बॉर्डर पर डबवाली में यात्रा का सामना हुआ अनोखी गाड़ियों के निर्माताओं से. वे फौज से नीलाम हुई गाड़ियों में फेर बदल कर के और उनकी डेंटिंग-पेंटिंग कर ऐसा चमकाते हैं कि नयी फैन्सी गाड़ियां भी फेल हो जायें. अलॉय व्हील, चौड़े टायर, अनोखे साइलेंसर और रंग-बिरंगी बॉडी. खैर, हम आगे निकले बठिंडा की तरफ. कुछ देर की यात्रा के बाद जब हम वहां पहुंचे तो दिन चढ़ निकला था. लोगों ने हमारी टीम के कैमरे के आगे अपने विचार रखे और हम निकल पड़े अपने अगले मुकाम फरीदकोट की तरफ. केबल जगत से जुड़े कई साथी हमारा इंतजार कर रहे थे जिन्होंने हमारा जोरदार खैर-मकदम किया. रात होने तक हम फिरोजपुर पहुंच गये जहां अगली सुबह हमें मिले कुछ नौजवान और बुद्धिजीवी. फिरोजपुर से हम मोगा पहुंचे, फिर वहां से हुसैनीवाला बॉर्डर जहां भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि है। देखा जाये तो वास्तव में सतलुज नदी के तट पर बनी इस जगह को समाधि बनाने का फैसला अंग्रेजों का था. है ना चौंकाने वाली बात? दरअसल हुआ ये कि तीनों को फांसी देने का दिन 24 मार्च मुकर्रर किया गया था, लेकिन देश भर में इन तीनों की लोकप्रियता और विद्रोह की आशंका के मद्देनजर अंग्रेजों ने एक दिन पहले ही उन्हें फांसी दे दी. लोग इनकी लाशों को लेकर हंगामा न करें इस डर से चुपके से उनका अग्नि संस्कार भी करवा दिया. जबतक लोगों को खबर मिलती और वे यहां पहुंचते, तबतक अंग्रेजों ने अस्थियों को सतलुज में प्रवाहित भी करवा दिया और भाग खड़े हुए. लोग पहुंचे तो जो जगह गर्म थी वहीं समाधि वना
दी. बाद में बटुकेश्वर दत्त का भी अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार वहीं किया गया. हुसैनीवाला का महत्त्व 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के अद्वितीय शौर्य के लिये भी है. वहां मुट्ठी भर भारतीय सैनिकों ने सैकड़ों की संख्या में आये पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया था. हुसैनीवाला से हमारी यात्रा पहुंची खडूर साहिब, जहां का गुरुद्वारा बेहद मशहूर है. ये इलाका पहले तरनतारन के नाम से जाना जाता था. हालांकि इस धार्मिक स्थल की जितनी शोहरत है, उतनी ही बुरी है वहां रहने वाले लोगों की स्थिति. गरीबी और बेरोजगारी के साथ-साथ वहां के लोग महंगाई की मार भी झेलने को मजबूर हैं. हमारा अगला पड़ाव था अमृतसर साहिब. सिखों के इस महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक शहर में तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी. हमने कुछ लोगों से मुलाकात की और चल पड़े पंजाब के एक और शहर जलंधर की ओर. रात हमने जलंधर में गुजारी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जालंधर जिले का नाम राक्षस के नाम पर रखा गया है. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह जगह राम के पुत्र लव की राजधानी थी। वही कुछ मानते हैं कि जालंधर का अर्थ पानी के अंदर होता है और यहां पर सतलुज और बीस नदियों का संगम होता है इसलिए इस जगह का नाम जालंधर रखा गया. जालंधर का एक नाम त्रिरत्ता भी है. सुबह लोगों से मुलाकात की, फिर चल पड़े लुधियाना की ओर. लुधियाना पंजाब की सबसे बड़ी आबादी वाला पुराना शहर है जहां कामगार तबका ज्यादा रहता है. इसका प्राचीन नाम लोधी-आना था, जो कि लोधी वंश के शासकों के नाम पर था. सतलुज नदी के किनारे स्थित यह शहर 1480 में दिल्ली की लोधी वंश द्वारा स्थापित किया गया था. प्रथम सिख युद्ध (1845) में लुधियाना में एक बड़ी लड़ाई लड़ी गयी थी. लोगों से बातचीत के बाद हम आगे बढ़े रूप नगर की ओर. घस छोटे से शहर का नाम पहले रोपड़ था. पंजाब में हाल के वर्षों में शहरों के नाम बहुत बदले हैं, लेकिन उस लिहाज से हालात बदले हों वैसा नहीं दिखता. रूप नगर में लोगों से बातचीत करते हुए शाम हो गयी. फिर वहां से हम चले होशियारपुर की ओर. रास्ते में मिला आनंदपुर साहिब. सिखों के इस प्रमुख धार्मिक स्थल की स्थापना सिखों के नवें गुरू गुरु तेग बहादुर ने 1665 में की थी. .हां पर साबका हुआ कई इलाकों से आये तीर्थ-यात्रियों से. अलग-अलग लोग, अलग अलग राय. देर रात हम पहुंचे होशियारपुर. सुबह लोगों की रायशुमारी के बाद हम आगे बढ़े जम्मू की ओर. रास्ते में मिला गुरदासपुर, जहां दुकानें बंद थीं. कांग्रेस ने उस दिन पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में बंद का आह्वान किया था. लोगों से मुलाकात हुई और हम आगे बढ़ने वाले थे कि एक अजीबोगरीब फूड स्टॉल ने हमारा ध्यान खींचा. गुरदासपुर शायद देश में इकलौती ऐसी जगह है जहां चावल में समोसे मिला कर खाते हैं. हमने भी ट्राई किया और चटखारे लेते हुए बढ़ निकले आगे. जम्मू में हमारी मुलाकात स्थानीय लोगों के अलावे कश्मीर और लेह से आये हुए कई लोगों से हुई. जम्मू शहर नगर के बीच से तवी नदी निकलती है, जिसके कारण इस नगर को आधिकारिक तौर पर जम्मू-तवी कहते हैं. यह इस इलाके का सबसे बड़ा नगर है और जम्मू-कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी भी है. जम्मू को "मन्दिरों का शहर" भी कहते हैं, क्योंकि यहां ढेरों मन्दिर हैं जिनके चमकते शिखर-कलश दूर से ही स्वर्ण बिन्दुओं जैसे दिखाई देते हैं. हालांकि जम्मू-कश्मीर की सरकार भंग होने के कारण वहां के लोग कुछ निराश जरूर हैं, लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति वे बेहद जागरुक हैं. हमने उनसे उनकी राजनीतिक अपेक्षाओं और
चुनावी संभावनाओं पर बातचीत की और आगे बढ़े उधमपुर की ओर. रास्ते में मिला छेनानी नाशरी टनल जो 9 किलोमीटर लंबा है और देश का सबसे लंबा टनल है. 2 अप्रैल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था. इस टनल ने जम्मू और कश्मीर के बीच की दूरी को करीब 30 किलोमीटर कम कर दिया है. पहले वाहन चालकों को बेहद खतरनाक पहाड़ी रास्ते से जाना पड़ता था. इस टनल को पत्नीटॉप टनल भी कहते हैं जहां सर्दियों में जाना लगभग असंभव हो जाता था. हमारा अगला पड़ाव था उधमपुर, जहां स्थानीय लोगों के अलावा कश्मीर क्षेत्र के भी कई लोगों से मुलाकात हुई. अगली सुबह भी हमने कुछ स्थानीय लोगों से बात-चीत की और चल पड़े भदरवाह की ओर. रास्ते में मिला बनिहाल डैम और दर्रा. हालांकि अब सड़क बहुत बढ़िया बन गयी है, लेकिन लोग अपनी स्थिति से बहुत संतुष्ट नहीं दिखे. भदरवाह पहुंचते हुए शाम हो गयी. हमें बताया गया कि आगे का पहाड़ी रास्ता बेहद मुश्किल है और रात के वक्त वहां जाना ठीक नहीं है. हमने जम्मू-कश्मीर पर्यटन निगम के ‘रोज गार्डन गेस्ट हाउस’ में पड़ाव डाला. एक पहाड़ की चोटी पर बने इस खूबसूरत गेस्ट हाउस का निर्माण गुलाम नबी आजाद के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था. भदरवाह को मिनी कश्मीर कहते हैं और शाम के वक्त वहां का नजारा बेहद खूबसूरत था. मौसम ठंढा था और चारों तरफ पर्वतों से घिरे इस जगह की छटा बेहद प्यारी लग रही थी. अगली सुबह जब सूरज निकला तो आकाश साफ था. ठंढे माहौल में खिली हुई धूप बेहद प्यारी लग रही थी. यही धूप इन दिनों दिल्ली में असहनीय हो जाती है. हमने स्थानीय लोगों से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर रायशुमारी की और चल निकले हिमाचल प्रदेश की ओर. वहां से आगे का रास्ता बेहद दुर्गम और घुमावदार था. तब पता चला कि रात को इधर न आकर हमने कितनी समझदारी की. कई-कई किलोमीटर तक तो सड़क का नामोनिशान नहीं दिखा.. पहाड़ी रास्ता और कच्ची सड़क का कॉम्बिनेशन वाकई डेडली था. कुछ जगहों पर तो लैंडस्लाइड के कारण सड़क लगभग बंद सी थी और बीच में से किसी तरह कूदते-फांदते हमारी गाड़ी किसी तरह पहुंची हिमाचल प्रदेश में. पहले चंबा, फिर कांगड़ा पहुंच कर लोगों से बात-चीत की. कांगड़ा हिमाचल का ऐतिहासिक शहर है और व्यवसायिक केंद्र भी. हमारा अगला पड़ाव हमीरपुर था. पहाड़ों के बीच बसा ये लोकसभा क्षेत्र शिमला था. पहाड़ी रास्ता, लेकिन साफ और चौड़ी सड़कें. हिमाचल के लोग पहले अपनी भावनाएं खुल कर व्यक्त करते थे, लेकिन अब बहुत डिप्लोमैटिक हो गये हैं. उनके मनमें क्या छिपा है, ये जानने में बेहद मशक्कत करनी पड़ती है. हमीरपुर से आगे हमें शिमला जाना था. पहुंचे तब तक रात हो चुकी थी. शिमला से थोड़ा पहले ही हिमाचल टूरिज्म कॉरपोरेशन के गेस्ट हाउस में रुकना हुआ. यहां एक बात खास तौर से बताना चाहूंगा कि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के गेस्ट हाउसों का जिक्र इसलिये कर रहा हूं कि वे कमर्शियल होटलों के मुकाबले ज्यादा खूबसूरत लोकेशनों पर बने हैं और उनमें जगह की भी कमी नहीं होती. ठहरने के लिये वे सर्वोत्तम होते हैं बशर्ते कि वहां बुकिंग मिल जाये. अगली सुबह हमारा साबका शिमला के लोगों से हुआ. भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी रह चुकी यह खूबसूरत नगर फिलहाल हिमाचल प्रदेश की राजधानी है. वैसे तो शिमला को 1819 में अंग्रेज सैनिकों के आरामगृह के तौर पर बसाया गया था, लेकिन 1865 यहां के ठंढे मौसम और खूबसूरती को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इसे . उनके विचार जान कर हम आगे बढ़े और हिमाचल से बाहर निकल कर चंडीगढ़ पहुंच गये.