नौवीं चेतना यात्रा की प्रतीक्षा में भारतीय केबल टीवी कम्यूनिटीरा-8

नौवीं चेतना यात्रा
केबल टीवी को देखने के नजरिए भी अलग-अलग हैं। व्यवसासिक नजरिए से देखें तब अदना सा दिखने वाला यह व्यवसाय स्वंय में इतना आकर्षण रखता है कि भारत में जैसे ही व्यवसायिक रूप में इसकी शुरूआत हुई वैसे ही देश के प्रतिष्ठित उद्योग घरानों को इस व्यवसाय के प्रति इतना आकर्षण हुआ कि वह इस व्यवसाय में उतरने से स्वंय को रोक नहीं सके। बिना ज़रा सा भी समय गंवाए वह केबल टीवी व्यवसाय में भी अपने पांव जमाने के लिए घुसपैठ कर गए। हालांकि सफलता मिलने की बात अलग है, सभी को सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे असफल उद्योगपति कुछ करोड़ गंवाकर आराम के साथ इस व्यवसाय से बाहर भी हो गए जिनमें प्प्ज्स् अर्थात बिड़ला ग्रुप एवं आरपीजी यानिकि गोयना ग्रुप सहित कई और भी शामिल रहे। कोई हार-जीत का मुकाबला नहीं , धन्धा-धन्धा है किसी को रास आया, किसी को नहीं आया, लेकिन केबल टीवी व्यवसाय ने आकर्षित किया, इस बात में कोई अतिश्योत्तफ़ी नहीं है। जो असफल रहे वह अपना बोरिया बिस्तर समेट कर केबल टीवी को टाटा कर गए, लेकिन हिन्दुजा ग्रुप, रहेजा ग्रुप ऐसे जमे कि बस छा गए। इसी व्यवसाय का वह भी एक अहम हिस्सा बन गये। इसी तरह से ब्रॉडकासि्ंटग के क्षेत्र से केबल टीवी के क्षेत्र में भी अपना वर्चस्व जमाने के लिए स्टार टीवी के द्वारा ज़ी ग्रुप को साथ लेकर की गई, लेकिन ज़ी-स्टार की सहभागिता लम्बी नहीं चल पाई परन्तु दोनों की भागीदारी से उपजा सिटी केबल आज भी अपनी मौजूदगी बनाए हुए है केबल टीवी में, जबकि स्टार टीवी, ज़ी ग्रुप से अलग हो जाने के बाद रहेजा ग्रुप के साथ केबल टीवी का भी हिस्सा बने रहने का मोह नहीं छोड़ पाया। इन्हीं के बीच में से कई और केबल टीवी व्यवसाय की धुरी बन गए और एम-एस-ओ- कहलाते हैं।
केबल टीवी व्यवसाय के संचालकों में इस तरह से दो ध्रुव बन गए। जिनमें केबल टीवी ऑपरेटर एवं एम-एस-ओ- दो भाग हो गए। यहीं से इस व्यवसाय में पहेलियां बनने-बुझने लगी, क्योंकि ऑपरेटर भी एम-एस-ओ- की श्रेणी में स्वंय को स्थापित करने में सफलता हासिल करते गए। आरटेल (उड़ीशा), जीटीपीएल (गुजरात), मंथन (कोलकाता), यूसीएन (नागपुर), आईसीसी (पुणे), फास्टवे (पंजाब), एकट्राई (बंगलौर), एशिया नेट (केरल) आदि अनेक केबल टीवी ऑपरेटरों ने स्वंय को एक कामयाब एम-एस-ओ- के रूप में स्थापित किया जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इन केबल, सिटी केबल, हाथवे केबल, डीजी केबल एवं डैन केबल ने अपना परचम लहराया है। केबल टीवी व्यवसाय में ज़ी ग्रुप या स्टार टीवी का उतरना दूरदर्शी सोच की ज़रूरत थी, क्योंकि उन्हें दिखाई दे रहा था कि शीघ्र ही ब्रॉडकासि्ंटग क्षेत्र में कई और भी ब्रॉडकास्टर्स शामिल हो जाएंगे। चैनलों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जाएगी, तब बाजी केबल टीवी ऑपरेटरों के हाथों में चली जाएगी। वही तय करेंगे कि किस चैनल को चलाएं या किसको नहीं चलाएं। यानिकि चैनल तो ले आयो लेकिन ऑपरेटरों ने चलाने को ही ना कर दिया तब क्या करोगे, क्योंकि 1994 से ही पे चैनलों की भी ‘स्टार मूवी’ से शुरूआत हो चुकी थी। ज़रूरी तो नहीं कि ऑपरेटर हरेक चैनल को प्रसारण के लिए ब्रॉडकास्टर्स को भुगतान करें। केबल टीवी ऑपरेटरों ने गर चैनल चलाने का विरोध ही करना शुरू कर दिया तब उसका उपाय तो ढूंढना ही होगा, इसीलिए ब्रॉडकास्टर्स के लिए ब्रॉडकासि्ंटग के साथ-साथ केबल टीवी का क्षेत्र भी उतना ही ज़रूरी हो गया। इसीलिए स्टार टीवी ने सबसे पहले ज़ी ग्रुप के साथ मिलकर सिटी केबल की नींव रखी, लेकिन ज़ी से अलग हो जाने के बाद स्टार टीवी ने रहेजा ग्रुप के हाथवे केबल में भी अपनी हिस्सेदारी बनाई।
आज बाईस-तेईस वर्षों की इस केबल टीवी इण्डष्ट्री की चकाचौंध दुनियाभर के धनकुबेरों को आकर्षित कर रही है, बात कहां तक पहुंचेगी, फिलहाल पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन कयास पूरे लगाए जा सकते हैं कि अभी इस व्यवसाय का सफरनामा जारी है, कहां तक पहुंचेगा नहीं मालूम, लेकिन उपभोक्ताओं का जो जखीरा यहां केबल टीवी की झोली में है वैसा आंकड़ा विश्व में कहीं और नहीं है। यह एक बड़े बदलाव की बयार है, जिसमे टैक्नोलॉजिकल बदलावों के साथ-साथ कानूनन बदलाव भी नए आयाम बनाएंगे। इन्हें बहुत ही बारीकी के साथ देश के हरेक केबल टीवी ऑपरेटर को समझना होगा, अन्यथा इस व्यवसाय से बाहर हो जाने से उसे कोई रोक नहीं पाएगा। केबल टीवी व्यवसाय की शुरूआत करने वाले भारत के केबल टीवी ऑपरेटरों ने स्वंय की उपलब्धी पर कभी उतनी गंभीरता से नहीं सोचा कि आखि़र उन्होंने कैसे इसे एक व्यवसायिक जामा पहनाया, और क्यों इस व्यवसाय ने देश के प्रतिष्ठित उद्योग घरानों को आकर्षित किया\ वह आए तो उनके साथ मनी पावर सहित मसल पावर का आना भी स्वाभाविक ही था, लेकिन लाख जतन कर भी वह केबल टीवी ऑपरेटरों पर ही निर्भर रहे, सीधे-सीधे उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच सके। अपनी इसी उपलब्धि को ही केबल टीवी ऑपरेटर समझ लेते तब भी बात अलग होती, लेकिन स्वंय पर उनकी खूब मार पड़ने के बावजूद भी वह डटे रहे यह भी कम नहीं है। अब सारा का सारा सिस्टम ही बदल रहा है। टैक्नोलॉजी को ही बदले जाने के लिए कानून में संशोधन करवा दिया गया है। एनालॉग से डिजीटाईजेशन पर चला जाएगा केबल टीवी, जिसकी समय-सीमा तय हो चुकी है 31 दिसम्बर, 2014 जब पूरा देश ही डिजीटाईजेशन पर चला जाएगा, अर्थात 31 दिसम्बर, 2014 के बाद भारत में एनालॉग केबल टीवी प्रसारण पूरी तरह से गैर-कानूनी हो जाएगा। इसकी शुरूआत 1 नवम्बर, 2012 से इसके प्रथम चरण से हो चुकी है। अब 1 अप्रैल, 2013 से देश की ओर 38 सिटी को लेकर द्वितीय चरण भी चालू हो गया है एवं शीघ्र ही तृतीय चरण के निकट पहुंचने वाली है केबल टीवी इण्डस्ट्री, लेकिन केबल टीवी ऑपरेटरों के रवैये से ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कि वह इस बदलाव की गंभीरता को समझा पाने में बहुत देर कर रहे हैं। जैसे कि वह विवश से किसी बहाव में बह रहे हैं, होने क्या जा रहा है अथवा केबल टीवी किस भविष्य की ओर बढ़ चला है, ऑपरेटरों के लिए वह समझ पाना कठिन होता जा रहा है, शायद यही कारण है कि अब उसका बहुत ज़्यादा छटपटाना भी शुरू हो गया है।
ऑपरेटरों में असुरक्षा की भावना ज़्यादा घर करती जा रही है, लेकिन मार्ग नहीं खोज पा रहा है। हालांकि स्वंय को पूरी तरह से सुरक्षित बना लेने में वह सक्षम है, लेकिन दूरदर्शिता के अभाव के साथ-साथ ठुका हुआ विश्वास भी चाहिए सफलता के लिए जो उसके पास नहीं है। ना ही वह किसी दूसरे पर करता है और ना ही कोई दूसरा उस पर, इसीलिए सही दिशा की ओर नहीं बढ़ पा रहे हैं केबल टीवी ऑपरेटर।
14 जनवरी, 2003 को मकर सक्रांन्ति के शुभ दिन कण्डीश्नल एक्सेस सिस्टम (ब्।ै) के लिए बनाए गए कानून को लागू किए जाने की घोषणा की गई थी, लेकिन केबल टीवी ऑपरेटरों में उसे लेकर भी कन्फ्रयूजन ही कन्फ्रयूजन थे, जबकि वही इलाज भी था। इसीलिए देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों का कन्फ्रयूजन दूर करने की सोच कर उस समय चेतना यात्र की योजना तैयार की गई थी। 2005 में आरंभ हुई चेतना यात्र आज भी जारी है। बीते आठ वर्षों में लगातार आठ चेतना यात्रएं देश की कर लेने के बावजूद भी नौवीं चेतना यात्र की तैयारी शुरू हो गई है। केबल टीवी व्यवसाय का चेतना यात्र भी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। अब देशभर में तमाम आयोजनों के साथ यात्र आगे बढ़ती जाती है। देश के कोने-कोने में पहुंच कर छोटे-छोटे गांव कस्बों की भी तमाम कड़ियों को जोड़ने का प्रयास चेतना यात्र के अर्न्तगत किया जाता है। भारतीय ब्रॉडकासि्ंटग एण्ड केबल टीवी व्यवसाय में प्रत्येक वर्ष की जाने वाली इस चेतना यात्र का महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब इसमें से ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने का अमृत निकलता है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान को रोकने के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है एवं देश के तमाम स्कूलों में बच्चों को पृथ्वी के प्रति उनकी िज़म्मेदारी की बात समझाई जाती है या फिर सबको साथ लेकर सब जगह वृक्षा रोपड़ करवाया जाता है, तब केबल टीवी से जुड़े हर शख्स का सीना गर्व से फूल जाता है, क्योंकि अपने लिए तो हर कोई कुछ भी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है, लेकिन जब समूची मानव जाति के लिए निःस्वार्थ भाव से कुछ भी किया जाता है तब जो सन्तुष्टि मिलती है, उसे किसी भी कीमत में तोला नहीं जा सकता है।
ब्रॉडकासि्ंटग एण्ड केबल टीवी इण्डस्ट्री को ‘ग्रीन ब्रॉडकासि्ंटग’ के बैनर तले पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान को रोकने के लिए यथासंभव जो भी किया जा सकता है, किए जाने के लिए इस व्यवसाय में संलग्न हर शख्स को उत्प्रेरित करना चेतना यात्रओं की विशेष उपलब्धि कही जाएगी। सबकी सहभागिता के साथ देश के भिन्न शहरों में लगाए गए पौधे अब वृक्ष बनते जा रहे हैं, कई फलदार वृक्षों पर फल भी आ गए हैं, उन्हें देखकर उनको लगाने वालों की खुशी को बयां नहीं किया जा सकता है। ब्रॉडकासि्ंटग एण्ड केबल टीवी इण्डस्ट्री में बरसने वाली अकूत दौलत की चमक तो सबको आकर्षित कर अपनी ओर खींचती है, लेकिन इसकी शत्तिफ़ अद्भुद है। यह अन्ना जैसे बड़े-बड़े आन्दोलनों को जन्म दे सकती है, तो भ्रष्टाचारियों को जेल की सलाखों तक भी पहुंचा सकती है, लेकिन प्रकृति की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले ऐसे प्रयासों से वह आंखें मूंद लेती है। निरन्तर बिना रूके, बिना थके प्रत्येक वर्ष की जाने वाली इस चेतना यात्र को समाचार चैनलों पर वह जगह नहीं मिल पाती है जिसकी वह हकदार है।
देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को आपस में जोड़ना उनकी समस्याओं के समाधान निकालने का प्रयास करना एवं भावी संभावनाओं के प्रति उन्हें जागरूक करना यात्र का प्रथम कर्त्तव्य होता है। ब्रॉडकास्टर्स, एम-एस-ओ- एवं केबल टीवी ऑपरेटरों के बीच सामंजस्य स्थापित करना अर्थात इन सबके बीच एक मजबूत ब्रिज का दायित्व निभाना यात्र का दूसरा कर्त्तव्य होता है, जबकि समूची पृथ्वी के लिए किए जाने वाले कार्यों में इण्डस्ट्री के सभी वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। कण्डीश्नल एक्सेस सिस्टम के बाद डिजीटाईजेशन पर पहुंची इस इण्डस्ट्री में इस बार की जाने वाली चेतना यात्र का बहुत ही विशेष महत्त्व है, क्योंकि डैस की शुरूआत होने के साथ ही बहुत सारे भ्रम भी इस व्यवसाय में फैल गए हैं। सभी वर्ग स्वंय को ठगा महसूस कर रहे हैं, लेकिन नया कानून अब इम्प्लीमेंट होना शुरू हो गया है। यहीं से इण्डस्ट्री को अब और ऊंचाईयों की ओर ले जाना है, लेकिन सभी को साथ लेकर सबके अधिकारों का ध्यान रखकर आगे बढ़ना सबको भाएगा। आपसी प्रतिस्पर्धा में भला मुफ्रत के भाव में भी कब तक माल लुटाया जा सकता है। अतः केबल टीवी के प्रतिस्पर्धी डी-टी-एच- ऑपरेटरों को भी इसी व्यवसाय का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए साथ लेकर आगे बढ़ना ज़्यादा कारगर सिद्ध होगा यह सब तभी सम्भव है, जब सभी एक-दूसरे पर भरोसा करें, विश्वास करें। अपनी-अपनी में ही सब लगे रहे तो समय ज़्यादा खराब होगा और परिणाम भी अपेक्षानुसार नहीं आ पाएंगे। आवश्यकता है म्युचल अण्डरस्टैंडिंग की, समझदारी की, दूरदर्शिता की एवं सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों की ज़रूरतों को भी समझने की। सभी के सहयोग से ही यह इण्डस्ट्री आज तक पहुंच सकी है, अतः ब्रॉडकास्टर्स हों या फिर एम-एस-ओ- किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि केबल टीवी ऑपरेटरों की कोई भूमिका ही नहीं रही। इसी तरह से केबल टीवी ऑपरेटरों को भी स्वंय को खुदा नहीं समझना चाहिए, ब्रॉडकास्टर्स के बगैर उनका महत्त्व ही क्या होता। इसी तरह से डी-टी-एच- ऑपरेटरों को भी एम-एस-ओ- अथवा केबल टीवी ऑपरेटरों को अपना शत्रु नहीं समझना चाहिए। ग्राहकों के पास पहुंचाया जाने वाला प्रोडक्ट तो दोनों के पास एक ही है केवल रास्ते ही तो अलग-अलग हैं फिर झगड़ा कैसा\ पैसा तो उपभोक्ता की जेबों से ही आना है फिर मुफ्रत के भाव में क्यों---\ इसी प्रकार से इण्डस्ट्री के सभी वर्गों को जोड़ने-जगाने का लक्ष्य लिए ‘चेतना यात्र-9’ 5 सितम्बर को दिल्ली से शुरू की जायेगी।
‘चेतना यात्र-9’ का फोकस विशेष तौर पर डैस पर होगा। देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों में डैस को लेकर जो भ्रम हैं उन्हें दूर करने का प्रयास इस यात्र में किया जाएगा। डिजीटाईजेशन पर डैस के दूसरे फेस के कुल 38 शहरों में ‘राऊण्ड टेबल डिस्कशन ऑन डैस’ भी आयोजित किए जाएंगे तो अनेक शहरों में बड़े सम्मेलनों के आयोजन होंगे।
देशभर के तमाम शहरों में विद्यमान हार्डवेयर वालों को भी इस बार विशेष रूप से यात्र के साथ जोड़ा जाएगा। भिन्न चैनलों के चैनल डिस्ट्रीब्यूटरों सहित चैनलों के प्रतिनिधियों को भी यात्र में शामिल किया जायेगा। प्रयास किया जायेगा कि डी-टी-एच- ऑपरेटरों को भी यात्र का सहभागी बनाकर आपसी भेदभाव को दूर किया जाए, अन्यथा केबल टीवी में डी-टी-एच- को एक बड़ा शत्रु ही समझा जाता है। समूची इण्डस्ट्री का लक्ष्य ता उपभोक्ता ही है, भले ही मार्ग भिन्न हों तब बैर कैसा, सबको संयुक्त प्रयास करते हुए श्रेष्ठ सेवाएं उचित दरों पर उपलब्ध करवानी चाहिए। विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ताओं का जखीरा इस इण्डस्ट्री के पास है, केबल टीवी से आगे निकलकर उपभोक्ताओं के लिए और भी बहुत कुछ इसी माध्यम से उपलब्ध करवाए जाने की ओर बढ़ना चाहिए इण्डस्ट्री को। इसके लिए अब उपभोक्ताओं के और निकट जाने का समय आ गया है, अतः समूची इण्डस्ट्री को दूरदर्शिता पूर्ण सोचने व निर्णय लेने का समय आ गया है। यह तभी सम्भव है जब समस्त कड़ियों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर एक विशाल संगठन का गठन किया जाए, नाम ‘मीडिया क्लब ऑफ इण्डिया’ भी रखा जा सकता है, लेकिन तार केन्द्र से लेकर देश के प्रत्येक वार्ड तक जुड़े होने चाहिए, जिनकी शाखाएं हरेक गांव-कस्वे तक पहुंची होनी चाहिएं, तभी ट।ैधटव्क् अथवा अन्य व्यवसायिक लाभ भी भविष्य में जोड़ने सरल हो जाएंगे समूची कम्युनिटी के लिए। नौवीं चेतना यात्र ग्लोबलवार्मिंग डैस सहित कई और लक्ष्य भी साथ लेकर अपनी तैयारी कर रही है। जिसकी प्रतीक्षा सारे देश में की जा रही है।
व्यवसासिक नजरिए से देखें तब अदना सा दिखने वाला यह व्यवसाय स्वंय में इतना आकर्षण रखता है कि भारत में जैसे ही व्यवसायिक रूप में इसकी शुरूआत हुई वैसे ही देश के प्रतिष्ठित उद्योग घरानों को इस व्यवसाय के प्रति इतना आकर्षण हुआ कि वह इस व्यवसाय में उतरने से स्वंय को रोक नहीं सके। बिना ज़रा सा भी समय गंवाए वह केबल टीवी व्यवसाय में भी अपने पांव जमाने के लिए घुसपैठ कर गए। हालांकि सफलता मिलने की बात अलग है, सभी को सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे असफल उद्योगपति कुछ करोड़ गंवाकर आराम के साथ इस व्यवसाय से बाहर भी हो गए जिनमें प्प्ज्स् अर्थात बिड़ला ग्रुप एवं आरपीजी यानिकि गोयना ग्रुप सहित कई और भी शामिल रहे। कोई हार-जीत का मुकाबला नहीं, धन्धा-धन्धा है किसी को रास आया, किसी को नहीं आया, लेकिन केबल टीवी व्यवसाय ने आकर्षित किया, इस बात में कोई अतिश्योत्तफ़ी नहीं है।

14 जनवरी, 2003 को मकर सक्रांन्ति के शुभ दिन कण्डीश्नल एक्सेस सिस्टम (ब्।ै) के लिए बनाए गए कानून को लागू किए जाने की घोषणा की गई थी, लेकिन केबल टीवी ऑपरेटरों में उसे लेकर भी कन्फ्रयूजन ही कन्फ्रयूजन थे, जबकि वही इलाज भी था। इसीलिए देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों का कन्फ्रयूजन दूर करने की सोच कर उस समय चेतना यात्र की योजना तैयार की गई थी। 2005 में आरंभ हुई चेतना यात्र आज भी जारी है। बीते आठ वर्षों में लगातार आठ चेतना यात्रएं देश की कर लेने के बावजूद भी नौवीं चेतना यात्र की तैयारी शुरू हो गई है। केबल टीवी व्यवसाय का चेतना यात्र भी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। अब देशभर में तमाम आयोजनों के साथ यात्र आगे बढ़ती जाती है। देश के कोने-कोने में पहुंच कर छोटे-छोटे गांव कस्बों की भी तमाम कड़ियों को जोड़ने का प्रयास चेतना यात्र के अर्न्तगत किया जाता है।

‘चेतना यात्र-9’ का फोकस विशेष तौर पर डैस पर होगा। देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों में डैस को लेकर जो भ्रम हैं उन्हें दूर करने का प्रयास इस यात्र में किया जाएगा। डिजीटाईजेशन पर डैस के दूसरे फेस के कुल 38 शहरों में ‘राऊण्ड टेबल डिस्कशन ऑन डैस’ भी आयोजित किए जाएंगे तो अनेक शहरों में बड़े सम्मेलनों के आयोजन होंगे।

(शुभारम्भ 5 सितम्बर 2013)
‘चेतना यात्रा-9’
दिल्ली-रामगढ़ का किला
कण्डीशनल एक्सेस सिस्टम यानिकि ब्।ै के लिए जब केबल टीवी एक्ट में संशोधन किया गया था तभी देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को कैस के प्रति जागरूक करने के लिए चेतना यात्र की योजना बनाई गई थी, लेकिन परिस्थिति में बड़े बदलाव आए तत्कालीन सरकार द्वारा 14 जनवरी, 2003 को जारी की गई अधिसूचना धरी की धरी ही रह गई। कानून बना देना अलग बात होती है, लेकिन कानून को लागू किया जाना अलग बात हुआ करती है, यह तभी मालूम हुआ जब कैस कानून बनाए जाने के बाद एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सका। आम चुनाव आ गए और एनडीए सरकार के स्थान पर कांग्रेस की यूपीए सरकार का राज कायम हो गया, अतः एनडीए सरकार के द्वारा बनाया गया कैस कानून भी बंमाने हो गया। हालांकि तब केबल टीवी का कोई अन्य विकल्प ही नहीं था अतः उस समय कैस कानून की ज़रूरत भी थी, क्योंकि समस्या केबल पे चैनलों को लेकर थी। फ्री टू एयर चैनलों के लिए कानून में किसी भी तरह को कोई संशोधन नहीं किया गया था, लेकिन पे चैनलों के लिए डिजीटाईजेशन सैट्टॉप बॉक्स अनिवार्य किया गया था। उपभोक्ताओं को पूरी आज़ादी दी गई थी कि वह केवल उन्हीं पे चैनलों का भुगतान करें जो वह देखना चाहते हैं, कानून में फ्री टू एयर चैनलों के लिए एनालॉग सिस्टम को बदले जाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। इसलिए अगर कैस कानून लागू होता तब देशभर के केबल टीवी उपभोक्ताओं को बहुत लाभ होना था। हरेक उपभोक्ता को जबर्दस्ती सैट्टॉप बॉक्स लेने की कोई ज़रूरत नहीं थी। सिर्फ पे चैनलों के लिए ही सैट्टॉप बॉक्स की अनिवार्यता थी, अतः उम्मीद की जा रही थी कि कैस लागू हो जाने पर कई पे चैनलों को फ्री टु एयर हो जाना मजबूरी हो जाता।
कैस कानून के अन्तर्गत बेवजह भारत की विदेशी मुद्रा विदेशों को नहीं जाती, बल्कि आवश्यकता के हिसाब से भारत में ही शायद सैट्टॉप बॉक्स भी बनाए जाने शुरू हो जाते, क्योंकि उपभोक्ता लम्बे समय तक फ्री टु एयर चैनलों से ही स्वंय को संतुष्ट करने की कोशिश करते। पे चैनल देखने के लिए अधिकांश केबल टीवी उपभोक्ता सैट्टॉप बॉक्स पर खर्चा करने से बचते, अतः एनालॉग प्रसारण को ज़्यादा पसन्द किया जाता, जबकि अब डिजीटाईजेशन को जबरन थोप दिया गया है। कैस कानून के प्रति देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को जागरूक करने के लिए सन्- 2005 में शुरू की गई चेतना यात्र आज भी जारी है। आज यह यात्र डिजीटाईजेशन पर ऑपरेटरों को जागरूक कर रही है, लेकिन इसकी योजना कैस कानून के समय बनाई गई थी। कैस लागू नहीं हो पाया था, लेकिन सन्- 2004 में डीटीएच प्रचलन में आ गया था। अर्थात् केबल टीवी का एक विकल्प उपभोक्ताओं के लिए बाज़ार में आ चुका था। कैस का कानून तभी बनाया गया था, जब उपभोक्ताओं के लिए केबल टीवी का कोई अन्य विकल्प ही नहीं था। डीटीएच प्रचलन में आ जाने के बाद कैस की उपयोगिता ही नहीं रह गई थी, क्योंकि यदि कोई उपभोक्ता केबल टीवी से सन्तुष्ट नहीं है, तब उसके लिए डीटीएच एक विकल्प के रूप में उपलब्ध हो गया था।
पूर्व एनडीए सरकार द्वारा बनाया गया कैस कानून नई आई यूपीए सरकार के गले नहीं उतर रहा था, अतः वह इसे लागू किए जाने में इच्छुक नहीं थी, लेकिन कैस के लिए पैसा खर्च चुके एमएसओ पशोपेश में थे। उन्होंने अदालत में कैस लागू किए जाने की गुहार लगाई, जबकि यूपीए सरकार इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी, तिस पर डीटीएच एक बड़ा प्रतिस्पर्धी बन गया था केबल टीवी का। फिर से केबल टीवी एक भंवरजाल में फंस सा गया था। केबल टीवी ऑपरेटरों की समझ से परे हो चुके थे हालात, अतः सन्- 2005 में पहली बार शुरू हुई चेतना यात्र निरन्तर जारी है। लगातार आठ यात्रएं कर देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रह गया है, लेकिन केबल टीवी इण्डस्ट्री में भी बड़ा बदलाव आया है। देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को कैस के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उन्हें डीटीएच से भी अपने उपभोक्ताओं को बचाने के उपाय बताने में ही शुरूआती यात्रएं रहीं, लेकिन शीघ्र ही केबल टीवी ऑपरेटर कम्यूनिटी को जनहितार्थ कार्यों के प्रति भी प्रोत्साहित किया जाने लगा। पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान के प्रति केबल टीवी ऑपरेटरों को जागरूक करने के साथ-साथ देशभर में ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए वृक्षारोपड़ अभियान भी यात्र के दरमियान शुरू किया गया। इसी तरह से व्यावसायिक समस्याओं के समाधानों के साथ-साथ जनहितार्थ भी अपना दायित्व निर्वाह करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई।
आखिरकार एक जनवरी, 2007 को दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश से कैस कानून का प्रथम चरण लागू किए जाने के लिए सरकार को बाध्य होना ही पड़ा। कैस के प्रथम चरण में साउथ दिल्ली, मुम्बई (साउथ), साउथ कोलकाता एवं चेन्नई शामिल हो गए। सरकार की अधिसूचना जारी होते ही कैस एरिया में एमएसओ द्वारा आयात किए गए सैट्टॉप बॉक्स गोदामों से निकलकर कैस एरिया के उपभोक्ताओं तक पहुंच गए। इस मौके का डीटीएच ने पूरा फायदा उठाया अर्थात उन्हें केबल टीवी उपभोक्ताओं में अपनी पैठ बनाने का वह सुनहरा अवसर मिल गया जिसकी प्रतीक्षा वह 2004 से ही कर रहे थे। कैस की कहानी प्रथम चरण तक ही सिमट कर रह गई, क्योंकि सरकार की मंशा कुछ और ही थी, जो कि बाद में डैस के रूप में बाहर आई। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा नान कैस एरिया के लिए टैरिफ तय करने का निर्देश ट्राई को दिया गया, तब ट्राई ने अदालत को जवाब देने के लिए खूब कवायद की।
ट्राई नान कैस एरिया के टैरिफ तय नहीं कर सकी अतः नान कैस एरिया को ही खत्म करने का निर्णय ट्राई द्व़ारा ले लिया गया, वहीं से डिजीटल एड्रेसिबल सिस्टम यानिकि डैस पैदा हुआ। कैस तो बीती बातें हो गया, लेकिन डैस के लिए बड़ी सोच समझ कर केबल टीवी एक्ट- 1995 में संशोधन किए गए। डैस के लिए बनाए गए कानून को संसद के दोनों सदनों में पास करवाने के बाद शीघ्र ही माननीय राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर हो जाने के बाद इसे लागू करवाए जाने के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई। सरकारी अधिसूचनानुसार पहली जुलाई, 2012 से डैस का प्रथम चरण लागू किए जाना था, जिसे बदलकर एक नवम्बर, 2012 करना पड़ा। केबल टीवी व्यवसाय में डैस ने खलबली मचाकर रख दी, तमाम अगर-मगर, किन्तु-परन्तु खड़े हो गए, लेकिन सरकार अपने इरादों में पूरी तरह से पक्की निकली, क्योंकि एक नवम्बर, 2012 से डैस के प्रथम चरण की सरकार ने शुरूआत कर ही दी। डैस को लेकर अभी भी केबल टीवी ऑपरेटरों में तमाम सवालिया निशान लगे हुए हैं, जबकि सरकारी अधिसूचनानुसार एक नवम्बर, 2012 को प्रथम चरण के बाद एक अप्रैल, 2013 से डैस का द्वितीय चरण भी आरम्भ हो गया है।
प्रथम चरण में मात्र चारों महानगर दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता व चेन्नई ही शामिल थे, जिनमें से कुल दो महानगरों दिल्ली एवं मुम्बई में ही सरकार डैस की शुरूआत करवा पाई। डैस लागू करवाने में सरकार इतनी जल्दी में है कि प्रथम चरण को पूर्णतया लागू किए गिना द्वितीय चरण के लिए अधिसूचित देश के 38 शहरों में भी डैस को लागू कर दिया गया है। डैस के लिए आयात किए जा रहे सैट्टॉप बॉक्स सहित अन्य हार्डवेयर के एवज में कितनी राशि विदेशी मुद्रा के रूप में देश से बाहर जा रही है उसकी परवाह ना करते हुए सरकार को डैस लागू करवाए जाने की बड़ी जल्दी है। डॉलर के मुकाबले लुढ़कते रूपए में डैस की भी बड़ी भूमिका है। अभी देश की राजधानी दिल्ली में भी पूर्णतया लागू नहीं हो पाया है डैस, जबकि पूरे ग्यारह महीने बीत चुके हैं। डैस के प्रथम चरण में दिल्ली का भी जब पूर्णतया डैस लागू नहीं करवाया जा सका है तब प्रथम चरण की शेष तीनों मेट्रो सिटी मुम्बई व कोलकाता की स्थिति कैसी होगी, जबकि चेन्नई में तो अभी शुरूआत भी नहीं करवाई जा सकी है। सरकार तो डैस के द्वितीय चरण में 38 शहरों में डैस को लागू करवाने पर बढ़ चुकी है, अतः ‘चेतना यात्र-9’ का उद्देश्य पूर्णतया इस बार डैस पर फोकस है।
5 सितम्बर, 2013 को दिल्ली से आरम्भ हुई चेतना यात्र-9 डैस में शामिल सभी शहरों में जाकर यह जानकारी लेगी कि बाकी शहरों में डैस की वास्तविक स्थिति क्या है। दिल्ली की स्थिति तो देश के बाकी शहरों से बिल्कुल अलग है ही। कई दिनों की तैयारी के बाद केबल टीवी ऑपरेटरों का राष्ट्रीय अधिवेशन 16-17 अगस्त, 2013 को दिल्ली में बुलाया गया, जिसमें देश के भिन्न राज्यों के प्रमुख ऑपरेटरों ने भाग लिया। केबल टीवी ऑपरेटरों के राष्ट्रीय अधिवेशन के साथ-साथ ऑपरेटरों द्वारा समाज सेवा में संलग्न विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किए जाने के लिए ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ का भी आयोजन दिल्ली में किया गया। 16-17 अगस्त को आयोजित कार्यक्रमों के उपरान्त ‘चेतना यात्र-9’ की शुरूआत दिल्ली से 5 सितम्बर की प्रातः 8 बजे आदर्श नगर पार्क में राजकुमार भाटिया एवं मोर्निंग क्लब द्वारा की गई। दिल्ली से विदा लेकर नोएडा एबीपी न्यूज़ चैनल के ऑफिस के बाद सीधे मेरठ के लिए रवाना हुई यात्र। 5 सितम्बर शिक्षक दिवस के रूप में एक बहुत ही शुभ दिन माना जाता है, जबकि वृहस्पतिवार जिसे गुरूवार भी कहा जाता है अर्थात् गुरूवार के दिन ही शिक्षक दिवस के अवसर पर देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए दिल्ली से एक शिक्षक का दायित्व निभाने के लिए यात्र की शुरूआत हुई। मेरठ पहुंचते-पहुंचते काफी अबेर हो चुकी थी, लेकिन रोमी भाई यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षा में मिले। मेरठ के साथ-साथ अन्य शहरों में भी पूरे जोर-शोर के साथ रोमी भाई डैस पर काम कर रहे हैं। अगले दिन यात्र के भव्य स्वागत की तैयारियों का निर्देश देकर सब रात्रि विश्राम पर चले गए। मेरठ के होटल में विश्राम कर प्रातः जल्दी ही आगे के लिए तैयार होकर वहां पहुंची यात्र जहां मेरठ ऑपरेटरों के द्वारा स्वागत कार्यक्रम था। बहुत ही शॉर्ट नोटिस पर इतनी बड़ी संख्या में ऑपरेटरों को बुलाने का काम हर कोई नहीं कर सकता है, लेकिन ऑपरेटरों की उत्सुकता एवं रोमी भाई के व्यवहार से भारी संख्या में ऑपरेटर पहुंचे थे। ऑपरेटरों के साथ-साथ प्रैस कॉन्फ्रेस के लिए भी पत्रकारों की संख्या में कोई कमी नहीं थी। वहीं रोमी भाई ने हमें आईबीएन-7 के प्रमुख अभिषेक से भी भेंट करवाई थी। वहीं अभिषेक जिन्हें आप मुजफ्रफनगर पर विशेष रिपोर्ट करते हुए अब रोजाना ही टीवी पर देख रहे हैं, तब उनके अन्य सहयोगी भी उस मीटिंग में थे। मुजफ्रफनगर दंगों में मारे गए आईबीएन-7 के पत्रकार व फोटोग्राफर की हत्या पर हमें भी बहुत दुःख पहुंचा है। मेरठ मीटिंग के बाद हमने यात्र का पूर्व निर्धारित रूट बदलना ही ज़्यादा बेहतर समझा, क्योंकि उधर स्थितियां काफी तनावपूर्ण हैं, ऐसी जानकारियां मिल रही थीं। रोमी भाई की मीटिंग से मुरादाबाद के लिए यात्र रवाना हो गई, लेकिन तभी मेरठ के आकाशदीप शर्मा (ऑपरेटर एवं चैनल डिस्ट्रीब्यूटर) का फोन आ गया और इत्तिफाकन उनसे भेंट हो गई। उन्हीं के साथ-साथ मुजफ्रफरनगर के ऑपरेटरों से भी वहां भेंट हुई एवं आकाश ने मुरादाबाद मार्ग में गजरौला के ऑपरेटर संदीप रस्तोगी के साथ भी भेंट तय कर दी, अतः रास्ते में संदीप रस्तोगी एवं अन्य ऑपरेटरों के साथ गजरौला मीटिंग कर यात्र मुरादाबाद पहुंची, जहां भारी संख्या में ऑपरेटर चेतना यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वागत-सत्कार के बाद ऑपरेटरों को मार्गदर्शन कर मुरादाबाद में ही विश्राम किया। अगली सुबह-सबेरे ही मुरादाबाद के प्रमुख ऑपरेटर फिरासत भाई अपने पुत्र सहित भेंट करने आए और उनसे मिलकर यात्र आगे के लिए रवाना हो गई। मुरादाबाद की व्यवस्था का दायित्व राजीव जौहरी ने बखूबी निभाया।
मुरादाबाद से रवाना होकर यात्र सीधे बिजनौर पहुंची। इस मार्ग पर मुजफ्रफनगर तनाव का प्रभाव प्रतीत होने लगा था। मुरादाबाद से बिजनौर के लिए एक मार्ग कांठ-स्योहारा-धामपुर होते हुए भी जाता है, उसी मार्ग पर स्थित ऑपरेटरों के साथ मीटिंग रखी गई थी, लेकिन समयाभाव के कारण यहां का रूट भी बदला गया एवं नूरपुर से होकर बिजनौर पहुंचने का निर्णय लिया गया। बिजनौर से तकरीबन 10-12 किलोमीटर पहले किसी गांव में एक मेला लगा हुआ था, जिसमें दूर-दराज गांवों से बैलगाड़ियों में भरकर परिवार सहित ग्रामीण मेले में जा रहे थे। मेले में जाते ग्रामीणाें के चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी झलक रही थी, खिलखिलाते चेहरे, पूर्णतया सन्तुष्ट और खुश नज़र आ रहे थे। अतः एक अजीब सा आर्कषण मेले में खींच ले गया। मुश्किल से ही वहां गाड़ी ले जाई जा सकी।
दोयज का मेला बड़े बाबा के मन्दिर पर सड़क से हटकर बिल्कुल अलग अन्दर कहीं लगा हुआ था, जहां आस-पास के अनेक गांव से परिवार सहित लोग अपने-अपने ग्रामीण ट्रांसपोर्ट साधनों से पहुंचे हुए थे। पूरा मेला छोटी-छोटी दुकानों से सजा-धजा था। खाने की तमाम मिठाईयों में जलेबी सबसे ज़्यादा लुभा रही थी। मेले में कश्तियों का भी खेल खेला जा रहा था, जहां कोई भी किसी के साथ कुश्ती लड़ने के लिए स्वतन्त्र था। बड़ी ही रोमांचक कुश्तियां देखने केा यहां मिलीं। कुश्तियों के बाद देखा कि कुछ लोग सुअर लेकर अलग-अलग बैठे हुए थे। हमें लगा कि जैसे इनकी बलि दी जानी है, लेकिन बलि नहीं बल्कि इन सुअरों के साथ बैठे इनके मालिकों द्वारा बच्चों की बीमारी का इलाज किया जा रहा था।
मान्यता है कि जिन बच्चों का कान बहता है या बच्चे डर जाते हैं उन बच्चों को इन सुअरों के दो बालों से टोटका कर इलाज होता है यहां। यह दृश्य भी वाकई चौंकाने वाला था। मेले से निकल कर शीघ्र ही बिजनौर की मीटिंग लेकर यात्र सीधे ऋषिकेश के लिए रवाना हो गई। चांदपुर से ऑपरेटर सुल्तान भी यात्र के स्वागत के लिए बिजनौर पहुंचे थे। बिजनौर में ही टीवी चैनलों से जानकारी मिली कि मुजफ्रफरनगर में दंगे भड़क गए हैं, वहां छः लोग मारे भी गए हैं। मुजफ्रफनगर दंगों के कारण आस-पास के सभी क्षेत्र भी अतिसंवेदनशील हो गए हैं। शाम ढ़लती जा रही थी, अफवाहों का दौर शुरू हो गया था। शहर में सावधानी बरतते हुए पीएसी की टुकड़ियां पहुंचने लगी थी, अतः हम भी बिजनौर से ऋषिकेश के लिए रवाना हो गए। बिजनौर-ऋषिकेश मार्ग में अनेक जगह लोग आपस में गुट बनाकर खुसर-पुसर करते दिख्ााई दे रहे थे, तो जगह-जगह पुलिस-प्रशासन भी चौकस सा दिखने लगा था। एक अनजाना सा खतरा सारे रास्ते पसरा था, लेकिन यात्र निर्विघ्न सकुशल ऋषिकेश पहुंच गई, जबकि ऋषिकेश सहित पूर्ण उत्तराखण्ड में यात्र की व्यवस्था की जि़म्मेदारी देख रहे अजय चौधरी दिल्ली से मुजफ्रफरनगर मार्ग पर फंस कर रह गए थे। वह अपनी गाड़ी से दिल्ली से ऋषिकेश के लिए चले थे, लेकिन मुजफ्रफरनगर दंगों के कारण किन्हीं भी मार्गों मुजफ्रफरनगर क्रॉस कर ऋषिकेश पहुंचना जब असम्भव हो गया तब वहां से वापिस दिल्ली जाकर दिल्ली से हवाई जहाज से ऋषिकेश आने का निर्णय अजय चौधरी ने लिया। अगले दिन दोपहर को अजय चौधरी दिल्ली से ऋषिकेश पहुंच गए तभी ऋषिकेश में ऑपरेटरों के साथ मीटिंग हो सकी। भारी संख्या में आए ऑपरेटरों को देखकर उनकी उत्सुकता-जिज्ञासा का स्पष्ट पता लग रहा था।
मुजफ्रफरनगर में हालात बहुत बिगड़ जाने की खबरें डरा रहीं थी, अफवाहों का कोई अन्त नहीं था व ना ही मीडिया से छन-छन कर आ रहीं खबरों पर यकीन बन पा रहा था, लेकिन इतना स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि बहुत बड़े स्तर पर नरसंहार वहां हो रहा है। बारहाल मुजफ्रफरनगर से आगे निकलते हुए ऋषिकेश के बाद यात्र देहरादून पहुंची। रास्ते में मानियावाला के ऑपरेटर मनीष के यहीं शाम को 4ः30 बजे एबीपी न्यूज़ चैनल पर प्रसारण हो रहे अपने ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ के कार्यक्रम को देखने का भी मौका मिल गया। एबीपी न्यूज़ पर बहुत ही बेहतरीन ढं़ग से ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ कार्यक्रम का आधे घण्टे का प्रसारण किया गया। देशभर से कार्यक्रम पर बधाईयां आईं। मानियावाला में मनीष भाई से विदा लेकर यात्र अजय चौधरी से भी विदा लेकर यात्र सीधे प×चकुला की ओर बढ़ चली। इस मार्ग में मुजफ्रफरनगर दंगों का कोई प्रभाव नहीं दिखाई दिया, लेकिन देहरादून से आज सीधे सोलन (हि-प्र-) पहुंचने का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बदलने का कारण नाहान से ऊपर धूर्मपुर तक की सड़क का बहुत ज़्यादा क्षतिग्रस्त होना था।
नाहान से सीधे प×चकुला मार्ग पर बरवाला से 10-12 किलोमीटर आगे निकलने पर ‘रामगढ़’ में ‘ज्ीम थ्वतज त्ंउहंती’ अर्थात् रामगढ़ का किला में प×चकुला के नम्रता वाले राजेश मलिक की मेहमानवाजी में रात्रि विज्ञाम हुआ। रामगढ़ का किला एक अद्भुत अनुभव है। यह स्थान अभी भी अपनी शान-ओ-शौकत के साथ बड़ी बुलन्दियों को सहेज कर रखे हुए है। यहां तक पहुंचना ही ‘चेतना यात्र-9’ का प्रथम भाग होगा, क्योंकि अगले भाग में यहीं से स्मृतियों का पिटारा खोला जाएगा। किले की कहानी बड़ी ही रोमा×चक एवं रोचक है, क्योंकि यहां हमारी भेंट चंदेलों की 13 व 14वीं पीढ़ी से रूबरू हुई है। इस प्रथम भाग से आगे बढ़ने तक हम चाहते हैं कि मुजफ्रफरनगर पूरी तरह से शान्त वातारवरण में पहुंच जाए। शेष आगामी अंक में----!
फ्री टू एयर चैनलों के लिए कानून में किसी भी तरह को कोई संशोधन नहीं किया गया था, लेकिन पे चैनलों के लिए डिजीटाईजेशन सैट्टॉप बॉक्स अनिवार्य किया गया था। उपभोक्ताओं को पूरी आज़ादी दी गई थी कि वह केवल उन्हीं पे चैनलों का भुगतान करें जो वह देखना चाहते हैं, कानून में फ्री टू एयर चैनलों के लिए एनालॉग सिस्टम को बदले जाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। इसलिए अगर कैस कानून लागू होता तब देशभर के केबल टीवी उपभोक्ताओं को बहुत लाभ होना था।

‘चेतना यात्र-9’ का उद्देश्य पूर्णतया इस बार डैस पर फोकस है। 5 सितम्बर, 2013 को दिल्ली से आरम्भ हुई चेतना यात्र-9 डैस में शामिल सभी शहरों में जाकर यह जानकारी लेगी कि बाकी शहरों में डैस की वास्तविक स्थिति क्या है। दिल्ली की स्थिति तो देश के बाकी शहरों से बिल्कुल अलग है ही। कई दिनों की तैयारी के बाद केबल टीवी ऑपरेटरों का राष्ट्रीय अधिवेशन 16-17 अगस्त, 2013 को दिल्ली में बुलाया गया, जिसमें देश के भिन्न राज्यों के प्रमुख ऑपरेटरों ने भाग लिया। केबल टीवी ऑपरेटरों के राष्ट्रीय अधिवेशन के साथ-साथ ऑपरेटरों द्वारा समाज सेवा में संलग्न विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किए जाने के लिए ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ का भी आयोजन दिल्ली में किया गया।

(द्वितीय भाग)
‘चेतना यात्रा-9’
उत्तराखण्ड से आगे जोधपुर तकला
हिमाचल प्रदेश में सोलन मार्ग से यात्र बिलासपुर पहुंची। रामगढ़ का वृत्तान्त अलग से दे दिया गया है, लेकिन वहां की स्मृतियां सदैव साथ रहेंगी। उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा के निशान अभी भी पहाड़ी क्षेत्रें में स्पष्ट दिखाई दे जाते हैं। हालांकि हिमाचल में कोई तबाही नहीं हुई लेकिन पहाड़ों पर भारी वर्षा का प्रभाव पड़ा है। बिलासपुर डैम लबालब भरा हुआ है, जबकि यही बांध एक यात्र के दौरान हमने एक सूखी नदी के समान देखा था। पीडब्ल्यूडी गैस्ट-हाउस में रात्रिविश्राम कर अगली सुबह वहां के ऑपरेटर अजय द्विवेदी से भेंट कर यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ गई। मुजफ्रफरनगर दंगे अब वहां के गांवों तक पहुंच गए हैं, सरकार पूरी तरह से दंगों को रोकने में असफल रही है। खबरें 48 लोगों के मारे जाने की आ गई हैं, अब पूरे दंगाग्रस्त क्षेत्र को अर्थात् मामला बहुत गम्भीर हो गया है। यात्र के दौरान देश के भिन्न प्रदेशों-शहरों एवं लोगों से मिलने के साथ-साथ देश में होने वाली बड़ी घटनाओं से अपना ध्यान नहीं हटाया जा सकता है। इसलिए मुजफ्रफरनगर के दंगों की खबरें अच्छी नहीं लगती हैं।
बिलासपुर से कांगड़ा पहुंचकर रिन्कू भाई आदि से भेंट कर अगली सुबह सीधे पठानकोट होते हुए जम्मू पहुंची यात्र। जम्मू में सुभाष भाई सहित सभी यात्र के स्वागत में प्रतीक्षारत थे। डैस पर जम्मू एण्ड कश्मीर के ऑपरेटरों की प्रतिक्रिया को कैमरे में कैद कर वहीं रात्रिविश्राम के बाद अगली सुबह अमृतसर के लिए रवाना हुई यात्र, लेकिन अमृतसर वाले ट्राई के ओपन हाउस में भाग लेने के लिए दिल्ली गए हुए थे। लुधियाना फास्टवे के गुरदीप भाई भी वहां ना होकर चण्डीगढ़ में थे, तब तक चलते-चलते यात्र जम्मू से पठानकोट होते हुए जालन्धर के नजदीक पहुंच चुकी थी, मात्र 70-80 किमी- ही रह गया था जालन्धर, लेकिन अपना पूर्व निर्धाारित कार्यक्रम भी पूरा बिगड़ रहा था और वहां कोई उपलब्ध भी नहीं था, अतः जालन्धर ना जाकर डलहौजी-चम्बा के लिए यात्र का मार्ग बदला गया। रात्रि में सीधे डलहौजी की खूबसूरत वादियों ने स्वागत किया। वहां के प्रमुख होटल माऊन्टवीय में रात्रिविश्राम किया। सुबह डलहौजी के ऑपरेटर कोहली जी के साथ डिजीटाईजेशन पर चर्चा के बाद यात्र आगे के लिए रवाना हो गई, लेकिन तय नहीं हो पा रहा था कि आखिर अभी जाना कहां है, क्याेंकि डलहौजी के रास्ते में जगह-जगह लगे लंगरों के कारण मालूम हुआ कि कोई धार्मिक यात्र चल रही है।
रास्ते में भटंवा गांव में लगे एक लगंर पर थोड़ा ठहर कर जानकारियां ली गई तब मालूम हुआ कि ‘मनीमहेश यात्र’ चल रही है, जिसमें देश-विदेशों से भत्तफ़ों का सैलाब उमड़ आया है, उन्हीं की सेवा के लिए इस मार्ग में तमाम लंगर लगे हुए हैं। अमरनाथ यात्र के बाद दूसरा नम्बर इसी मनीमहेश यात्र का आता है। भटंवा गांव के लंगर प्रबन्धकों से यात्र की जानकारियां लेने से ही मालूम हुआ कि हिमाचल में चम्बा से आगे भरमौर गांव से 13 किलोमीटर आगे हडसर तक गाड़ी से जाकर फिर 13 किलोमीटर पैदल ऊपर चढ़ाई करने पर ‘मनीमहेश दर्शन’ के लिए पहुुंच पाते हैं भत्तफ़जन। कृष्ण जन्माष्टमी से आरम्भ होकर राधाष्टमी तक पन्द्रह (15) दिनों तक चलती है यह यात्र। वैसे तो भत्तफ़जन रक्षाबन्धन से ही शुरू हो जाते हैं। दुनियाभर से लोग इस यात्र में शामिल होने के लिए इसी मार्ग से आते व जाते हैैं। इस कठिन यात्र के श्रद्धालुओं की सेवा के लिए ही जगह-जगह लंगर लगाए जाते हैं।
बारहाल! डलहौजी से रवाना होकर चम्बा पहुंचने पर चम्बा का ऑपरेटर भी नहीं मिल सका तब भरमौर गांव के लिए आगे बढ़ चले यात्र। बहुत ही कठिन मार्ग, पहाड़ों को काट-काट कर मार्ग बनाया हुआ था, तो बीच में पहाड़ों के बीच में से सुरंग मार्ग भी भरमौर ले जाने के लिए बनाया गया था। चम्बा से 67 किलोमीटर के ढेढ़े-मेढ़े तंग पहाड़ी रास्तों को सावधानीपूर्वक पार कर भरमौर पहुंचना तो हो गया, लेकिन इससे आगे के बारे में बिना जाने बढ़ना ठीक नहीं लगा। रात हो गई थी और टेम्प्रेचर का पारा भी काफी नीचे गिर चुका था, ठण्ड के कारण सभी ने यहां गर्म कपड़े पहने हुए थे, उन्हें देखकर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है ठण्ड का। भरमौर में एक स्थान पर गाड़ी खड़ी कर पहले तो एक चक्कर पैदल मारकर वहां का जायजा लिया। बहुत ही संकरी सी वह भरमौर की सड़क है, जहां केवल एक ही गाड़ी नीचे से ऊपर आ जा सकती है। बिल्कुल खड़ी चढ़ाई पर एक बार अपनी गाड़ी बढ़ा देने पर सामने से आने वाली गाड़ी के कारण बीच में फंस जाने से हालत खराब हो जाती है। यहीं पर इस भरमौर गांव का मुख्य बाजार भी इसी सड़क के दोनों और है। यहां पर पैदल चलने वाले भत्तफ़ों की संख्या की भी कमी नहीं है। अतः इस सड़क पर गाड़ी चढ़ाना एक कठिन कार्य है।
भरमौर में ही भरमाषी माता का मन्दिर है, जिसके दर्शन मनीमहेश से पूर्व किए जाते हैं। चौरासी मन्दिर भी अपना विशेष महत्त्व रखता है यहां पहुंचने वाले भत्तफ़ों के लिए। सुबह मनीमहेश के लिए भरमौर से यात्र का कार्यक्रम कैसे बनाया जाए, इसका निर्णय कर पाना बहुत कठिन हो गया था, क्योंकि भरमौर से आगे 13 किलोमीटर पर स्थित हडसर तक ही गाड़ी ले जाई जा सकती है, वहां से ऊपर 7-8 घण्टे की चढ़ाई 13 किलोमीटर की पैदल का मतलब है कि ऊपर चढ़ाई कर लेने के बाद रात्रि विश्राम वहीं ‘मनीमहेश’ में ही कर अगली सुबह वापिसी की जाए। मालूमात करने पर पता चला कि भरमौर से ऊपर मनीमहेश के लिए हैलिकाप्टर सर्विस भी है। अतः हैलिकाप्टर सर्विस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि दो अलग-अलग कम्पनियां यहां हैलिकाप्टर सर्विस उपलब्ध करवा रही थीं, लेकिन उनमें से एक कम्पनी के हैलिकाप्टर में तकनीकी खराबी आ गई है, वह दो दिनों से उड़ान नहीं भर सका है अतः केवल एक ही चोपड़ आज उड़ान भर रहा था, लेकिन कल भी यह चोपड़ उड़ान भरेगा या नहीं यह पक्का नहीं है, क्योंकि मनीमहेश यात्र आज सम्पन्न हो गई है। बताया गया है कि ऊपर स्नोफाल हो रहा है अतः अब ऊपर से लोग नीचे आने शुरू हो गए हैं।
आज तय नहीं हो सका कि कल क्या किया जाएगा। रात्रिविश्राम के लिए एक होटल महादेव में दो रूम ले लिए, वहां से अगली सुबह सबसे पहले वहीं पहुंचे जहां से हैलिकाप्टर सेवा मिलती है। गाड़ी रात्रि में ही हैलिपैड वाली जगह के निकट खड़ी कर दी गई थीं। हैलिकाप्टर सेवा के लिए 3-4 राऊण्ड की सवारियां आ गई थीं, अतः हमने भी तुरन्त अपनी 4 सीटें बुक करवा दीं। मात्र 5 मिनट की हवाई यात्र के लिए 3400/- रूपये प्रति सवारी टिकट था। हैलिकाप्टर से ऊपर उड़ने का हमारे लिए यह पहला अवसर ही था, लेकिन बेहद रोमा×चक था यह पांच मिनट का सफर, जिसको शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है, लेकिन कैमरे में कैद कर लिया। भरमौर से ऊपर मनीमहेश पहुंच कर दर्शन कर अपने तीन सहयोगी ऊपर से पैदल ही भरमौर वापिस आए, लेकिन मैं हैलिकाप्टर से ही वापिस भी आ गया। इस पूरी यात्र का वर्णन अलग से किया जाएगा, लेकिन चेतना के साथ यह धार्मिक यात्र दैवीय संयोग ही कहा जाएगा, क्योंकि ना तो हमारे कार्यक्रम में ही थी व ना ही हमें इस यात्र के बारे में कुछ मालूम था, परन्तु कैलाश पर्वत से बुलावा आया तो हम भी वहां हाजिरी भर आए।
भरमौर से वापिसी फिर उन्हीं ढेढे़-मेढ़े पहाड़ी रास्तों से होकर चम्बा पहुंचकर वहां के ऑपरेटर गुुल्ला भाई से मिलकर अमृतसर की ओर बढ़ती रही यात्र। रास्ते में चमेरा डैम में भरा पानी-नदी दूर तक साथ-साथ चलती हैं। चम्बा से थोड़ा आगे बढ़ जाने के बाद जितना भी नीचे उतरते जा रहे थे, एक चक्रवाती तूफान साथ-साथ बरसता-गरजता हुआ यात्र का पीछा कर रहा था। जोरदार अांधी-बारिश ही नहीं बल्कि मोटे-मोटे ओले भी काफी दूर तक टप-टप कर गाड़ी पर गिरते रहे, लेकिन बिना रूके यात्र आगे बढ़ती रही। आखिरकार पठानकोट पार कर अमृतसर मार्ग पर बटाला-गुरदासपुर तक तूफान ने अपनी शक्ति दिखलाई थी। सैकड़ों पेड़ मुख्यमार्ग पर गिरे हुए थे, जिनके कारण रास्ते अवरूद्ध हो गए थे। कई मार्गों को बदलते हुए, यहां से वहां भटक रहे थे तमाम वाहन आगे निकलने के लिए। आखिरकार सबको पारकर देर रात अमृतसर पहुंच ही गई भरमौर से चली चेतना यात्र। रात्रि विश्राम होटल रंधावा में किया। सुबह अमृतसर ऑपरेटर भुल्लर से भेंट बिना ही यात्र लुधियाना के लिए रवाना हो गई। जालन्धर में ऑपरेटर दर्शन कपूर के साथ अल्पाहार लेकर लुधियाना पहुंच गई यात्र।
फास्टवे प्रमुख भाई गुरदीप के साथ डैस पर विस्तार से डिस्कशन हुई, राजू एवं पीयूष भी डिस्कशन में शामिल हो गए। वहीं शिमला के खन्ना जी से भी भेंट हो गई एवं बाजवा चण्डीगढ़ आदि भी वहीं मिल गए। विकास कपूर (रिलायंस) फईम एवं सिद्ध (फूड-फूड) व न्यूज़ 24 का प्रतिनिधी गगन तनेजा आदि अनेक लोग फास्टवे के ऑफिस में ही मिल गए, सबसे मिल-मिलाकर यात्र वहां से आगे बढ़ी। भाई विकास अरोड़ा के साथ भावी सम्भावनाओं पर कुछ गम्भीर डिस्कशन के बाद रात्रि विश्राम भी लुधियाना के होटल गुलमोहर में किया। अगली सुबह गाड़ी की बैटरी ने फिर से प्रोब्लम की, अतः नई बैटरी लगवाई लुधियाना में। यहीं सारे मैले कपड़ों की भी ड्राईक्लीन करवाई। नाश्ता विकास अरोरा के ऑफिस में कर यात्र आगे के लिए रवाना हो गई।
लुधियाना से रवाना होकर थोड़ा पूर्व निर्धारित मार्ग में परिवर्तन करते हुए यात्र सीधे संगरूर होकर जींद पहुंची। जींद के ऑपरेटर रामफूल सिंह अपने अन्य साथियों सहित यात्र के स्वागत में प्रतीक्षारत थे, उनके साथ इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर चर्चा के बाद भिवानी के लिए रवाना हो गई यात्र, वहां राजकुमार आदि यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षा में थे। रात्रि विश्राम वहीं हरियाणा टूरिज्म के ‘बया’ रेस्ट हाउस में किया। सुबह नाश्ता राजकुमार के ऑफिस भिवानी हलचल में कर उनसे विदाई लेकर प्रदीप चौहान के आफिस में घर से आई लस्सी (मट्ठा) पीकर आगे राजस्थान की ओर बढ़ चली यात्र। राजस्थान में झुंझनू-सीकर होते हुए इत्तिफाकन सालासर बाला जी पहुंच गई यात्र। इस क्षेत्र में याकूब भाई का नेटवर्क है, उन्होंने सीकर में अपना बन्दा मिलने के लिए भेजने को बोला था, परन्तु बन्दा तो कोई नहीं आया बल्कि स्वंय याकूब भाई ने भी फोन नहीं उठाया, जब सीकर से सालासर पहुंच गई यात्र। सालासर में ही हनुमान जी का बहुत प्रतिष्ठित बड़ा भव्य एवं प्रसिद्ध बालाजी का मन्दिर स्थित है। इसके भत्तफ़ों में इत्तिफाकन हम भी शामिल हो गए। सालासर में मन्दिर के बिल्कुल मुख्य दरवाजे के निकट ही मौजूद केबल टीवी ऑपरेटर मुन्ना भाई से बालाजी की महिमा हमें मालूम हुई, उन्हीं के सहयोग से बालाजी के दर्शन कर यात्र चुरू के लिए रवाना हो गई।
जानकारी मिली कि चुरू के ऑपरेटर गौरीशंकर एक बड़े ऑपरेटर हैं, उन्होंने वहां डिजीटल हैण्डेड भी लगाया है। राजस्थान के गांवों का रास्ता पर करते हुए सालासर से रात्रि में चुरू पहुंच कर सीधे गौरीश्ांकर जी से भेंट की। उन्होंने बताया कि चुरू के साथ-साथ उन्होंने हनुमानगढ़ में भी डिजीटल हैण्डेड लगाया है। पूरा चुरू सैट्टॉप बॉक्स पर चल रहा है। वह स्वंय तो कुल साल डेढ़ साल से इस व्यवसाय को देखने लगे हैं, जबकि बता रहे हैं कि पिछले 17-18 सालों से वह केबल टीवी में हैं। अब हनुमानगढ़ में उन्हें कुछ पे चैनल नहीं मिल पा रहे हैं, लेकिन फैलाव वह आस-पास के क्षेत्रें में पूरा करना चाहते हैं। डैस लाइसेंस के बारे में भी उन्हें कुछ नहीं मालूम है परन्तु एक्सपर्ट पूरे दिखाई दिए, बिल्कुल ठेट केबल टीवी ऑपरेटर की ही तरह। ठेट ऑपरेटर का शब्द ऐसे गौरीशंकर जैसे ऑपरेटरों के लिए ही लिखा जा सकता है, क्योंकि कभी-कभी कई ऑपरेटर ऐसे काम कर ही जाते हैं जो उन्हें शोभा नहीं देता। बारहाल रात्रि विश्राम चुरू के होटल ‘सनसिटी’ में कर सुबह गौरीशंकर से बगैर मिले ही आगे बढ़ चली यात्र।
आगे का रास्ता फिर वापिसी उसी मार्ग से होकर था, जिससे रात्रि में चुरू पहुंचे थे। अब चुरू से नागौर होते हुए यात्र जोधपूर के लिए आगे बढ़ रही थी। चुरू से वापिस रतनगढ़-सुजानगढ़ होकर नागौर तक पूर्णतया रेगिस्तानी क्षेत्र ही है, पूरा डजर्ट क्षेत्र। इस मार्ग पर एक रेलवे फाटक के बन्द होने से वाहनों की लम्बी कतार को देखते हुए, थोड़ा सा डजर्ट की पगडण्डी पर गाड़ी बढ़ाकर देखा तब थोड़ा सा दूर जाकर दिखा तो वहां भी डजर्ट में एक बस्ती मिल गई। मेन रोड से डजर्ट की उस पगडण्डी पर उतरते हुए हमें कतई भी अनुमान नहीं था कि इससे आगे भी कोई रहता होगा, लेकिन वहां तो पूरा गांव बसा था। गांव में मन्दिर था और मस्जिद भी पक्के मकान, बिजली, पानी भी आश्चर्य हुआ, वहां एक बस्ती देखकर। बारहाल! पुनः वापिस मेन हाईवे पर पहुंचे तो फाटक अभी भी बन्द ही था जो थोड़ी और प्रतीक्षा करने के बाद खुला। बन्द फाटक के दोनों और खड़े वाहनों में एक वाहन में किसी मरीज को भी लेकर इलाज के लिए शहर ले जाया जा रहा था, जिसे बन्द फाटक से काफी तकलीफ हुई, लेकिन फाटक खुल जाने में प्राथमिकता दी।
देर रात जोधपुर पहुंच गई यात्र, यहां ‘उम्मेद क्लब’ में रात्रि विश्राम की व्यवस्था भाई महिपाल निमबारा द्वारा करवाई गई थी। जोधपुर भी डैस सिटी है और यहां पूरी तरह से डैन का नेटवर्क काम कर रहा है। ‘उम्मेद क्लब’ की स्थापना सन् 1922 में हुई थी अतः आज भी इसकी आन-बान और शान में कोई कमी नहीं दिखाई देती है, वही रजवाड़ा पन आज भी बरकरार है। यहां ठहरना भी एक अलग अनुभव का एहसास करवाता है। चेतना यात्र-9 के द्वितीय भाग को यहीं विराम देते हैं, यहीं से चेतना यात्र-9 के तीसरे भाग को शुरू करेंगे, क्योंकि एक नया बदलाव शुरू हो रहा है यहां से। यात्र के इस भाग में हिमाचल से जम्मू जाते हुए एक बन्दर पकड़ने वाला भी पिंजड़ा लगाए मिला था, जिसके पिंजड़े में दो बन्दर खाने के लालच में फंस गए थे, लेकिन बाकी बन्दर भाग गए थे। दूसरी जगह पिंजड़े में कोई बन्दर नहीं फंसा, शायद उसकी गाड़ी में बन्द बन्दरों ने बाहर के बन्दरों को बचने के लिए कोई मूक सन्देश दे दिया था। यात्र में ऐसे अलग-अलग अनुभव मिलते ही रहते हैं, जिन्हें पाठकों तक पहुंचाने का आनन्द हम भी लेते है। आगे की स्मृतियों के लिए तीसरे भाग की प्रतीक्षा करें।

(प्रथम भाग)
‘चेतना यात्रा-9’
रामगढ़ का किला
यात्रा के प्रथम भाग को रामगढ़ के किले तक ही ले जा सके थे, लेकिन यह किला सामान्य से थोड़ा हटकर इसलिए भी हो गया है, क्योंकि किले की आन-बान व शान को बनाए रखने के लिए उनके वंशज ही अभी भी वहीं मौजूद हैं। उन्हीं की जायदाद है और वही उसकी पूरी देखरेख भी करते हैं। मध्यप्रदेश में स्थित खजुराहो से शुरू होती है रामगढ़ के किले की कहानी जिसे चन्देलों ने बनाया व बसाया था, ऐसा कहना है उनके वंशज अमिताभ चन्देल का। खजुराहो से चन्देलों का एक परिवार हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में आकर बसा था, उनका ही एक भाई बिलासपुर से सन् 1640 में रामगढ़ आया था, जिन्होंने यहां रहने के लिए यह किला बनवाया था। उस समय के हालातों में अपनी सुरक्षा को देखते हुए समर्थ-सक्षम घराने इसी तरह से अपनी रिहाईशें बनवाया करते थे। अपने ही सुरक्षा सैनिक और ट्रांसपोर्ट के लिए हाथी, घोड़े और ऊंटों को रखने का प्रचलन था। उनकी 14वीं पीढ़ी अमिताभ चन्देल एवं अमिताभ के पिताजी अर्थात् चन्देल वंश की 13वीं पीढ़ी कुंअर मोहन सिंह जी से हुई बातचीत में कई ऐतिहासिक जानकारियां प्राप्त हुई। पिछले दस वर्षों से रामगढ़ के इस किले को एक हैरिटेज होटल का रूप दे दिया गया है। पूर्व में किले का यह भाग जनानखाना कहलाता था। इसकी दीवारें 18 फुटी हैं, जबकि आज के मकानों में 4 इंची दीवारों की भी चिनाई की जाती है। इस किले का प्रवेशद्वार 37 फुट ऊंचा है। अमिताभ चन्देल का दावा है कि भारत में इतनी ऊंचाई वाला यही एक मात्र प्रवेश द्वार है, ऐसा लिम्का बुक ऑफ रिकॉडर््स में भी दर्ज है।
खुशमिजाज-मिलनसार स्वभाव के अमिताभ चन्देल जो कि पूर्वजों की यह धरोहर सम्भाल रहे हैं, उनसे बातकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि चन्देल वंश की 14वीं पीढ़ी से बात की जा रही है। कहीं से भी कोई घमण्ड उनमें दिखाई नहीं दिया, बिल्कुल आम आदमी की ही तरह उन्होंने बातों का जवाब दिया। एम-कॉम-, एल-एल-बी- अमिताभ से जब उनकी पढ़ाई के लिए पूछा गया तो बड़ी सादगी से उनका जवाब था, कि पढ़ाई - - - एम-कॉम-, एल-एल-बी- लेकिन पता नहीं क्यों की। पढ़ने का मतलब अभी भी तलाश रहे हैं वो। अमिताभ! अपना नाम बताते हुए वह स्पष्ट कर देते हैं कि बच्चन नहीं, बल्कि अमिताभ चन्देल। रामगढ़! लेकिन शोले वाला नहीं, हां उससे काफी कुछ इस रामगढ़ में भी मिलता है। यहां भी शोले के ब्लाइन्ड मौलवी (ए-के- हंगल) जैसे एक ब्लाइन्ड मौलवी हैं। रामगढ़ की सबसे खास बात जो उन्होंने बताई वह यह है कि यहां जो रामलीला कमेटी है उसका अध्यक्ष एक मुस्लिम है।पुरानी कारों के शौकीन अमिताभ के पास रोल्स रॉयल भी है। वह टेनिस खिलाड़ी हैं और हर छह महीने बाद टूर्नामेंट भी करवाते हैं। मीठा और घी उन्होंने बिल्कुल त्याग रखा है, लेकिन गान्धी जी ने नमक भी त्याग रखा था, जो अभी वह नहीं कर सके हैं। उनकी इच्छा 120 वर्ष जीने की है, इसीलिए अपनी शारीरिक क्षमता की परीक्षा भी वह लेते रहते हैं। उन्होंने किले में एक रस्सी बांध रखी है, जिसे पर चढ़कर कोई घण्टी बजाएगा तब उसके लिए पांच दिन किले में रहना-खाना फ्री होता है। इस तरह की अनेक बातें रामगढ़ के किले में खाने की मेज पर चन्देलों के वारिस अमिताभ चन्देल से कर यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली।

(तृतीय भाग)
‘चेतना यात्रा-9’
जोधपुर से आगे मुम्बई तक
राजस्थान में खासी गर्मी पड़ रही थी, लेकिन यह क्षेत्र पूर्णतया मरूस्थल सा भी बीच-बीच में दिखाई देता है। जोधपुर से आगे बढ़ते ही मौसम में काफी बदलाव आ गया और बारिश शुरू हो गई। कई जगह तेज बारिश भी मिली लेकिन जोधपुर से उदयपुर का रास्ता पहाड़ी घुमावदार एवं फोर लेन वाला होने के कारण समय से उदयपुर पहुंच गई यात्र। उदयपुर में केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ मीटिंग रखी हुई थी वहां के प्रमुख ऑपरेटर अजय पोरवाल ने। पोरवाल उदयपुर में नगर निगम सदस्य (काऊन्सलर) भी हैं। उन्होंने यात्र विश्राम के लिए वहां के सर्किटि हाउस में व्यवस्था की हुई थी। उदयपुर का सर्किट बिल्कुल प्राइम लोकेशन पर स्थित है, जहां से उदयपुर की प्रमुख लेक का नजारा बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है। यहां की बॉलकनी में बैठकर पूरा दिन भी गर झील को निहारा जाए तो भी समय गुजरने का पता ही नहीं चलेगा।
उदयपुर के चैम्बर ऑफ कॉमर्स में ऑपरेटरों की मीटिंग रखी गई थी, जहां भारी संख्या में आए थे ऑपरेटर। मीटिंग में यात्र का भव्य मेवाड़ रिवाजनुसार पगड़ी पहनाकर स्वागत किया गया। ऑपरेटरों के साथ इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर विस्तार से बातें हुई। अभी उदयपुर डैस सिटी नहीं है, जबकि जोधपुर में डैन नेटवर्क के द्वारा ही डैस के अन्तर्गत सर्विस दी जा रही है, लेकिन उदयपुर में मोनोपॉली नहीं है। ऑपरेटरों को आपस में संगठित रहने का संदेश देकर यात्र झीलों के शहर उदयुपर से आगे के लिए रवाना हुई। यहां से आगे गुजरात का सफर शुरू हो जाएगा। बारिश भी यात्र के साथ-साथ राजस्थान से ही आगे-आगे चलने लगी है, अतः उदयपुर से हिम्मतनगर पारकर जैसे ही अहमदाबाद पहुंची यात्र कि जोरदार बारिश भी शुरू हो गई। अहमदाबाद में शाम की ही मीटिंग रखी गई थी। डैस के द्वितीय चरण के अन्तर्गत अहमदाबाद सिटी भी आती है। यहां जीटीपीएल एवं इन केबल डैस सेवा उपलब्ध करवा रहे हैं, लेकिन दोनों ही एमएसओ के साथ जुड़े हुए केबल टीवी ऑपरेटर मीटिंग में शामिल हुए।
ऑपरेटरों की संख्या भारी बारिश के बावजूद भी काफी थी। मीटिंग के बीच लाइट चले जाने के कारण थोड़ी असुविधा अवश्य हुई, लेकिन ऑपरेटरों के होसलों में कोई कमी नहीं दिखाई दी। पूरे जोश में भरे हुए दिखाई दे रहे थे अहमदाबाद के ऑपरेटर। इन केबल टीवी ऑपरेटरों में जोश तो पूरा भरा हुआ दिखाई दे रहा था, लेकिन दिशा की कमी भी साफ दिखाई दे रही थी। सबको जोड़ने व जागने का संदेश देकर मीटिंग सम्पन्न तो हो गई, लेकिन ऑपरेटरों की जिज्ञासा खत्म नहीं हुई, अतः मीटिंग के बाद भी उन्हीं के साथ देर तक बैठना हुआ। गुजरात में वहां के प्रमुख बापू भाई के कनक सिंह राना से आज भेंट के लिए समय ही नहीं मिल सका। अगली सुबह कनक भाई राजकोट रवाना हो गए, जबकि यात्र का रूट भी राजकोट का ही था। अतः राजकोट में बापू के साथ वहां के अन्य ऑपरेटरों के संग मीटिंग कर यात्र जूनागढ़ के लिए रवाना हो गई। राजकोट भी डैस के द्वितीय चरण में शामिल है। यहां भी जीटीपीएल की प्रतिस्पर्धा में डैन नेटवर्क चलता है।
गुजरात में चार सिटी अहमदाबाद, राजकोट, वडोदरा और सूरत डैस के द्वितीय चरण में शामिल है, जबकि राजस्थान की दो ही सिटी जयपुर व जोधपुर डैस के द्वितीय चरण में आती हैं। गुजरात में केबल टीवी ऑपरेटरों में डैस को लेकर बहुत उत्साह तो दिखाई दे रहा है, लेकिन करना क्या हैं\ इस सवाल का जवाब उन्हें भी नहीं मालूम है। उन्हें आपस में संगठित होने एवं नींद से जाग जाने के संदेश से ज्यादा कुछ दिया भी नहीं दिया जा सकता है। ऑपरेटरों को एनालॉग की तरह धींगा मस्ती से बाहर निकल आने का समय अब आ गया है, अतः बिजनेसमैन बनो का भी संदेश उन्हें देने का प्रयास किया जाता है। राजकोट से जूनागढ़ पहुंच कर ऑपरेटरों के साथ भी कनक सिंह राना ने एक मीटिंग करवाई, लेकिन यहां ऑपरेटरों में वह उत्साह नहीं दिखाई दिया। आज बड़े बेटे अनुराग का जन्मदिन भी है, जिसमें मैं शामिल नहीं हो पाता हूं। लगातार उसका यह 9वां ऐसा जन्मदिन है, जब मैं उसके साथ नहीं होता हूं, साथ ही उसका छोटा भाई अमन भी यात्र में मेरे साथ होने के कारण अनुराग के जन्मदिन में शामिल नहीं हो पता है। सबसे छोटा अकुंश भी न्यूजीलैंड में होने के कारण बीते चार सालों से अनु के जन्मदिन पर साथ नहीं हो पता है। भाईयों की गैर हाजिरी भी अपने जन्मदिन पर अनु को हमेशा खलती ही होगी।
जूनागढ़ में भी भारी बारिश बनी हुई है, अतः आगे का रास्ता और भी कठिन हो सकता है बारिश के कारण। कनक भाई जूनागढ़ तक यात्र में शामिल होने के बाद वापिस अहमदाबाद चले गए। जूनागढ़ में अभी एनालॉग सिस्टम ही चल रहा है, क्योंकि यहां का नम्बर डैस के तृतीय चरण में आयेगा। यह एक हिस्टोरिकल शहर है, यहां की इमारतें अभी भी अपनी कहानियां सुनाती प्रतीत होती हैं। जूनागढ़, सोमनाथ और गीर अपने आप में एक इतिहास हैं। इसी क्षेत्र में एशिया के शेर अर्थात लायन पाए जाते हैं। लायन देखने के लिए जूनागढ़ से यात्र आगे बढ़ते हुए सासणगीर पहुंचती है। रास्तेभर लगातार बारिश होती रही। सासणगीर में वन विभाग के टूरिस्ट कैम्पस में ही विश्राम किया। यहां वन विभाग में नए भर्ती किए गए फॉरेस्ट गार्ड फॉरेस्ट की 5 दिवसीय ट्रेनिंग चल रही है, इनमें लड़के व लड़कियां दोनों ही शामिल हैं। 5 दिनों की ट्रेनिंग में उन्हें वनस्पति, जंगल, जानवरों के साथ-साथ जानवरों के साथ इंसानों के रिलेशन के बारे में भी जानकारी दी जाती है। प्रकृति के साथ मानव संबंधों व प्रभाव के बारे में भी बताया जाता है एवंम ग्रामीण वासियों के साथ वन विभाग के कर्मचारियों का व्यवहार कैसा होना चाहिए उसके लिए भी इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। 5 दिनों की कड़ी ट्रेनिंग व दिनचर्या के बाद सभी ट्रेनर कर्मचारियों की जिम्मेदारी उन्हें सुपुर्द कर दी जाएगी, इस तरह कुछ और वन्य कर्मचारियों की संख्या बढ़ जाएगी। यहां के रेन्जर साहब से भेंट नहीं हो सकी, लेकिन दो दिन के प्रवास में बारिश के बावजूद भी एशिया लायन हमें वहां के एक गांव तलाला के निकट बहती हिरन की नदी के किनारे देखने को मिल ही गए। यहां गाड़ी का एक टायर भी पूर्णतया क्षमिग्रस्त हो गया। बारिश में भीगते-भीगते जब गाड़ी का टायर बदला जा रहा था, तभी एक लायन गाड़ी के पीछे से होकर सड़क पार करके गया एवं एक और लायन थोड़ी देर बाद उसी मार्ग से नदी की दिशा में सड़क पार कर उतर गया। हालांकि लगातार हो रही बारिश में लायन दिखने की संभावनाएं बिल्कुल नहीं थीं, लेकिन यात्र का स्वागत करने जैसे वह भी निकल आये। तलाला गांव के केबल टीवी ऑपरेटरों जितेन्द्र एवं दिनेश के साथ दीव के ऑपरेटर अरूण एवं धर्मेश भी दीव से तलाला आ गए थे। डैस पर जानकारी लेने के लिए ऑपरेटर अब हिलने-डुलने लगे हैं। इसीलिए दीव से आए ऑपरेटरों सहित तलाला के ऑपरेटर दिनेश के फार्म हाउस पर बैठक की गई।
बैठक में डैस पर डिस्कशन एवं इण्डस्ट्री की भावी संभावनाओं पर चर्चा के बाद दीव वाले ऑपरेटर वापिस दीव चले गए और चेतना यात्र मुख्य मार्ग से वापिस जूनागढ़ मार्ग से होते हुए राजकोट, अहमदाबाद एक्सप्रेस वे से वडोदरा पहुंची। यह पूरा क्षेत्र प्रकृति की अद्भूत कृपा का पात्र बना हुआ है। यहां की जमीन बहुत उपजाऊ है। आमों की विशेष प्रकार की केसर आमों का उत्पादन यहीं पर होता है। कपास, गन्ना, नारियल, मूंगफली, गेंहू यहां बहुतायत में होता है। पशूधन की यहां कोई कमी नहीं है। भेड़-बकरियों सहित गाएं व भैंसे भी यहां हर घर में पाली जाती हैं, अतः दिल्ली की तरह मिलावटी दूध की कतई गुंजाइश नहीं होती है। किसान समृ˜ है, उनकी वेशभूषा भी भिन्न है। चाय की दुकानों पर चाय बनते व परोसते देखना अलग सा लगता है, क्योंकि चाय की दुकानों पर जयाेंही ग्राहक पहुंचते हैं उनके हाथों में प्लेट पकड़ा दी जाती है और फिर उनकी प्लेट में केटली से चाय पलट दी जाती है, परन्तु जब हमने चाय रखकर मांगी तब प्लेट में प्लास्टिक के एक छोटे से ग्लास में चाय रखकर दी जाती है।
बेसन का सेवन यहां कुछ ज्यादा ही होते देखा गया। यहां के आटो कुछ विशेष प्रकार के होते हैं, उन पर बैठी सवारियाें भी आकर्षित करती हैं। चाय बनाने बेचने वाले हों या फिर गाय-भैंस-बकरियां चराने वाले उनके कानों में अलग तरह के झूमके देखे जा सकते हैं यहां। ऊंट गाड़ियों के साथ-साथ यहां बैलगाड़ियां भी देश के अन्य क्षेत्रें से अलग दिखाई देती है। लगातार कई दिनों से हो रही बारिश ने यहां का माहौल काफी बिगाड़ कर रख दिया है। सड़कें पानी में डूब गई हैं, नदी, नाले व नहरों सहित डैम भी ओवरफ्लो करने लगे तब हाई अलर्ट की चेतावनी देने के साथ डैम के कपाट भी खोलने पड़ गए हैं। अतः लोगों को अधिक पानी के कारण थोड़ी परेशानी भी उठानी पड़ी है, लेकिन इस वर्ष इस क्षेत्र में पानी की कमी भी दूर हो गई है। गुजरात की चारों डैस सिटी में से अहमदाबाद व राजकोट को कवर करने के बाद वडोदरा में जे-बी- गांधी सहित अन्य ऑपरेटरों के साथ वार्तालाप कर यात्र देर रात सूरत पहुंच गई। वडोदा-सूरत के बीच एक्सप्रेस वे पर जितना लम्बा जाम लगता है वैसा जाम देश के किसी भी हाईवे पर दिखने को अभी तक हमें नहीं मिल सका है। हरेक बार इस जाम में घण्टों खराब करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी नहीं है यहां से गुजरने वाले वाहनों के लिए, लेकिन इस बार भरूच के निकट एक्सप्रेस हाईवे से उतरकर ग्रामीण क्षेत्रें से गुजरते हुए अंकलेश्वर होकर गोल्डन ब्रिज को पार करते हुए काफी आगे निकल कर पुनः हाईवे को पकड़ कर देर रात सूरत पहुंच सकी यात्र।
सूरत भी डैस सिटी में शामिल है, अतः यहां भी डैस की अन्य सिटी की भांति एनालॉग प्रसारण बंद हो चुका है। यहां भी सैट्टॉप बॉक्स के बिना किसी भी टीवी को कोई सिग्नल प्राप्त नहीं हो रहे हैं। जीटीपीएल यहां भी नम्बर वन एमएसओ बना हुआ है, जबकि दूसरे नम्बर पर इन केबल है। सूरत में दो अन्य एमएसओ ने भी हैडेण्ड लगा रखे हैं। इनमें से एक एमएसओ डीएल नेटविजन के साथ तो जीटीपीएल की भागीदारी है, जबकि दूसरा एमएसओ देवश्री नेटवर्क पूर्णतया इण्डिपैंडेट है। इनके साथ-साथ यहां भी डैन ने अपनी मौजूदगी बना रखी है। डैस पर डिस्कशन के साथ-साथ यहां के केबल टीवी दर्शकों को भी डैस पर विशेष संदेश देकर यात्र गुजरात से महाराष्ट्र के लिए रवाना हो गई। सूरत को मिलाकर कुल ग्यारह डैस सिटी अभी तक कवर की जा चुकी है इस चेतना यात्र में। 5 सितम्बर को दिल्ली से रवाना हुई चेतना यात्र-9 अभी तक कुल दस राज्यों व एक यूनियन टैरिटरी (चण्डीगढ़) का सफर कर चुकी है, जबकि सितम्बर खत्म होने में अभी तक एक दिन और बाकी रह गया है। सूरत से सापूतारा पहुंची यात्र। सापूतारा को यहां की मसूरी या फिर नैनिताल कहा जा सकता है। महाराष्ट्र व गुजरात वालों के लिए यह एक बहुत ही खूबसूरत हिल स्टेशन है। यहां पहुंचने की सड़कें भी खासी घुमावदार पहाड़ी हैं। बड़ी सी झील के चारों ओर बड़े-बड़े होटल बने हुए हैं, वीकेन्ड पर टूरिस्ट की भीड़ यहां बढ़ जाती है। अबेर काफी हो चुकी सापूतारा पहुंचते-पहुंचते, अतः यहीं विश्राम कर अगले दिन नासिक रवाना हुई यात्र। गुजरात का आखिरी पड़ाव था सापूतारा एवं नासिक महाराष्ट्र की प्रथम सिटी है इस यात्र की। नासिक भी डैस सिटी में शामिल है। महाराष्ट्र के नौ शहरों को डैस के द्वितीय चरण की लिस्ट में जगह दी गई है। यहां डैन सब पर हावी है, लेकिन हाथवे-इन की भी मौजूदगी बनी हुई है।
केबल टीवी ऑपरेटरों को डैस की घुटन आभास होने लगी है, अतः उनकी एक्टिविटीज बढ़ने लगी हैं। अब ऑपरेटरों की नई-नई एसोसिएशन भी बनने लगी हैं या फिर डैड पड़ी हुई एसोसिएशन में हरकत शुरू होने लगी हैं। नूर भाई-अनिल गीटे आदि से भेंटकर यात्र महाराष्ट्र के दूसरे डैस शहर औरंगाबाद के लिए बढ़ चली। देर रात औरंगाबाद पहुंच पंचवटी होटल में विश्राम कर सुबह वहां के एक मात्र एमएसओ देवा दहले से पहले केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ भेंट की। औरंगाबाद केबल टीवी ऑपरेटरों के नेता देशमुख सहित नीलकण्ठ एवं अन्य ऑपरेटरों से भेंट करने के बाद एमएसओ से भेंट कर यात्र सीधे अहमदनगर के लिए रवाना हो गई, लेकिन नासिक व औरंगाबाद के ऑपरेटरों का डैस के प्रति रवैया सकारात्मक प्रतीत नहीं हुआ।
औरंगाबाद से सीधे अहमदनगर पहुंची यात्र। अहमदनगर डैस सिटी के अंतर्गत नहीं आता है, लेकिन यहां अहमदाबाद से आ रही जीटीपीएल की फीड चलती है। औरंगाबाद में एक काला ताजमहल भी टूरिस्ट के लिए बहुत आर्कषण रखता है, जबकि टूरिस्ट को अजन्ता-अलोरा की गुफाएं भी यहां आने के लिए आकर्षित करती हैं। अहमदनगर से पूना मार्ग पर ही अन्ना जी का गांव रालेगण सिद्धी पड़ता है, अतः अन्ना जी का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए यात्र अहमदनगर से सीधे रालेगण सिद्धी पहुंची। अन्ना जी के गुरूकुल आश्रम पहुंचे ही थे कि आश्रम से अन्ना जी की गाड़ी बाहर आ रही थी, उन्हें इस यात्र के बारे में बताते हुए उनके साथ कुछ पल भेंट की आग्रह किया तब उन्होंने अपने पीछे-पीछे आने के लिए हमें निर्देश दिया। उनकी गाड़ी के पीछे की गाड़ी में उनकी सिक्योरिटी वाले थे एवं उसके पीछे अपनी गाड़ी चल पड़ी। आश्रम से निकल कर अन्ना जी वहां स्थित अपने मीडिया सेन्टर पहुंच कर एक कुर्सी पर बैठकर बोले कि यहां ठीक है, हमने कहां कि ठीक है और अपने कैमरे-ट्राई पोर्ट लगा लिए।
अन्ना जी को चेतना यात्र-8 की प्रति भेंट करते हुए ग्लोबल वार्मिंग पर के प्रति लोगों को जागरूक करने की देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों की मुहिम के बारे में जानकारी देने के साथ-साथ एनालॉग से डिजीटल पर जाने के बारे में भी बताया गया। अन्ना जी ने पर्यावरण के प्रति किए जा रहे इस योगदान पर अपनी शुभकामनाएं भी लिखीं। उनका आर्शीवाद-शुभकामनाएं प्राप्त कर यात्र रालेगण सिद्धी से सीधे पूना के लिए रवाना हो गई।
पूना में आईसीसी प्रमुख एजाज ईनामदार के साथ सबसे पहले भेंट हुई। डैस पर उन्होंने अपनी प्रोग्रेस बताई, जबकि डैस से पूर्व भी उनका नेटवर्क हर मामले में नम्बर वन चल रहा है। बेसिल से ऑडिट करवाकर एवन क्वािलटी का सर्टिफिकेट भी उन्होंने प्राप्त किया हुआ है। टैक्नोलॉजी में एचडी के साथ-साथ अब वह थोड़ी भी अपने उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवा रहे हैं। इनके साथ जुड़े लास्टमाइल ऑपरेटरों में 10 हजार कनेक्शन वाला ऑपरेटर भी हैं तो मात्र 75 कनेक्शन वाला भी शामिल है। उनसे डैस पर डिस्कशन के बाद यात्र का स्वागत बाबा शेख ने किया। पूने में आईसीसी के साथ-साथ बाबा शेख इण्डिपैन्डेंट एमएसओ हैं। हाथवे-डैन-इन-जीटीपीएल के अतिरिक्त साईं केबल एवं एक क्फि़्रस्टल केबल भी यहां एमएसओ के रूप में मौजूद है। केबल टीवी ऑपरेटरों की संख्या भी तकरीबन 600 से अधिक है यहां। पूने-मुम्बई के बिल्कुल निकट होने के कारण डैस सिटी के रूप में अति महत्वपूर्ण हो जाता है। महाराष्ट्र में एण्टरटेनमेंट टैक्स एक बड़ी समस्या बन गया है, जिसको लेकर ऑपरेटर ज्यादा परेशान हैं। हालांकि सैफ फॉर्म तो तकरीबन भरवाए ही जा चुके हैं, लेकिन चैनल च्वॉईस के लिए पैकेजों का काम की अभी शुरूआत भी नहीं हुई है। चेतना यात्र-9 का गर्मजोशी के साथ स्वागत कर भाई बाबा शेख ने कुरान शरीफ की एक हिन्दी प्रति भेंट की। बाबा शेख ने मृत्युंजय एवं सम्भाजी पुस्तक की हिन्दी प्रति भी भेंट की। बाबा शेख यहां की एक सहकारी बैंक के चेयरमैन बनाए गए हैं, इसके लिए उन्हें बधाई देने वालों का तांता लगा होने के बावजूद भी उन्होंने यात्र के स्वागत के लिए पूरा समय निकाला। बाबा शेख के यहां मीडिया प्रो के प्रतिनिधियों से भी भेट हुई एवं लेटना के विकास कंवर भी मिले। इन सबके साथ डैस पर बात कर यात्र पूने से पिम्परी के लिए रवाना हो गई। पूना में भेंट करने वालों में सबसे पहला शख्स पूर्व मित्र एक्टिविस्ट केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए लम्बी लड़ाई लड़कर थक चुका वसंत पटवर्धन था। वसंत को जैसे ही पता लगा कि यात्र पूने पहुंच रही है, वह मुम्बई से सीधे पूना पहुंचे और सुबह सबसे पहले भेंट की। वसंत भाई ने महाराष्ट्र के केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है और उस संघर्ष में काफी कुछ गंवाना भी पड़ा है। अब वह इण्डस्ट्री से बाहर है, लेकिन इण्डस्ट्री से लगाव में कोई कमी नहीं है।
पूना से पिम्परी पहुंचने पर गोपी भाई ने यात्र का जोरदार स्वागत किया। गोपी पिम्परी में डैन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन पिम्परी में भी डैन-ईन-हाथवे एवं पीसीएस कुल चार एमएसओ हैं। डैन का कंट्रोल रूम पिम्परी में ही लगा हुआ है। यहीं से सोलापुर, पूना व पिम्परी चिंचवाड़ कवर होते हैं। यहां ढ़ाई लाख के लगभग सैट्टॉप बॉक्स केबल टीवी के लगे होंगे तो तकरीबन चार लाख डीटीएच भी लगा हुआ है। यह स्थिति केबल टीवी के लिए ठीक नहीं कही जा सकती है। इसी तरह से औरंगाबाद में भी एक ही एमएसओ (हाथवे) है, लेकिन दो सौ केबल टीवी ऑपरेटर होने के बावजूद केबल व डीटीएच के बॉक्स बराबर संख्या में लगे हुए हैं, परन्तु औरंगाबाद में वीडियोकॉन की फैक्ट्री होने के कारण उनके ही एम्प्लाई की संख्या 20-25 हजार है, जिन्हें वीडियोकॉन का डीटीएच लगाना मजबूरी होती है, क्याेंकि उनकी सैलरी से डीटीएच का पैसा कट जाता है, परन्तु पिम्परी में ऐसी कोई वजह नहीं है। 2 अक्टूबर को गोपी भाई ने पिम्परी में एक राऊण्ड टेबल डिस्कशन का कार्यक्फ़्रम रखा जिसकी विशेषता यह रही कि एक-दूसरे के कम्प्टीटर एमएसओ के साथ-साथ सभी एमएसओ के प्रमुख केबल टीवी ऑपरेटरों को भी बुलाया गया। जानकारियों के अभाव में बहुत सारी गलतफहमियां इस गोल मेज सम्मेलन में दूर की गईं। बहुत ही पॉजीटिव रही यह डिस्कशन ऑन डैस। पिम्परी से मुम्बई मार्ग पर थाने के एमएसओ जेवी मंगेश के साथ भेंटकर नवी मुम्बई-कल्याण होकर मुम्बई पहुंच गई यात्र। सितम्बर पूरा बीत चुका और अब अक्टूबर का दूसरा दिन यानिकि 2 अक्टूबर पूर्ण छुट्टी के दिन काम करते हुए यात्र महानगरी मुम्बई पहुंच गई है। चेतना यात्र-9 के तृतीय भाग को यही विराम देते हैं, यहां से आगे चौथे भाग को मुम्बई से ही शुरू किया जाएगा, अतः पाठक गण अगले अंक की प्रतीक्षा करें।
पूना में आईसीसी प्रमुख एजाज ईनामदार के साथ सबसे पहले भेंट हुई। डैस पर उन्होंने अपनी प्रोग्रेस बताई, जबकि डैस से पूर्व भी उनका नेटवर्क हर मामले में नम्बर वन चल रहा है। बेसिल से ऑडिट करवाकर एवन क्वालिटी का सर्टिफिकेट भी उन्होंने प्राप्त किया हुआ है। टैक्नोलॉजी में एचडी के साथ-साथ अब वह थोड़ी भी अपने उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवा रहे हैं। इनके साथ जुड़े लास्टमाइल ऑपरेटरों में 10 हजार कनेक्शन वाला ऑपरेटर भी हैं तो मात्र 75 कनेक्शन वाला भी शामिल है।

2 अक्टूबर को गोपी भाई ने पिम्परी में एक राऊण्ड टेबल डिस्कशन का कार्यक्फ़्रम रखा जिसकी विशेषता यह रही कि एक-दूसरे के कम्प्टीटर एमएसओ के साथ-साथ सभी एमएसओ के प्रमुख केबल टीवी ऑपरेटरों को भी बुलाया गया। जानकारियों के अभाव में बहुत सारी गलतफहमियां इस गोल मेज सम्मेलन में दूर की गईं। बहुत ही पॉजीटिव रही यह डिस्कशन ऑन डैस।

(चौथा भाग)
चेतना यात्रा-9
मुम्बई से हैदराबाद तक
डिजीटलाईजेशन के प्रथम चरण में दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता व चैन्नई चारों महानगरों में एक नवंबर 2012 से केबल टीवी संशोधित एक्ट 2012 लागू हो गया था, लेकिन पालन केवल दिल्ली व मुम्बई में ही शुरू हुआ था। कोलकाता में त्यौहारों के बाद अमल करने की बात हुई थी, जबकि चैन्नई पर कोई निर्णय ही नहीं हो सका था। अभी भी चैन्नई में डैस के लिए बना कानून लागू नहीं करवाया जा सका है, लेकिन कोलकाता में इम्प्लीमेंट हो रहा है। कोलकाता में भी दिल्ली व मुम्बई की तरह एनालाग प्रसारण बंद करवा दिया गया है।
ट्राई के निर्देशानुसार दिल्ली में सैफ फार्म सहित उपभोक्ताओं से चैनल च्वाईस या निधि उनकी च्वाईस के अनुसार चैनलों के बुके पर भी उपभोक्ताओं से उनकी सहमति ले ली गई है। अर्थात उन्हें किस सैटटॉप बॉक्स पर कितने रुपए वाला चैनलों का पैकेज लेना है यह भी तय किया जा चुका है एवं इसी हिसाब से ही उपभोक्ताओं से मासिक वसूली भी शुरू की जा चुकी है। चैनलों के भिन्न पैकेजों के अनुसार पैसा वसूलने के साथ-साथ सरकार का टैक्स भी वसूला जाने लगा है, जबकि चार मेट्रो सिटी के बाद एक अप्रैल 2013 से देश की 38 सिटी और डैस के कानून के अर्न्तगत आ गई है, वहां भी एनालाग प्रसारण बंद करवा दिया गया है।
स के प्रथम चरण में शामिल महानगरी मुम्बई भी दिल्ली की ही भांति आगे बढ़नी चाहिए थी, लेकिन दिल्ली की तरह वहां अभी चैनलों की च्वाईस पैकेजों की शुरुआत ही नहीं हो सकी है, इसीलिए पूरे महाराष्ट्र में केबल टीवी ऑपरेटरों में एण्टरटेनमेंट टैक्स को लेकर खलबली मची हुई है। महाराष्ट्र में 45 रुपए प्रति सब्स्क्राईबर प्रतिमाह एण्रटेनमैंट लगा हुआ है, जबकि केंद्रीय सरकार का 12ण्36: और द्वितीय चरण में शामिल हो गई है, अतः ऑपरेटरों में डैस के प्रति ज्यादा चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। अब वहां एकता संगठन की बातें आवश्यक समझी जा रही है। महाराष्ट्र केबल ऑपरेटर्स फैडरेशन (डब्व्थ्) का नेतृत्व मुम्बई के वरिष्ठ केबल टीवी ऑपरेटर अरविंद प्रभु कर रहे हैं। अरविंद प्रभु से मिले बिना मुम्बई से आग यात्र को ले जाना उचित नहीं लगा, अतः उनकी प्रतीक्षा में शाम तक हाईकोर्ट में थे। हाईकोर्ट में एण्टर टैनमेंट टैक्स को लेकर सरकार की ओर से जवाब दाखिल किया जाना था, लेकिन वहां से आज खाली हाथ ही वापिस आना पड़ा प्रभु को, क्याेंकि सरकार द्वारा जवाब दाखिल नहीं किया गया। शाम को महाराष्ट्र केबल ऑपरेटर्स के सदस्यों से बैठक हुई तब डैस पर जानकारियों का आदान-प्रदान हुआ। दरअसल बहुत सारी समस्याएं अधकचरे ज्ञान के कारण ही हैं इस इण्डस्ट्री में डैस को लेकर ऑपरेटर भ्रमित ज्यादा हैं, जबकि गम्भीरता से देखा जाए तो इसके लाभ ज्यादा हैं। बात ठीक तरह से लागू किए जाने की है।
टैक्स के मामले में भी महाराष्ट्र में जो लड़ाई चल रहीं है वह भी लीक से कुछ हटकर ही है। डैस पर आए कानून के अर्न्तगत टैक्स जमा करने की जिम्मेदारी एम एस ओ पर डाली गई है, लेकिन महाराष्ट्र में केबल टीवी ऑपरेटर का मानना है कि उनसे यह अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए, अर्थात टैक्स भरने का अधिकार उनहें ही दिया जाना चाहिए। अभी महाराष्ट्र के ऑपरेटर टैक्स मामले पर ही अटके हुए हैं, जबकि दिल्ली पैकेजों के पार पहुंच गई है डैस के अन्तर्गत मुम्बई में अरविंद प्रभु व अन्य आपरेटरों के साथ डैस पर डिसकशन कर चैतना यात्र गोवा के लिए बढ़ चली। मुम्बई से कोंकण हाईवे पर लगातार बारिस साथ-साथ चलने लगी, गोवा बहुत दूर था अतः रात्रि विश्राम के लिए खेड के बाद चिपलूण के निकट रात्रि 3 बजे एक होटल वक्रतुण्ड में ठहरने की जगह तो मिल गई लेकिन खाने के बगैर ही रात काटनी पड़ी। बहुत ही हरियाली से भरा यह क्षेत्र पूर्णतया पोल्यूशन मुक्त प्रतीत हो रहा है। अगली सुबह फिर से गोवा की ओर बढ़ने लगी यात्र। चिपलून-रत्नागिरी-सावंतवाडी होते हुए शाम तक गोवा पहुंच गई यात्र। लगातार बारिस भी सारा रास्ते साथ चली और फिर गोवा में भी जमकर बरसती रही।
गोवा से कर्नाटक के लिए बढ़ते हुए धारवाड़-हुब्बली पहुंची यात्र, वहां आपरेटरों के साथ मीटिंग लेकर यात्र सीधे दावनगिरी पहुंची। लगातार सारे रास्ते बारिस रही दावणगीरी तक। दावणगीरी के आपरेटरों के साथ सुबह मीटिंग हुई तब ऑपरेटरों ने वहां के अन्य ऑपरेटरों को भी मीटिंग में बुलाने के लिए दोपहर बाद एक बड़ी मीटिंग करने के लिए तब तक रुक जाने जाने का आग्रह किया, अतः वहीं रुककर एक और बैठक कर शाम को दावणगीरी से सिमोगा पहुंची यात्र। कर्नाटक का यह क्षेत्र बहुत ही हरा-भरा एवं सम्पन्न है। प्रकृति का सौंदर्य यहां से गुजरने वाले का आकर्षित करता है। मन्दिरों में सजावट हो गई है। वह जगमगा रहे हैं क्योंकि नवरात्रें की धूम यहां भी पूरी दिखाई दे रही है। विजय दशमी पूर्व कर्नाटक में भी उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। यहां के कई शहरों में गरबा का भी आयोजन किया जाता है। सिमोगा में हाथियों की फुटबॉल का विशेष आयोजन था। रात्रि विश्राम ज्वैल राक होटल सिमोगा में किया, वहीं सुबह आपरेटरों के साथ मीटिंग ली और यात्र चिकमंगलूर के लिए रवाना हो गई। पोालिटकली देश की पूर्व प्रधानमंत्री रही स्वण् इंदिरा गांधी से चिकमगलूर का नाम जुड़ा हुआ है, क्योकि उन्होंने एक बार यहां से चुनाव लड़ा था।
चिकमगलूर के ऑपरेटर्स के साथ हाइवे पर ही मीटिंग कर यात्र बेलूर होकर सीधे हासन पहुंची। बेलूर के ऑपरेटरों से भी हाईवे पर ही भेंट की एवं हासन के आपरेटरों के साथ मीटिंग कर यात्र सीधो तुमकूर पहुंची। रास्ते में फिर से बारिस शुरू हो गई। पूरा क्षेत्र बड़ी घुमावदार सड़कों के साथ अति प्राचीन वृक्षों से घिरा हुआ है। तुमकुर का भी पोलिटिकली महत्व रहा है लेकिन एजुकेशन सिटी कहा जाता है तुमकुर शहर को। इस क्षेत्र में प्रमुख शहरों को किसी ना किसी रूप में विशिष्ट पहचान दी गई है। चिकमगलूर को कॉफी सिटी कहा जाता है। बंगलोर को गार्डन सिटी के नाम से भी जाना जाता है। कर्नाटक केबल टीवी आपरेटरों में डैस को लेकर चिंता है, वह एम एस ओ के साथ स्वयं को अब सुरक्षित नहीं मान रहे हैं। इसलिए उनमें आजाद होने के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। तुमकुर के आपरेटर सतीष के परिवार से भी भेंट की सतीष अन्य ऑपरेटरों के साथ मिलकर डिजीटल फीड चल रही है एवम् सेटटॉप बॉक्स लगाए जाने लगे हैैं। सतीष एवं सीमा शेखर आदि ने मिलकर बंगलौर में हैडेण्ड लगाया है। बंगलौर से ही फीड तुमकुर सहित अन्य नजदीकी क्षेत्रें को जा रही है। इनका हैडेण्ड ईडिजीटल कहलाता है।
तुमकुर से सीधे बंगलौर पहुंची यात्र बंगलौर में 6-7 एम एस ओ डैस को अर्न्तगत कार्यरत है। हाथवे-डैन अमोध एकट्रीया एवं इन केबल सहित ई-डिजीटल एवं आल डिजीटल भी वहां बड़े नेटवर्क बन गए हैैं, जबकि दो अन्य एम एस ओ ओर बंगलौर में डिजीटल सेवा उपलब्ध करवा रहे हैं। डैस के द्वितीयचरण में घोषित 38 शहरों की लिस्ट में कर्नाटक की कुल दो ही सिटी बैंगलौर एवं मैसूर ही शामिल है। मैसूर में डिजीटल फीड बंगलौर से ही पहुंचाई जा रही है। केबल टीवी ऑपरेटरों का कोआपरेटिव स्टाईल में डैस पर जाने का एक अच्छा नमूना बंगलौर में देखने को मिलता है। फिलहाल दो सौ आपरेटर आल डिजीटल में सहभागी बनकर डैस के अर्न्तगत पूर्णतया निजी नेटवर्क चला रहे हैं।
बंगलौर सबसे भेंट कर यात्र मैसूर पहुंची। हेरिटेज सिटी कहा जाता है मैसूर को। यह टीपू सुल्तान की नगरी है, यहां दशहरा उत्सव बड़ी धूूम-धाम से मनाया जाता है। यहां का दशहरा महोत्सव विश्वविख्यात है। बंगलौर-मैसूर मार्ग पर पड़ने वाली कई सिटी के नाम सिल्कसिटी, शुगर सिटी हिस्टौरिकल सिटी यानिकि हरेक सिटी को अपनी एक अलग पहचान दी गई है। मैसूर में बिजली की साज-सज्जा अलगी ही आकर्षण रखती है। दशहरा महोत्सव के दौरान रात के 10 बजते ही जगमगाती लाइटें बंद कर दी जाती है। दशहरा महोत्सव के आज के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए एक कलाकार के रूप में सिने अभिनेत्री हेमामालिनी आई हुई है। इसी तरह यहां हर रोज देश की जानी मानी हस्तियां शामिल होती है। 5 से 13 अक्टूबर तक चलने वाले इस दशहरा महोत्सव में आज मिका नाईट का कार्यक्रम है, जबकि पहले दिन शुरुआत प्रमुख टीवी कलाकार शान से हुई थी, कल हेमा मालिनी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए हर वर्ष देश के प्रतिष्ठित कलाकरों को बुलाया जाता है।
मैसूर के आपरेटर भी दशहरा महोत्सव में व्यस्त रहते है। रमा नाथन भी अति व्यस्त है, थोड़ी फुर्सत गाड़ी की सर्विस करवाने के लिए यहां निकाली और कपड़े भी लाण्ड्री करवाए। रमांनाथन के साथ मैसूर के सांसद श्री ए एच विश्वनाथन से भी भेंट हुई, उनकी शुभकामनाएं लेकर यात्र बांद्रीपुर टाईगर रिजर्व पार्क के लिए रवाना हो गई। जंगल में बने फारेस्ट हट््स में ही रात्रि विश्राम किया एवं सुबह-सुबह जंगलात की सवारी कैन्ट में जंगल की सैर की। यह जंगल बहुत विशाल है एवं तीन राज्यों कर्नाटक-तमिलनाडु व केरल में फैला हुआ है। वीरप्पन के मारे जाने के बाद अब जानवर भी पूरी आजादी के साथ यहां विचरण करते है। इस टाईगर रिर्जव पार्क में टाइगर, लेपार्ड, भालू जंगली भैंसे, जंगली कुत्ते, हाथियों के झुण्ड, हिरन, साम्भर, सूअर-बिज्जू आदि की भरमार है। बांस व लैन्टिना की झाड़ियों से हरा-भरा यह जंगल मैसूर से ऊटी मार्ग पर स्थित है। जंगल के अंदर सैर करने के लिए जंगलात के कैन्टर उपलब्ध हैं। हमने आज दो बार जंगल की सैर की एवं टाइगर-भालू के अतिरिक्त सभी कुछ देखने को मिला।
जंगल से निकलकर यात्र मुधुमलई टाइगर रिजर्व पार्क (तमिलनाडु) होते हुए सीधे सुल्तानबतेरी (केरल) पहुंची, जहां केरल की आपरेटर एसोसिएशन यात्र के स्वागत के लिए प्रतीक्षा में थी। केरल के तृतीय चरण में है लेकिन यहां डिजीटल की तैयारी पूरी जोरों पर है। सेटटॉप बॉक्स लगाए जा रहे हैं। केरल केबल टीवी ऑपरेटर एसो स्वयं यहां अपना डिजीटल हेडेण्ड आपरेटर कर रही है। जबकि अन्य एम एस ओ भी मौजूद है। केरल मीटिंग कर यात्र तमिलनाड़ु के ऊटी शहर के लिए रवाना हो गई। चारों ओर चाय, घूमती सर्पाकार सकरी सड़कों से गुजरते हुए रात का अंधेरा पूरी तरहस से धुंध से बदल चुका था। कोहरा इतना गहरा गया कि रास्ता दिखना ही बंद होता जा रहा था, यानिकि फोग के कारण विजीबिल्टी ना के बराबर रह गई। सड़कों पर बनी सफेद पट्टियों पर नजर गड़ाए किसी तरह गडूलूर तक ही पहुंच सकी आज यात्र। ऊटी कुल 50 किलोमीटर दूर रह गया था, अतः यहीं गुडूलूर में ठहरकर अगली सुबह आगे बढ़ने का निर्णय लिया गया।
एक छोटा सा कस्बा गुडूलूर तमिलनाडू का हिस्सा है। इस पूरे क्षेत्र में चाय-कॉफी के बागान, क्रिश्चन स्कूल व मस्जिदें बहुतायत में दिखाई देेते हैं बाजरों की रौनक भी अलग सा आकर्षण रखती हैं। गुडूलूर से यात्र के मार्ग को थोड़ा सा बदलना पड़ा, क्योंकि पहुुंचना पाण्डीचेरी है जो अभी बहुत दूर है। ऊंची मार्ग से कोयम्बटूर होते हुए सेलम जाने की अपेक्षा यहां से वापिस बान्दीपुर होकर गुण्डलपेट चामराज नगर मार्ग से सत्यमंग्लम भवानी होते हुए यात्र सेलम पहुंची। गडूलूर बिल्कुल केरल के निकट लेकिन तमिलनाडू में था जहां से आज यात्र रवाना हुई। वहां से बांदीपुर चामराज नगर कर्नाटक का हिस्सा है और सत्यमंग्लम से पुनः तमिलनाडू में प्रवेश कर गई यात्र। सेलम से अत्तूर होकर हाईवे 68 से होकर हाईवे 45 पर विल्लेपुरम से हाईवे 45 ए से सीधो पाण्डीचेरी पहुंच गई यात्र।
आज की यात्र कुछ विशिष्ट है, क्योकि आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे आकर मार्ग में परिवर्तन हुआ। तीन राज्यों को पार कर यू टी पाण्डीचेरी पहुंचा। पाण्डीचेरी में 12 अक्टूबर को मीटिंग का प्रोग्राम पूर्व निर्धारित था। तमिलनाडू में अभी डैस शुरू नहीं हो सका है, जबकि चैन्नई डैस के प्रथम चरण में था एवं कोयम्बटूर डैस के दूसरे चरण में लिस्टेड है। रात्रि विश्राम होटल जयराम पाण्डीचेरी में किया, जहां समुद्री तूफान फैलिन की खबरे लोगों को डराने का काम कर रहीे है। कई हिन्दी समाचार चैनलों पर तूफान की खबरे प्रसारित हो रही है। इस समुद्री तूफान को फैलिन नाम दिया गया है। इसका फोकस उड़ीसा व आंध्र प्रदेश के समुद्री किनारे हैं। इसी मार्ग पर या=रा ने बढ़ते हुए आगे निकलना है। हिन्दी समाचारों चैनलों को कई दिनों बाद पाण्डीचेरी में देखने का अवसर मिला, लेकिन समुद्री तूफान के साथ-साथ श्री मति सोनिया गांधी रिटायर्डमेंट नहीं लेंगी की खबरें ही दोनों दिनों में देखने को मिली। अयोध्या में सोमनाथ मंदिर की तरह ही मंदिर बनाए जाने के लिए होने वाली मीटिंग पर तीसरी खबर शुरू हो गई। इसके अलावा देश-दुनिया कहां हैण्ण्ण्कुछ नहीं मालूम। तूफान आने की समय सीमा एवं तूफान की दूरी भी चैनलों पर घटती जा रही है। क्या-क्या नुकसान हो सकता है अथवा क्या-क्या बचाव किए जा सकते हैं, पर पूर एक इ्र्रवेन्ट के तौर पर ले लिया गया है खबर्ची चैनलों ने।
पाण्डीचेरी के सभी एम एस ओ ने संयुक्त रूप से पूरी गर्म जोशी से यात्र को स्वागत किया। उनके साथ डैस पर भी लम्बी चर्चा हुई एवं पूरी जानकारी उन्हें दी गई, तत्पश्चात पाण्डीचेरी से चैन्नई के लिए रवाना हो गई यात्र। चैन्नई के मरीना बीच का दृश्य शायं पांच बजे अन्य दिनों से कुछ अलग नहीं प्रतीत हुआ। जबकि मीडिया द्वारा फैलिन तूफान की छह बजे भारतीय समुद्री तट से टकराने की घोषणा हुई है। तूफान की खबरों ने दशहरा उत्सव को भी फीका करके रख दिया है, जबकि आंध्रप्रदेश का ज्वलंत मुद्रा तेलगाना भी किसी कौने में सरका दिया गया है। तूफान की खबरों से इस पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल बना हुआ है। त्यौहार और तूफान के कारण यात्र चैन्नई में सीधे आगे आंध्रप्रदेश की और बढ़ चली। आंध्रप्रदेश में भी दशहरा उत्सव बड़ी जोर-शोर से मनाया जाता है। दशहरा उत्सव के देश में अलग-अलग रूप हैं।
मैसूर के दशहरा उत्सव को देखने के लिए दुनियाभर से टूरिस्ट आते हैं। उसी तरह से महाराष्ट्र, गुजरात में दशहरा के अवसर पर पूरे नौ दिन डाण्डिया चलता है। जिसका इंतजार सभी को होता है। बंगाल-उड़ीसा में नौ देवी पूजा की जाती है, जिसका विसर्जन देखने के लिए भी भीड़ की कमी नहीं होती है। तमिलनाडूु में बाजारों की रौनक वहां से गुजरने वालों को आकर्षित करती है। पेठा, फलों के जगह-जगह ढ़ेर लगे हुए है, साथ में केले के पेड़ों को भी बेचने के िलए रखा गया है। यहां दशहरा पर केले के पेड़ों व पत्तों से वाहनों व घरों को सजाया जाता है एवं पेठा नजर ना लगे के लिए सिंदूर आदि लगाकर फोड़ा जाता है।
दशहरा के अवसर पर तमिलनाडू से आंध्रप्रदेश में प्रवेश किया यात्र ने। केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ मीटिंग से भी ज्यादा इस समय दशहरा एवं तूफान महत्वपूर्ण हो गया है, जबकि यात्र समुद्र के उसी किनारे-किनारे चल रही है। जिस ओर ऊपर तूफान ने भारतीय समुद्री किनारे से टकराना हैै। तूफान के आने का आंखों देखा हाल जिस तरह से भिन्न समाचार चैनलों द्वारा बखान किया जा रहा है, शाम के 5 बजे चैन्नई के मरीना बीच पहुंच कर तो कतई सच नहीं प्रतीत हुआ, क्योंकि वहां समुद्री लहरों में रोजाना की तरह ही हलचल थी, जबकि चैनलों द्वारा तूफान के समुद्री तट से टकराने का समय शाम के छह बजे तय किया गया हुआ था।
चैन्नई के मरीन बीच को देखकर यात्र सीधे आंध्रप्रदेश की ओर बढ़ चली। आंध्रप्रदेश में इसी समुद्र किनारे पर बसे नैल्लौर शहर में विश्राम कर अलगी सुबह यात्र आगे बढ़ी। नैल्लौर के ऑपरेटरों से सुबह भेंट हो सकी, यहां एनालाग ही चल रहा है, लेकिन ऑपरेटरों को अगले साल 2014 में डिजीटल पर जाना होगा, यह उन्हें मालूम भी है और तैयारी भी कर रहे है। नैल्लौर सिटी में सभी मकान सफेद रंग के दिखाई देते हैं, एक प्रकार सारा शहर ही सफेद सा नजर आता है, जबकि देश के अन्य शहरों में आस-पास बने दो मकान भी एक रंग के मुश्किल से ही देखने को मिलते हैं। नैल्लौर से कावली-औंगल होकर हाइवे से गुण्टूर तक पहुंच कर यात्र का रूट आगे अंदरूनी रास्तों से तय करने का निर्णय लिया गया, क्योंकि आज दशहरा का पर्व है अतः हाईवे पर वह सब नहीं दिखाई देता है जो गांवों के रास्तों पर देखा जा सकता है। वैसे भी चैन्नई से चला एन एच 5 सीधे विशाखापट्नम तक समुद्र के किनारे-किनारे सुपरफास्ट यात्र के लिए बना हुआ है।
इस हाइवे से शहर साईड में ही रह जाते हैं, इसीलिए शहरों की रौनक विशेष तौर से दशहरा पर्व के अवसर पर बिल्कुल नजर नहीं आती है। इसीलिए इस एक्सप्रेस हाईवे को गुण्टूर से छोड़कर मृनालगोडा वाला मार्ग को पकड़ा गया। थोड़ी दूर जाने के बाद ही समझ में आने लगा कि एक गलत निर्णय ले लिया गया है, क्योंकि एक्सप्रेस वे से ग्रामीण रास्ते पर सड़क खराब मिली, जिसे स्वाभाविक मानते हुए यात्र आगे बढ़ने लगी, आगे और ज्यादा खराब होती गई सड़कें। सड़के आगे जाकर ठीक मिल जाएगी इसी उम्मीद पर इतना आग बढ़ चुके थे कि इतनी बड़ी बात नहीं थी, लेकिन जिस मार्ग से हम जा रहे हैं, वह सही मार्ग भी है या न हीं यह समझ पाना बहुत ही कठिन था, क्योकि उस मार्ग पर लोग ग्रामीण तेलगू भाषी थे वह अंग्रेजी भी नहीं समझते थे एवं शब्दों के उच्चारण भी बिल्कुल भिन्न थे।
इतना ही काफी नहीं था, बल्कि जिस मार्ग से यात्र गुजर रही थी, यह मार्ग नैक्सलैइट्स के लिए भी बहुत अनुकूल था। इसी मार्ग को पार करते-करते अंधेरा भी घना होता जा रहा था जबकि हमें कितना दूर किस दिशा में बढ़ना है यह भी ठीक से मालूम नहीं हो पा रहा था, फिर भी बढ़ते ही रहने के अतिरिक्त नैल्लौर से आरंभ हुई थी, नैल्लौर में आपरेटरों के साथ मीटिंग के बाद हल्का सा नाश्ता कर यात्र एन एच 5 से होकर बड़ी तेजी के साथ हाईवे पर गुण्टूर तक पहुंच गई थी, लेकिन गुण्टूर से सूर्यापेट पहुंचना इतना कठिन हो जाएगा अनुमान नहीं था। सूर्यापेट के लिए यूं तो विजियवाडा होकर एन एच 9 पकड़कर सीधे हैदराबाद वाला हाइवे मिल जाना था, लेकिन आंध्रप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रें में दशहरा पर्व को देखने की चाहत हमारे लिए अब एक चुनौती बन गई थी। सूर्यापट में यात्र के स्वागत की भव्य तैयारियों वहां के ऑपरेटरों ने की हुई थीं, वहां से राजेंद्र वी उपाला बार-बार फोन पर यात्र की जानकारी ले रहे थे, लेकिन फोन के सिग्नल भी सभी जगह नहीं मिल पा रहे थे। इन्ही दुविधाओं से निबटते हुए किसी तरह से अर्धरात्रि में सूर्यापेट पहुंच पाई यात्र। दशहरा की भीड़ वापिस अपने घरों को लौट रही थी, अब भोजन व रात्रि विश्राम के अलावा किसी स्वागत-सत्कार की चाहत नहीं रह गई थी। सूर्यापेट में अच्छा कहे जाने वाला होटल स्टाफ छुट्टी पर होने के कारण उपलब्ध नहीं था और जो मिला वह वहां ठहरने लायक नहीं था, बहरहाल दशहरा की यह रात्रि कुछ लम्बी जरूर हो गई लेकिन यह रात भी कि गई। सुबह सूर्यापेट मीटिंग के बाद यात्र सीधे मेन हाईवे से हैदराबाद के लिए रवाना हो गई। हैदराबाद में दशहरा उत्सव मनाया जा रहा था, यहां झांकियों की धूम थी, विसर्जन की तैयारियों चल रही थीं, सभी लोग पूरी छुट्टी पर थे। बाजार भी जल्दी ही बंद होने लगे थे, लेकिन दशहरा की झांकियों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, लोग एक-दूसरे पर गुलाल फेंक रहे थे, नाचते-गाते बहुत ही आकर्षक झांकियों को विसर्जन करने के लिए लोग निकल पड़े थे। हैदराबाद में सेवा सिंह जी के परिवार के साथ लंच कर यात्र चारमिनार होकर हैदराबाद शहर से बाहर मैडचल पहुंचकर विश्राम कर अगली सुबह वहां से आगे नागपुर के लिए रवाना हुई। हैदराबाद भी डैस सिटी है, लेकिन आपरेटरों से फोन पर ही सारी बातें हो सकी दशहरा उत्सव के कारण। यहां से आगे की यात्र अगले भाग में पढ़ियेगा तब तक के लिए दशहरा की शुभकामनाएं!!!

(पांचवां भाग)
चेतना यात्रा-9
हैदराबाद से कानपुर तक
आंध्रप्रदेश में दशहरा पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। दशहरा पर नौ दिनों के लिए भव्य झांकियों की सजावट शहरों में अपना अलग ही आकर्षण रखती है। हजारों लोगों की भीड़ उन झांकियों को देखने के लिए रोजाना उमड़ती है। दशहरा के दिन यह झाकियां विसर्जन के लिए ले जाई जाती है। प्रत्येक झांकी दूसरी झांकी से भव्य दिखाने का प्रयास किया जाता है। हैदराबाद में आज ही दशहरा है, इसलिए पूरा हैदराबाद भिन्न-भिन्न झांकियों के साथ सड़कों पर उमड़ा हुआ है। लोग नाचते, गाते, ढोल-मंजीरे बजाते हुए गुलाल उड़ाते अपनी-अपनी झांकियों के साथ टोलियों में विसर्जन के लिए जा रहे हैं। बहुत ही खूबसूरत झांकियों की सजावट है, अधिकांश दुकाने बाजार बंद हो गए हैं। पूरी तरह से सारा शहर दशहरा मय हो गया है।
हैदराबाद एक ऐतिहासिक शहर है। चार मिनार के साथ ही शिव जी का विशाल मंदिर भी स्थित है। इसके आस-पास का बाजार पूरा खुला हुआ है। इस बाजार में भारी भीड़ दिखाई दे रही है। हैदराबादी बिरयानी ही नहीं बल्कि हैदराबाद की पर्ल ज्वैलरी की मांग विश्वभर में होती है। यहां से सानिया मिर्जा ने खेल की दुनिया में विश्व पटल पर अपना नाम दर्ज करवाया जो बाद में एक पाकिस्तानी क्रिकेटर के साथ शादी कर वहां जा बसीं। एक कडुवाहट के साथ लिया जाने वाला नाम जनाब ओबेसी का भी है, जो खुलेआम हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं, वह भी यहां से अपनी घिनौनी नेतागिरी की दुकान चलाते हैं। हैदराबाद में भारी भीड़ सड़कों पर उमड़ी पड़ी है। सभी केबल टीवी ऑपरेटर भी दशहरा उत्सव में व्यस्त हैं। कुल आठ एम-एस-ओ यहां अपनी सर्विस दे रहे हैं। डैस के द्वीतीय चरण में यह शहर भी एक अप्रैल 2013 से शामिल हो गया है। अतः एनालाग प्रसारण यहां भी पूरी तरह से बंद है एवं बिना सैटटॉप बॉक्स के किसी भी टीवी को कोई चैनल नहीं मिल रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि एण्टरटेनमैंट टैक्स यहां केवल 4-3-2 रूपए प्रति उपभोक्ता ही लगा हुआ है। आंध्रप्रदेश में केबल टीवी पर एण्टरटेनमैंट टैक्स शहरों की श्रेणीनुसार लगा हुआ है, ए ग्रेड की श्रेणी में सबसे अधिक 4 रूपए प्रति टीवी तो बी ग्रेड की सिटी में 3 रूपए एवं शेष क्षेत्र में मात्र 2 रूपए प्रति टीवी लगा हुआ है। डैस के द्वितीय चरण में आंध्रप्रदेश के कुल दो ही शहर हैदराबाद एवं विशाखापटनम अभी कुल 38 सिटी में शामिल किए गए हैं। हैदराबाद से यात्र सीधे नागपुर जाएगी नागपुर अभी काफी दूर है, इसलिए दशहरा की धूम-झांकियों से निकलते हुए यात्र आंध्रप्रदेश से महाराष्ट्र नागपुर के हाईवे की ओर निकलकर मैडचल शहर जाकर रात्रि विश्राम कर प्रातः नेशनल हाईवे-7 से नागपुर के लिए रवाना हो गई। यह मार्ग बीच-बीच में बहुत ही खराब रहा, लेकिन हैदराबाद नागपुर तक ठीक-ठाक ही सफर हो गया थोड़ा सा नक्सलग्रस्त क्षेत्र भी है यह क्षेत्र, क्योंकि आंध्र-महराष्ट्र का बार्डर क्षेत्र है। अभी एक बड़ी वारदात से नक्सलवादियों ने यहां अपनी उपस्थिति भी दर्ज करवाई है।
नागपुर में बड़ी मीटिंग यात्र का स्वागत के लिए प्रतीक्षा कर रही थी, अतः समयानुसार यात्र कुशलपूर्वक नागपुर पहुंच गई। हैदराबाद में भी दशहरा केा लेकर विशेष सुरक्षा का बन्दोबस्त तो था ही लेकिन दशहरा से अगले दिन वहां भाजपा की बड़ी रैली भी थी जिसमें राष्ट्रीय स्तर के अनेक नेता आने वाले थे, अतः वहां सुरक्षा कुछ अतिरिक्त चाक चौबंद थी। नागपुर में भव्य स्वागत के बाद वहां ऑपरेटरों के साथ आयोजित बैठक में सीधे-सीधे उनके सवालों के जवाब देकर कन्फ्रयूजन दूर करने के प्रयत्न किए गए। शाम को दैनिक भास्कर के साथ एक भेंट और फिर रात्रि विश्राम कर प्रातः यात्र महाराष्ट्र के नागपुर शहर से छत्तीसगढ़ के लिए यात्र बढ़ चली। डैस के अंतर्गत द्वितीय चरण के लिए घोषित 38 शहरों में नागपुर का भी नाम शामिल है। महाराष्ट्र के नौ शहरों को डैस के द्वीतिय चरण में शामिल किया गया है, लेकिन पड़ौसी राज्य आंध्रप्रदेश में एण्टरटेनमैंट टैक्स लगा रखा है। इतना ज्यादा टैक्स लगाए जाने का पूरे महाराष्ट्र में विरोध किया जा रहा है, अतः यह भी एक बड़ा कारण है कि महराष्ट्र में डैस के अर्न्तगत शामिल किए गए नौ शहरों में डैस पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहा है। ऑपरेटरों व एम-एस-ओ के बीच भी टैक्स को लेकर तमाम भ्रम की स्थिती बनी हुई है। दैनिक भास्कर नागपुर में यात्र को लेकर प्रकाशित खबर के द्वारा भी भ्रम को दूर करने का एक सार्थक प्रयास करने की कोशिश की गई। नागपुर से भण्डारा तक मित्र प्रकाश दुबे जी भी यात्र में साथ रहे, उन्हें भण्डारा छोड़ यात्र आगे बढ़ चली। नागपुर की व्यवस्था भाई सुभाष बान्तै सहित नरेंद्र-गोटू भाई आदि के द्वारा की गई थी। जबकि हैदराबाद में स- सेवा सिंह एवं परिवार दशहरा पर्व का मेजबान रहा। नागपुर में दशहरा की धूम डाण्डिया कार्यक्रमों के कारण बहुत आकर्षक होती है, जो कि दो दिन पूर्व ही सम्पन्न हो गई। नागपुर से रायपुर को यह मार्ग भी महाराष्ट्र- छत्तीसगढ़ बार्डर पर है, अतः यह क्षेत्र भी अक्सर नक्सल वादियों की गतिविधियों के कारण खबरों में सुर्खियां बटोरता रहता है। बारहाल भण्डारा से होते हुए सीधे दुर्ग-भिलाई पहुंची यात्र। दुर्ग-भिलाई एक तरह से ट्विन शहर हैं। दोनों एक-दूसरे से बिलकुल सटेे हुए।
ऑपरेटरों के साथ भेंट कर यात्र सीधे रायपुर के लिए आगे बढ़ी क्योंकि रायपुर में ही छत्तीगढ़ के एक विशिष्ट टूरिज्म, शिक्षा, धर्मस्व, संस्कृति एवं पीडब्लूडी श्री ब्रजमोहन अग्रवाल जी के साथ एक भेंट वार्ता भाई प्रकाश दुबे जी के द्वारा तय की गई थी। रात्रि विश्राम रायपुर में ही किया गया क्योंकि मंत्री जी से भेंट के लिए समय रात के 11 बजे के बाद तय हुआ था। राजनीतिक जीवन देखने वालों को भले ही आनंद दायक दिखता हो लेकिन कठिन कम नहीं होता है। ब्रिज मोहन जी रात्रि 2 बजे तक लोगों से मुलाकात करते हैं और फिर सुबह से ही लोगों की उनसे मिलने के लिए भीड़ लग जाती है। आम जिन्दगी में एक दिन में ही थक्कर चूर हो जाएगा आदमी, लेकिन राजनीतिक जीवन को जीने वालों के लिए यही दिनचर्या होती है। रायपुर के ऑपरेटरों के साथ इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर मीटिंग लेकर यात्र छत्तीसगढ़ से उड़ीसा के लिए रवाना हो गई। छत्तीसगढ़ से उड़ीसा का यह मार्ग भी नक्सल ग्रस्त कहलाता है। आदिवासी क्षेत्र भी है, इसी मार्ग से सीधे सम्बलपुर पहुंच विश्राम किया।
सम्बलपुर से केन्दझुरगढ़ होकर सीधे वेस्ट बंगाल कोलकाता पहुंची यात्र। उड़ीसा में तकरीबन एक छत्र राज है, ओरटैल का। हालांकि डैस के अन्तर्गत उड़ीसा का अभी कोई शहर नहीं आया है, लेकिन ओरटैल कं- आरम्भ से ही डिजीटल पर काम कर रही है। उड़ीसा से निकलकर अब पड़ौसी राज्यों में भी ओरटैल ने अपना विस्तार किया है। बारहाल उड़ीसा से कोलकाता मार्ग भी भारी बारिश के कारण काफी क्षतिग्रस्त मिला। आखिरकार देर रात्रि में यात्र ने कोलकाता मे प्रवेश किया। कोलकाता में यात्र का स्वागत करने के लिए भाई सुरेश सेतिया आगे आए। उन्हीं के साथ रात्रि भोज एवं उनकी मेहमानवाजी में ही कोलकाता विश्राम हुआ। काली पूजा के कारण कोलकाता के ऑपरेटर धार्मिक कार्यक्रमों में अति व्यस्त दिखाई दिए। डैस के प्रथम चरण में शामिल कोलकाता में भी अब एनालाग प्रसारण पूर्णतया बंद हो चुका है। बिना सैट्टाप बॉक्स के किसी भी टीवी को कोई चैनल उपलब्ध नहीं है। लेकिन इससे आग अभी कोलकाता भी बढ़ न हीं सका है। दशहरा पर्व को मनाने का तरीका बंगाल में उत्तरभारत से बिलकुल भिन्न है, लेकिन मनाया बहुत जोर-शोर से जाता है। यहां बड़े-बड़े भण्डार सजाए जाते हैं। बांसो के पण्डालों के द्वारा जो झांकियां बनाई जाती है, वह बहुत ही आकर्षक अद्भुत होती है। नौ दिन, नौ देवियों की पूजा-अर्चना की जाती है। साऊण्ड सिस्टम पर देवी माता के भजनों की गूंज पूरे बंगाल में गूंजती है। हर गली मुहल्ले की अलग-अलग झांकियां सजती है। दशहरा के अवसर पर एक प्रकार से पूरा बंगाल वार्षिक जश्न में डूबा हुआ होता है। हाईवे पर तमाम टोलियां वहां से गुजरने वाले वाहनों से चंदा इकट्ठा करती है। देवी माता की नौ दिनों तक विशेष पूजा की जाती है। हजारों लोग रोजाना पूजा में शामिल होेते हैं, हर झांकी अपना विशेष आकर्षण रखती है, जिन्हें देखने वालों की भारी भीड़ उमड़ती है। इसी दौरान बंगाली लोग टोलियां में भ्रमण पर भी निकला करते हैं। देश के दूर-दराज क्षेत्रें में टूरिस्ट की संख्या तो इस समय बढ़ ही जाती है, लेकिन बंगाल के टूरिस्ट भी भारी संख्या में सभी टूरिसट जगहों पर देखने को मिलते हैं।
कोलकाता से यात्र वर्धमान होते हुए दुर्गापुर पहुंची, जहां एक बड़ी मीटिंग बलाई गई थी। दुर्गापुर के एक चर्च में मीटिंग की व्यवस्था की गई थी। इस क्षेत्र के आस-पास के क्षेत्रें में गरीबी की रेखा से नीचे की आबादी भी बड़ी संख्या में है। कुपोषण-भुखमरी व अभाव ग्रस्त परिवारों में ऐसे बच्चों की कमी नहीं जिन्हें जीविकापार्जन के लिए शैशवकाल से ही संघर्ष करना पड़ता है। अनेक बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते है। ऐसे अनेक बच्चों को यह चर्च गोद लेकर उनका लालन-पालन किया करता है। इसी चर्च में दुर्गापुर एवं दुर्गापुर के आस-पास के क्षेत्रें से आपरेटर मीटिंग में शामिल हुए। आपरेटरों को इण्डष्ट्री की भावी समभावनाओं पर जानकारियां देकर यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ती लेकिन अन्धेरा जल्दी घिर आया अतः रात्रि विश्राम के लिए भी यहीं रुकना पड़ा, क्योंकि आगे का सफर अंधेरे में करने वाला नहीं है। यह क्षेत्र पूरी तरह से नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। आदिवासियों के गांव भी इस मार्ग पर काफी हैं और थोड़ा लम्बा होते हुए चतरा डोबी मार्ग से झारखण्ड से बिहार प्रवेश कर पहुंचना है। इस मार्ग पर स्थित बस्तियों में रात का सन्नाटा कुछ ज्यादा ही प्रतीत होता है। लोग रात ढ़लते ही अपने-अपने घरों में सिमट जाया करते हैं। हालांकि पूर्व यात्रओं में हम देर रात भी इस मार्ग से गुजरे हैं, लेकिन रात में कहीं पहुंचने पर कोई होटल मिलने में बड़ी कठिनाई होती है। इसीलिए दुर्गापुर में ही रात्रि विश्राम कर अगली सुबह आग बढ़ी यात्र। धनबाद में कोयला किस तरह ढ़ोया जाता है, उसकी कई तस्वीरें हमने ली, एक साधारण सी सायकिल पर किस तरह कोयला लादकर ले जाते अनेक लोगों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कि प्रशासन जैसी कोई चीज है ही नहीं इस क्षेत्र में। कोयला ढ़ोने का यह रोजाना का सिलसिला कुछ ऐसा ही है, जैसे दूसरे क्षेत्रें में आदिवासी महिलाएं जंगल से लकड़ियां इकट्ठी कर बाजारों में ले जाकर बेचती हैं। इसी तरह से झारखण्ड में धनबाद एवं निकटवर्ती क्षेत्रें में खदानों से निकाल कर अपनी सायकिलों पर लाद कर रोजाना टनों कोयला बाजारों में लाते हैं। बाजारों में यह कोयला खरीददार इकट्ठा कर ट्रकों में भरकर रोजना बेचते हैं। बाजारों तक कोयला लेकर आने वालों से वहां बनी ग्राम निगररानी चौकियां खुलेआम अपनी निगरानी की कीमत लेती हैं, ऐसा दृश्य भी हमारे कैमरे ने कैद किया।
कोयला लादे हुए जिस तरह से ये सायकिल को खींचते हैं, वह इतना सरल काम न हीं है, हर किसी कि वश की भी बात नहीं है। उन्हें सायकिल पर कोयला ले जाते हुए देखकर कोई भी दांतो तले अंगुली दबा लेगा, लेकिन वहां तो यह सामान्य सी बात है, क्योंकि वहां रोजमर्रा की बाते हैं। एक तरह से पूरी चेन वहां कोयले के काम में लगी हुई है। जैसे-जैसे उनका जीवन ही कोयला हो गया हो। धनबाद से बोकारो मीटिंग लेकर बिहार जाने के लिए मार्ग थोड़ा और भी कठिन हो जाएगा, ऐसी झारखण्ड में ही जानकारी मिल गई। अजय सिंह एवं अन्य साथियों के साथ बोकारो में भेंट हुई, शीघ्र ही बोकारो से चन्दवा-चतरा होते हुए डोबी पहुंच गई यात्र। डोबी से गया के लिए हमने जीपीएस का सहारा ले लिया। जीपीएस के अनुसार मुंबई-कोलकाता हाईवे से जिस रास्ते पर यात्र चली गई, शुरू में नहीं पता लगा कि यह रास्ता आगे जाकर कैसा हो जाएगा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रें में से होकर जिस मार्ग पर जीपीएस हमे ले जा रहा था, वह आने वाले सम्भावित खतरों का संकेत भी साथ-साथ दे रहा था। अंधेरा आज कुछ समय से पहले ही गहरा गया था। सड़क के नाम पर गांवों में बैलगाड़ी-ट्रैक्टर निकलने के लिए कीचड़ भरे जो रास्ते होते हैं, कहीं-कहीं वह मिल जाते थे, वर्ना तो जीपीएस के दर्शाए जा रहे मार्ग से आग बढ़ते रहने के अलावा वहां किसी से भी यह पूछा नहीं जा सकता था, कि हम सही जा रहे हैं या नहीं। बीच-बीच में कहीं-कहीं सड़क बनती है उसकी तैयारियां भी दिखाई दे जाती थी, तब ऐसी उम्मीद भी हो जाती थी, कि शायद आगे रोड बनी मिल जाए, और कभी-कभी रोड़ का कोई टुकड़ा बना हुआ भी मिल जाता था। इस मार्ग पर दो-तीन जगह लालटेन की रोशनी में एक साथ कई लोगों को मीटिंग करते देखकर अजीब सा अहसास हुआ, लेकिन यात्र अपनी राह बढ़ती रही। मार्ग में गीदड़ कई जगह आगे-आगे दोड़ते मिल जाते थे, तो चिमगादड़े भी काफी संख्या में दिख रहीं थी और कुत्तों को रोने की कुकुश आवाज वातावरण को और भी भयावह किए जा रही थी, जबकि हमें, अब यह भी नहीं जान पड़ रहा था कि आखिर अभी कितनी दूर तक इस अंधेरे रास्ते पर आग बढ़ते रहना है। आगे से कहीं फिर वापिस तो नहीं आना पड़ेगा या आगे निकलने का मार्ग कहीं आगे जाकर बंद तो नहीं हो जाएगा, क्यांकि अब जीपीएस ने भी साथ छोड़ दिया था, क्योंकि टैलिफोन के सिग्नल ही उपलब्ध नहीं थे। इसी क्षेत्र के आस-पास अभी दो-चार दिनों के आस-पास एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया गया था, अतः रुकने की तो कोई गुंजाईश ही नहीं थी, लेकिन चलती हुई कोई गाड़ी अपनी लाइटों को कारण ऐसा कोई संकत नहीं देती है, कि यह गाड़ी लोकल नहीं बल्कि बाहर के किसी व्यक्ति की है, परन्तु एक बार भी रास्ता जानने के लिए अथवा किसी दूसरे कारणों से भी अगर गाड़ी को रोका जाता है, तब दूसरे को तुरंत पता लग जाएगा कि यह तो शिकार स्वयं मांद में आ गया है। गाड़ी के टायरों पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता था, क्योंकि गड्ढ़ों में जा-जा कर दो टायरों में फोड़े से निकले हुए हैं, वह दूर तक चल भी सकते है, और किसी भी गड्ढे़ पर बस्ट भी हो सकते हैं, तब की तब देखी जाएगी, फिलहाल तो गाड़ी में डीजल की सुई व जल चुकी डीजल की लाईटे ने भी चेतावनी दे दी है कि इसी बीच मोबाईल में कुछ हरकत हुई है, थोड़े से सिग्नल पकड़ने लगा है मोबाईल। नैट भी उपलब्ध है, अतः तुरंत हमने जीपीएस ऑन कर जानना चाहा कि गया अब कितनी दूर रह गया है। जीपीएस बता रहा है कि तकरीबन 12 किमी आगे जाने के बाद फिर एक और एसटी हाईवे पर जाना है, कुल 27 कि दूर है, अभी गया यहां से आगे जो एसटी हाईवे मिलेगा उसकी स्थिति कैसी होगी, यह तो वहीं पहुंचने पर मालूम पड़ेगा, आखिरकार यहां से एक-एक किलोमीटर हमने अपनी गाड़ी के मीटर से कम करना शुरू कर दिया। 8-10 किमी जाने के बाद इतना तो प्रतीत हाने लगा कि रास्ता आगे से ही मिलेगा अतः 12 किमी के बाद एक और पतली सी रोड मिली, जिस पर अन्य वाहन भी आ जा रहे थे, जबकि जिस मार्ग से होकर हम यहां पहुंचे है, वहां तो केवल एक ही गाड़ी हमारी ही उस हाईवे पर थी, जिस पर जीपीएस ने हमें पहुंचा दिया था।
नए हाईवे से होकर अर्ध रात्रि में किसी तरह यात्र गया तो पहुंच ही गई, लेकिन थकावट कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही थी सभी को। सबसे पहले तो पैट्रोल पम्प से डीजल भरवाया और टायरों को थपथपा कर शाबाशी दी उनके सहयोग के लिए। फिर गया रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर रात्रि विश्राम के लिए एक होटल दरबार पहुंचकर भोजन कर विश्राम किया। बोकारों से चन्दवा-चतरा और डोबी तक सामान्य तौर पर ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी यात्र, लेकिन डीबी से गया के लिए जीपीएस ने जो मार्ग दिखलाया उस पर बढ़कर एक बड़ी गल्ती हम कर बैठे थे, जिसका आभास होने तक यात्र काफी अंदर तक बढ़ चुकी थी, बारहाल यात्र का यह हिस्सा भी बहुत रोमान्चकारी उपलब्धी रही। गया से अगली सुबह जहानाबाद होते हुए सीधे पटना पहुंची यात्र। पटना भी राजनीतिक दृष्टिकोण से नेताओं की राजधानी कही जाती है। यहां लगे होर्डिंग अपनी नई कहानी कहते हैं, हुंकार रैली के बड़े-बड़े होर्डिंग हर चौराहों पर लगे हुए हैं। आपरेटरों के साथ दोपहर में मीटिंग मुश्किल से ही हो पाती है। यहां कोलकाता के सुरेश सेतिया ने आकर झण्डा गाड़ दिया है एवं हाथवे की झोली भी खाली नहीं रही है। डैस के द्वीतिय चरण में पटना का भी नाम है, इसलिए एनॉलाग यहां भी बंद हो चुका है एवं बिना सैट्टॉप बॉक्स के किसी भी टैलिविजन को सिग्नल प्राप्त नहीं हो रहे हैं, परन्तु एसएएफ फार्म पर अभी गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है। पटना से आगरा होकर मोहनिया के रास्ते यात्र मुगल सराय से वाराणसी पहुंची। वराणसी पहुंचते-पहुंचते भी रात थोड़ी ज्यादा ही हो चुकी थी, लेकिन वहां होटल रामाडा में एक रूम हमारे लिए दीनू भाई बुक करवा चुके थे, जबकि वह स्वयं बनारस में नहीं थे। अगले दिन भाई आलोक से भेंट कर बनारस के नजदीक से देखने की कोशिश की। भारी संख्या में पुलिस बल तैनाती के कारणों में पाया किय अनाधिकृत निर्माण को तोड़ने के लिए सरकारी फरमान जारी किया गया है।
कहा जा रहा है कि सन 1970 के नक्शे के अनुुसार सब ठीक-ठाक करने की तैयारी है, अर्थात 1970 के बाद जो भी निर्माण हुआ होगा उसे अनाधिकृत मानते हुए गिराया जाएगा। यानिकि आज 40-45 साल बाद सरकार को यदि वह निर्माण नाजायज दिखाई दे रहा है तब इतने सालों से वह कहां सोई हुई थी \ वह निर्माण रातो-राज नहीं हो गए बल्कि हरेक निर्माण के लिए सरकारी बाबुओं को भेंट चढ़ानी ही होती है, तब क्यों नहीं रोके जा सके ऐसे निर्माण जिन्हें ढ़ाने के लिए अब इतना पुलिस बल लेकर पहुंचे है। सरकारी नुमाइंदे दीपावली सिर पर खड़ी है, आदमी आखिर क्या करे--- सरकारी हथौड़े के सम्मुख आम आदमी किस कदर मजबूर है, यह देखना है तो बनारस में वह बेबशी स्पष्ट दिखाई दी। अभी इस वर्ष के दशहरा उत्सव का भी आखिरी भाग आज रात्रि को बनारस में होना है, जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग यहां पहुंचते हैं। हम तो पहुंचे हुए आगे जाने की सोच रहे थे, अतः आज की रात बनारस का वह कार्यक्रम जो कि ‘नककटैया’ कहा जाता है, देखने के लिए एक और रात बनारस में रुकना तय किया गया। बनारस की सुबह प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण रखती है, जब गंगा के घर के घाट पर सूर्याेदय होता है तो बस कैमरे के बटन कितनी बार दबा दिए गए है। पता ही नहीं चलता है, मन करता है कि बस इस सुनहरी सुबह के फोटो खींचे ही जाओ। शाम को गंगा घाट पर होने वाली अद्भुद आरती दशर्कों को बांध लेती है। वहीं महाशमशान पर जलती चिताएं कभी बुझ नहीं पाती हैं। बनारस का पान, बनारस की साड़ियां, बनारस की ठंडाई-कचौड़िया ना जाने क्या-क्या मशहूर हैं। यहां दशहरा के अवसर पर अलग-अलग स्थानों से अलग-अलग लीलाएं राजगद्दी, रावण संहार, भरत मिलाप व नाक कटईया आयोजित की जाती है। यह एक एतिहासिक शहर है, यहां रहने वाले आरम्भ से ही ऐसी परम्पराओं से जुड़े होते है, जबकि बाबा विश्वनाथ (शिवजी) के मंदिर में पूजा - अर्चना भी अब कड़ी सुरक्षा के घेरे में की जाती है। नाक कटईया कार्यक्रम की शुरुआत ही अर्धरात्रि से होती है, जो कि सुबह भोर होने तक चलती है। झांकियों में राम की लीलाओं के अतिरिक्त इस बार लालू प्रसाद को जेल में दिखलाए जाने के झांकी सभी के लिए आकार्षण का केंद्र बनी हुई है। वाराणसी से आगे सीधे पहुंची यात्र। इलाहाबार भी एक ऐतिहासिक शहर है। गंगा-यमुना सरस्वती नदियों का यहां संगम होता है, इसलिए त्रिवेणी भी कहते है इलाहाबाद हो। यहां पर कुम्भ का भी आयोजन अभी पिछले ही दिनों हुआ है। इलाहाबाद में केबल टीवी उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों से कुछ अलग है। यहां डैन की स्थिति काफी कमजोर है, जबकि हाथवे नम्बर वन पर बना हुआ है। डैस सिटी में भी इलाहाबाद शामिल है, अतः एनालाग प्रसारण यहां भी बंद हो चुका है। इलाहाबाद के केबल टीवी दर्शक भी बिना सैट्टॉप बॉक्स के केबल टीवी नहीं देख पाते हैं। यही हाल बनारस का भी है, क्योंकि उत्तरप्रदेश में डैस के अन्तर्गत शामिल किए गए पांच शहरों में वाराणसी व इलाहाबाद भी है। इलाहाबाद में ही उत्तरप्रदेश का उच्च न्यायालय भी है एवं एजुकेशन सिटी भी इस शहर को कहा जा सकता है, जबकि वकीलों का शहर भी लोग इसे कहते हैं। इलाहाबाद से रायबरेली होकर यात्र सीधे लखनऊ पहुंची।
रायबरेली का महत्व राजनीतिक गतिविधियों के कारण बना हुआ है, जबकि लोगों की हालत वैसी ही है जैसे उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों की। रायबरेली से सीधे लखनऊ पहुंची यात्र। लखनऊ में भाई ओमेश्वर, सुनील जौली एवं अन्य साथी यात्र की प्रतीक्षा में थे। सभी ऑपरेटरों के द्वारा यात्र का भव्य स्वागत सत्कार के बाद डैस पर विस्तृत चर्चा हुई, क्योंकि लखनऊ नवाबों का एतिहासिक शहर होने के साथ-साथ अब डैसी सिटी की श्रेणी में भी आ चुका था। उत्तरप्रदेश की राजधानी होने के कारण राजनीतिक दृष्टिकोण से भी लखनऊ का विशेष महत्व है एवं केबल टीवी में भी लखनऊ अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। लखनऊ की तहजीब, नजाकत, लहजा और खान-पान अभी भी अपनी विशेषता बनाए रखें हुए है। यहां के मंदिरों में पान भी प्रसाद में दिया जाता है। लखनऊ का हजरगंज अब काफी बदल गया है, जबकि रेलवे स्टेशन की खूबसूरती देखते ही बनती है, जबकि महानगर गोमती आदि अनेक छोटे-छोटे लखनऊ वहां बन गए हैं। लखनऊ में देर रात तक आपरेटरों के साथ पार्टी चलती रही, अत- रात्रि विश्राम भाई ओमेश्वर की मेहमानवाजी में कर सुबह सीधे कानपुर के लिए रवाना हो गई यात्र। कानपुर केबल टीवी इण्डस्ट्री के हिसाब से कुछ जल्दी ही सुबह पहुंच गई यहां यह यात्र, इतनी सुबह ऑपरेटरों के मिलने का समय नहीं हुआ करता है, अतः ब्रेकफास्ट वार्ता सिटी केबल के कानपुर प्रमुख स- एच एस लार्ड साहब के निवास पर हुई। सिटी केबल के ऑफिस में ही ऑपरेटरों के साथ डैस पर खड़े प्रश्नों पर गंभीर चर्चा के बाद वहां दूसरे एमएसओ, डीजी के विशाल से भेंट कर आपरेटरों की अलग से एक मीटिंग ली गई। संजीव भाई (डैन) आज कानपुर में नहीं है अतः उनसे भेंट नहीं हो पाई।
डैस सिटी होने के कारण यहां भी एनालाग प्रसारण बंद हो चुका हैं एवं अब सैट्टाप बॉक्स के बिना किसी भी टैलिविजन को कोई भी सिग्नल उपलब्ध नहीं है। कमर्शियल दृष्टिकोण से कानपुर का विशेष महत्व होता है। यहां लैदर उद्योग के साथ-साथ पान मसाला, गुटखा आदि के बडे नामी उद्योग भी हैं। कई बड़ी-बड़ी नामी-गिरामी फैक्ट्रियां भी यहां स्थित है अतः विज्ञापनदाताओं को अपने दिए गए विज्ञापनों को यहां पर देखना भी होता है इस नजरिए से भी यहां केबल टीवी का विशेष महत्व हो जाता है। डैस पर यहां भी स्थिति दूसरे शहरों जैसी ही है। कानपुर से आगे की यात्र बांदा होते हुए मध्यप्रदेश में प्रवेश करेगी, उसका वर्णन अगले अंक में किया जाएगा, यह भाग कानपुर तक ही रखते हैं---।
झारखण्ड में धनबाद एवं निकटवर्ती क्षेत्रें में खदानों से निकाल कर अपनी सायकिलों पर लाद कर रोजाना टनों कोयला बाजारों में लाते हैं। बाजारों में यह कोयला खरीददार इकट्ठा कर ट्रकों में भरकर रोजना बेचते हैं। बाजारों तक कोयला लेकर आने वालों से वहां बनी ग्राम निगररानी चौकियां खुलेआम अपनी निगरानी की कीमत लेती हैं, ऐसा दृश्य भी हमारे कैमरे ने कैद किया।

धनबाद से बोकारो मीटिंग लेकर बिहार जाने के लिए मार्ग थोड़ा और भी कठिन हो जाएगा, ऐसी झारखण्ड में ही जानकारी मिल गई। अजय सिंह एवं अन्य साथियों के साथ बोकारो में भेंट हुई, शीघ्र ही बोकारो से चन्दवा-चतरा होते हुए डोबी पहुंच गई यात्र। डोबी से गया के लिए हमने जीपीएस का सहारा ले लिया। जीपीएस के अनुसार मुंबई-कोलकाता हाईवे से जिस रास्ते पर यात्र चली गई, शुरू में नहीं पता लगा कि यह रास्ता आगे जाकर कैसा हो जाएगा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रें में से होकर जिस मार्ग पर जीपीएस हमें ले जा रहा था, वह आने वाले सम्भावित खतरों का संकेत भी साथ-साथ दे रहा था।

डैस के द्वीतिय चरण में पटना का भी नाम है, इसलिए एनॉलाग यहां भी बंद हो चुका है एवं बिना सैट्टॉप बॉक्स के किसी भी टैलिविजन को सिग्नल प्राप्त नहीं हो रहे हैं, परन्तु एसएएफ फार्म पर अभी गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है। पटना से आगरा होकर मोहनिया के रास्ते यात्र मुगल सराय से वाराणसी पहुंची।


(छठा भाग)
चेतना यात्रा-9
कानपुर से दिल्ली तक
एक दिन की देरी से चल रही है यात्र, पूर्व घोषित कार्याक्रमानुसार क्योंकि 25 अक्टूबर को जबलपुर में ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ के आयोजन में यात्र को शामिल होना है, जबकि यात्र की शुरुआत उत्तरप्रदेश की राजधानी नवाबों के शहर लखनऊ से हुई थी। लखनऊ से रवाना होकर कानपुर का कार्यक्रम निबटाते हुए फतेहपुर बान्दा होते हुए कार्वी से सीधे चित्रकूट धाम यानिकि पंचवटी आरोग्यधाम पहुंची यात्र। भगवान श्री रामचन्द्र जीके 14 वर्षीय बनवास में से साढ़े ग्यारह वर्ष यहीं गुजरे थे, यही वह पावन भूमि है जहां भगवान राम ने अपने जीवन का सबसे ज्यादा समय व्यतीत किया था। माननीय पं- दीन दयालजी की शोधशाला भी यहीं पर स्थित है। चित्रकूट हिन्दुओं के लिए एक पावन तीर्थ स्थान है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि बाजारों में बिकने वाली इण्डिया रोड एटलस में चित्रकूट नाम है ही नहीं, बल्कि कार्वी का नाम अवश्य है। बांद्रा से कार्वी तक का मार्ग खासा क्षतिग्रस्त मिला, साथ ही रूट भी काफी घुमावदार था, अतः पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया। यहां से जबलपुर की दूरी इतनी निकट नहीं थी कि दो-चार घ्ांटों में पूर्ण कर ली जाए, जिस पर मार्ग भी काफी क्षतिग्रस्त एवं बिलकुल अनजाना था। यह मार्ग अधिकांश आदिवासी एवं वन्य क्षेत्र था। बांधवगढ़ टाईगर रिजर्व पार्क के बीच में से ही होकर गुजरी यात्र। इस मार्ग के एक ओर पन्ना तो दूसरी ओर शहडोल था। कानपुर से रवाना होने के बाद एक रात्रि चित्रकूट आरोग्यधाम पंचवटी में भी विश्राम किया, तब अगली सुबह शीघ्र ही जबलपुर के लिए यात्र शुरू हो गई थी। मार्ग इतना क्षतिग्रस्त था कि एक बार स्वयं टायर में पंचर लगाना पड़ा, क्योंकि अन्य कोई विकल्प था ही नहीं। कार्वी से सतना होकर बांधवगढ़ के जंगल मार्ग से गुजरते हुए उचेहरा-उमरिया होते हुए शाम को समयानुसार जबलपुर पहुंच गई यात्र, जहां बहुत ही गर्मजोशी के साथ यात्र का स्वागत-सत्कार किया गया। जबलपुर में यात्र के सकुशलता के लिए प्रार्थनाएं की जा रही थी, एवं लम्बे समय से वहां सब प्रतीक्षा में खड़े थे। जैसे ही यात्र वहां पहुंची सबने बैण्ड-बाजे के साथ फूलों के हारों से यात्र का जबर्दस्त स्वागत किया यानिकि एक तरीके से हारों से लाद दिया गया।
जबलपुर में ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ के आयोजन का भी कार्यक्रम रखा गया था। ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ मध्यप्रदेश के आयोजन का कार्यक्रम मध्यप्रदेश केबल टीवी ऑपरेटर एसोशिएसन द्वारा किया गया था, जिसका संचालन पूर्णतया पप्पू चौकसे आदि कर रहे थे। माननीय विधानसभा अध्यक्ष मध्यप्रदेश श्री ईश्वरदास रोहाणी के कर कमलों द्वारा द्वीप प्रज्वलित करवाकर ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ की शुरुआत की गई एवं विशेष अतिथियों में वहां के मेयर ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। पहली बार दिल्ली से बाहर मध्यप्रदेश के जबलपुर में आयोजित किए गए ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ के कार्यक्रम की प्रशंसा कर रहा था। आयोजकों के द्वारा हर संभव प्रयास किए गए थे कि ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ केवल उन्हीं को दिया जाए जो वास्वत में इसके अधिकारी है। माननीय विधानसभा अध्यक्ष मध्यप्रदेश श्री ईश्वर दास राहाणी जी के गरिमामयी औजस्वी भाषण से शुरू हुआ कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जबलपुर के लाखों टैलिविजनों तक भी पहुंचाया जा रहा था। जबलपुर की जनता ने भी कार्यंक्रम का खूब आनंद लिया एवं मध्यप्रदेश के केबल टीवी ऑपरेटरों के द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रम के लिए जनता के बीच विशेष सम्मान के योग्य भी हो गए। यही इस कार्यक्रम का उद्देश्य भी है। केबल टीवी, ऑपरेटरों केा समाज वह सम्मान भी दे, जिसके वह अधिकारी हैं। इसके लिए देशभर में ऐसे ही अनेक आयोजन करने होंगे। ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ एक ऐसा मंच बन जाएगा, जिस मंच से समाज को विशिष्ट योगदान देने वाला देश का कोई भी नागरिक अथवा संस्था सम्मानित होना चाहेगी। देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों सहित मीडिया द्वारा आरम्भ किया गया यह ‘सम्मान’ दिल्ली से निकलकर अब जिस तरह से मध्यप्रदेश के जबलपुर तक आ पहुंचा है, वैसे ही देश के अन्य शहरों तक भी शीघ्र ही पहुंच जाएगा।
जबलपुर में ‘ईमान इण्डिया सम्मान’ के सफल आयोजन के बाद रात्रि विश्राम जबलपुर में ही कर अगली सुबह यात्र भोपाल होते हुए देर रात इंदौर पहुंची। मुख्य मार्ग पूर्णतया क्षतिग्रस्त होने के कारण नए मार्गों से होते कार्यक्रम की प्रशंसा कर रहा था। आयोजकों हुए यात्र किसी तरह से इंदौर पहुंच गई, लेकिन इंदौर के भी प्रमुख ऑपरेटर मुम्बई प्रदर्शनी में गए हुए हैं। मध्यप्रदेश के तीन शहर जबलपुर -भोपाल एवं इंदौर भी डैस की द्वितीय चरण में शामिल 32 शहरों की लिस्ट में है, इसीलिए केबल टीवी ऑपरेटरों में काफी गहमागहमी है। अधिकतर ऑपरेटर इस दौरान मुम्बई दौरे पर हैं क्योंकि मुम्बई में एक प्रदर्शनी लगी हुई है। इसी कारण यात्र जबलपुर से आरम्भ होने के बाद सीधे इन्दौर रुकी रात्रि विश्राम के लिए। जबलपुर से भोपाल का मार्ग भी काफी क्षतिग्रस्त रहा, लेकिन थोड़ा सा लम्बा रूट लिए जाने से बहुत ज्यादा खराब मार्ग से बचा जा सका। यह तभी सम्भव है जब आगे के मार्ग के लिए लोकल लोगों से पूछ लिया जाए, अन्यथा फिर से मार्गोें पर सड़कें ढूढंते रह जाना होगा। यह पूरा मार्ग आदिवासी क्षेत्र भी है अतः अन्तर्मन की आंखों से पढ़ने जानने के लिए यहां बहुत कुछ है।
पंचर लगाने के अनुभव के बाद मध्यप्रदेश इस मार्ग पर हमें एक ओर अनुभव हुआ कि डीजल खत्म होने की सूचना देने वाली लाइट को जले हुए काफी देर हो चुकी थी, इसलिए एक अच्छे से गांव के बीच में से निकलते हुए खुुली तमाम दुकानों में से एक दुकान से हमने जानकारी लेनी चाही कि पैट्रोलपम्प यहां से कितनी दूर पड़ेगा। दुकानदार ने हाथ के ईशारे से हमे यह बता दिया कि वह जो सामने एक दीवार पर कुछ लिखा दिखाई दे रहा है ना, वहीं है पैट्रोल पम्प। हम खुश होकर उस दीवार के नजदीक पहुंचे, वहां से थोड़ा आगे बढ़े दायं-बाएं सब देख उससे और आगे बढ़कर दूर दिख रही एक अगली दीवार तक भी पहुंचे मगर पेट्रोल पम्प कहीं नहीं मिला एक ऐसे गांव का आदमी झूंठ क्यों बोलेगा, शायद हमारे ढूढ़ंने में ही कमी रह गई हो, अतः पुनः गाड़ी बैक कर फिर उसी मार्ग पर पैट्रोल पम्प को तलाशत-तलाशत गाड़ी को उसी दुकान के सामने खड़ा कर हमने फिर से पैट्रोल पम्प के लिए पूछा तो उस दुकानदार ने अपने हाथ के ईशारे से जो बताया उसकी दूरी उतनी नहीं थी, जितनी कि हम पर कर गए। हम बहुत ही धीरे-धीरे उस दुकानदार के बताए गए स्थान तक पहुंचे, लेकिन वहां तो कोई पेट्रोल पम्प नहीं था, आखिरकार वहां जो दुकान थी उससे पेट्रोल पम्प के लिए पूछा, तब पता लगा कि यहीं पर मिलता है पैट्रोल या डीजल कितना चाहिए।
जवाब मिला तो हमने 10 लीटर तो डलवा ही लिया क्योंकि यहां से अभी 20-25 किमी दूर था पेट्रोल पम्प। अब भाव की बात करना बेमानी थी, क्योंकि इतना भी कम नहीं था कि एक परचून की दुकान पर डीजल मिल गया था। यह दुकान एक महिला चला रही थी, इसीलिए ज्यादा सवाल-जवाबों का कोई अर्थ ही नहीं था। इन्दौर से आगे निकलकर महाकाल की नगरी उज्जैन पहुंची यात्र। आपरेटरों के साथ बैठक के बाद महाकाल केे दर्शन किए और फिर मध्यप्रदेश से राजस्थान की ओर बढ़ चली यात्र। फिर से शाम ढ़लने लगी थी और यात्र दो राज्यों के बार्डर एरिया से गुजर रही थी। यह मार्ग राजस्थान झालावड़ की ओर से कोटा पहुंचता है, जबकि दूसरा रास्ता नागदा-मंदसौर -नीमच-रतनगढ़ होते हुए कोटा जाता है।
अगर सीधे झालावाड़ पहुंचने में ही काफी रात हो चुकी थी। राजस्थान में कपिल भाई कोटा में नहीं थे लेकिन झालावाड़ में भी उन्हीं का नेटवर्क चलता है। उन्होंने झालावाड़ रात्रि विश्राम का आग्रह किया एवं कोटा में भी उनका प्रबंध थ्ज्ञा लेकिन रास्ते में ना ठहरकर यात्र सीधे सावाई माधोपुर ही पहुंचकर रुकी। सवाई माधोपुर में कपिल भाई का एक बन्दा हमारे स्वागत के लिए काफी देर से प्रतीक्षा कर रहा था। उज्जैन से चलने के बाद बिन कहीं रुके सीधे-सीधे चलते रहने के बावजूद भी अर्धरात्रि में ही पहुंच सकी यात्र। सवाई माधोपुर में कपिल भाई के प्रतिनिधि दिलीप सिंह द्वारा यात्र का गर्मजोशी से स्वगत किया गया। यहां भाई कपिल को मेहमानवाजी में थी यात्र। पांच सितारा रिसोर्ट मे विश्राम का विशेष बन्दोबस्त किया गया था, लेकिन यह बन्दोबस्त भी दूसरे मायनों में यादगार बन गया।
यह तो पहले से ही तय था कि यात्र देर से पहुंचेगी अतः रिसोर्ट में रूम बुक करवाने के साथ-साथ सबके लिए भोजन भी पैक करवाकर रखवा दिया गया था, लेकिन जब दिलीप भाई के साथ हम देर रात रिसोर्ट पहुंचे तब वहां हमारे लिए एडवांस में बुक करवाया गया रूम उपलब्ध ही नहीं था। जानकारी मिली कि एक ओर कोई गैस्ट देर रात वहां पहुंचे थे, गलतफहमी में वह रूम उन्हें दे दिया गया था। रूम तो रिसोर्ट वालों ने दूसरा उपलब्ध करवा दिया, लेकिन भोजन बिल्कुल भी नहीं था। अतः रात को सवाईम माधोपुर रेल्वे स्टेशन पर जो भी मिल सका उसी से रात्रिभोज का आनंद लिया गया। वैसे भी इन्दौर से चलकर यहां पहुंचने तक का सफर काफी लम्बा और थकाऊ हो चुका था। यहां से सुबह-सुबह रनथम्बौर टाईगर रिजर्व पार्क जाना था, अतः बिना समय गवाएं शीघ्र ही रात्रिविश्राम पर चले गए। सुबह भोर से पूर्व रणथम्भौेर के लिए एण्ट्री टिकट के बन्दोबस्त में जा लगे अमन भाई! एक अन्य फैमिली जो अजमेर से रणथम्भौर घूमने आई थी उसके साथ जिप्सी शेयर पर मिल सकी, तब रूट न- 2 की पर्मीशन के साथ रणथम्भौर का सफर शुरू हो सका। वही जंगल जहां से हमें कभी निराशा हाथ नहीं लगी, इस बार पूरा जंगल छान मारा लेकिन निराशा साथ लिए वापिसी करने लगे थे हम तभी करिक्ष्माई तरीके से एक टाईगर की झलक दिखलाई दे गई। टाईगर का पीछा कर और नज़दीक पहुंचे तब लुका-छुपी करते -करते टाईगर भी काफी लम्बा सफर पूरा करके वापिस अपने शिकार पर पहुंच रहा था।
यानिकि अब तो जैसे आज ही ईद हो गई हो। यह टाईगर अब तक अपने किल को मुंह में उठाए झाड़ियाें की ओर ले जा रहा था। उसका कोई भी मूवमैंट हम अपने कैमरों सें ओझल नहीं होने दे रहे थे। लगातार उसको अपने कैमरों में कैद करते हुए जो आनन्द एवं सन्तुष्टि हमें हो रही थी उसका अनुभव बिल्कुल अदभुद था ऐसे दृश्यों को देखना अलग बात होती है और फिल्माना बिल्कुल अलग बात हुआ करती है। एक टाईगर को मुंह में पूरा हिरन दबाए लेकर चलते हुए देखना सरल नहीं होता है, तिस पर इतना नजदीक कि कैमरों स्पष्ट रूप में कैद किया जा सके बाकई जीवन की एक बड़ी उपलब्धी वाला दृश्य रहा, यह रणथम्भौर का सफर। इस टाईगर ने आज सुबह ही यह शिकार किया होगा, शिकार करकें वह अपनी टैरिटरी को विजिट करने के लिए आगे चला गया होगा लेकिन तब वह उतना भूखा नहीं रहा होगा। सुबह सें अब तक वह कई किलोमीटर घूम लेने के बाद भूखा भी हो की गया था, अतः हमारी मौजूदगी से वह बिल्कुल भी डिस्टर्ब नहीं था। वह सीधे चलते हुए पहले अपने पर आया, फिर उस शिकार को उसने अपने जबड़ों में उठाया और उसे पास ही की झाड़ियों में लें जाने लगा। एक बड़ा सा हिरन जिसके सींग भी थे उसका आज का शिकार बना था। टाईगर के मुंह में झूलता हुआ वह हिरन बिल्कुल विवश और मासूम लग रहा था। उसकी खुली हुई आंखे और उठे हुए अगले पैर कैमरों में स्पष्ट कैद किए जा रहे थे। मुंह में जकड़े शिकार को ऊपर उठाते हुए अपनी पूंछ को भी पूरा उठाकर वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था। ऐसा दृश्य कैमरे में कैद करने के लिए किसी कैमरा मैन के लिए जीवन भी कम हो जाता है।
सारा जीवन कन्धे पर कैमरा रखे जंगलों में घूमते रहने बालों के लिए भी ऐसा दृश्य मिल पाना सरल नहीं होता है। जबकि कम से कम दो रात्रि रणथम्भौर के लिए हमने भी सुरक्षित रखी हुई थीं। लेकिन इतना कुछ मिल जाने के बाद वहां और रूक जाने का कोई अर्थ ही नहीं था। रिसोटर््स से चैक आऊट कर दिलीप सिंह के सहयोग से वहां के ए सी एफ (एसीएफ ) दौलत सिंह के साथ विशेष भेंट वार्ता की। दौलत सिंह ट्रंकलाइजर विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने ना जाने कितने ही जानवरों को ट्रंकलाइजर देकर बेहोश किया होगा। ऐसे ही एक प्रयास में रणथम्भौर के एक टाईगर की चपेट में वह स्वयं आ गए। जंगल का राजा वास्तव में जंगल में अपनी पूरी आजादी के साथ स्वच्छन्द एवं निर्भय विचरण करता है, लेकिन एक टाईगर गलती से इन्सानों के बीच पहुंच गया, तब इन्सानों के झुण्ड उस बेजुबान जानवर के दुश्मन हो गए। जिधर भी दिखाई दे इन्सानों के झुण्ड के झुण्ड उस टाईगर के पीछे पड़ जाते थे, बेचारा टाईगर कभी गन्ने के खेत में छुपता तो कभी झाड़ियों में छुप उन इन्सानों से स्वंय को बचाने की कोशिश करता था, लेकिन जैसे ही इन्सानों की नजर में वह टाईगर आ जाता था, तब चारों तरफ से घेरते हुए इन्सान उस पर पत्थर बरसाने लगते थे। टाईगर की समझ में यह बात नहीं आ पा रही थी कि आखिर ये इन्सान उसके दुश्मन क्यों हो गए हैं, जबकि रणथम्भौर में उसने इन्सानों को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था।
टाईगर जब इन्सानों की बस्ती में पहुंच जाए तो उसे वापिस जंगल में पहुंचाने के लिए बेहोश करना जरूरी होता है। इसी मिशन पर रणथम्भौर के ए-सी-एफ- दौलत सिंह लगे हुए थे, लेकिन टाईगर को यह नहीं मालूम था कि दौलत सिंह उसी की सुरक्षा के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाए हुए है। गांव वालो ने टाईगर को डी शेष में घेर रखा था और सभी तरफ से उस पर पत्थर फेंके जा रहे थे, जबकि दौलत सिंह टाईगर को गांव वालों से बचाने एवं जंगल ले जाने के लिए उसे बेहोश कर देना चाहते थे, लेकिन दौलत सिंह से पूर्व टाईगर ने उन पर हमला कर दिया, या कि टाईगर ने स्वयं के बचाव के लिए दौलत सिंह को दबोच लिया।
टाईगर के एक ही झपट्टे में दौलत सिंह के चेहरे का दायी तरफ वाला भाग पूर्णतया क्षतिग्रस्त हो गया। उनकी दांयीआंख भी टाईगर को भेंट चढ़ गई। लेकिन ईश्वर के यहां उनके दिन अभी बाकी थे तब टाईगर भला उनको कैसे मार सकता था। बामुश्किल दौलत सिंह को उस टाईगर की गिरफ्रत से छुड़वाया जा सका एवं ऐसी आपात स्थिती में उन्हें हास्पिटल पहुंचाने के लिए माननीय मुख्यमन्त्री जी का हैलिकाप्टर भी तुरन्त आ गया। इलाज के बाद दौलत सिंह अभी भी रणथम्भौर में ही कार्यरत हैं, उसी जिम्मेदारी पर, उन्हें अपना यही जीवन पसन्द है, जबकि उनकी दांयी आंख टाईगर अटैक में बलि चढ़ चुकी है। उनके चेहरे के अनेक आपरेशनो के बाद अब कोई यह मुश्किल से ही जान पाता है कि जो दीख रहा है वास्तव में वैसा नहीं था उनका चहरा उन्हें जीवित एवं स्वस्थ देखकर यही कहना पड़ता है कि जाको राखे साईयां मार सके ना कोय। वह टाईगर रणथम्भौर से चलते-2 बहुत दूर निकल गया था।
कहा जाता है कि मथुरा तक जा पहुंचा था वह टाईगर, लेकिन बाईज्जत उसे पकड़ कर वापिस जंगल में लाकर छोड़ा गया। वही टाईगर अब सरिस्का टाईगर रिजर्व पार्क में स्वच्छन्द विचरण करता है, लेकिन उस पर निरन्तर निगरानी रखने के लिए उसे कालर पहना दिया गया है। दौलत सिंह जी भी ए-सी-एफ- के पद पर रणथम्भौर टाईगर रिजर्व पार्क में ड्यूटी पर हैं। उनके साथ विस्तृत चर्चा व साक्षात्कार कर यात्र रणथम्भौर से जयपुर के लिए रवाना हो गई, लेकिन रणथम्भौर के नजदीक से देखना चाहते थे। यहां भी कहीं-कहीं नील गााएं दिखाई दे जाती थी, जबकि सड़कें बहुत ज्यादा क्षतिग्रस्त मिलीं। दे जरूर लगी परन्तु राजस्थान का अन्दरूनी ग्रमीण क्षेत्र वाकई शहरों से भिन्न था। रात्रि विश्रम जयपुर के एक आरटीडीसी के होटल गणगौर में किया। दीपावली के अवसर पर बहुत ही खूबसूरती के साथ जयपुर की सजावट की गई थी। लाईटों में जगमगा रहा था जयपुर ।
जयपुर भी डिजीटाईजेशन के द्वीतिय भाग की 38 सिटी में शमिल है, इसलिए यहां के केवल टीवी आपरेटर के साथ भी एक बैढक रखी गई। सभी आपरेटर होटल गणगौर में ही पहुंच गए। डैस पर खुलकर विस्तृत चर्चा हुई, उसके बाद आपरेटरों को दिल्ली निमन्त्रित कर थोड़ी सी शापिंग भी की गई जयपुर से कौशल एवं महेश सोलकी के साथ जयपुर शापिंग थोड़ी आसान सी हो गई, वर्ना जयपुर के बाजारों में भारी भीड़ के चलते हुए किसी बाहरी व्यक्ति के लिए काफी ज्यादा समय शापिंग में लगाना पड़ता।
जयपुर से निकल कर यात्र का अगला पड़ाव सरिस्का ही था, क्योंकि उस टाईगर को देखने का मोह हम छोड़ नही पा रहे थे, जिसने इतना बड़ा स्ट्रागल झेल कर अब स्वंय को नियन्त्रित का सामान्य जीवन जीना तय किया है। ऐसी विषम स्थितियों में से गुजरने के बाद टाईगर एवं दौलत सिंह दोनो ही अपने सामान्य जीवन को जी रहे हैं यह वाकई ईश्वरीय ही कहा जाएगा। सरिस्का टाईगर रिजर्व पार्क पहुंचने में काफी रात हो चुकी थी। सड़के यहा भी बहुत खराब थी, लेकिन जंगल के कानूनुसार समय रहते सरिस्का पहुंच गई यात्र। सरिस्का विचरण के लिए विशेष तौर से उस टाईगर को देखने के लिए सुबह ही समयानुसार बुकिंग खिड़की पर पहुंच गए हम एवं बताया कि हम विशेष तौर पर वह टाईगर देखने आए है, जिसने दौलत सिंह जी पर हमला किया था। उस टाईगर पर निगरानी रखने वाले दल से उसकी जानकारी प्राप्त कर फारेस्ट में घुमाने वाली जिप्शी में सवार होकर सरिस्का टाईगर रिजर्व पार्क के अन्दर उस टाईगर की तलाश में निकल पड़े हम बहुत ढूंढ़ा परन्तु कोई टाईगर नही मिल सका जबकि सरिस्का के सभी टाईगर को कालर पहनाया हुआ है। यहां एक टाईग्रैस ने अभी हाल ही में ही दो बच्चों को जन्म दिया है, उन शावको को छोड़ कर बाकी सभी टाईगर्स को कालर पहना रखा है।
सरिस्का पार्क में घूमते हुए सिग्नल तो कई जगह मिले लेकिन कोई टाईगर नहीं मिल सका । खूब ढूढ़ने की कोशिशें की गई लेकिन सफलता नहीं मिल सकी, जबकि साम्भर, नील गाय आदि भारी सख्या में दिखाई दिए सरिस्का टाईगर रिजर्व पार्क में देश के अन्य टाईगर रिजर्व पार्क से थोड़ा अलग है। यहां लोग अपने पालतू पशुओं को भी चारा खाने के लिए खुला छोड़ देते है। इन्फोरमेशन से यह तो जानकारी हमे मिल गई थी कि टाईगर ने एक बैल मार रखा है, वह अपने शिकार से ज्यादा दूर नहीं जा सकता है, लेकिन जहां उसके होने की सम्भावनाएं बताई जा रही है, वहा यह गाड़ी नहीं ले जाई जा सकती है। सरिस्का से आगे बढ़ी यात्र, तो सीधेमथुरा पहुंची मथुरा में नया डिंजिटल हैडण्ड लगाया गया है। भाई कैलाश गुप्ता का निओ नेटवर्क का एक नई विदेशी कम्पनी के साथ गठबंधन हुआ है। नई कम्पनी के साथ नई सम्भावनाओं ने जन्म लिया है। हांलाकि मथुरा अभी डैस के सेकैन्ड फेस में शामिल नहीं है। लेकिन थर्ड फेस में तो मथुरा भी शामिल हो जाना है अतः नी ओ नैटवार्क थर्ड फेस के लिए अब पूरी तरह से तैयार हो गया है। मथुरा में ही रात्रि विश्राम कर सुबह केलाश भाई जी का नया डिजीटल सैटाप का निरीक्षण कर यात्र मथुरा से आगे बढ़ गई।
5 सितम्बर 2013 को दिल्ली से आरम्भ हुई यह नौवी चेतना यात्र देशभर की समस्त डैस सिटी में भी पहुंची, लेकिन अब जबकि सिर्फ आज का ही दिन शेष बचा था, अतः मथुरा से यात्र सीधे आगरा पहुंची। आगरा में एम एस ओ के साथ अलग-अलग भेंट कर डैस पर आगरा की स्थिती की जानकारी लेकर यात्र दिल्ली रवाना होने से पूर्व गाड़ी में प्रोब्लम आ गई। हुआ यूं कि सरिस्का मार्ग में लगे झटकों के कारण गाड़ी में पेट्रोल टैंक के अन्दर कोई क्षति पहुंची जिसकी वजह से टंकी में कितना डीजल है उसका ठीक-2 पता नहीं लग पा रहा था। आखिरकार वही हुआ जिसका डर था, आगरा में डीजल खत्म हो जाने के कारण गाड़ी का डीजल पम्प हवा ले गया, और गाड़ी ने स्टार्ट होने से मना कर दिया। आखिरकार अनेक सेल्फ मारने पर भी जब गाड़ी चलने को तैयार नहीं हो पाई तब धक्के भी लगाए, लेकिन टस से मस नहीं होकर दी गाड़ी जैसे कह रही हो कि यात्र अभी जारी रखो।
पैट्रोल पम्प से डीजल भरकर गाड़ी में डाला गया, तत्पश्चात गाड़ी में डीजल पम्प को एक्सरसाइज की गई, तब कहीं जाकर काफी कसरत करवाकर गाड़ी पटरी पर आई। एक बार स्टार्ट हो जाने के बाद फिर से यात्र पर चलने के लिए गाड़ी पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी। दीपावली के अवसर पर सारे बाजार सजे हुए थे एवं बाजारों में रवासी भीड़ भी उमड़ी पड़ी थी, इसीलिए आगरा से दिल्ली पहुंचने के लिए सीधा यमुना एकस्प्रेस हार्दवे मार्ग से बिना कही रूके बाजारो व भीड़ से बचते हुए निर्विधन सफलता पूर्वक यात्र पूर्व घोषित समयानुसार दिल्ली पहुंच गई।
दिल्ली में भव्य स्वागत सत्कार के लिए सभी प्रमीक्षारत थे, आखिर दो महीने बाद देशभर का कठिन भ्रमण कर यात्र बापिस जो पहुंच रही थी। सभी ने जोरदार स्वागत किया एवं परिवार ने मंगल आरती की। पोती-पोते को गोद में उठाकर जब कन्धे से लगाया तब सारी थकावट छूमन्तर हो गई यात्र की। प्रत्येक वर्ष की जाने वाली यात्र में एक और सफल यात्र का अध्याय जुड़ गया है। इस प्रकार 5 सितम्बर 2013 से आरम्भ हुई नौवी चेतना यात्र 31 अक्टूबर 2013 को सम्पन्न हो गई, लेकिन सफर अभी रूका नहीं है, यात्र कभी रूका नहीं करती हैं,समय के साथ-साथ चलते-चलते पगडण्डियां पथ एवं पथिक भले ही बदल जाते हो लेकिन सफर सदैव जारी रहता है। अगले सफर की ओर बढ़ते हुए समस्त सहभागियों की स्मृतियों के खजाने की पूंजी को समेटे यात्र फिर से आगे की तैयारी मे है।
सभी का आभार व धन्यवाद सहित-----------!!

एक और चेतना यात्रा; लगातार नौ यात्राओं के बाद,
सितम्बर-अक्टूबर-2014
जुनून के बिना ऐसा कुछ कर पाना सम्भव ही नहीं होता है, लेकिन यह जुनून आखिर है क्या\ इसका जवाब तभी समझ में आ सकता है जब इस विशेष कम्युनिटी का सच समझ में आ जाए। विशेष कम्युनिटी अर्थात जिसमें स्वंय में शामिल हँू, ‘ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टी-वी- कम्युनिटी’ जिसकी पहुँच देश के कौने-कौने तक है। इसे देश का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है, जिसके अलग-अलग रूप है। लेकिन मुख्यः एक कन्टेट्स प्रोवाईडर (ब्रॉडकास्टर) दूसरा हैडेण्ड सर्विस प्रोवाईडर (एम-एस-ओ-) तीसरा केबल टी-वी- सर्विस प्रोवाईडर (केबल टी-वी- आपरेटर) एंव चौथा उपभोक्ता (दर्शक) है। यह एक ऐसी कम्युनिटी है कि इनके तार जब जुड़ जाते हैं तब इनके सामने सारी ताकते बौनी हो जाती है। अन्ना आन्दोलन का प्रमाण सबने देखा है। ऐसी कम्युनिटी का हिस्सा होना बड़े गर्व की बात है और मैं स्वंय को केबल टी-वी- आपरेटर के रूप में इस कम्युनिटी की नींव का एक मजबूत पत्थर मानता हूं। पूर्व में केबल टी-वी- ऑपरेटर ही हैडेण्ड सर्विस प्रोवाईडर भी हुआ करते थे। किसी भी चैनल के लिए दशर्कों तक पहुँचना तभी सम्भव होता था, जब केबल टी-वी- ऑपरेटर उस चैनल को दशर्कों तक पहुँचाए। ऑपरेटरों ने ही इन चैनलों को हर गली मुहल्ले में अपनी केबल बिछा कर दशर्को तक पहुँचाया। दशर्कों के साथ चौबीसों घण्टों सीधा-सीधा जुड़े रहने वाला विशिष्ट व्यक्तित्व है केबल टी-वी- ऑपरेटर कौन सा चैनल कहां से आता है दशर्को का इससे कोई वास्ता नहीं होता है। दशर्को की मांग अपने केबल टी-वी- आपरेटर तक ही होती है। जबकि केबल टी-वी- ऑपरेटर इन चैनलों को किस तरह अपने दशर्को तक पहुंचाते है, इस का कोई वास्ता नहीं होता है। इस मामले में ब्रॉडकास्टर भी अपने को ऑपरेटर से बिल्कुल अलग रखते है, क्योंकि शुरूआत तो उन्होने मुफ्रत में चैनल परोस कर कर ली लेकिन दशर्को को चस्का लगवा देने के बाद ऑपरेटरों से चैनलों का पैसा भी वसूलना शुरू कर दिया। पे चैनलों के प्रचलन में आ जाने से एम-एस-ओ- प्रचलन में आ गए और केबल टी-वी- ऑपरेटरों को सिर्फ केबल टी-वी- सर्विस प्रोवाईडर तक ही सिमट जाना पड़ा, जबकि वह स्वंय हैडेण्ड आनर हुआ करते थे। उपभोक्ताओं को इस बात का पता भी नहीं चला कि उनका केबल टी-वी- ऑपरेटर अब असहाय हो चुका है। वह स्वंय किसी एम-एस-ओ- से सिग्नल प्राप्त कर अपने दर्शको तक पहुंचा रहा है। अब अपने दर्शको की पसन्द के अनुसार वह चैनल उपलब्ध नहीं करवा सकता है। बल्कि जो एम-एस-ओ- द्वारा मिल रहा है, उसे ही दर्शको तक पहुंचा सकता है।
एम-एस-ओ- द्वारा किए गए विस्तार के कारण किसी भी चैनल के लिए एम-एस-ओ- को खुश करना मजबूरी बन गया, वहीं से कैरिज फीस की शुरूआत हुई। अर्थात चैनल अब मुफ्रत में दर्शको तक नहीं पहुंचेगा उसके लिए अब जेबे हल्की करनी होगी ब्रॉडकास्टर को। केरिज फीस की आमदनी पे चैनलों को दिए जाने वाले भुगतान से भी आगे निकल गई, इसीलिए ग्राऊण्ड से पैसा जितना उठाया जाना था नहीं उठाया गया। ऑपरेटरों से उगाही की जगह विस्तार करवाया गया, भले ही पड़ोसी ऑपरेटरों के साथ कम्पिटीशन कर केबल टी-वी- दरें 250 रूपये तक ही क्यों ना पहुंच गई लेकिन एम-एस-ओं- ने ग्राऊण्ड को सुधारने की कभी कोई कोशिश नहीं की। इसकी उसे जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि उसकी पूर्ति तो कैरिज फीस से ही होने लगी थी। बड़ी धूर्तता के साथ पे चैनल ब्रॉडकास्टर्स और एम-एस-ओ- ने मिलकर पहले तो केबल टी-वी- ऑपरेटरों के हैडेण्ड बन्द करवा दिए, लेकिन ऑपरेटर अपनी ताकत आपसी कम्पिटीशन में ही गंवाते रहे। पे चैनलों के बढ़ते जा रहे आर्थिक बोझ से बचने के लिए एम-एस-ओ- के प्रयासों को सफलता मिली और कण्डीश्नल एक्सेस सिस्टम (ब्।ै) कानून भी बनवा लिया गया, लेकिन वह कानून लागू नहीं करवाया जा सका।
केबल टी-वी- का वर्चस्व तोड़ने के लिए डायरेक्ट टू होम (क्ज्भ्) के प्रचलन में आ जाने से एम-एस-ओ- के भी पर कुतरने का काम ब्रॉडकास्टर्स ने किया। क्योंकि अब तक एम-एस-ओ- किसी भी चैनल का प्रसारण बन्द कर ब्रॉडकास्टर पर दबाब बनाने की कोशिश कर लिया करता था, लेकिन उनकें प्रचलन में आ जाने के बाद किसी चैनल को बन्द करने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। इण्डष्ट्री की इन्हीं उठापटक में केबल टी-वी- ऑपरेटर पीछे बहुत धकेले जाने लगे, जबकि इसका कोई महत्व ही नहीं है। केबल टी-वी- ऑपरेटर अपनी वास्तविक पहचान खोते जा रहे थे, जिन्हें भविष्य में ढूंढ पाना बहुत कठिन हो जाएगा, जबकि वह आज भी उपभोक्ताओं के साथ जुड़े हुए है। एम-एस-ओ- से सिग्नल प्राप्त कर अपने उपभोक्ताओं के टी-वी- तक उपलब्ध करवाना और उपभोक्ताओं से उगाही कर एम-एस-ओ- तक पहुंचाने का काम केबल टी-वी- ऑपरेटर ही कर रहे है। ऑपरेटरों के साथ उसके उपभोक्ताओं का रिलेशन बेजोड़ है, पच्चीस सालों का जिसे कजी या फिर एम-एस-ओ- भी तोड़ नहीं सके है। लेकिन हालात बहुत जटिल होते जा रहे थे। केबल टी-वी- ऑपरेटरों को जागरूक करना बहुत जरूरी था, अतः तब सन् 2000 में पाक्षिक ‘आविष्कार दर्पण’ समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया गया, जिससे कि उनके साथ सदैव जुड़ा रहा जा सके। समाचार पत्र को सीधे- सीधे ऑपरेटरों तक पहुँचा पाना सरल नहीं था, अतः प्रयास किया गया कि भिन्न शहरों और कस्बों में हैडेण्ड सर्विस देने वाले अपने केबल टी-वी- ऑपरेटरों तक ‘आविष्कार दर्पण’ पहुंचाएँ। लेकिन कोई नहीं चाहता था कि ऑपरेटरों में जागरूकता आए या उसे कोई जानकारी प्राप्त हो अथवा वह अन्य ऑपरेटरों के साथ जुड़े। ऑपरेटरों को जगाने और जोड़ने के लिए तब केवल एक मात्र रास्ता यही बचा था कि किसी ना किसी तरह से सीधे-सीधे उनके पास पहुँचा जाए। वहीं से ‘चेतना यात्र’ का जन्म हुआ। 2005 में देश की पहली चेतना यात्र की गई, लेकिन इस यात्र में केबल टी-वी- ऑपरेटरों से मिल पाना भी अब कितनी टेढ़ी खीर हो गया है का बोघ हुआ। ऑपरेटरों से मिलने के लिए आखिर कोई कैसे उन तक पहुँच सकता था, क्योंकि उसका ठिकाना अब एम-एस-ओ- तक ही सीमित हो गया था। अतः कई एम-एस-ओ- ने हमें सहयोंग देते हुए ऑपरेटरों तक हमारा सन्देश भी भेजा कि आपसे मिलने के लिए दिल्ली से एक ऑपरेटर अपनी गाड़ी में ‘चेतना यात्र’ पर निकला हुआ है। कई शहरों में कुछ ऑपरेटर बड़े कोतुहल के साथ मिले भी, लेकिन या तो वह एम-एस-ओ- के डमी निकले या फिर वह यही सोचने में लग गए कि आखिर उन्हें जगाने- जोड़ने में इसका हित क्या है\ कोई क्यों किसी के हित के लिए अपना घर बार छोड़ कर निकलेगा-----आदि। पहली चेतना यात्र बहुत कठिन लेकिन कडवे- मीठे अनुभवों से भरी थी। उसने नई सम्भावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया, उम्मीदों को जगाया लेकिन निराशा को नजदीक भी नहीं भटकने दिया। इस तरह 2005 में आरम्भ की गई ‘चेतना यात्र’ का दसवां भाग अब सितम्बर- अक्टूबर 2014 में होगा। लगातार हर वर्ष सितम्बर- अक्टूबर में की जाने वाली चेतना यात्र में देश के कौने-कौने में बैठे केबल टी-वी- ऑपरेटरों का विश्वास जीतना ही अपने आप में बहुत कठिन कार्य था, लेकिन विश्वास के साथ-साथ सम्मान भी प्राप्त किया गया। देश की महाशक्ति के रूप में वह हरेक शहर कस्बे गांव में अपनी विशेष पहचान के साथ मौजूद है। मीडिया के अंश के रूप में वह आज भी हर चोखट के सजग प्रहरी है। कण्डीश्नल एकसेस सिस्टम(ब्।ै) कानून रद्द कर नया कानून क्।ै (डिजीटल एड्रेसिबल सिस्टम) लाया गया है।
एनॉलाग को पूर्णतया खत्म कर देशभर में डिजीटाइजेशन लागू किए जाने की प्रक्रिया अब द्वितीय चरण में पूर्णता की ओर बढ़ रही है। शीघ्र ही डैस का थर्ड फेस भी लागू होने वाला है, जिसके अर्न्तगत देश का अधिकांश हिस्सा आ जाएगा, लेकिन केबल टी-वी- ऑपरेटर का भविष्य इस व्यवसाय में कितना सुरक्षित रह पाएगा\ यह सवाल आज बहुत बड़ा बन गया है। सवाल सिर्फ केबल टी-वी- ऑपरेटरों के भविष्य तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सवाल पूरी इण्डष्ट्री के ढ़ँाचे पर ही खड़े हो गए है। यू तो सबने मिलकर ब्।ै की जगह क्।ै का कानून बनवाया था, लेकिन सरकारी शिकंजा कुछ इस कदर कसता जा रहा है कि हर पक्ष छट-पटाने लगा है। डी-टी-एच- ऑपरेटर हो या फिर ब्रॉडकास्टर दोनो दुःखी है और रो रहे हैं जबकि एम-एस-ओ- अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है और केबल टी-वी- आपरेटर बिल्कुल ही बेचारा होकर रह गया। वह देश भर में तूफान उठाए हुए है। उपभोक्ता कह रहा है कि उसे लूटा जा रहा है, क्योंकि पहले उसे सैट्टॉप बॉक्स थमाए फिर हरेक टी-वी- से अलग-अलग वसूली और कभी सैट्टाप बॉक्स के नखरे तो कभी रिमोट कन्ट्रोल खराब होने से होने वाली परेशानियाँ और बढ़ गई हैै। काम बढ़ा दिया गया है और उपभोक्ताओं की आज़ादी छीन ली गई है।
इण्डष्ट्री के बिगड़ते हालातों के बीच ऑपरेटरों के आस्तित्व पर तो प्रश्न चिह्न लग ही रहे है, जबकि उम्मीदे वैल्यु एडेड सर्विसेस की भी थी। ऐसे में किस दिशा की और बढ़े ऑपरेटर यह तो उन्हें ही तय करना होगा, लेकिन उपभोक्ता भले ही ैज्ठ के कारण एम-एस-ओ- के नियन्त्रण में चले गए हो, फिर भी उनके साथ ऑपरेटरों का रिलेशन सदैव बना रहना चाहिए। यह बहुत जरूरी है लेकिन अब सरल नहीं रह गया है, अतः एक और यात्र आपरेटरों को जगाने व जोड़ने के साथ-साथ वैल्यु एडेड सर्विसेस उपभोक्ताओ तक पहुँचाने के लिए, यात्र हमेशा की तरह इस वर्ष भी सितम्बर-आक्टूबर में होगी और रूट वही जो पिछले साल का था, लेकिन तारीखों में अवश्य थोड़ा बदलाव होगा। अतः आपरेटर रूटानुसार अपनी तैयारी करें, शीघ्र ही यात्र उनके बीच पहुंचेगी।
विशेष कम्युनिटी अर्थात में स्वंय जिसमें शामिल हँू, ‘ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टी-वी- कम्युनिटी’ जिसकी पह्रुच देश के कौने-कौने तक है। इसे देश का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है, जिसके अलग-अलग रूप है। लेकिन मुख्यतः एक कन्टेट्स प्रोवाईडर (ब्रॉडकास्टर) दूसरा हैडेण्ड सर्विस प्रोवाईडर (एम-एस-ओ-) तीसरा केबल टी-वी- सर्विस प्रोवाईडर (केबल टी-वी- आपरेटरों) एंव चौथा उपभोक्ता (दर्शक) है। यह एक ऐसी कम्युनिटी है कि इनके तार जब जुड़ जाते हैं तब इनके सामने सारी ताकते बौनी हो जाती है।

कई शहरों में कुछ आपरेटर बड़े कोतुहल के साथ मिले भी, लेकिन या तो वह एम-एस-ओ- के डमी निकले या फिर वह यही सोचने में लग गए कि आखिर उन्हें जगाने-जोड़ने में इसका हित क्या है\ कोई क्यों किसी के हित के लिए अपना घर बार छोड़ कर निकलेगा---आदि-आदि। पहली चेतना यात्र बहुत कठिन लेकिन कडूंवे मीठे अनुभवों से भरी थी। उसने नई सम्भावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया, उम्मीदों को जगाया लेकिन निराशा को नजदीक भी नहीं भटकने दिया। इस तरह 2005 में आरम्भ की गई ‘चेतना यात्र’ का दसवां भाग अब सितम्बर-अक्टूबर 2014 में होगा। लगातार हर वर्ष सितम्बर अक्टूबर में की जाने वाली चेतना यात्र में देश के कोने-कोने में बैठे केबल टी-वी- आपरेटरों का विश्वास जीतना ही अपने आप में बहुत कठिन कार्य था, लेकिन विश्वास के साथ-साथ सम्मान भी प्राप्त किया है।