चेतना यात्रा-8

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भारत में केबल टीवी व्यवसाय आरम्भ हुए अभी बहुत लम्बा समय नहीं हुआ है, मात्र 22 साल ही हुए हैं अभी इस व्यवसाय को, जिसकी चकाचौंध आज पूरे विश्वभर के धनकुबेरों को ललचा रही है। भारतीय उद्योग घरानों ने तो इसकी शुरूआत में ही चमक देख ली थी। इसमे घुसने का प्रयास तो उनमें से कई ने किया, लेकिन सब टिके नहीं रह सके, लेकिन जो टिक भी गए उनके कन्धें का सहारा लेकर विदेशी धनकुबेर यहां अपने पावं जमाने के रास्ते तलाशते रहते हैं। हालांकि रिलायन्स का केबल टीवी मे आने की चर्चाएं लम्बे समय से चल रही हैं, जबकि सहारा ग्रुप ने अभी-अभी डीजी के कन्धों का सहारा लेकर ग्राऊण्ड में उतरने की घोषणा की है। आखिर ऐसा क्या है इस व्यवसाय में जो पैसे वालों को ललचाता है? इस सवाल का जवाब गर देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों की समझ में आ गया तब वह भी अपने-अपने क्षेत्र के बादशाह बन जाएंगे, लेकिन उनके अतिरिक्त उनके व्यवसाय को दुनियाभर के लोग समझ चुके हैं, नहीं समझ पा रहे हैं तो, वह केबल टीवी ऑपरेटर ही हैं। कस्तूरी मृग के समान है भारत के केबल टीवी ऑपरेटरों की स्थिति, क्योंकि जो उनके पास है, जिसकी सुगन्ध दुनियाभर को आकर्षित कर उनकी ओर ले आती है उसका आभास उन्हीं का ही नहीं है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि सबके जोर लगा लेने के बावजूद भी उनसे उनकी कस्तूरी नहीं छीनी जा सकी है, वह 22 साल बाद आज भी उन्हीं के पास है।
इसलिए अब कानून में बदलाव हुए हैं, और नए फ्केबल टीवी एक्ट-2011य् के अर्न्तगत उन ऑपरेटरों को समेटकर रख दिया गया है। नए कानून के अर्न्तगत ऑपरेटरों से उनकी कस्तूरी का नियन्त्रण पूरी तरह से हैडेण्ड ऑनर के पास चला जाएगा एवं वह हैडेण्ड भविष्य में किसके नियन्त्रण में चला जाए इसका पता तभी चल जाएगा जब वह जा चूका होगा। ऐसी अद्भूत प्रतिभा के धनी हैं देशभर के केबल टीवी ऑपरेटर, क्योेंकि उन्होंने इस व्यवसाय को स्वयं की सूझ-बूझ से ही इस मुकाम तक पहुंचाया है, जबकि 22 वर्षों बाद भी हमारे देश में केबल टीवी पर कोई शिक्षण संस्थान नहीं है।एक चैनल से आरम्भ होकर आज 100 से भी अधिक चैनलों को देश के करोड़ों टेलीविजनों तक पहुंचाने वाले केबल टीवी ऑपरेटरों की क्षमता अपार है, जिसे स्वयं वह भी नहीं समझ पाए। उन्होंने ना जाने कितनी बार अपना नैटवर्क अपग्रेड किया और कितनी बार कन्ट्रोल रूम, इसका कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है, लेकिन शुरूआत एक ही वी-सी-आर- वाले चैनल से उन्होंने की थी। तब वह भी बड़ी चुनौती हुआ करती थी कि एक वी-सी-आर- से फिल्म का प्रसारण कर एक टीवी से अनेक टीवी तक कैसे पहुंचाया जाए। वी-सी-आर- के बाद शुरू हुआ सैटेलाइट चैनलों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि कहीं थमा ही नहीं और ना ही थमा केबल टीवी ऑपरेटर। वह भी साथ-साथ ही बढ़ता गया और उन ऊंचाइयों पर पहुंच गया जहां की चकाचौंध सारी दुनिया के धनकुबेरों को आकर्षित कर रही है। उसी का परिणाम है कि फ्केबल टीवी एक्ट-2011य् आ गया है।
संशोधित कानून के लिए जारी अधिसूचना के अनुसार 31 दिसम्बर 2014 तक सारे देश में एनालॉग टेैक्नालॉजी पूर्णतया प्रतिबन्धित हो जाएगी। अर्थात पूरा देश डिजिटल एड्रोसिबल सिस्टम (डैस) पर चला जाएगा। डैस और कैस में बहुत बड़ा अन्तर है देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को यह बात बड़ी गम्भीरता के साथ समझनी होगी। यह बात अलग है कि प्रमुख शहरों सहित उनके निकटवर्ती अनेक कस्बों को भी भिन्न एम-एस-ओ- ने अपनी पहुंच में ले रखा है, वहां वह अपनी डिजिटल फीड भी पहुंचा देंगे, लेकिन अभी भी देशभर में ऐसे अनेक शहर-कस्बे व गांव हैं जहां कोई भी एम-एस-ओ- नहीं जाना चाहता है। ऐसे क्षेत्रें को निगल जाने के लिए डीटीएच ऑपरेटर फड़फड़ा रहे हैं।
डिजिटल टैक्नालॉजी समय की आवश्यकता है अतः केबल टीवी ऑपरेटरों को टैक्नालॉजी भयभीत नहीं होना चाहिए बल्कि उत्साह के साथ स्वागत करना चाहिए। किसी भी परिवर्तन में तमाम अगर-मगर, किन्तु-परन्तु स्वाभाविक हैं, केबल में कोई नई बात नहीं है। केबल टीवी ऑपरेटरों को भी अब डिजिटलाईजेशन के क ख ग को पूरी तरह से समझ लेना ही बेहतर रहेगा, इसलिए फ्चेतना यात्र-8य् का निर्णय लिया गया है अन्यथा इससे पहले की जा चुकी लगातार सात यात्रएँ पर्याप्त थीं। संशोधित केबल टीवी एक्ट-2011 के बारे में देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को जानकांरी देने के साथ-साथ डिजिटलाईजेशन के लिए तकनीकी मार्गदर्शन भी बहुत आवश्यक है। केबल टीवी ऑपरेटरों के विश्वास को जीवित रखना बहुत जरूरी है क्योंकि एनालॉग से डिजिटल में वह स्वयं को सुरक्षित नहीं समझता है। इन्सिक्योरिटी के कारण ही वह डिजिटल टैक्नालॉजी का अपनाने में संकोच कर रहा है, अतः नई टैैक्नालॉजी में उसका भविष्य किस प्रकार से सुरक्षित रह पाएगा, यह उसे समझना होगा, तभी वह डिजिटल के लिए सहयोग दे सकेगा।
एनालॉग से डिजिटल टैक्नालॉजी जैसे अब समय की आवश्यकता है, ठीक उसी तरह से समस्त केबल टीवी ऑपरेटरों को भी एक-दूसरे के साथ जुड़ने की अति आवश्यकता है। 7 सितम्बर को दिल्ली से आरम्भ होकर 20 प्रदेशों 5 यूनियन टेैरिटरंी में 450 से भी अधिक शहरों में होकर 60 दिनों बाद 30000 किलोमीटर का सफर पूर्ण कर 5 नवम्बर को दिल्ली वापिस पहुंचेगी यात्र।

फ्चेतना यात्र-8य् के अर्न्तगत सर्वप्रथम तो देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को डैस के प्रति भयमुक्त करना होगा। एनालॉग से डिजिटल में जाने के बाद ऑपरेटरों को क्या-क्या लाभ हो सकते हैं यह भी उन्हें विस्तार से बताना होगा। डैस भी कोई हव्वा नही है, यह बात जब उनकी समझ में आ जाएगी, तब वह कोओजरेटिव स्टाईल में भी डैस की दिशा में बढ़ सकते हेैं, लेकिन फिलहाल डैस को लेकर खासा हो-हल्ला है क्योंकि अभी इसकी शुरूआत ही नहीं हो पाई है। पूर्व घोषणा के अनुसार एक जुलाई 2012 से देश के चारो महानगरों दिल्ली-मुम्बई, कोलकाता व चैन्नई में डैस का प्रथम चरण लागू हो जाना था, लेकिन सरकार को 4 महीने आगे बढ़ानी पड़ी अपनी तय तारीख। अब 1 नवम्बर 2012 की प्रतीक्षा सारा देश कर रहा है क्योंकि डैस के प्रथम चरण को लागू किए जाने की यही तारीख घोषित की है सरकार ने। एक बार प्रथम चरण की शुरूआत हो जाए, तब इसकी सारी अगर-मगर, किन्तु-परन्तु भी सामने आ जाएगी, लेकिन जब तक इम्प्लीमेंट नहीं होगा तब तक डैस की तस्वीर पर से धुंध नहीं हट सकेगी। अभी भी समय तो बड़ी तेजी के साथ 1 नवम्बर की ओर बढ़ता जा रहा है, लेकिन डैस के प्रति वह विश्वास नहीं बन पा रहा है कि वास्तव में 1 नवम्बर से इसकी शुरूआत भी हो पाएगी या नहीं, क्योंकि के कारण अनेक हैं।
देशभर में केबल टीवी ऑपरेटरों को संशोधित केबल टीवी एक्ट-2011 को लेकर भ्रम की स्थिति है, क्योंकि उनका अपने कार्य क्षेत्रें से निकल पाना बहुत ही कम हुआ करता है एवं वैसे भी कहीं कोई ऐसा केन्द्र नहीं है जहां से वह सारी सूचनाएँ प्राप्त कर सकें। उन तक सीधे-सीधे अब सूचनाएँ पहुंच भी नहीं पाती हैं क्योंकि वह किसी ना किसी हैडेण्ड ऑनर की फीड लेकर अपने उपभोक्ताओं तक पहुंचा रहे हैं। हैडेण्ड ऑनर तक तो सूचनाएँ पहुंचाई जा सकती है, क्योंकि उनका रिकार्ड ब्रॉडकास्टर्स के पास दर्ज है, लेंकिन हैडेण्ड ऑनर से फीड लेकर उपभोक्ताओं को पहुंचाने वाले लास्टमाइल केबल टीवी ऑपरेटरों को तलाश पाना बहुत कठिन काम है।
उन तक पहुंचने के लिए ही प्रत्येक वर्ष चेतना यात्र की जाती है, लेकिन फिर भी उनके साथ जुड़े रह पाना सरल नहीं है। अधिकांश ऐसे ऑपरेटर किसी ना किसी रूप में कोई ओर व्यवसाय भी कर रहे हैं और केबल टीवी को उन्होंने साइड जोब की भांति अपना रखा है। ऐसे ऑपरेटरों को अब यह समझाना होगा कि जिसे उन्होंने साईड जोब बना दिया है वह अब बहुत बड़ी इण्डस्ट्री बनने जा रही है अतः अब उस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। दरअसल, देखा जाए तो एक बार फिर से शुरूआत ही की जा रही है एक नई इण्डस्ट्री की, क्योंकि जिस तरह से 8 चैनलों से 16 चैनल किए गए थे, 16 से 32 और 32 से 64 चैनल करते हुए एनालॉग टैक्नालॉजी में 106 चैनलों तक पहुंचे हैं ऑपरेटर, वैसे ही अब एनालॉग से आगे बढ़ते हुए डिजिटल पर जाना समय की आवश्यकता बन गया है।
जैसे कि एनालॉग में कन्ट्रोल रूम को अपग्रेड करने के साथ-साथ फील्ड में भी तमाम एम्प्लीफायर आदि भी बदलने पड़े थे, वैसे ही अब डिजिटल में जाने के लिए कन्ट्रोल रूम भी पूरी तरह से नए लगाने होंगे, नई तकनीक ंके साथ। एनालॉग के अर्न्तगत बीते 22 साल में अंधेर नगरी चौपट राजा की भांति ही जिसकी लाठी उसकी भेैंस की तर्ज पर चलती चली आई केबल टीवी इण्डस्ट्री। ब्रॉडकास्टर्स एम-एस-ओ- और सरकार सभी ऑपरेटरों को चोर ठहराते रहे, जबकि चोरी उसने एक पैसे की भी नहीं की। अंग्रे्रजो को गए तो 65 साल हो गए हैं, लेकिन केबल टीवी में मात्र 22 वर्षों पूर्व इन्होंने कदम धरे। फूट डालो और शासन करों का फार्मूला अपनाते हुए इन्होंने ऑपरेटरों को इतना साईड कर दिया कि उसकी फीड ही किसी ना किसी कन्ट्रोल रूम की मोहताज हो गई, परन्तु दोष सारा उसी के सिर, जिसने आंधी-बरसात, धुप-सर्दी की परवाह किए बगैर इन्हें देश के करोड़ों दर्शकों तक पहुंचाया। ऐसे केबल टीवी ऑपरेटरों को उनका स्वाभिमान-मान- सम्मान अवश्य जिंदा रखना होगा, तभी वह नई टैक्नालॉजी में स्वयं को सुरक्षित स्थापित कर पाएंगे, अन्यथा उनके लिए कानूनी शिकन्जा भी अब तैयार हो चुुका है। चेतना यात्र-8 का प्रयोजन सीधा साफ और बिल्कुल स्पष्ट है कि ऑपरेटर भले ही किसी भी शहर-कस्बे या गांव में हो, वह अपना कन्ट्रोल रूम चलाते हों या फिर किसी की भी फीड दर्शकों तक पहुंचाते हो, वह सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं। उन्हें आपस में एक-दूसरे से जुड़ना चाहिए। अकेले-अकेेले वह छिन्न-भिन्न होकर धीरे-धीरे लुप्त भी हो सकते हैं, लेकिन उन समस्त कडि़यों को आपस में जोड़ दिए जाने से वह स्वयं एक महाशक्ति बन जाएंगे, तब ना तो कोई उनका शोषण ही कर पाएगा व ना ही उनके लुप्त होने की सम्भावनाएँ बाकी रहेंगी। एनालॉग से डिजिटल टैक्नालॉजी जैसे अब समय की आवश्यकता है, ठीक उसी तरह से समस्त केबल टीवी ऑपरेटरों को भी एक-दूसरे के साथ जुड़ने की अति आवश्यकता है।
देश के प्रत्येक केबल टीवी ऑपरेटर को आपस में जोड़ने ओैर उन्हें डेैस के प्रति जागरूक करते हुए उनकी शक्ति का जनहित में योगदान करने के लिए प्रेरित करने हेतु चेतना यात्र-8 की शुरूआत की जा रही हैै। 7 सितम्बर को दिल्ली से आरम्भ होकर 20 प्रदेशों 5 यूनियन टेैरिटरी में 450 से भी अधिक शहरों में होकर 60 दिनों बाद 30000 किलोमीटर का सफर पूर्ण कर 5 नवम्बर को दिल्ली वापिस पहुंचेगी यात्र।

(शुभारम्भ 7th सितम्बर-2012)
दिल्ली से चण्डीगढ़ तक
प्रकृति का अद्भूत प्रसाद है भारत। मेरा जन्म यहां हुआ यह मेरे लिए बहुत गर्व की बात है, मैं बार-बार भारत का भ्रमण करता हूँ, लेकिन पुनः भारत माता के विशाल आंगन मुझे आकर्षित करता है और मैं फिर इस आंगन में विचरण के लिए निकल जाता हूँ। इसके आंगन की विविधताएँ मन मोहक हैं, त्यौहारों का तौर तरीका, रस्म-ओ-रिवाज, खुशियां मनाने के अलग-अलग अंदाज सब आकर्षित करते हैं, लेकिन बार-बार देश के भ्रमण पर जाना सम्भव नहीं हो पाता है, जबकि मैं 2005 से निरन्तर सितम्बर-अक्टूबर में देशांटन पर होता हूँ, नाम दिया है ‘चेतना यात्र’। चेतना आखिर किसके लिए--\ यह मेरा सौभाग्य है कि भारत में जब केबल टीवी के अंकुर फूटने शुरू हुए थे, तब मैं भी उनमें शामिल था जिन्होंने केबल टीवी की यहां नींव रखी थी। इस बात को हम आज भी बड़े गर्व के साथ अपने परिचय में कहते हैं कि भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इण्डस्ट्री के नींव के पत्थरों में हम भी शामिल हैं। हमारे जैसे ही देशभर में हजारों हैं, जिन्हें एक बड़ा परिवार कहा जा सकता है। इलैक्ट्रानिक मीडिया के अंश के रूप में देश के कौने-कौने में विद्यमान इस परिवार का प्रत्येक सदस्य हमें बार-बार बुलाता है और हम किसी अदृश्य शक्ति में बंधकर जैसे खिंचे हुए वहां चले जाते है, हर वर्ष। आठवीं चेतना यात्र 7 सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली से आरम्भ हुई। माननीय मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित जी ने हरी झण्डी दिखलाकर इस यात्र को अपना आर्शीवाद देते हुए रवाना किया। क्वीन मेरी स्कूल (मॉडल टाऊन) दिल्ली की छात्रओं ने मुख्यमन्त्री निवास पर पहुंचकर यात्र के गो ग्रीन मिशन को प्रोत्साहित करने के लिए दिल्ली के छात्र-छात्रओं का प्रतिनिधित्व किया। परिवार के सदस्यों सहित गो ग्रीन-गो डिजिटल के संदेश के साथ चेतना यात्र-8 को विदाई देने के लिए मीडिया इण्डस्ट्री के कुछ प्रमुख शेखर (एबीपी न्यूज), सुभाष ग्रोवर (जी ग्रुप), महिपाल सिंह (टाइम्स ग्रुप), डी- सिंह(आज तक) सहित अनेक ऑपरेटर भी फ्रलेग ऑफ सेरमनी में शामिल हुए। माननीय मुख्यमन्त्री जी की शुभकामनाओं सहित सबसे विदाई लेते हुए एक बार फिर से चेतना यात्र आरम्भ हो गई। इस यात्र में तकरीबन 30000 किलोमीटर का सफर 60 दिनों में तय किया जाएगा। देश के 20 राज्यों एवं 5 यूनियन टैरिटरी के भ्रमण में 450 शहरों से गुजरेगी यह यात्र। हर रोज एक नया शहर और रोजाना नए लोगों से मिलने का अवसर यात्र में मिलता है, लेकिन इण्डस्ट्री में सलंग्न सदस्यों के साथ सभी शहरों कस्बों व गाँवों में होने वाली भेंट-वार्ताओं में एक चीज सभी जगह एक समान होती है ‘अपनापन’ं। देश के किसी भी हिस्से में विद्यमान मेरे लिए ऐसा अपनत्व लिए बैठा हर सख्स मेरे परिवार का ही सदस्य प्रतीत होता है। इस अपनत्व में धर्म-जाति, अमीर-गरीबी अथवा क्षेत्रीय भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। उत्तर में भी वैसा ही अपनत्व मिलता है जैसा दक्षिण में मिलता है और पूर्व की भांति पश्चिम में, फिर यात्र का सिलसिला क्यों रोक दिया जाए।
सातवीं के बाद आठवीं यात्र इसलिए भी आवश्यक थी कि केबल टीवी में नए बदलाव आने हैं, क्योंकि वर्तमान में प्रचलित ‘केबल टीवी एक्ट-1995’ को संशोधित कर अब ‘केबल टीवी एक्ट-2011’ लाया गया है। संशोधित कानून के अर्न्तगत 22 वर्षाे से प्रचलित एनालॉग टैक्नालॉजी को अब पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित कर दिया जाएगा एवं एनालॉग के स्थान पर समूची इण्डस्ट्री को डिजिटल पर ले जाया जाएगा। डिजिटल पर जाने के लिए देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को जागरूक करना बहुत जरूरी है। इसलिए इस यात्र को ‘गो ग्रीन-गो डिजिटल’ का टाइटल भी दिया गया है। डिजिटल एड्रेसिबल सिस्टम पर जाने के कारण केबल टीवी एक बार फिर से जीरो से ही शुरू होगी अतः ऐसे बड़े परिवर्तन में देश का कोई केबल टीवी ऑपरेटर छूट ना जाए, इसके लिए चेतना अतिआवश्यक है। भावी सम्भावनाओं में समूची केबल टीवी कम्यूनिटी के लिए अवसरों के ढ़ेर लगे हुए हैं, जिनके प्रति ऑपरेटरों को जागरूक करने की अब अतिरिक्त आवश्यकता है, अतः चेतना यात्र-8 के अर्न्तगत देश के अधिक से अधिक ऑपरेटरों के साथ डैस पर बात की जाएगी, लेकिन इसके लिए सूचना व प्रसारण यह मार्ग मसूरी पहुंचाता है, लेकिन जब इस क्षेत्र में बर्फ पड़ जाती है तब चम्बा-मसूरी मार्ग बन्द हो जाता है। यह क्षेत्र आक्सीजन से भरपूर है और प्राकृति का खूबसूरत नजारा तो है ही। मसूरी की वादियाें में इस रूट पर पहली बार एंट्री की थी, अतः इस रूट पर मसूरी की एंट्री पर इतनी गंदगी के ढ़ेर मिलेंगे नहीं मालूम था, लेकिन यही सच्चाई है। जैसे सारी मसूरी की गंदगी इसी मार्ग पर सजा दी गई हो। मसूरी पहुंचने पर वहां के बाजारों में पूर्ण सन्नाटा दिखाई दिया। पूर्णतः बाजार बंद। हरेक दुकान बंद देखकर पहले तो लगा जैसे शायद यह लंच टाइम हो और सभी दुकानदारों ने लंच टाइम पर एक साथ पूरा बाजार बंद रखने का तय कर लिया हो, परन्तु ऐसा हो पाना सरल नहीं होता अतः फिर लगा शायद किसी विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के कारण बाजार बंद रखा गया हो, लेकिन कारण कुछ और निकला कि मसूरी में हुई लूटपाट की एक घटना के विरोध में पूरा मसूरी बंद रखा गया है आज। हुआ यूं कि मसूरी के एक साहब- व्यवसायिक कार्यवश 3 लाख रूपये लिए स्कूटर पर जा रहे थे कि तभी उनसे वह राशि सरेआम लूट ली गई। मसूरी जैसे शांत शहर में यह एक डराने वाली बड़ी वारदात थी। अतः प्रशासन की आंखें खोलने व चाक-चौबंद रहने के लिए लूटपाट की घटना के विरोध में पूरी मसूरी में बंद रखकर अपनी एकता की शक्ति सहित प्रशासन को विरोध दर्ज करवाया मसूरी वासियों ने। मसूरी में दो नेटवर्क प्रचलन में है, लेकिन दोनों ही मसूरी से बाहर के ऑपरेटर है। अतः उनसे यहां भेंट नहीं हो सकी, अतः मसूरी से देहरादून के रास्ते शाम ढ़ले सहारनपुर पहुंच गई यात्र। देहरादून में अब नए समीकरण बन रहे है, शीघ्र ही परिणाम देखने को मिलेंगे।
डिजिटल के लिए अन्तिम तारीख की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे देहरादून के ऑपरेटर बल्कि अभी से ही वह पूरी तैयारी में है। उसके सकारात्मक इरादे अवश्य ही एक नई दिशा की ओर ले जाएंगे केबल टीवी इण्डस्ट्री को। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून को शायद अब अपनी विशेष भूमिका का आभास हो चला है केबल टीवी में, इसलिए यहां अब जो सम्भावनाएं दिखाई दे रही हैं वह काफी पहले से दिखनी चाहिए थी। देहरादून से रात्रि में सहारनपुर पहुंची यात्र। सहारनपुर में विपिन परासर (डैन) से भेंट हुई वह डैन के साथ अनुबंध कर स्वयं को सुरक्षित कर पाए हैं अन्यथा पे चैनलों ने उनका जीना हराम करके रख दिया था कहना है पारासर का। हालांकि यहां दूसरा नेटवर्क हाथवे के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन डैस के लिए भी पूरी तरह से तैयार है यहां के केबल ऑपरेटर, लेकिन इसके लिए वह हाथवे व डैन पर निर्भर हैं। वैसे भी उनके निकट अभी डैस के कानून को पहुंचने में काफी समय हैं। सहारनपुर नाईट हाल्ट कर अगली सुबह यात्र हरियाणा के यमुना नगर के लिए रवाना हुई। यमुना नगर में केबल टीवी ऑपरेटरों की भारी भीड़ यात्र का स्वागत करने के लिए सुबह से ही प्रतीक्षा में थी। यमुना नगर पहुंचने तक दिल्ली-उत्तर प्रदेश-उत्तराखण्ड-उत्तर प्रदेश होते हुए हरियाणा भी एंट्री कर चुके थे हम। ऑपरेटरों को यहां करनाल के सूनील आरोड़ा एवं जयसवाल जी का संरक्षण प्राप्त हैं। यहा ंशीघ्र ही डिजिटल प्रणाली अपना लेंगे ऑपरेटर जबकि सुनील अरोड़ा करनाल में डैस पर ही केबल टीवी सेवाएं दे रहे हैं। यमुना नगर भी डिजिटल सर्विस शुरू करने वाला है यह जानकर खुशी हुई। वैस अभी तो डैस के प्रथम चरण के परिणाम भी नहीं आ सके हैं, करनाल-यमुना नगर तो सैकण्ड फेस में भी नहीं आ रहे, लेकिन उनकी तैयारी पूरी है यह सराहनीय है। अर्थात डैस भविष्य की जरूरत है, कानूनन मजबूरी नहीं। जैसेकि दूपहिया वाहन चलाने वालों को हैल्मेट की। हैल्मेट उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी है, ना कि कानून का पालन करने के लिए मजबूरी। यमुना नगर से अम्बाला होते हुए चण्डीगढ़ पहुंची चात्र। चण्डीगर में केबल टीवी में तो कुछ खास नहीं है, यहां भी पंजाब का फास्ट वे ही चलता है। ऑपरेटरों के साथ मीटिंग करना यहां एक बड़ी चुनौती होती है, लेकिन सन्नी गिल भाई जी भी इत्तेफाकन चण्डीगढ़ में ही हैं। अतः उन्होंने बाजवा जी के साथ मीटिंग रखी और फिर अगले ही दिन केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ भी मीटिंग तय हो गई। इत्तेफाक यह भी रहा कि आज हिमाचल की आदरणीया गवर्नर श्रीमति उर्मिल सिंह भी हिमाचल भवन में ठहरी हुई हैं और माननीय मुख्यमन्त्री श्री धूमल जी भी, जबकि मेरी भी यहीं की एडवांस बुकिंग है। है ना इत्तिफाक--- इससे आगे अगले भाग में लिखा जाएगा, फिलहाल यात्र का पड़ाव चण्डीगढ़ में है।

(14th सितम्बर-24 th सितम्बर तक)
(द्वितीय भाग)
चण्डीगढ़ से कच्छ के रनभुज तक
चिर प्रतीक्षित चेतना यात्र-8 का शुभारम्भ कुछ खास तरीके से किया गया, क्योंकि इस चेतना यात्र का मकसद भी बहुत खास और पूर्व में की गई सात चेतना यात्रओं से बिल्कुल हटकर है। केबल टीवी एक्ट-1995 में हुए संशोधन के बाद फ्केबल टीवी एक्ट (संशोधित) 2011य् में काफी अन्तर आ गया हैै। एक तरीके से बाईस सालों बाद यह इण्डस्ट्री फिर से जीते से ही आरम्भ होने जा रही है, क्योंकि वर्तमान में प्रचलित एनालॉग टैक्नालॉजी पूर्णतया प्रतिबन्धित हो जाएगी एवं डिजिटल एड्रेसिबल सिस्टम अनिवार्य होगा पूरे देश में, इसलिए फिर एक बार से यह इण्डस्ट्री जीरो से आरम्भ हो रही है। देश के कौने-कौने तक विद्यमान केबल टीवी ऑपरेटरों को आने वाले परिवर्तन के प्रति जागरूक करना इस यात्र का प्रथम उद्देश्य है एवं उन्हें आपस में जोड़कर उनके द्वारा समाज के लिए किए जाने वाले कार्याे के प्रति भी उन्हें प्रोत्साहित करना। दूसरा उद्देश्य है, अर्थात समूची कम्यूनिटी को समाज में वह सम्मान दिलाना जिसके वह हकदार हैं। अभी तक आपने पढ़ा कि 7 सितम्बर को दिल्ली से रवाना होने के बाद उत्तर प्रदेश से गुजरते हुए उत्तराखण्ड कवर करती हुई पुनः सहारनपुर के रास्ते उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर यमुना नगर से हरियाणा पहुंची यात्र। हरियाणा में अम्बाला पहुुंचकर गाड़ी की भी थोड़ी मैन्टीनैंस की गई, यानिकि एक पंचर और एक स्टैंड भी लगवाना अम्बाला में। लम्बा पहाड़ी एरिया कवर करने के बाद थोड़ा सा यह प्लेन एरिया यात्र के बीच में आया है तो गाड़ी को भी पूरी तरह से दुरूस्त कर लेना आवश्यक है आगे के बेहतर सफर के लिए। चण्डीगढ़ हिमाचल भवन से यात्र के इस भाग की शुरूआत करते है। माननीया गर्वनर हिमाचल प्रदेश भी धूमल जी का एक ही समय पर एक ही स्थान पर ठहरना प्रशासन के लिए चुुनौती बन जाता है, ऐसे वातावरण में हमें यह उम्मीद नहीं थीं कि प्रदेश के प्रमुख मेहमानों के बीच हिमाचल भवन में हमारी बुकिंग को भी तवज्जो दी जाएगी। लेकिन यह जानकर आश्चर्य के साथ-साथ खुशी भी हुई कि हमारी मांगनुसार हमें भी वहां ठहरने की अनुमति दी गई। अन्तर केवल फर्स्ट एवं थर्ड फ्रलोर का ही था, बाकी सब एक समान ही था। उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन अवश्य वहां मौजूद था, लेकिन उनके होने से हिमाचल भवन के बाकी गैस्ट कतई भी प्रभावित नहीं थे। सब कुछ बिल्कुल सामान्य सा, हमारी गाड़ियां भी बिल्कुल सामान्य तरीके से बिना किसी विघ्न के आ जा रही थीं और वहां तीसरी मन्जिल पर ठहरे विशिष्ट मेहमानों की गाड़ियां भी। ना उन्हें हमसे और ना हमें उनसे कोई परेशानी थी। दिल्ली की मुख्यामन्त्री श्रीमती शीला दीक्षित जी के द्वारा झण्डी दिखाकर रवाना की गई यात्र को यहां दो-दो माननीय देखकर उनसे भी शुभकामनाएँ लेने की सूझी अतः तीसरी मन्जिल पर पहुंच कर उनसे मिलने का प्रयास किया गया। माननीय मुख्यमन्त्री श्री धूमल जी के प्राइवेट सेक्रेटरी सुख राम ठाकुर मिले और उन्होंने बहुत ही शालीनता के साथ अगले ही दिन दोपहर में शिमला में मिलवाने का समय दिया, उन्होंने अपना मोबाइल नम्बर सहित सी-एम- हाऊस के लाइन नम्बर भी लिखकर दिए, लेकिन शिमला पहुंचने पर उनका मोबाइल भी नहीं उठा और लाइन नम्बर पर भी ठाकुर साहब नहीं जा सके। मालूम हुआ कि आज सुबह ही दिल्ली चले गए है सी-एम- साहब हिमाचल भवन में ही ठहरें माननीय गवर्नर श्रीमती उर्मिला सिंह जी से यात्र के लिए शुभकामनाओं हेतु भेंट हुई उनके एवजे में अर्जुन सिंह से, उन्होंने बताया कि अभी तो साहिबा हाइनैस रैस्ट कर रही हैं और उठेंगी तो सीधे दिल्ली जाना है , फिलहाल समय नहीं मिल सकेगा। सी-एम- के पी-एस- से में अर्जुन का जवाब ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि यह स्पष्ट मना थी ना कि झांसा। बहरहाल! यात्र उनकी शुभकामनाओं की मोहताज नहीं है, इनकी शुभकामनाओं के बगैर सात यात्रएँ सफलता पूर्वक की जा चुकी है। हिमाचल भवन चण्डीगढ़ में सन्नीगिल व मनमोहन सिंह बाजवा जी के सहयोग से नक्ल के द्वारा बुलाए गए केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ मीटिंग के बाद यात्र शिमला के लिए रवाना हो गई। पन्चकुला-कालका जी के रास्ते धरमपुर होते हुए सोलन में राजन (ऑपरेटर) के साथ भेंटवार्ता कर सीधे शिमला पहुंची यात्र। शिमला प्रवेश से पूर्व ही एक अच्छी सी रीर्सोट एशियादि डाऊन’ में नाईट हाल्ट कर अगली सुबह एस-एन खन्ना जी के साथ लम्बी बातचीत एवं मीडिया क्लब ऑफ इण्डिया का हिमाचल प्रदेश का दायित्व सुपुर्दकर मुकेश मल्होत्र से भी मिलने का प्रयास किया गया, लेकिन अपनी आदत से मजबूर मल्होत्र जी ने फोन उठाना ही बंद कर दिया। यात्र बिलासपुर के लिए बढ़ चली। वहां द्ववेदी भी मल्होत्र से भिन्न नहीं है। बिलासपुर में दो मीटर साइकिल सवार मि- निरन्जन (बंगलौर) एवं स- प्रभजोत सिंह (अम्बाला) टूरिस्ट मिल गए, जो कि मनाली-लेह-रोहतांग की यात्र पर निकले हुए थे। बंगलौर से निरन्जन अकेले बंगलौर-कन्याकुमारी की यात्र करते हुए अम्बाला पहुंचा है और अम्बाला से आगे की यात्र में स-प्रभजोत सिंह को साथ में लिया है। वापसी में प्रभजोत सिंह अम्बाला रूक जाएगा एवं निरन्जन फिर से अकेले बंगलौर जाएगा। इन दोनों मोटर साईकिल सवारों को बिलासपुर में हमने मेहमान बनाया। रात्रि विश्राम साथ किया और अगले दिन दोनों अपनी आपनी यात्र के लिए बढ़ चलें। बिलासपुर में अगले दिन भी द्ववेदी जी नहीं मिल सके और यात्र हमीरपुर के लिए रवाना हो गई। मोन्टी भाई हमीरपुर में यात्र की प्रतीक्षा में थे, उनसे लम्बी वार्तालाप के बाद रविवार के कारण कांगड़ा-धर्मशाला में किसी से सम्पर्क ना हो पाने के कारण सीधे पठानकोट की ओर बढ़ चली यात्र। इस मार्ग पर जगह-जगह गिरा पहाड़ो का मलबा बता रहा था कि किस कदर रास्ते अवरूद्ध रहे हैं। पठानकोट पहुंचते-पहुंचते काफी रात हो गई, अतः बिना किसी को तंग किए सीधे-होटल वीनस में नाईट हाल्ट कर सुबह वहां पठानकोट के ऑपरेटरों से मिलने का प्रयास किया, लेकिन नहीं मिल सके तब सीधे जम्मू पहुंची यात्र। जम्मू में सुभाष चौधरी श्रीनगर गए हुए थे, लेकिन उनका यात्र के स्वागत के लिए निर्देश दिया हुआ था। उनकी अनुपस्थिति में भी यात्र के स्वागत की पूरी तैयारी की हुई थी, साथ ही वृक्षारोपड़ का भी बन्दोबस्त किया गया था। वृक्षारोपड़ के बाद डैस पर मीटिंग और फिर जम्मू से पठानकोट होते हुए अमृतसर के लिए वापसी।
भारत-पाकिस्तान दोनों के दरवाजे आमने-सामने, खोलने और बंद करने की विशिष्ट प्रक्रिया को साकार देखने का अवसर होता है। अपने-अपने ध्वज उतारने के साथ-साथ ध्वज के प्रति कितना समर्पण-सम्मान व त्याग की भावना है इसका भी स्पष्ट प्रदर्शन देखने को यहां मिलता है। एक ही देश के दो टुकड़े करने वालों की छाती पर सदैव यह रस्म ऐसा दर्शाती हैं कि आखिर कब तलक सियासत दान दोनों देशों की जनता को एक-दूसरे से आखिर कब तक कितना जुदा रख सकेंगे\
अमृतसर पहुंचते ही भारी बारिश का सामना करना पड़ा। बड़ी तूफानी बारिश थी चंहुओर पानी ही पानी भर गया था अमृतसर में। नाइट हाल्ट अमृतसर ही किया, अगली सुबह सबसे मिलने की कोशिश की गई, डैस पर बातें हुई और फिर हार्डवेयर इण्डस्ट्री में शार्प के डीलर से भेंट हुई, तत्पश्चात् बब्बी भाई ने रीट्रीट देखने के लिए अटारी-बाघा बार्डर का विशिष्ट प्रबंध करवाया। बाघा बार्डर पर सूर्यास्त पर ध्वज उतारने की प्रक्रिया को देखने के लिए रोजाना देशभर से लोग आते है। हजारों का हुजूम यहां देशभक्ति के जुनून में भावविभोर हो जाता है। देशप्रेम का एक अनूठा संगम यहां देखने को मिलता है। बार-बार आने के बाद भी हर बार यहां आने को मन करता है। रोम-रोम देशभक्ति के जोश से पुलंकित हो जाता है यहां। यह दोनों देशों के आमने-सामने का नजारा होता है। भारत-पाकिस्तान दोनों के दरवाजे आमने-सामने, खोलने और बंद करने की विशिष्ट प्रक्रिया को साकार देखने का अवसर होता है। अपने-अपने ध्वज उतारने के साथ-साथ ध्वज के प्रति कितना समर्पण-सम्मान व त्याग की भावना है इसका भी स्पष्ट प्रदर्शन देखने को यहां मिलता है। एक ही देश के दो टुकड़े करने वालों की छाती पर सदैव यह रस्म ऐसा दर्शाती हैं कि आखिर कब तलक सियासत दान दोनों देशों की जनता को एक-दूसरे से आखिर कब तक कितना जुदा रख सकेंगे\ कोई दिन तो ऐसा आएगा कि बीच की ये दीवारे ही हट जाएंगी। बाघा बार्डर की रीट्रीट देखने जाने से पहले ही दिल्ली से अन्णू यात्र के लिए कुछ ओर सामान लेकर वहां पहुंच गया। सभी ने एक साथ ड्रिल देखी, फिर जीरो माइलस्टोन भी देखा और वापिस अमृतसर होकर जलंधर के लिए बढ़ चली यात्र। अटारी-बाघा बार्डर से यात्र की दो गाड़ियों और कुल छः जने हो गए। बाघा से अमृतसर होकर जलंधर पहुंचने में रात ज्यादा हो गई थी, लेकिन फास्टवे के जलन्धर प्रमुख कटारिया जी के सहयोग से वहां शंग्रीला होटल में बुकिंग हो गई थी अतः ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई, लेकिन थोड़ा सा होटल शंग्रीला के लिए भी यहां अवश्य लिखा जाता, परन्तु होटल मालिकों से बात हो गई और उन्होंने भविष्य में और बेहतर सेवाएं देने का आश्वासन दिया है अतः जलंधर से आगे बढ़ गई यात्र। रात्रि विश्राम कर सुबह जलंधर में भाई दर्शन कपूर आदि के साथ डैस पर वार्तालाप के बाद यात्र जलंधर से लुधियाना पहुंची। लुधियाना में फास्टवे प्रमुख श्री गुरदीप सिंह जी के साथ डिजिटल एैड्रेसिबल सिस्टम पर लम्बी वार्तालाप हुई, उन्होंने विस्तार से बताया कि किस तरह से डैस में वह भारत के नम्बर वन स्थान पर अपने नेटवर्क को ले रहे है। उनके साथ हुई लम्बी वार्तालाप पर अलग से लिखा जाएगा, लेकिन फास्टवे प्रमुख गुरदीप सिंह की बातों में पूरी तरह से केबल टीवी इण्डस्ट्री के बारे में परिपक्वता नजर आती हैं,वह इण्डस्ट्री की जमीनी हकीकत से पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं एवं दूरदर्शिता के साथ एक सही दिशा में ले जा रहे हैं अपने आधीन नेटवर्क को फास्ट वे की ओर से चेतना यात्र-8 की शुभकामनाओं में गुरदीप सिंह द्वारा भेंट किया गया एक लाख रूपए का चैक भी शामिल था। फास्ट वे में सलंग्न पंजाब केबल टीवी इण्डस्ट्री के कई पूर्व पिलर्स से भी वहां भेंट वार्ता हुई। पंजाब में केबल टीवी कम्युनिटी को एकता का मार्ग दिखाने वाले सन्नीगिल भी फास्टवे के एक मजबूत पिलर के रूप में दिखाई दिए जबकि बाजवा जी, राजभाई एवं राजा सहित अनेक पंजाब के पुराने दिग्गजों को भी फास्टवे का महत्वपूर्ण हिस्सा बने वहां देखा। गुरदीप सिंह जी के साथ लम्बी वार्तालाप के कारण देर रात हो गई अतः रात्रि विश्राम फास्टवे की मेजबानी में लुधियाना ही रहा। फास्टवे के ऑफिस में ही दिल्ली से आए हुए कैटविजन के कुकरेजा जी से भी भेंट हुई, उनसे जानकारी मिली कि डैस के अर्न्तगत वह भी काफी कुछ कर रहे है। यह अच्छी बात है कि भारत के पूर्व हार्डवेयर मैन्युफैक्चर्स में से एक कैटविजन बदलती टैक्नालॉजी के अर्न्तगत स्वयं को भी अपग्रेड करते हुए ऑपरेटरों के साथ सम्पर्क सीधे रहे है। अगली सुबह भारत बंद की काल तकरीबन सभी विपक्षी दलों द्वारा की गई थीं, क्योंकि देश की जनता पर कमरतोड़ महंगाई के साथ-साथ भारत सरकार ने विदेशी निवेश के लिए भी फिरंगियों को बड़ा आकर्षक आमन्त्रण देने की घोषणा कर दी है। एफडीआई के मुद्दे पर समूचा विपक्ष बिदका हुआ है अतः भारत बंद की घोषणा के कारण लुधियाना से आगे का आज का सफर कहां तक पहुंच सकेगा नहीं मालूम, लेकिन बंद के कारण यात्र को वहीं रोकने की अपेक्षा आगे बढ़ने का निर्णय लिया गया। भटिण्डा में एक मीटिंग के बाद यात्र हरियाणा होेते हुए निर्विघ्न राजस्थान पहुंच गई। हालांकि अनेक प्रमुख मांगों पर बंद का प्रभाव देखने को मिला, लेकिन यात्र गांवों के मार्ग से होते हुए आगे बढ़ती रही। इसी प्रकार से देररात बीकानेर पहुंच गई यात्र, वहीं विश्राम किया। बीकानेर में ‘राजविलास पैलेस होटल में याकूब भाई का नाम लेने पर ही 50 परसेंट का डिस्काउंट मिल जाने से बड़ी राहत मिली। अगले दिन बीकानेर से सीधे जोधपुर पहुंची यात्र। इस क्षेत्र में याकूब भाई का दूसरा भाई राजा मोहम्मद ही नेटवर्क चलाता है। मि- राजा मोहम्मद (याकूब के भाई) केबल टीवी व्यवसाय भी सम्भालते हैं। यहीं से राजस्थान का मरूस्थल भी आरम्भ हो जाता है। कपास की खेती कहीं-कहीं दिखाई देती हैं जबकि गर्मी अभी भी काफी है यहां, वहां महीपाल सिंह निम्बाना द्वारा यात्र के स्वागत एवं पृथ्वी के बढ़ते तापमान के संदर्भ में लोगों को जागरूक करने के लिए कार्यक्रम का आयोजन रखा गया था।
महीपाल जी के साथ उनके परममित्र गौरव सारंग भी यात्र के स्वागत में अपने ही अन्दाज में प्रतीक्षा रत मिलें। देर रात तक वहां आने-जाने वालों का सिलसिला चलता रहा और यात्र वृतान्त भी जारी रहा। अगली सुबह सवेरे ही यात्र के स्वागत-शुभकामना का कार्यक्रम आरम्भ हो गया। जोधपुर के सर्किट हाऊस के प्रांगण में कार्यक्रम का आयोजन रखा गया था। जोधपुर के प्रसिद्ध स्कूल सेन्ट ।ग्प्डै के छात्रें द्वारा यात्र का पूरी गर्भजोशी के साथ स्वागत किया गया। पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान पर छात्रें को जानकारी के साथ उसे रोकने में उनकी भूमिका पर दिए गए संदेश को उन्होंने बड़ी गम्भीरता से ग्रहण किया। स्कूल डायरेक्टर आंनद जोर्ज सहित जोधपुर के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस अजय पाल लांबा द्वारा यात्र की शुभकामनाओं के साथ झण्डी दिखला कर जोधपुर से आगे के लिए विदाई की गई। वहां उपस्थित तमाम अन्य गण्मान्य व्यक्तियों ने भी यात्र रवानगी में अपना पूरा सहयोग दिया। जोधपुर-पाली मार्ग पर स्थित एक गांव में बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर के प्रांगण में ग्राम पंचायत द्वारा यात्र का भव्य स्वागत किया गया। महिपाल सिंह निम्बाना एवं स्छ जलानी, (एक्स डायरेक्टर ैण्ठण्ठण्श्र) अपनी गाड़ियों से यात्र के साथ-साथ जोधपुर से 70 किलोमीटर दूर पाली तक यात्र में सहभागी बने। पाली जिला कलेक्टर नीरज के- पवन (प्।ै) डिस्ट्रीक्ट क्लब में यात्र का स्वागत एवं वहां से आगे के लिए शुभकामनाओं सहित झण्डी दिखलाकर विदाई की गई। पाली के माननीय सांसद द्वारा भी यात्र गर्मजोशी के साथ भव्य स्वागत एवं झण्डी दिखलाकर विदाई की गई। जिला कलेक्टर श्री बदरी राम जाखड एवं पूर्व विधायक भीमराज भाठी बहुत ही जवां कम आयु के कर्मयोगी प्रतीत हुए, उन्होंने बताया कि उन्होंने यहां प्रत्येक बेटी के नाम पर एक पौधा लगाने का अभियान शुरू किया है। पौधे पर बाकायदा उसके नाम की टैकिंग होती है जिसके द्वारा वह लगाया जाता है, वहीं उसकी देखभाल भी करती है। अपनी तरह का यह एक अच्छा अभियान है जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम हैं पाली से स्वागत-सत्कार सहित विदाई लेकर यात्र सीधे माऊण्ट आबू की ओर रवाना हो गई। महिपाल निम्बाना और उनके समस्त सहभागी पाली ही रूक गए वह यहां से वापिस जोधपुर जाएंगे। पाली से माऊण्ट आबू का रास्ता पिण्डवाड़ा होकर जाता है। पिण्डवाडा पहुंचना कभी बहुत कठिन हुआ करता था, क्योंकि बीच मार्ग में आदिवासियों का भी एक एसा टुकड़ा हुआ करता था, जो राहजनों से लूटमार भी किया करते थे। हमने उस दौरान भी इस मार्ग से यात्र की है, लेकिन फोरलेन हाईवे बन जाने के कारण नहीं मालूम कि वह तीर-कमान-तलवार वाले आदिवासी कहां चले गए। अब यह मार्ग बिल्कुल सुरक्षित हो गया है। आबू रोड़ पर स्थित ब्रहमकुमारी शान्तिवन कार्यक्रम में मीडिया पर चल रही गोष्ठी में सम्मिलित होकर अगली सुबह यात्र राजस्थान से सीधे गुजरात की ओर बढ़ चली, लेकिन इससे पहले कि फोरलेन हाईवे पकड़े गाड़ी पंचर हो गई। पंचर हुआ टायर तो बदल लिया परन्तु अब नए टायर डलवाने का समय आ गया है, उम्मीद की गई थी कि आगे बड़ा शहर पालनपुर पड़ेगा वहीं नए टायर ले लेंगे, इस क्षेत्र का जीटीपीएल का दायित्व सम्भाल रहे मि- शैलेश भाई के साथ बराबर सम्पर्क बना रहा, ेउन्होंने ही इस मार्ग पर पूरा सहयोग दिया। होटल मंगलम में रात्रिविश्राम कर अगली सुबह सबसे पहले वहां टायर बदल गए गाड़ी में, क्योंकि अब स्थिति एर्मजेंसी वाली आ चुकी थी, फिर भी आबू रोड़ से भुज तक का साथ देकर उन टायरों ने काफी हिम्मत की थी। नए टायर डलवाने के बाद गाड़ी की ओर से अब पूरी बेफिक्री हो गई थी, अतः भुज से आगे की यात्र बड़ी आरामदायक रही गाड़ी की ओर से। यही क्षेत्र कच्छ कहलाता है जिसके बारे में सदीनायक श्री अमिताभ बच्चन जी ने कहा है कि कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा। वाकई वह सही कह रहे हैं अब हम भी मानते है कि कच्छ नहीं देखा तो वाकइ कुछ नहीं देखा।
हिस्टोरिकल कच्छ का जितना भी कुरेदेंगे उतनी ही कहानियां-इतिहास यहां दबे मिल जाएंगे, यह भारत का एक ऐसा प्राचीन क्षेत्र है जहां विश्वभर से तमाम व्यापारियों का आवा-गमन होता रहा है। राजे-रजवाड़ों का क्षेत्र कच्छ प्राकृतिक आपदाओं का बार-बार शिकार हुआ हैं, लेकिन आज भी अपनी आन-बान और शान के साथ सारे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है। अतः अमिताभ जी की ही भांति अब हम भी कहते हैं कि कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा।
बिल्कुल भिन्न अनुभव, बिल्कुल अलग। यहां की सभ्यता पारिधान-खान-पान सब कुछ सबसे अलग। यहां की गाय के बड़े-बड़े सींग बहुत ही आकर्षक लगते हैं। यहां के वाहन जुगाड जो कि रायल एन फील्ड मोटर साईकिल से बनाए गए है उनका आकर्षक भी कम नहीं है और उनपर लदी सवारियों के बीच बैठा ड्राइवर तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वह खड़ा होकर वाहन चला रहा हो। पुरूषों की तो तकरीबन सफेद रंग की ही वेशभूषा होती है लेकिन महिलाओं की वेशभूषा चटकीले आकर्षक रंगो में होती है। सभी पुरूष साफा भी पहने होते हैं, साथ ही उनके श्रृंगार और उनके द्वारा पहने गए आभूषण कहीं ओर देखने को नहीं मिलते है, जबकि कच्छ की महिलाओं की वेशभूषा-श्रृंगार-आभूषण अपना विशेष आकर्षण रखती है। सारी दुनिया से बिल्कुल अलग, एक खास अन्दाज है कच्छ का। सोने-चांदी के आभूषण से युक्त महिलाएं कहीं भी स्वच्छंद रूप से आ जा सकती हैं, कोई उन जेवरों को झटकने वाला नहीं, कोई चेन स्नैचर नहीं होता है कच्छ में। हिस्टोरिकल कच्छ का जितना भी कुरेदेंगे उतनी ही कहानियां-इतिहास यहां दबे मिल जाएंगे, यह भारत का एक ऐसा प्राचीन क्षेत्र है जहां विश्वभर से तमाम व्यापारियों का आवा-गमन होता रहा है। राजे-रजवाड़ों का क्षेत्र कच्छ प्राकृतिक आपदाओं का बार-बार शिकार हुआ हैं, लेकिन आज भी अपनी आन-बान और शान के साथ सारे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है। अतः अमिताभ जी की ही भांति अब हम भी कहते हैं कि कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा। कच्छ के एतिहासिक नगर लखपत-नारायण सरोवर और कोटेश्वर से अगला भाग शुरू किया जाएगा, फिलहाल कच्छ में ही है चेतना यात्र-8।

24 सितम्बर से 3 अक्टूबर
(तृतीय भाग)
(भुज से महानगरी मुम्बई तक)
कच्छ रन की भिन्नता के साथ-साथ यह भी बताना आवश्यक है कि 24 सितम्बर को ही ज्येष्ठ पुत्र अनुराग का भी जन्मदिन आता है, लेकिन सन् 2005 से आरम्भ की गई चेतना यात्र के कारण किसी भी वर्ष उसके साथ उसका जन्मदिन मनाने का अवसर नहीं मिल सका है। यात्र के दरमियान मिस करने में अनुराग का जन्मदिवस भी शामिल है, जबकि विजय दशमी का पूजन किए तो अब सात वर्ष यात्र को दिए ही जा चुके हैं और आठवीं यात्र के साथ दशहरा पर्व को भी अब इस यात्र में समर्पित किया जाएगा। पूरे भारत को अपना घर एवम् समस्त देशवासियों को परिवार मान लेने के बाद ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ कि विजय दशमी का पूजन सिर्फ अपने घर में ही कर हम दशहरा मना सकते हैं, अपितु कभी आन्ध्र प्रदेश तो कभी मैसूर तो कभी तिरूपाति जी में दशहरा पर्व का आनन्द लिया है यात्र के दौरान। वास्तव में हमारा देश विविधताओं से लबालब भरा हुआ है। इसे जितना भी नजदीक से देखो हर बार नया और खूबसूरत लगता है। एक बाप की ओर से अपने जन्मदिन पर बेटे को अवश्य किसी गिफ्रट की अपेक्षा होती होगी जो मैं बीते सात वर्षाे के बाद इस आठवीं यात्र में भी नहीं दे पाने का एहसास कर रहा हूं, हालांकि यात्र भुज से आगे बढ़ रही है। आगे बढ़ते हुए तकरीबन एक सौ किलोमीटर के फांसले पर एक प्रसिद्ध मन्दिर ‘माता नौ मद्य’ आया जिसकी मान्यता बहुत ज्यादा है। हमने भी मन्दिर में दर्शन किए। यहां आकर मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है, ऐसा कहना है यहां आने वाले भक्तों का, दर्शन तो किए लेकिन मां से मन्नत मांगने का हमें ध्यान ही नहीं रहा, और यात्र यहां से गुजरात के मैप में दिखाए जाने वाले अन्तिम शहर लखपत की ओर बढ़ चली। बीच में एक प्राचीन गांव घड़ौली और जारा भी देखा, कहा जाता है कि जारा में कभी कोई युद्ध हुआ था, लेकिन वहां ऐसे कोई अवशेष हमें नहीं मिल सके। चलते-चलते सुनसान रास्तों को पार करते हुए मोदी के गुजरात में पनचक्कियों के पावर प्लांट सहित साफ-सुथरी चमचमाती सड़कें सफर को आरामदायक बनाती हैं। शाम ढ़लने के साथ-साथ यात्र गुजरात के अन्तिम किनारे स्थित लखपत पहुंच गई। बड़ी विचित्र सी एक उजड़ी हुई बस्ती सी दिखाई दी, हमें लखपत के रूप में। सामने ही झण्डा साहिब को देखा तो कोई गुरूद्वारा होेने का आभास हुआ अतः सीधे उसी ओर बढ़ चले कदम। गाड़ी को बाहर खड़ी कर गेट के अन्दर प्रवेश किया तो वहां वाकई गुरूद्वारा ही मिला। गुरूद्वारे में श्री निर्मलए बाबा (सरदार जी-पाई जी के रूप में) मिलें। बाबा जी को अपना परिचय देकर हमने वहां स्थित गुरूद्वारे के बारे में जानना चाहा, तब वह गुरूद्वारे के मुख्य द्वार खोलते हुए हमें सीधे दरबार में ले गए जहां गुरूग्रन्थ साहिब पूजा स्थान था। इस गुरूद्वारे की प्राचीनता तो वहां की दर-ओ-दीवार बता ही रहीं थी, लेकिन भाई निर्मलए बाबा द्वारा सुनाई गई हिस्ट्री के अनुसार यह विश्व का पहला गुरूद्वारा है का दावा भाई जी कर रहे थे। उनका कहना था कि गुरूनानक देव जी महाराज सवा महीना यहां रूके थे और यहीं से वह मक्का-मदीना गए थे। लखपत से पहले उन्होंने रास्ते में जहां पानी पिया यह विश्व का पहला गुरूद्वारा है का दावा भाई जी कर रहे थे। उनका कहना था कि गुरूनानक देव जी महाराज सवा महीना यहां रूके थे और यहीं से वह मक्का-मदीना गए थे। लखपत से पहले उन्होंने रास्ते में जहां पानी पिया था वहां नानक तालाब आज भी है। भाई जी का कहना था कि यह जिस लखपत को आज यहां उजड़ी हुई स्थिति में आप देख रहे हैं, यही भारत का कभी सबसे बड़ा सी-पोर्ट हुआ करता था। दुनियाभर के जहाजों का यहां आना-जाना हुआ करता था, बहुत ही व्यस्ततम पोर्ट हुआ करता था लखपत। प्रत्येक दिन की आमदनी तब एक लाख रूपए इस पोर्ट से हुआ करती थी, जिसके कारण यह लखपत कहलाया। यहां समुन्दी पत्थरों (विशेष प्रकार के समुन्द्री पत्थर) की मुद्रा भी कभी प्रचलन में हुआ करती थीं। समुन्द्र के साथ-साथ यहां सिंधु नदी भी बहा करती थी। गुजरात का बहुत ही व्यस्त और सम्पन्न क्षेत्र हुआ करता था यह लखपत। यहां चावलों की फसल भी कभी हुआ करती थी, यहां का चावल लाल रंग का हुआ करता था। कराची जोकि अब पाकिस्तान का शहर है से आने वाले व्यापारी इसी मार्ग से बुधबंदर (पोर्ट) आया करते थे, वह साथ में तम्बाकू पत्ती, बीड़ी पत्ता और गुड़ लाया करते थे, जबकि माण्डवी बंदरगाह पर खजूर, गुड़ सहित मशीनों के लिए ब्लैक ऑयल भी आता था। भूकम्प आने के बाद यहां सब कुछ उलट-पलट हो गया, यहां से समुन्द्र काफी दूर चला गया, सिन्धु नदी लुप्त हो गई और किनारे दलदली हो गए, पूरी बस्ती ही उजड़ गई। यहां रहने वाले सब चले गए, बस अब सिर्फ अवशेष ही शेष रह गए हैं। लेकिन सीमा सुरक्षा बल को यहां तैनात देखकर उसका भी कारण जानने की कोशिश की तब जानकारी मिली कि मात्र 50-70 किलोमीटर दूर ही है यहां से पाकिस्तान की सरहदें इसी तरह वहां भी दलदली क्षेत्र है। सावधानी वश यहां तैनाती है क्योंकि घुसपैठियों का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। हालांकि इस सीमा से कभी कोई घुसपैठ नहीं हुई है, क्योंकि दोनों देशों की सीमाएं मीलों दलदली हैं। कहां समुन्द्र है और कहां दलदल पता ही नहीं लगता है अतः इस मार्ग से किसी को घुसपैठ करने की सोचना भी आत्महत्या जैसा ही होगा। फिर भी सावधानी वश पहरा आवश्यक है। लखपत से वापसी करते हुए काफी रात हो चुकी थी, अतः बहुत ज्यादा लम्बा सफर कर पाना कठिन हो गया था, लेकिन नजदीक की किसी बस्ती में पहुंचने के लिए भी 70-80 किलोमीटर जाना ही था अतः यात्र लखपत से आगे बढ़ते हुए नारायण सरोवर पहुंची। यह भी एक ऐतिहासिक स्थान मिला साथ में धार्मिक मान्यता वाला भी। कहा जाता है कि मानसरोवर-विंदुसरोवर-पम्पा सरोवर और नारायण सरोवर कुल चार सरोवर ही हैं जहां स्नान करने से जीवन को पुण्य (मुक्ति) मिलता है। मान सरोवर में स्नान करने वालों को भी नारायण सरोवर में स्नान किए बिना तपस्या पूर्ण नहीं होती है। यहां इस सरोवर की रचना कैसे और कब हुई के बारे में हमने नारायण सरोवर के मैनेजर सुरेन्द्र कुमार ठक्कर से जानकारी लेने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि कभी यह ऋषि मुनियों का तपस्या स्थान हुआ करता था, अतः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं नारायण प्रकट हुए, उन्हाेंने तपस्वियों के लिए अपने दाय-पावं के अंगूठे से पृथ्वी से यहां जलबहाव करवाया तभी से यहां सरोवर स्थित है और इसे नारायण सरोवर के नाम से ही जाना जाता है। बारह महीने चौबीसो घण्टों यहां दुनियाभर से श्रद्धालु स्नान के लिए आते है। उनके लिए निरन्तर लंगर भी यहां चलता है एवं श्रद्धालुओं के लिए ठहरने की भी यहां व्यवस्था है। वहीं विश्राम कर प्रातः सरोवर में स्नान के बाद यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। यहां से थोड़ी आगे बढ़ने पर ही भगवान कोटेश्वर का मन्दिर आ जाता है। यानिकी गुजरात के नक्शे में एक छोर पर जैसे लखपत है वैसे ही दूसरे किनारे पर कोटेश्वर भी स्थित है। कोटेश्वर कोई शहर या बस्ती नहीं है बल्कि यह भगवान शिवजी का ही एक रूप है जोकि कोटेश्वर कहलाता है।
माण्डवी भी एक बंदरगाह ही है, लेकिन यह एक बड़ा शहर भी है। यहीं बंदरगाह पर इंटरनेशनल पतंग फैस्टिवल भी आयोजित किया जाता है। पतंग फैस्टिवल में भाग लेने के लिए विश्वभर से यहां सैलानी आते हैं। माण्डवी बीच पर सदैव रोनक रहती है। काईट फैस्टिवल के साथ-साथ माण्डवी शिप मरम्मत के लिए भी जाना जाता है एवं यहां नए शिप भी तैयार किए जाते हैं। यहां केे केबल टीवी ऑपरेटर नवीन जोशी के साथ भी डिजिटलाइजेशन पर चर्चा हुई।
कहते हैं कि रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव जी को भी रावण ने जीत लिया तब भगवान को श्रीलंका ले जाने की जिद रावण ने की। रावण की तपस्या से प्रसन्न शिवजी ने हिमालय से रावण की लंका में जाने की सहमति दे दी, लेकिन साथ में एक शर्त भी लगा दी कि साथ में जाने के लिए तो मैं तैयार हूं, लेकिन मुझे एक बार कहीं रख दोगे तब वहां से उठा नहीं सकोगे। शर्त स्वीकार कर रावण भगवान शिवजी को साथ लिए-लिए इसी मार्ग से अपनी लंका जा रहा था। सारा देवलोक परेशान-व्याकुल हो रहा था कि शिवजी अगर लंका चले गए तब उन्हें वहां से वापिस पाना कठिन हो जाएगा, क्योंकि रावण बहुत तपस्वी ब्राह्यण है, अतः देवों ने अपनी शक्ति से वहां भगवान शिवजी को रोकने के लिए रावण के सम्मुख एक जाल बुना। वहां एक गाय दलदल में फंसी तड़प रही है और एक बूढ़ा सा कमजोर आदमी गाय को दलदल से बाहर निकालने की नाकाम कोशिश कर रहा है उन्होंने वहां से गुजर रहे रावण से मदद की गुहार लगाई। तब रावण को भी दलदल में फंसी गाय को बचाने में धर्म प्रतीत हुआ और उसने वहीं शिवजी को एक किनार रखकर दलदल में से गाय को निकालने लगा। शर्त के अनुसार भगवान शिवजी वहीं स्थित हो गए, रावण हार गया। भगवान कोटेश्वर के दर्शन कर यात्र आगे बढ़ते हुए माण्डवी पहुंची। माण्डवी भी एक बंदरगाह ही है, लेकिन यह एक बड़ा शहर भी है। यहीं बंदरगाह पर इंटरनेशनल पतंग फैस्टिवल भी आयोजित किया जाता है। पतंग फैस्टिवल में भाग लेने के लिए विश्वभर से यहां सैलानी आते हैं। माण्डवी बीच पर सदैव रोनक रहती है। आज गणेश विसर्जन के लिए भी काफी भीड़ यहां उमड़ी हुई है। माण्डवी से आगे बढ़ते हुए यात्र अंजार पहुंची जहां गांधी धाम और अंजार के ऑपरेटरों की मीटिंग लेकर बिना रूके सीधे जामनगर पहुंची यात्र। जामनगर पहुंचते-पहुंचते काफी रात हो चुकी थी लेकिन वहां होटल ‘आराम’ में ठहरने के लिए बुकिंग की हुई थी, इसलिए परेशानी नहीं हुई, लेकिन यह होटल भी अपने आप में इतिहास था। माण्डवी जैन तीर्थ स्थान भी है, वहां विजय विलास एवं मोदी का स्पेशल बीच भी है। जामनगर के राजा का एक नायाब स्थान हुआ करता था यह होटल जिसे अब आराम के नाम से जाना जाता है। इसकी भव्यता स्वयं बयान करती है कि यह किसी रजवाड़े से जुड़ी हुई कोई प्राचीन इमारत है, बहरहाल! ओरिजनल्टी को नहीं छेड़ा गया है इस बिल्डिंग की, भले ही जामनगर के एक शानदार होटलों में इसकी गिनती हो लेकिन यह एक हैरिटेज बिल्डिंग भी है। सुबह जामनगर के प्रमुख ऑपरेटरों के साथ ‘गो ग्रीन-गो डिजिटल’ पर चर्चा हुई, मनसुख भाई ने बड़ी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया एवं उनका नया बनाया कन्ट्रोल रूम-ऑफिस सभी विजिट किया। वह शीघ्र ही डिजिटल में जाएंगे। जामनगर से मीटिंग निबटाकर सीधे द्वारिका के लिए रवाना हुई यात्र। कच्छ से जामनगर तक जीटीपीएल के प्रतिनिधि शैलेश हमारे सहयोगी बने हुए थे, अब उन्हें भी द्वारिका के मार्ग पर थी। कच्छ की एक और विशेषता यह भी देखी कि अधिकांश लोग दोपहर 12 बजे से शाम 4-5 बजे तक आराम पसंद हैं, द्वारिका थोड़ा समय से पूर्व पहुंच गई यात्र। अभी मन्दिर के कपाट खुलने में दो घण्टे बाकी थे अतः हमें जानकारी मिली कि यहां से 60-70 किलोमीटर दूरी पर ओखा पोर्ट के साथ ही वैड द्वारिका जी का मन्दिर समुन्द्र में स्थापित हैं वहां के दर्शन भी जरूरी होते हैं तब आकर द्वारिका जी के दर्शन करने चाहिए तब हमने सीधे ओखा पोर्ट की ओर बढ़ाई यात्र। वैड द्वारिकाधीश दर्शनों के लिए एक बोट में हम भी सवार हो गए। मात्र दस रूपए प्रति सवारी एक तरफ के बोट वाले ने लिए, लेकिन तकरीबन 150 सवारियां उस बोट में ठंसी गई। वहां इसी तरह से ही सवारियां ठंसी जाती हैं, हादसा कभी भी हो सकता है, लेकिन सवारियां स्वयं को उस खतरनाक सफर के सुपुर्द कर देती हैं। हमने थोड़ा ठहर कर दूसरी फिर तीसरी बोट की प्रतीक्षा भी की लेकिन जब तक पूरी तरह से ठुंस ना जांए सवारी बोट आगे बढ़ती ही नहीं है। वैड द्वारिका जी के दर्शन कर फिर उन्हीं बोट्स में से किसी भी एक में आना मजबूरी थी जैसेे गए वैसे ही वापसी में भी सब सवारियां पूरी तरह से ठुंसी हुई थीं एक बोट में। वापसी में सूर्यास्त बोट में ही हो गया था अतः वहां से द्वारिकाधीश जी पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह से अन्धेरा हो गया था। द्वारिकाधीश जी की आरती चल रही थी अतः दर्शनों में और समय लगा। दर्शन कर प्रसाद लेकर सीधे दीव के लिए बढ़ चली यात्र, क्योंकि दीव में ही एक होटल में ठहरने की व्यवस्था की हुई थी एवं प्रातः 10 बजे गो ग्रीन के अन्तर्गत दीव के एक स्कूल में कार्यक्रम भी रखा हुआ था। द्वारिका से चलते-चलते काफी रात हो चुकी थी अतः रास्ते में पोरबंदर, नवीबंदर, चोरवाड, वीरावल व सोमनाथ मंदिर भी आए परन्तु बिना कहीं रूके सीधे दीव रात्रि 3 बजे पहुंच सके। दीव में प्रसिद्ध होटल आज्जारो में विश्राम किया। अगली सुबह सवेरे ही तैयार होकर गर्वन्मैंट गर्ल्स हाई स्कूल दीव में आयोजित गो ग्रीन कार्यक्रम के अन्तर्गत पृथ्वी के बढ़ते तापमान के प्रति ग्लोबल वार्मिंग पर छात्रओं को जागरूक करने का प्रयास किया। स्कूल कार्यक्रम के बाद ऐतिहासिक दीव भ्रमण के बाद यात्र एशियाई शेरों के ठिकाने गिर वन की ओर बढ़ चली। दीव दमन को पुर्तगालियों के कब्जे से 1961 में मुक्त करवाया गया था,इसमें भारतीय सेना के अनेक जवान शहीद हुए थे उनके शहीदी स्मारक पर पहुंच कर शहीदों का श्रद्धांजलि देकर यात्र गिर की ओर बढ़ी, लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पुर्तगालियों के कब्जे से दीव को मुक्त करवा लेने के बावजूद भी पुर्तगालियों का वहां की तमाम जगह-मकानों पर कब्जा है। ऐसे अनेक मकान हैं वहां जहां पर पुर्तगालियों के अभी भी ताले लटके हुए है। वह रहते स्काटलैंड में हैं लेकिन उन्होंने अपने कब्जे अभी भी कायम किए हुए है। यहीं एक ओर विचित्रता भी देखने को मिली कि ऐसे अनेक नागरिक यहां है जिनके पास पुर्तगाली पासपोर्ट भी बना हुआ है। यहां ड्यूल नागरिकता वाले भी काफी संख्या में हैं, अतः दीव भले ही पुर्तगालियों से मुक्त करवा लिया गया हो लेकिन वहां भारतीयों की मानसिक गुलामी के प्रमाण अभी भी मौजूद है।
गिर में वन्यविभाग वालों की कोई विशेष बैठक शुरू होने वाली है कल से, इसलिए वहां फाटेस्ट रैस्ट हाऊस में बुकिंग नहीं मिल सकी है अतः वहां एक नवनिर्मित सुख सागर रिर्सोट में विश्राम कर आगे बढ़ी यात्र। इस बार गिर में शेरों से मिलना नहीं हुआ, लेेकिन वहां के केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ गो डिजिटल पर चर्चा के बाद यात्र जूनागढ़-राजकोट होते हुए अहमदाबाद पहुंची। जूनागढ़ में भी कच्छ की ही भांति दोपहर में आराम करने की आदत के कारण किसी से भेंट नहीं हो पाई जबकि राजकोट के ऑपरेटरों के साथ डिजिटल पर चर्चा हुई। रात्रि विश्राम के बाद अहमदाबाद में ऑपरेटरों के साथ मीटिंग चलते-चलते शाम हो गई, क्योंकि वहां गणेश विसर्जन का उत्सव बड़ी धूमधाम से गाने-बाजों के साथ मनाया जा रहा था, लम्बे जाम लगे हुए थे, लोग हर्षोल्लास-उमंग में गुलाल-अबीर के साथ नाचते-गाते सड़कों पर गणेश जी का विसर्जन करने निकले हुए थे। जीटीपीएल में ऑपरेटरों के साथ हुई बैठक के बाद गणेश विसर्जन के जाम से पार होते-होते शाम हो गई थी, लेकिन यात्र बिना रूके अहमदाबाद से आगे बढ़ चली। आगे बढ़ते हुए डाकोर पहुंची यात्र। यहां भी गणेश विसर्जन के साथ-साथ पूनम की रात होने के कारण कृष्ण जी के मन्दिर डाकोर में दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का सड़कों पर हुजूम उमड़ा हुआ था। भारी संख्या में भक्तगणों का डाकोर मन्दिर में दर्शन के लिए तांता लगा हुआ था, रात्रि विश्राम डाकोर में ही करने का निर्णय लिया और डाकोर की मीहमा को टटोलने की कोशिश की गई। जानकारी मिली की यह नगर पूर्व में डंकपुर के नाम से जाना जाता था, यहां का एक व्यक्ति विजय सिंह राजपूत भगवान श्री कृष्ण जी का बहुत बड़ा भक्त था, वह बार-बार यहां से श्री द्वारिकाधीश जी के दशर्नाे को जाता रहता था, आखिरकार उम्र के साथ वह भक्त भोड़ाना के रूप में प्रसिद्ध हो गया था, वह काफी जीर्ण भी हो गया था, लेकिन द्वारिका दर्शन के लिए भी वह जा पाने में असमर्थ हो गया था, तब भगवान श्री कृष्ण से द्वारिका जी मन्दिर में उनके परम भक्त भोड़ाना ने बड़ी विनती सहित प्रार्थना की कि हे कृष्ण अब आगे मैं नहीं आ सकूंगा, मैं नहीं जानता कि आगे आपके दर्शन कैसे कर पाऊंगा! भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण जी ने कहां कि अगली बार पैदल नहीं बैलगाड़ी लेकर आना, मैं तुम्हारे साथ चलूंगा। भक्त भोड़ाना की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह बैलगाड़ी ले सके, लेकिन भगवान के दिए गए निर्देश का पालन करते हुए उसने किसी तरह दो बैलों सहित बैलगाड़ी का प्रबंध किया। बैलों की जीर्ण हालत ऐसी नहीं थी कि वह दो-चार कोस भी चल सके, लेकिन चलते-चलते वह द्वारिका जी पहुंच गया। द्वारिका जी से भगवान श्री कृष्ण स्वयं भक्त भोड़ाना की बैलगाड़ी के सारथी बने रात-रात में ही डंकपुर पहुंच गए। द्वारिका जी से चलकर भगवान श्री कृष्ण सीधे त्रिमलर गांव में रूके एवं वहीं खड़े एक नीम के पेड़ से दातुन तोड़ कर उन्होंने दातुन भी की, इसलिए उस नीम के पेड़ का एक भाग पूरी तरह से कड़वी पत्तियों वाला है तो दूसरी ओर की पत्तियां बिल्कुल कड़वी नहीं होती है। डंकपुर का नाम बाद में डाकोर पड़ा और भक्त भड़ोना के भगवान श्री कृष्ण के मन्दिर का निर्माण वहां के राजा ने करवाया। कहा जाता है कि उस मन्दिर के निर्माण में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने भी श्रम दान किया, क्योंकि दिन में काम करने वाले कामगारों की संख्या मानो 50 होती थी लेकिन जब उन्हें पारिश्रमिक दिया जाता था तब वह संख्या 49 ही रह जाती थी। भगवान कृष्ण जी द्वारिका से रात्रि में यहां आए थे इसलिए उनकी काली मूर्ति यहां स्थापित है। उनके भक्त देश-दुनिया से यहां दर्शनों के लिए आते है आज पूनम की रात है अतः भक्तों की भीड़ भी बहुत बढ़ गई है।अहमदाबाद से डाकोरगोधरा होते हुए दाहोद पहुंची यात्र। गोधरा के ऑपरेटर गणेश विसर्जन में व्यस्त थे लेकिन दाहेाद के ऑपरेटरों के साथ डिजिटल पर लम्बी चर्चा हुई। उनके स्वागत सत्कार के बाद यात्र गुजरात से मध्य प्रदेश के लिए बढ़ चली। दाहोद ही गुजरात की अन्तिम बस्ती है मध्य प्रदेश सीमा में प्रवेश से पूर्व। मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र आदिवासियों की बहुतायत वाला क्षेत्र है। प्रथम बस्ती झाबुआ आई मध्य प्रदेश की। झाबुआ का ऑपरेटर प्रदीप कहीं बाहर गया हुआ है, लेकिन यहां के प्रसिद्ध मुर्गो की विशेष प्रजाति कड़कनाथ रास्ते में मिले, जिनके फोटो भी लिए। विशिष्ट प्रजाति का यह मुर्गा यहीं झाबुआ में होते है। झाबुआ में अब बाकायदा इन मुर्गो के भी फार्म हाऊस बन गए हैं। दाहोद स्वागत सत्कार के बाद वहां से सीधे इंदौर पहुंची यात्र। इंदौर में शाकिर-टीट्र भाई के साथ बंगलौर अट्राई का इंदौर एसआर केबल का निरीक्षण किया जो कि वाकई पूर्णतया प्रोफेशनल दिखाई दिया। हालांकि यहां फिर से ऑपरेटरों के कम्प्टीशन होने के आसार प्रबल हो रहे है, लेकिन प्रोफेशनल बनने में बाकी को अभी काफी समय लग सकता है। इन्दौर तक पहुंचते-पहुंचते पूरा सितम्बर खत्म हो गया है। यहीं से अब अक्टूबर की शुरूआत होगी। दिल्ली से आरम्भ हुई इस यात्र ने अब तक कुल 10 राज्य(ैजंजम) एवं 2 केंद्रशासित राज्य(न्ण्ज्) कवर कर लिया है। केबल टीवी इण्डस्ट्री में भी इन्दौर की अपनी अलग कहानी है, अभी भी कुल 5 हैडेण्ड वहां हैं। इन्दौर से आगे बढ़ते हुए यात्र खण्डवा होते हुए बुरहानपुर पहुंची, वहां रमेश पातोदार नए ऑपरेटर से भेंट हुई जो बड़ी दंबगता के साथ नेटवर्क भी ऑपरेट कर रहे हैं जबकि उनके अन्य व्यवसाय भी हैं। मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमा पर स्थित है बुरहानपुर, यहीं से महाराष्ट्र में प्रवेश किया यात्र ने। मार्ग में ओमकारेश्वर तीर्थ स्थान भी आया, वहां पहुंच दर्शन कर यात्र जलगांव होते हुए भुसावल पहुंची। भुसावल में ही रात्रि विश्राम एवं ऑपरेटरों के साथ मीटिंग कर यात्र सीधे अहमदनगर के लिए बढ़ चली। सारे रास्ते में तुफानी बारिस आज भी जारी रही, जबकि कल भी इसी तरह से बिजली कड़कती रही और बादल गरजते रहे थे। अहमदनगर में ऑपरेटरों के साथ मीटिंग कर यात्र एक नए मार्ग से कल्याण-पनवेल-थाने की ओर रवाना हो गई। कल्याण तक मार्ग प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब हो रहा था, बहुत ही खूबसूरत यह मार्ग मुम्बई के लिए बनाया गया है। कल्याण में गनपत गायकवाड़ से भेंट हुई जो कि केबल टीवी ऑपरेटर के साथ-साथ वहां के माननीय विधायक भी हं। माननीय इसलिए कि वह अपने व्यवहार के कारण ही आजाद उम्मीदवार के रूप में वहां के विधायक चुने गए जबकि उनके सामने खड़े भिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों की जमानतें भी जब्त हो गई। केबल टीवी में भी उनकी उपस्थिति उसी तरह से सम्मानजनक है। वह आरम्भ से अभी तक भी नाना प्रकार से समाज में जरूरत मंदो की मदद करते रहते है। एक भले इंसान हैं गनपत गायकवाड़। उनसे मिल लेने के बाद लम्बी यात्र की काफी थकान दूर हो गई। कल्याण से पनवेल के मार्ग से थाने होकर सीधे मुम्बई पहुंची यात्र। मुम्बई का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है, अतः यात्र का यह भाग यहीं बंद कर अगले भाग को मुम्बई से ही खोलेंगे।

(4 अक्टूबर-15 अक्टूबर तक)
(चौथा भाग)
मुम्बई से केरल
मुम्बई पहुंचने में चेतना यात्र-8 को कुल 28 दिन लगे, दिल्ली से 7 सितम्बर को आरम्भ हुई चेतना यात्र-8, 3 अक्टूबर की रात में मुम्बई पहुंची। दिल्ली से मुम्बई तक का सफर दिल्ली-उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल, हरियाणा, चण्डीगढ़, हिमाचल प्रदेश-जम्मू और कश्मीर, पंजाब-राजस्थान-गुजरात से मध्य प्रदेश के रास्ते महाराष्ट्र पहुंचा। इसी बीच दीव से भी गुजरी यात्र। मुम्बई तक पहुंचते-पहुंचते कुल 12 प्रदेश एवं दो यूनियन टैरिटरी का सफर पूरा कर चुकी है चेतना यात्र-8। अनके स्थानों पर ग्लोबलवार्मिंग के प्रति लोगों में जन-जागृति लाने के कार्यक्रमों के आयोजनों सहित केबल टीवी ऑपरेटरों को डिजीटलाइजेशन पर भी अपग्रेड किया। मुम्बई डैस के प्रथम चरण में शामिल है अतः मुम्बई के केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ डैस के बाद की सम्भावनाओं पर काफी विस्तार से बातें हुई। इस यात्र के दरमियान मुम्बई में डस्। होस्टल (मन्त्रलय) ठिकाना रहा, क्योंकि कल्याण के ऑपरेटर गनपत गायकवाड़ विधायक भी है और मुम्बई विधायक भवन में उनके आवास के लिए भी एक आवास आरक्षित है। अतः उनके अनुरोध पर इस बार यात्र में पड़ाव मुम्बई मन्त्रलय विधायक भवन में ही किया गया। विधायक भवन में ठहरने का भी अपना एक अलग ही अनुभव रहा, क्योंकि विधायक गनपत गायकवाड़ के सचिव (सरकारी) गोसांई जी के इसी सेवा में बिताए गए कई वर्षो के अनुभवों को जानकर काफी कुछ नई जानकारियां प्राप्त हुई। मुम्बई में डैस को लेकर भावी सम्भावनाओं पर ब्रॉडकास्टर्स का एक दो दिवसीय ‘ज्अ छमगज’ कार्यक्रम का आयोजन एबीपी न्यूज द्वारा रखा गया था, अतः मुम्बई प्रवास के दौरान चेतना यात्र-8 का वह आयोजन मुम्बई की विशिष्ट उपलब्धी रहा। कार्यक्रम जे डव्ल्यु मैरिट होटल मेें रखा गया था, वहां 4 की सुबह समय से ही पहुंच गई यात्र। मंच से जी ग्रुप प्रमुख माननीय सुभाष चन्द्रा जी कार्यक्रम की शुरूआत में भाषण दे रहे थे। श्री चन्द्ररा जी को बहुत दिनों बाद किसी मंच से सीधे सुनने का अवसर मिला था, डैस के इम्प्लीमेंट पर उन्होंने यह विशेष संदेश इण्डस्ट्री को दिया था, अतः प्रश्नोत्तर काल में उनसे सवाल करने का जब अवसर मिला तब भारतीय केबल टीवी ऑपरेटरों की ओर से मात्र दो सवाल उनके सम्मुख रखे -
1- डैस के बाद केबल टीवी ग्राहकों को क्या भुगताना होगा\ का जवाब सैटॉप बॉक्स लगाने वाले ऑपरेटर क्या दें\ एवम्
2- कन्ज्यूमर्स को कन्फ्रयूज करना कब बंद किया जाएगा\ प्रोडक्ट वही है कन्ज्यूमर भी वही, मोड़ ऑफ ट्रांसपोर्टेशन का ही तो फर्क है, डीटीएच और केबल में, फिर कीमतें अलग और कम्प्टीशन क्यों\ क्यों माल को मुफ्रत में देकर भ्रमित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, और कब तक किए जाएंगे|
माननीय सुभाष जी ने बहुत ही चतुराई भरा उत्तर दिया और शीघ्र ही वह वहां से विदा भी हो गए, लेकिन यात्र के लिए उन्होंने अगले ही दिन घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया। सुभाष जी के घर दिए गए समय से ही पहुंच गए, लेकिन उनसे मिलने के लिए तकरीबन एक घंटा प्रतीक्षा करनी पड़ी। बड़े भाई की भांति बहुत ही आत्मयिता के साथ उनसे मिलना हुआ। उनके कर कमलों द्वारा चेतना यात्र-6 व 7 पर लिखी पुस्तक का अवलोकन भी करवाया गया एवं घर से बाहर निकल कर उन्होंने चेतना यात्र-8 की गाड़ी को भी बड़ी गम्भीरता से देखा एवं फोटो खिंचवाए। उनसे आर्शीवाद एवं शुभकामनाएं लेकर यात्र पुनः होटल श्रू डंततपवज पहुंची जहां ज्अ छमगज प्रोग्राम जारी था, वहां सबसे मिलने के बाद यात्र हिन्दुजा ऑफिस नागेश छाबड़िया से डैस का हाल जानने के लिए पहुंची परन्तु नागेश भाई बोर्ड की मीटिंग में व्यस्त थे। डीजी ऑफिस में जे-एस-कोहली जी के साथ डैस पर विचार विमर्श के बाद यात्र को नेटवर्क-18 में अनुज गांधी की शुभकामनाएं लेकर मुम्बई से आगे के पड़ाव की ओर बढ़ चली। मुम्बई से शुरू हुई हल्की-हल्की बूंदा बान्दी भारी तूफानी बारिश में बदल गई अतः रास्ते भी जाम हो गए सफर तय कार्यक्रम से लेट होने लगा अतः हितेष से भी भेंट नहीं हो सकी और सीधे कोल्हापुर-सांगली मार्ग पर बढ़ चली यात्र, परन्तु रात अधिक हो चली थी अतः हाईवे पर स्थित महाड़ में एक रिसोर्ट में विश्राम कर सुबह वहां के ऑपरेटरों के साथ भेंट कर यात्र सांगली पहुंची। महाड़ से आगे का रूट खेद्र-चिपलन होते हुए कोयना गांव से पाटन-खरड़ के मार्ग से सांगली पहुंचा था। यह महाराष्ट्र का अन्दरूनी क्षेत्र हैं, प्राकृतिक खूबसूरती गजब है इस मार्ग पर। पूरा पहाड़ी मार्ग है, जगह-जगह झरने मन मोह लेते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हुए सांगली ऑपरेटरों से भेंट कर सीधे कोल्हापुर पहुंच गई आज यात्र। कोल्हापुर और सांगली दोनाें ही शहरों में हिन्दुजा नेटवर्क चलता है, लेकिन कोल्हापुर में एक नेटवर्क जीटीपीएल का भी मिल गया, वहीं मीटिंग की और डैस पर ऑपरेटरों को अपडेट करते हुए यात्र आगे बढ़ चली। महाराष्ट्र ये गोवा की ओर बढ़ते हुए इसी मार्ग पर एक गांव में ‘पांडव गुफा’ भी देखने का स्थान है। मुख्य मार्ग पर लगा यह बोर्ड वहां से गुजरने वालों को आकर्षित करता है। मुख्यमार्ग से मात्र 3 किलोमीटर अंदर जाने के बाद गाड़ी एक तरफा खड़ी कर कुछ कदम पैदल चलने के बाद वहां कुदरत का वह दृश्य सामने आता है, जिसे देखकर यकीन करने को मन नहीं करता है।
अद्भुद हजारों साल पूर्व के अवशेष वही पत्थरों पर उकेरे हुए मिलते है। शिवलिंग-गणेश जी की मूर्तियाें और कहुआ पत्थर जैसे आज भी किसी तपस्वी की प्रतीक्षा कर रहा हो। झरने का निरन्तर बहाव इस दृश्य को और भी खूबसूरत बना देता है। पूरा पहाड़-गुफाएं एवं बारह शिवलिंग-गणेश मूर्तियां सब एक ही शिला पर बने हुए हैं, कहा जाता है कि ऋषिमुनियों के लिए यह तपस्या स्थान था, यहीं पांडव भी रहे और स्वयं भगवान राम भी यहां आए थे। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ शिवरात्री पर यहां उमड़ती है, लेकिन कुल मिलाकर यहां का दृश्य प्रकृति का एक अद्भुद नजारा है। यहां से आगे बढ़ते हुए सीधे गोवा पहुंची यात्र। गोवा में रात्री विश्राम कर ऑपरेटर मनरेका परिवार के साथ भेंट कर यात्र गोवा से धारवाड़ के लिए बढ़ चली। मार्ग पूर्णतया घने वन का क्षेत्र है, प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हुए देर रात धारवाड़ पहुंच कर विश्राम किया। ऑपरेटरों से मिलने से पूर्व वहां होटल कर्नाटक भवन के मालिक अशोक भाई से भेंट हुई, लम्बी चर्चा हुई, उन्होंने वहीं ठहरी ब्लाइन्ड क्रिकेट टुर्नामैंट के आयोजकों से भी परिचय करवाया एवं धारवाड़-हुबली के मेयर के साथ मीटिंग का भी कार्यक्रम तय किया। अशोक जी के होटल कर्नाटक भवन में रात्री विश्राम कर प्रातः सर्वप्रथम वहां के मेयर श्री पाण्डुरंग पाटिल जी से भेंट की एवं यात्र के लिए शुभकामनाओं सहित फ्रलेगऑफ भी धारवाड मेयर हाऊस सेे किया गया। धारवाड़ के अनेक केबल टीवी ऑपरेटर भी कार्यक्रम में शामिल हुए तत्पश्चात धारवाड़ स्टेडियम में आयोजित ब्लाइंड क्रिकेट टुर्नामैंट के खिलाड़ी और आयोजकों से भेंट कर यात्र धारवाड़ से हुबली पहुंची। हुबली ऑपरेटरों के साथ डैस पर अपडेटिंग के साथ-साथ लंच लेकर हावेरी-हरिहर-डावनगिरी की ओर बढ़ चली यात्र। धारवाड़ में अमोद (पूर्व मुख्यमन्त्री श्री कुमार स्वामी की पत्नी के नाम पर यहां केबल टीवी नेटवर्क चलते हैं) नेटवर्क के अतिरिक्त मि- सामा का भी निजी नेटवर्क चल रहा है। धारवाड़ से हुबली की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है, दोनों जगह अमोद को एक ही नेटवर्क चल रहा है जबकि भविष्य के गर्भ में यहां काफी उठा-पटक की सम्भावनाएं बन रही है। फिलहाल कर्नाटक में अमोद के साथ डैन का भी गठबंधन है। हुबली में ही आमोद के प्रतिनिधि शबीर भी अन्य ऑपरेटरों के साथ मिले और अशोक भाई से भी विदा लेकर यात्र सीधे दावणगिरी पहुंची। वहां के ऑपरेटरों के साथ रात को ही भेंट की, क्योंकि सुबह यहां से जल्दी ही आगे बढ़ना है। दावणगीर में भी आमोद से सीधे सिमोगा पहुंची यात्र। सिमोगा मीटिंग निबटाकर सीधे तमकुर पहुंच कर वहां आयोजित एक बड़ी मीटिंग को सम्बोधित किया। तुमकुर में आयोजित इस मीटिंग में आस-पास के क्षेत्रें से भी काफी संख्या में ऑपरेटर आए हुए थे, उनके भोजन का भी प्रबंध किया गया था। दोपहर से ही यहां ऑपरेटर आने शुरू हो गए थे, बहरहाल! यहां भी अभी तो अमोद नेटवर्क ही चल रहा है, लेकिन भविष्य के गर्भ में काफी कुछ उथल-पुथल की सम्भावनाएं प्रबल हो रही हैं। मीटिंग काफी लम्बी चली, रात ज्यादा होने के कारण बैंगलोर का रात्री विश्राम रद्ध कर यहीं रूकना पड़ा। तुमकुर से सीधे बंगलौर पहुंची यात्र, ऑपरेटरों की कर्नाटक एसोशिएशन द्वारा यात्र का गर्मजोशी से स्वागत सत्कार के बाद डैस पर लगे अनेक प्रश्न चिह्नों पर मुक्त चर्चा हुई। बंगलौर में ही बेसिल द्वारा खोली गई ब्रांच के द्वारा केबल टीवी ट्रेनिंग प्रोग्राम के सर्टिफिकेट वितरण कार्यक्रम में निमन्त्रण मिला तो वहां चार दिन चले ट्रेनिंग कार्यक्रम को भी देखा एवं इस सत्र में कुल 16 टैक्नीशियन्स से ट्रेनिंग हांसिल की, उनसे भी सीधे-सीधे मिलना हुआ एवं उनके भविष्य के प्रति शुभकामनाएं देते हुए सर्टिफिकेट वितरण कार्यक्रम में शामिल होकर यात्र बंगलौर से मैसूर के लिए बढ़ चली। मैसूर में अभी दशहरा की तैयारियां की जा रही है। यहां भी आमोद का ही नेटवर्क फिलहाल चल रहा है, लेकिन केबल टीवी ऑपरेटरों में काफी चहल-पहल दिखाई दे रही है। मैसूर केबल टीवी ऑपरेटरों की अब बाकायदा एसोसिएशन भी बन गई है। मैसूर मीटिंग के बाद वहीं रात्रि विश्राम कर अगले पड़ाव की और बढ़ चली यात्र। बान्दीपुर फिलहाल बन्द मिला, क्योंकि देशभर के समस्त टाईगर रिजर्व पार्को पर माननीय उच्चतम न्यायालय में एक केस चल रहा है जिसके अन्तर्गत समस्त पार्को पर फिलहाल प्रतिबन्ध लगा हुआ है। मैसूर से भाई रंगानाथन ऑपरेटर से विदाई लेकर सुबह गुण्डलपेट होते हुए बान्दीपुर पहुंची यात्र। बान्दीपुर टाईगर रिजर्व पार्क तो बंद था, लेकिन इसी के बीच बनी सड़क से होते हुए ही कर्नाटक से केरल के लिए जाया जाता है। बान्दीपुर से गुजरते हुए जंगली हाथियों के झुण्ड ने यात्र का स्वागत किया। यह मार्ग प्राकृतिक सौंर्दय के साथ-साथ जानवरों से भी भरा हुआ है। यहां कहीं भी हाथी-टाईगर, भालू-जंगली कुत्तों सहित जंगली भैंसे भी देखने को मिल सकते है। हिरणो की भी भिन्न प्रजातियां यहां है। इसी मार्ग से कर्नाटक से केरल में प्रवेश किया यात्र ने। केरल का पहला पड़ाव सुल्तान बतेरी में हुआ। यह एक टूरिस्ट सिटी है। हिल स्टेशन के साथ-साथ यहां जानवरों का आकर्षण भी टूरिस्टों को आकर्षित करता है। मौसम तो खूबसूरत यहां होता ही है। कर्नाटक से केरल प्रवेश के इस मार्ग में तमिलनाडू का भी एक जंगल आता है। कुल तीन प्रदेशों में बंटा हुआ है यह घना जंगल। इसी मार्ग से केरल में पहुंची यात्र।
यूं तो भारत के अन्य प्रदेशों से केरल विशिष्ट भिन्नता रखता ही है, लेकिन केबल टीवी व्यवसाय में भी केरल देश के अन्य प्रदेशों से बिल्कुल अलग है। यहां 120 लोकल चैनल प्रचलन में है। तकरीबन 4700 केबल टीवी ऑपरेटर केरल में केबल व्यवसाय में सलंग्न है। हालांकि शुरूआती दौर में यहां सिटी केबल का काफी जोर-शोर था लेकिन अब केवल नामचारे के रूप में ही सिटी केबल का ॅॅप्स् रूप। यूं तो यहां हिन्दुजा के इन केबल की भी प्रीजेंस बनी हुई है परन्तु सिर्फ नामचारे के लिए ही। डैन की झोली भी बिल्कुल खाली नहीं कही जा सकती है, जबकि हाथवे एशियानैट का सहभागी बना उनसे काफी आगे बना हुआ है, लेकिन केरल में केबल टीवी ऑपरेटरों का समूह बाकी सबकों बहुत पीछे धकेलता हुआ काफी आगे निकल गया है अन्य सबसे। केबल टीवी ऑपरेटरों ने आपस में मिलकर केरल कम्युनिकेशन केबल लिमिटेड (ज्ञब्ब्स्) कम्पनी बनाई हुई है। केरल के कुल 4700 केबल टीवी ऑपरेटरों में से तकरीबन 3000 ऑपरेटर ज्ञब्ब्स् से जुड़े हुए हैं, अतः ऑपरेटरों ने स्वयं को सबसे अलग बनाए रखा हुआ है। सब आपस में कोऑपरेटिव स्टाईल में केबल बिजनेस कर रहे है। डिजीटल का कानून यहां लागू होने में अभी काफी समय हैं, लेकिन केरल के ऑपरेटर अभी से ही पूरी तैयारी से चल रहे है। क्।ै का लायसेंस भी उन्होंने ले लिया है एवं डिजीटल हैडेण्ड लगा कर तकरीबन 2 लाख सैटॉप बॉक्स भी अभी तक केरल में लगाए जा चुके है ऐसा कहना है ज्ञब्ब्स् के सचिव गोविन्दम का। केरल के केबल टीवी ऑपरेटरों ने देश के अन्य राज्यों के केबल टीवी ऑपरेटरों के सामने एकता का एक ऐसा उदाहरण पेश किया है कि जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। केरल के कुल 14 जिलों में ज्ञब्ब्स् की सेवाएं उपलब्ध हैं। फिलहाल 150 चैनल वह डिजीटल प्रसारण किए जा रहे हैं, लेकिन जनवरी 2013 तक वह 250 चैनल एवं 31 दिसम्बर 2013 से पूर्व कुल 500 चैनलों के प्रसारण का लक्ष्य लेकर चल रहे है। सभी ऑपरेटरों में अपनी उपलब्धी पर खुशी उत्साह देखने को मिलता है। लेकिन समस्याएं भी उन्हें घेरे हुए हैं। वहां बिजली की दरें केबल व्यवसाय के लिए काफी ज्यादा हैं, 10/- प्रति यूनिट है, जबकि वहां अन्य व्यवसाय के लिए कमर्शियल दर 3/- रू- प्रति यूनिट है। केबल के तार बांधने के लिए भी बिजली के खम्भों की दर निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। 1998 से पहले मात्र एक रूपया प्रति पोल को 1998 में 17/-रू- प्रति पोल कर दिया गया। इसी पोल की दर को 2002 में 108/- कर दिया गया और अब 2012 में सीधे 311/-रू- प्रति पोल (वार्षिक) कर दिया गया है। अतः इन बढ़ी दरों के विरूद्ध केबल टीवी ऑपरेटरों का विरोध प्रदर्शन केरल में जारी है। इसी के साथ उनकी सबसे बड़ी समस्या उनके प्रतिस्पर्धा एम-एस-ओ- पैदा कर रहे हैं क्योंकि वह अपने सैटॉप बॉक्स मुफ्रत में कन्ज्यूमर्स को दे देते हैं जबकि ज्ञब्ब्स् ऐसा नहीं कर सकती है। इस सबके बावजूद भी केरल केबल टीवी ऑपरेटरों की एसोसिएशन का कहना है कि वही केरल में नम्बर बन हैं जबकि केरल के लोकप्रिय चैनल एशियानैट को लेकर भी उन्हें बहुत परेशान किया जा रहा है। यह चैनल स्टार ग्रुप का है और मीडिया प्रो के बुके में शामिल है, लेकिन मीडिया प्रो उनसे बहुत ज्यादा रिकवरी करना चाहता है। केरल में सन्तोषजनक बात यह भी है कि वहां की राज्य सरकार ने अभी केबल टीवी पर मनोरंजन कर नहीं लगाया है। जबकि इसके बिल्कुल विपरीत भारत के नक्शे में बिल्कुल ऊपरी सिरे पर कश्मीर से जरा नीचे दांयी ओर के राज्य उत्तराखण्ड पर नजर मारें तो वहां के केबल टीवी ऑपरेटरों की मनोरंजन कर ने कमर तोड़ रखी है। केरल केबल टीवी ऑपरेटरों की एसोसिएशन के साथ बैठक के बाद सुल्तान बतेरी से यात्र आगे बढ़ी ही थी कि बाइक सवारों का एक जत्था मिल गया जोकि त्रिवेन्द्रम से सुल्तान बतेरी से भी आगे टूर पर निकला हुआ था। 50 मोटर साइकिलों वाले इस जत्थे में सभी रायल एनफील्ड मोटर साइकिल थीं, एवं बहुत पुरानी पुरानी मोटर साइकिलों के साथ एक मोटर साइकिल डीजल की भी शामिल थी। इन बाइर्क्स के काफिलें में एक जीप भी शामिल थी एवं मैकेनिक भी। उनसे भेंट परिचय के बाद यात्र त्रिशूर से पूर्व गुरूवायूर में ज्ञब्ब्स् के टैक्निकल डायरेक्टर के साथ भेंट कर सीधे त्रिशूर होते हुए कोची पहुंची। सण्डेे होने के कारण केबल टीवी ऑपरेटरों का मिलना बहुत ही कठिन हो जाता है। पूरी तरह से छुट्टी का ही माहौल है केरल में अतः बामुश्किल कोची में गाड़ी की आधी सर्विस करवाई जा सकी। कोची से रूट में थोड़ा सा चेंज किया गया, अब यात्र सीधे मुन्नार के मार्ग पर बढ़ चली थीं, यह मार्ग पूरा पहाड़ी, प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुद खजाना है। बारिश लगातार हो रही है, लेकिन यात्र बिना रूके आगे बढ़ते हुए मुन्नार से थोड़ा पहले एडिमाली में रात्रि विश्राम के लिए रूक गई। एडिमाली में ही वहां के एक बड़े केबल टीवी ऑपरेटर से भेंट हुई। इन्हीं ऑपरेटर द्वारा मुन्नार में भी केबल ऑपरेट किया जाता है। यह पूरा क्षेत्र चाय बागान से भरा हुआ है यहां अनेक झरने है और रास्ता पहाड़ी के साथ-साथ बहुत संकरा भी है। यहां से आगे का मार्ग फिर से चेंज किया, जबकि मुन्नार मात्र 13 किलोमीटर ही रह गया था, लेकिन मुन्नार के लिए एडमिली से कोटाप्पना और कोटाप्पना से पूप्पारा और वहां से मुन्नार होकर वाइल्डलाइफ सैन्चुरी चिनार के मार्ग से उडामलाइपेट के रास्ते तमिलनाडू में प्रवेश किया यात्र ने। बहुत ही खूबसूरत नजारों भरा रहा यह पूरा मार्ग, इसी मार्ग पर मुन्नांर से पूर्व एक साइकिल सवार विदेशी (स्पेन) घुमक्कड़ भी मिला। उससे मुन्नार में भेंट परिचय के बाद यात्र तमिलनाडू के लिए बढ़ चली। यात्र के इस भाग को केरल तक ही रखते हैं क्योंकि यहां से आगे प्रकृति की इतनी सुन्दरता तमिलनाडू में नहीं मिलेगी। तमिलनाडू के साथ अगला भाग आरम्भ किया जाएगा। तब तक प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लीजिएगा।

(16 अक्टूबर से 25 अक्टूबर)
(पांचवा भाग)
(तमिलनाडू से कान्हा)
रसमलाई के बाद यदि अदरक खाने के लिए दिया जाए तो कैसा लगेगा, कुछ वैसा ही फर्क केरल की हसीन वादियों को पार कर तमिलनाडू में पहुंचने पर हुआ, क्योंकि केरल जैसी प्राक्रतिक सम्पदा तो तमिलनाडू को मिली ही नहीं है तिस पर केबल टीवी व्यवसाय में भी केरल के मुकाबले में तमिलनाडू के हालात बिल्कुल ही अलग है। केरल की चिनार वाइल्ड लाइफ सैन्चुरी से होते हुए जैसे ही तमिलनाडू में प्रवेश होता है पूरा प्लेन एरिया शुरू हो जाता है, वह पहाड़ियां वहीं थम जाती हैं।
तमिलनाडू में पहला पड़ाव त्रिची रहा जिसे त्रिचुरापल्ली के रूप में जाना जाता है। निक नेम त्रिची है जबकि त्रिची से पहले डिण्डीगुल भी एक बड़ा शहर बीच में आता है एवं उडुम्मलाई पेट्टा केरल पार करते ही पड़ता है। आज से ही नवरात्रे भी शुरू हुए है यानिकी दशहरा की शुरूआत हो गई है। त्रिची पहुंचते-पहुंचते रात्री के साढ़े दस बज चुके थे लेकिन होटल चैकिन करने तक बारह बज गए थे, क्योंकि जिस किसी भी ढंग के होटल में जाते थे पता चलता था कि फुल है, कोई भी रूम उपलब्ध नहीं है। लगातार बारिश भी हो रही थी और अभी भोजन भी करना था जो बढ़ते जा रहे समय के कारण और भी कठिन हो गया था, जबकि खाना तो यहां सिर्फ भूख मारने के लिए ही खाया जा सकता है उत्तर भारतीयों के लिए, तिसपर पहला नवरात्र। यूं तो कहीं पहुंचने से पूर्व ही हमारे होटल में ठहरने का बन्दोबस्त ऑपरेटरों के द्वारा हम करवा भी लेते है, लेकिन तमिलनाडू का यह रूट पूर्व निर्धारित नहीं था। केरल से थोड़ा चेन्ज कर यह नया रूट बनाया गया था। इसी रूट पर डिण्डीगुल में तमिलनाडू केबल टीवी ऑपरेटर्स एसोसिएशन प्रमुख गोकुल भाई का भी ठिकाना है, लेकिन बीमारी वश वह अस्पताल में एडमिट हें, उनसे सम्पर्क नहीं हो सका, अतः त्रिची में होटल मिलने में परेशानी आई। इस परेशानी का कारण यह रहा कि नवरात्रे शुरू होने के साथ-साथ यहां शादियों का सीजन भी शुरू हो जाता है। इन नवरात्रें में यहां शादियां की जानी ज्यादा शुभ मानी जाती हैं। अतः सभी अच्छे होटल शादियों के कारण अगले पांच दिनों तक के लिए बुक हो चुके है। इसलिए रसमलाई के बाद स्वाद अदरक जैसा हो गया। केरल से तमिलनाडू घुसते ही बामुश्किल एक होटल में रात्रीविश्राम के लिए जगह तो मिल गई लेकिन खाना---!तमिलनाडू में दूसरी सबसे बड़ी समस्या भाषा की भी आती है कि यहां हिन्दी तो छोड़ो अंग्रेजी जानने, समझने वालों का भी अभाव हैं। बहरहाल! त्रिची में रात्रीविश्राम कर सीधे तंझावर के लिए रवाना होना पड़ा क्योंकि केबल टीवी ऑपरेटरों ने यात्र के स्वागत का प्रबंध तंझावर शहर में ही रखा हुआ था। हालांकि कल जबकि ऑपरेटरों की मदद की ज्यादा जरूरत थी तब गोकुल या प्रभाकर दोनों में से कोई नहीं मिल सका था, लेकिन आज सुबह से यात्र के स्वागत की प्रतीक्षा तंझावर में जा रही थी, वहां परम्परागत तरीके से यात्र क स्वागत-सत्कार किया गया। डैस पर ऑपरेटरों का मार्गदर्शन कर यात्र तंझावर से नागापट्टनम पहुंची। नागापट्टनम में भी ऑपरेटर प्रतीक्षारत थे वहां से सीधे कराईकाल में मीटिंग हुई। कराईकाल भी माहे की ही तरह से पाण्डीचेरी का एक हिस्सा है। यहां तमिलनाडू राज्य का राज नहीं बल्कि पाण्डीचेरी का ही राज चलता हैं। इसलिए यहां की स्थिती तमिलनाडू के ऑपरेटरों से बिल्कुल अलग है।
तमिलनाडू में केबल टीवी व्यवसाय पूरी तरह से वहां की सरकार के ही अधिग्रहण में चल रहा है केबल टीवी ऑपरेटरों की मनमानी के अन्तर्गत नहीं। केवल चैन्नई में कुल दो एम-एस-ओ- जैक कम्युनिकेशन एवं केएल केबलविजन के अतिरिक्त पूरे तमिलनाडू राज्य में उपलब्ध पे चैनलों की बिलिंग सिर्फ वनविन्डो तमिलनाडू अरासु केबल नेटवर्क लिमिटेड पर होती है। वहां के केबल टीवी ऑपरेटरों को मात्र 70/- रूपए ही प्रति उपभोक्ता प्रति माह लेने का निर्देश है एवं इन 70/- रूपए में से 20/- रूपए अरासु केबल के खाते में जमा करवाने होते हैं। यह 20/- रूपए टैक्स नहीं है, बल्कि जो भी कण्टेंट वहां उपलब्ध है उसके एवज में ऑपरेटरों से लिए जाते है। हालांकि वहां अनेक हैडेण्ड हैं, लेकिन सभी का नियन्त्रण अरासु केबल द्वारा ही किया जाता है। डैस की तैयारी में तमिलनाडू के ऑपरेटर भी छटपटा रहे हैं, इसके लिए तंझावर के ऑपरेटरों द्वारा डैस लायसेंस भी ले लिया है, लेकिन अभी तो चैन्नई में ही डैस नहीं हो पा रहा है। चैन्नई में 2003 में कैस जिस तरह से लागू हुआ था वह वहीं तक ठहरा हुआ है, वहां केवल दो एम-एस-ओ- ही केबल नेटवर्क चला रहे हैं लेकिन फिलहाल डैस की तैयारियां बिल्कुल नहीं है जबकि डैस के प्रथम चरण में चैन्नई भी शामिल है और एक नवम्बर सामने खड़ा है। कराईकाल के ऑपरेटर डैस की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि वह पोण्डीचेरी के कानून के अंतर्गत आते हैं, परन्तु डैस पर चले जाने के बाद कराईकाल के सिग्नल जब आस पास के क्षेत्रें में होकर तमिलनाडू के राज्य में पहुंचेंगे तब कानूनी स्थिती क्या होगी यह देखने लायक होगा। कराईकाल से सीधे यात्र पोण्डीचेरी पहुंची, यहां भी होटलों की स्थिती तमिलनाडू जैसी ही है, लेकिन रात्रीविश्राम के लिए एक होटल तो मिल गया परन्तु खाने की समस्या जस की तस रही।
्रंपोण्डीचेरी में कुल चार एम-एस-ओ- हैं जो अपना-अपना नेटवर्क चला रहे हैं, वह भी डैस के लिए तैयार बैठे हैं परन्तु तमिलनाडू सरकार की भांति यहां भी वैसा ना हो जाए, इसका डर भी उनमें बैठा हुआ है। वहां के ऑपरेटरों के साथ भेंट कर यात्र चैन्नई के लिए रवाना हंो गई। पोण्डीचेरी से चैन्नई के मार्ग पर पोण्डीचेरी का समुन्द्र काफी दूर तक साथ-साथ चलता है। साथ में समुन्द्र और ऊपर से लगातार हो रही बारिश के कारण गाड़ी के शीशे बंद कर आगे बढ़ रही थी यात्र, कि दिखाई दिया कि समुन्द्र के किनारे-किनारे नमक उद्योग का इधर बड़ा काम है। कई जगह नमक के बड़े-बड़े ढ़ेर बिटोड़ों की भांति बने हुए थे। कई को त्रिपाल से तो अधिकांश घास फूंस से ढ़के थे तो काफी बिना ढ़के भी बिटोरे से ढ़ेर बन खड़े थे।
इन्हीं में से एक बढ़े से ढ़ेर को बोरियों में भर-भर कर ट्रक में लोड किया जा रहा था। बड़ा अजीब सा दृश्य था, बारिश में नमक के ढ़ेर को खुरच-काटकर बोरियों में भर ट्रक में लाद रहे मजदूर अजीब से प्रतीत हो रहे थे। हम उन्हीं के बीच अपनी गाड़ी लिए पहुंच गए और उस सारे दृश्य को कैमरों में कैद किया, देखा कि मजदूर भी एक परिवार के ही सदस्य थे, इनमें पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी काम में लगी हुई थीं। लगातार पड़ रही बारिश में भीगते हुए यह सब नमक के टीले को खुरच-खुरच कर बोरियां में भर कर बोरियों के मुहं की सिलाई कर ट्रक में लाद रहे थे। पूरी तरह से तरबतर। नमक का इनके शरीर पर क्या प्रभाव होता होगा इसकी परवाह तो वहां किसी को भी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने नमक के प्रभाव से सुरक्षित रहने के लिए कोई भी उपाय नहीं किए हुए थे। ऐसे कठिन कार्य में सलंग्न उस परिवार के सदस्यों को देखकर मुंह से ‘मेरा भारत महान’ निकलता है। बहरहाल! यात्र पोण्डीचेरी से सीधे चैन्नई पहुंची। एक नई एसोसिएशन के ऑफिस में किशाेर भाई के साथ वहां के ऑपरेटरों से पहले तमिलनाडू चैन्नई और फिर डैस एवं भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा हुई। इस मीटिंग में जानकारी मिली कि मात्र 15» ही सैटॉप बॉक्स चैन्नई में लगे हैं, वह भी कैस के समय में। यहां डैस के लिए कम से कम छः महीने चाहिए होंगे, लेकिन डैस पर जाने के लिए अभी तक डिजीटल एड्रोसिबल सिस्टम के हैडेण्ड के लिए अरासु केबल (सरकार) का हैण्डर ही किसी को नहीं दिया जा सका है।
डैस के प्रथम चरण में भले ही चैन्नई भी शामिल हो लेकिन पहली नवम्बर को वहां डैस इम्प्लीमेंट किए जाना किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। तमिलनाडू सरकार अपनी असर्मथता केन्द्रीय सरकार के पास लिख कर भेज चुकी है, लेकिन केन्द्रीय सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। डैस इम्प्लीमेंट के लिए चलाए जा रहे प्रचार अभियान में चैन्नई के केबल टीवी उपभोक्ताओं को भी वही संदेश दिया जा रहा है जो दिल्ली के उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। तमिलनाडू में अन्य ऑपरेटर भी डैस की तैयारी कर रहे है, वहां डैस के लिए एम-एस-ओ- लायसेंस भी लिए गए हैं, लेेकिन वहां के सरकारी निर्देश के विरूद्ध जा पाना किसी भी ऑपरेटर के लिए सरल नहीं होगा, परन्तु सरकारी व्यवस्था गर यूं ही लाचार रही तब तमिलनाडू में अनेक डिजिटल हैडेण्ड लगने की सम्भावनाएं हैैं। बहरहाल! चैन्नई से यात्र तिरूपती जी की ओर बढ़ चली। देर रात पहुंचना हुआ तिरूपती जी, क्योंकि चैन्नई में ही भारी जाम और बारिश के चलते दो ढ़ाई घण्टे खराब हो गए। चैन्नई-तिरूपती मार्ग भी नया बनाया जा रहा है, जिसके कारण यात्र और थकाऊ हो जाती है, इसलिए अर्धरात्री में पहुंचकर होटल मुश्किल से मिला क्योंकि दशहरा के कारण ब्रहमोत्सव भी जारी है तिरूपती जी में। ऑपरेटर राजशेखर रेड्डी हैदराबाद गए हुए हैं अतः उनसे वहीं भेंट होगी, लेकिन इस बार तिरूपती जी मन्दिर जाना नहीं हो सका सीधे हैदराबाद के लिए बढ़ी यात्र। यहीं से थोड़ा रूट भी चेंज किया गया यात्र का, क्योंकि दशहरा के कारण आन्ध्रप्रदेश में भी ऑपरेटरों का मिलना थोड़ा कठिन हो जाता है। कड़प्पा में ऑपरेटरों की मीटिंग के बाद यात्र कुर्नूल होते हुए नन्दयाल पहुंची। आन्ध्रप्रदेश में दशहरापर्व के लिए नन्दयाल बड़ा प्रसिद्ध है, यहीं पर पांच दिन का रामलीला जैसा कार्यक्रम आयोजित होता है। आयोजन आज से ही आरम्भ हुआ है, इत्तेफाकन जब हम आयोजन में पहुंचे। सबसे पहले कर्ण का रोल पात्र द्वारा किया गया और उसके बाद सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र का डोम वाला रोल एक पात्र द्वारा किया गया। इसी प्रकार से भिन्न-भिन्न पात्रें के रोल यह कलाकार करते हैं। श्रेष्ठ कलाकारों को पुरस्कृत किया जाता है। इस कार्यक्रम को देखने के लिए दूर-दराज क्षेत्रें से भी भारी संख्या में श्रद्धालुजन नन्दयाल आते है। नन्दयाल के ऑपरेटरों द्वारा इस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया जा रहा है। नन्दयाल दशहरा कार्यक्रम का स्वरूप उत्तर भारत में जैसे रामलीलाएं होती हैं, उनसे कुछ मिलता-जुलता ही था। इस कार्यक्रम में सिर्फ राम पर ही आधारित कार्यक्रम नहीं होता बल्कि द्वापर-त्रेता और सत्तयुग के प्रमुख पात्रें को अपने-अपने तरीके से प्रदर्शित करते हैं कलाकर। नन्दयाल से यात्र सीधे हैदराबाद पहुंची।
आन्ध्रा में दशहरा की धूम के साथ-साथ शनिवार-रविवार भी है अतः ऑपरेटर अपने परिवारिक कार्यों में व्यस्त होने के बावजूद भी हैदराबाद में एक बड़ी मीटिंग की व्यवस्था में लगे हुए मिले। रविवार को ऑपरेटरों की मीटिंग में यात्र का भव्य स्वागत हुआ। मीटिंग को संबोधित कर ऑपरेटरों के साथ भोजन किया। इन ऑपरेटरों में तीन ऑपरेटर भिन्न दलों से निवार्चित निगम पार्षद भी थे।
हैदराबाद में ही गाड़ी का व्हील बेलैंसिग एण्ड अलाईमैंट व सर्विस भी करवाई, साथ ही गंदे कपड़े भी लॉण्ड्री को दिए जो कल मिलेंगे। रविवार काफी व्यस्त रहा हैदराबाद में, सोमबार को ड्राईक्लीनर ने कपड़े देने में दोपहर ही कर दी, क्योंकि बिजली ही वहां लेट आई। हैदराबाद से निजामाबाद पहुंची यात्र, वहां के हालात बदले से प्रतीत हुए। निजामाबाद के ऑपरेटर साहनी साहब से भेंट नहीं हो सकी जबकि एक नया ऑपरेटर वहां अपना कन्ट्रोल रूम लगाए बैठा है। एक अन्य ऑपरेटर को ढूंढकर वहां का हाल जानने की कोशिश की तब जानकारी मिली कि वहां चल रहे तेलंगाना आन्दोलन का प्रभाव साहनी जी पर पड़ा है, उनका कन्ट्रोल रूम भी बंद है एवं वह हैदराबाद में है। साहनी जी एक बड़े और दबंग ऑपरेटर हुआ करते थे निजामाबाद में, परन्तु अब वहां की स्थितियां बहुत बदली सी हैं। निजामाबाद से आदिलाबाद होते हुए सीधे वर्घा (महाराष्ट्र) पहुंची यात्र। महाराष्ट्र-आन्ध्रा बोर्डर का यह क्षेत्र अपनी-अपनी भिन्न सस्कृतियों के कारण एकदम बदला सा लगता है।
महाराष्ट्र लगते ही दशहरा के कार्यक्रमों की अलग शैली गरबा की धमक आनी शुरू हो गई। वर्घा के ऑपरेटर मनीष के द्वारा वहां रात्रीविश्राम के लिए एक होटल में एडवांस बुकिंग करवा दी गई थी, परन्तु होटल में नहीं वहां सर्किट हाऊस में रात्रीविश्राम कर अगली सुबह ऑपरेटरों से मिलकर यात्र नागपुर के लिए रवाना हुई। गुजरात की ही तरह वर्घा भी महात्मा गान्धी जी से जुड़ा हुआ है, अतः यह भी महाराष्ट्र का एक ड्राई शहर है। वर्घा से नागपुर बहुत दूर नहीं है, दोपहर में ही नागपुर पहुंचकर पहले दैनिक भास्कर में समूह सम्पादक प्रकाश दुबे जी के साथ भेंट की और फिर वहां के ऑपरेटरों द्वारा आयोजित मीटिंग को सम्बोधित किया। ऑपरेटरों के साथ नागपुर के एम-एस-ओ- की ड्रैंस पर तैयारी भी अन्य शहरों से अलग नहीं है। सभी शहरों में एम-एस-ओ- फिलहाल अपना-अपना क्षेत्र विस्तार करने में प्रयत्नशील है। रात्रीविश्राम नागपुर में ही वहां के ऑपरेटरों के साथ चली लम्बी चर्चा के साथ हुआ। सुभाष बान्तै सहित नरेन्द्र-ठाकरे एवं मजहर व गोटू भाई आदि भी देर रात तक साथ रहे। नागपुर में भास्कर गरबा-डाण्डिया कार्यक्रम का आनन्द लिया। डाण्डिया का यह कार्यक्रम नौ दिनों तक चलता है जिसे दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित किया जाता है। नागपुर में नवभारत व अन्य समाचार पत्रें द्वारा भी ऐसे आयोजित करवाए जाते हैं।
नागपुर से अगले दिन यात्र सीधे मध्य प्रदेशं में कान्हा नेशनल पार्क के लिए रवाना हो गई। महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश का यह बार्डर क्षेत्र पूर्णतया आदिवासी बहुल क्षेत्र है। दूर तलक जंगल अथवा कहीं-कहीं छोटे-छोटे गांव जहां आदिवासियों का बसेरा। दशहरा उत्त्सव की धूम जगह-जगह थी, क्योंकि नवरात्रें की यह आखिरी शाम जो थी, कल तो विजय दशमी है अतः दशहरा मनाया जाएगा। रात में कान्हा नेशनल पार्क पहुंच गई यात्र। बिल्कुल ग्रामीण क्षेत्र यहां भी दशहरा कार्यक्रम की गून्ज थी। क्षेत्र के आदिवासी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम कर रहे थे। उसकी थोड़ी सी फुटेज उठाई एवं कान्हा के फारेस्ट में मध्य प्रदेश टूरिज्म द्वारा बने रात्रीविश्राम गृह में ठहरने का प्रबंध किया, परन्तु मध्य प्रदेश टूरिज्म द्वारा बनाए गए वह विश्राम गृह इतनी बत्तर हालत में है कि वहां से अपना सामान उठाकर वापिस वहां स्थित प्राइवेट रिसोर्ट्स को तलाशना पड़ा। चन्दन रिसोटर््स में रात्रीविश्राम किया। यह रिसोर्ट्स वहां मुख्य मार्ग पर ही स्थित है, इसका प्रमुख आकर्षण इसकी खुली रसोई है जो वहां से गुजरने वालों का ध्यान खींचती है। यहां पता चला कि कल बुधवार होने के कारण पार्क बन्द होगा। मध्यप्रदेश में इन पार्काे का साप्ताहिक अवकाश भी होता है, यह यहीं पहुंचकर पता चलता है। साप्ताहिक अवकाश के कारण कान्हा पार्क में तो आज जाना नहीं हुआ, वहां के लिए एक और दिन यहीं ठहरने का निर्णय लिया, लेकिन आज विजय दशमी पर्व है अतः सर्वप्रथम घर परिवार को दशहरा की शुभकामनाएं देकर यहां के आदिवासियों द्वारा दशहरा मनाने के कार्यक्रम में भाग लिया। दशहरा पर मुख्यतः मूर्तिविसर्जन का कार्यक्रम होता है यहां, लेकिन सुबह से ही माता के भजन-हवन शुरू हो जाते है। झांकिया निकाली जाती है माता की और सारे रास्ते सभी आदिवासी नाचते-गाते माता की अर्चना करते हुए नदी तक मूर्ति विसर्जन के लिए जाते हैं।
इनमें से अनेक महिलाएं लड़कियां भक्तिभाव में कुछ ज्यादा लीन हो जाती है, जहां वह एक तरहसे अपनी सु६-बु६ भी खो देती हैं भक्तिभाव में। पूरे रास्ते में अपने-अपने घरों से निकलकर आदिवासी महिलाएं मूर्ति पूजा करतीे हैं और मार्ग में आने वाले समस्त मन्दिरों में भी पूजा-अर्चना की जाती है। इस प्रकार सुबह से आरम्भ हुई मूर्ति विसर्जन की शोभा यात्र को शाम में जाकर नदी में विसर्जित किया गया। मूर्ति विसर्जन कार्यक्रम के बाद वहां लगी एक हाट भी हमने कैमरे में कैद किया। इस हाट में दूरदराज क्षेत्रें से आदिवासी यहां पहुंचे है। उनके लिए सजा यह हाट भी अपने आप में कान्हा पहुंचे टूरिस्ट के लिए एक बड़ा आकर्षण है। कान्हा में आज अवकाश होने के कारण वहां पहुंचे देश-विदेश के सैलानियों के लिए आदिवासियों के दशहरा महोत्सव से काफ्रफ़ी राहत मिली और बहुत कुछ नया देखने को मिला। दशहरा महोत्सव के बाद कान्हा टाइगर रिजर्व नेशनल पार्क का विजिट कर पाना भी अब एक टेढ़ी खीर हो गया है।
शाम को फॉरेस्ट ऑफिस जाने पर मालूम हुआ कि पार्क में प्रवेश के लिए जितनी गाड़ियों को अनुमति दी जाती है वह पहले से ही बुक की जा चुकी है, लेकिन उनमें से गर कोई केंसिल होती है तब वह बुकिंग किसी दूसरे को दी जा सकती है, उसके लिए सुबह की प्रतीक्षा करनी होगी। सुबह 5-00-5-30 बजे फॉरेस्ट ऑफिस के बाहर लम््रं्रंबी लाइन लग जाती है। वहां पहले आओ पहले पाओ के कारण कान्हा घूमने आए टूरिस्ट सुबह से ही खड़े हो जाते है, लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को अन्दर जाने का अवसर मिलें। कान्हा का आकर्षण चेतना यात्र-8 को नागपुर से कान्हा नेशनल पार्क तक तो खींच लाया, लेकिन यहां की मुश्किलें तो और लम्बी होती जा रही थीं, आखिरकार चन्दन रिसोर्ट में ही ठहरे एक विदेशी टूरिस्ट के साथ हमें भी कान्हा विजिट का अवसर मिला। वह टूरिस्ट अकेला था और हम तीन अतः एण्ट्री सहित जिप्सी का खर्चा शेयर कर कान्हा टाईगर रिजर्व नेशनल पार्क देखने का सौभाग्य प्राप्त हो सका। कान्हा पार्क मध्य प्रदेश के अन्य पार्काे से कहीं ज्यादा घना व आकर्षक है। यहां जंगली भैंसे, बारह सिंहे, जंगली कुत्ते भी हैं जबकि टाईगर-लेपार्ड सहित हिरनों की भिन्न प्रजातियां तो हैं ही। कार्बट की भांति हाथियों के झुण्ड नहीं हैं यहां। बांस और साल का घना जंगल है कान्हा। यात्र के इस भाग को कान्हा तक ही सीमित रखते हैं, क्योंकि जंगल से निकल कर शहर का भाग अगले अंक से शुरू करेंगे। क्योंकि जंगल के स्वाद में शहर मिला देने से जंगल का जायका भी खत्म हो जाएगा अतः यात्र का यह भाग कान्हा पर ही फुलस्टॉप करते हैं।

(25 अक्टूबर से 5 नवम्बर)
(छठा भाग)
(कान्हा से दिल्ली)
विजयदशमी के त्योहार की धूम इस क्षेत्र में अभी पूरी तरह से बनी हुई है। कान्हा के गांवों में भले ही देवी मां की मूर्ति का विसर्जन हो गया हो लेकिन बाकी क्षेत्रें में दशहरोत्सव जारी है। कान्हा से आगे का रास्ता पूरी तरह से जंगल का ही है, इस मार्ग पर आदिवासियों की ही बीच-बीच में बस्तियां गांव हैं। दशहरा की खुशियां सब अपने-अपने तरह से मनाने में जुटे हैं। कहीं-कहीं रावण भी बनाकर खड़ा किए हुए हैं। कान्हा से मोचा- बाईहर- सुपखार- चिल्पी- बोडला- पण्डेरिया- मुंगेली होते हुए तखतपुर से बिलासपुर (छत्तीसगढ़) पहुंची यात्र।
इस बीच का सफर शहरी वातावरण से बिल्कुल भिन्न रहा। इस मार्ग में आए गांवों मेें बने मकान भी ध्यान आकृष्ट करते है, कच्चे ही सही, लेकिन इन मकानों का डिजाईन आकर्षित करता है। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ का बोर्डर एरिया है यह, बिल्कुल जंगलों में से होकर ही आगे निकल रहा है। कभी-कभार ही कोई गाड़ी इस रूट से गुजरती है, ऐसा बयान यहां की सड़के कर रही हैं। बहरहाल! यात्र बिलासपुर पहुंच गई है। बिलासपुर में भी विजय दशमी के त्योहार की धूम मची हुई है।
रात्रीविश्राम बिलासपुर में ही किया, यहां दूरदर्शन व अन्य चैनलों के लिए रिपोर्टिंग करने वाले कमल दुबे आदि ने यात्र का स्वागत किया। दशहरोत्सव पर शहर में जितनी भी झांकियां हैं उनके बीच भी सर्वश्रेष्ठ बनने की प्रतियोगिता होती है। नौ दिनों के ऐसे पर्व का अब फाइनल मूर्तिविसर्जन का दिन है। इन मूर्तियों को गाजे-बाजे के साथ नाचते-गाते-झूमते विसर्जन के लिए ले जाया जाएगा। इनकी शोभायात्र के कारण सारा शहर सजा हुआ है और दूरदराज क्षेत्रें से भी लोग आकर मार्ग के दोनों ओर अपना स्थान ग्रहण कर रहे है।
बड़े-बड़े मंच भी इनके मार्ग पर जगह-जगह बने हुए हैं जहां भिन्न लोग अपनी-अपनी ओर से श्रेष्ठ झांकियों का चयन कर उन्हें पुरस्कृत करने के लिए बैठे है। ऊंची आवाज का संगीत एक दूसरे में घुलकर बेसुरा सा हो गया है, भीड़ बढ़ती ही जा रही है और अलग-अलग मोहल्लों से मूर्तियों की झांकियां को विसर्जन के लिए ले जाने के लिए गाड़ियों में अलग-अलग तरीके से लाद कर ले आया जाने लगा है। हरेक झांकी के साथ मस्त युवकों के झुण्ड हैं, हर किसी को ही अपनी झांकी सर्वश्रेष्ठ लगती है जबकि उनमें से श्रेष्ठ का चयन करने के लिए भिन्न मंचो पर चयनकर्ता भी आसीन हैं। भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात है, क्योंकि मूर्तिविसर्जन के इस कार्यक्रम में एक-दूसरे से आगे निकलने को लेकर या फिर किसी अन्य कारण को लेकर झगड़ा होने की सम्भावनाएं भी बनी रहती हैं, अतः सावधानीपूर्वक सब तरह के प्रबंध यहां होते हैं। रात बढ़ती जा रही है, साथ ही मूर्तिविसर्जन की भीड़ भी, एक उन्माद का सा माहौल बनता जा रहा है जो सुबह तक चलने की सम्भावना है। बहरहाल! दशहरा मनाने, की देशभर में अलग-अलग परम्पराएं हैं। अभी कान्हा में हवन और मूर्ति विसर्जन से पूर्व महाराष्ट्र में दशहरा के अवसर पर डाण्डिया-गरबा की धूम हम देखते हुए आ रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र से पूर्व आन्ध्र व तमिलनाडु के रंग अलग देखे हैं।
बिलासपुर से उड़ीसा होते हुए बंगाल पहुंचनी है यात्र, अतः उड़ीसा के लिए छत्तीसगढ़ से शुरू होने वाला सफर थोड़ा सा रिस्की हो जाता है क्योंकि इधर माओवादियों की एक्टीविटी चल रही है। बिलासपुर से जजंगी- रायगढ़- झारसुगुड़ा-देवगढ़-बाराकोट होते हुए देर रात सकुशल केन्दुझर पहुंच गई यात्र। इस मार्ग पर भी दशहरोत्सव की धूम जगह-जगह मची हुई थी। बीच में एक स्थान ऐसा भी आया जहां सबरी मन्दिर भी था और उनके दर्शन-पूजन के लिए वहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा थी। इसी मार्ग पर थोड़ा सा रास्ता भटक जाने के कारण तकरीबन 70 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर करना पड़ा। यह 70किलोमीटर हमारे तकरीबन ढ़ाई घण्टे खा गया क्योंकि सड़क बहुत खराब और छोटे-छोटे गांवों में से होते हुए निकल रही थी। बहरहाल! देर रात्री केन्दुझर पहुंच ही गई यात्र। सुबह वहां के ऑपरेटर के साथ भेंट की तब जानकारी मिली कि केबल टीवी का कार्य छोड़ पोलिटिक्स में कदम रख दिए हैं, फिलहाल वहां नगर निगम के सदस्य बन गए है। केबल व्यवसाय को बेच दिया है उन्होंने।
केन्दुझर से आगे बढ़ने से पूर्व हमारे साथ चल रहे एक सहयोगी ड्राइवर इमरान ने वहां ईद की नमाज पढ़ी। आज बकरीद है अतः इमरान ने नमाज अदा की और उसे ईदी दी गई तब यात्र उड़ीसा से वेस्ट बंगाल के लिए रवाना हुई। मिदिनापोर से खड़गपुर होते हुए यात्र कोलकाता पहुंची, जहां र्फस्ट फेस में ही डैस लागू किया जाना है। मुम्बई-दिल्ली व चे न्नई की ही भांति कोलकाता भी डैस के प्रथम चरण में शामिल है। 31 अक्टूबर की आधी रात को इन चारों महानगरों में एनालॉग प्रसारण बन्द किए जाने का आदेश सरकार दे चुकी है, लेकिन सरकार में सूचना व प्रसारण मन्त्री श्रीमति अम्बिका सोनी के त्याग पत्र से स्थिती थोड़ी जटिल हो गई है। ऐसे समय पर जबकि मन्त्री महोदया जी ही इस्तीफा दे गई हैं, जबकि इस सारी कवायद को करने में उन्होंने ही तो बड़ी जिम्मेदारी निभाई है। ऐसा कानून बनाना ही अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ऐसे कानून से देश के करोडों लोग प्रभावित होंगे एवं हजारों लाखों करोड़ो का इन्वेस्टमेंट होगा। नई सम्भावनाएं जन्मेंगी और नए बाजार खुलेंगें इलैक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में एक नई क्रान्ति की शुरुआत होगी, जिस पर सारी दुनिया के धनकुबेरों की गिद्ध दृष्टि गड़ी हुई है। उसके लिए विशिष्ट कानून बना देना भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि ऐसे कानून को लागू करवाना भी एक बड़ी चुनौती थी, परन्तु ऐसे समय पर माननीया मन्त्री महोदया जी का त्यागपत्र सारी सम्भावनाओं पर प्रश्नचिह्न खड़े कर गया है।
बहरहाल! यात्र कोलकाता पहुंची, जहां सर्वप्रथम सुरेश सेतिया की अगुवाई में एम-एस-ओ- ने गर्मजोशी से यात्र का स्वागत किया। भावी सम्भावनाओं पर गम्भीर चर्चा सहित वहां की वास्तविक वर्तमान स्थितियों पर भी जानकारियां मिलीं, तत्पश्चात कोलकाता के ऑपरेटरों के साथ भी विशेष बैठक हुई। कोलकाता के हालात ऐसे नहीं प्रतीत हो रहे हैं कि पहली नवम्बर को यहां डैस लागू हो पाएगा, क्योंकि एम-एस-ओ- ऑपरेटराें के साथ-साथ यहां की सरकार भी अभी इस पक्ष में नहीं है कि पहली नवम्बर को डैस लागू किया जाए। कोलकाता में डैस इम्प्लीमेंट पर अभी अनेक प्रश्नचिह्न लगे हुए हैं, तिस पर माननीय मन्त्री महोदया जी के त्यागपत्र ने नए सवालो को खड़ा कर दिया है।
कोलकाता से आगे बढ़ते हुए यात्र दुर्गापुर पहुंची। वहां भी डैस को लेकर अब कन्फ्रयूजन और बढ़ गया है। दुर्गापुर से यात्र आसनसोल केे मार्ग से झारखण्ड़ की ओर बढ़ गई। लेकिन कुल 9 एम-एस-ओ- ॅॅप्स्-डंदजीवन-क्ळ-ळज्च्स्-प्छ-क्म्छ-व्त्ज्म्स्-स्प्छज्ञ - ज्ञभ्स्।ैभ् तो कोलकाता में प्रचलन में हैं, जबकि शीघ्र ही 4 एम-एस-ओ- और यहां के लिए तैयारी में है। अर्थात् अकेले कोलकाता में जब दर्जनभर से ज्यादा हैडेण्ड हो जाएंगे तब क्।ै में खूब प्रतिस्पर्धी देखने को मिलेगी यहां। दुर्गापुर से पुरूलिया होते हुए यात्र टाटा नगर जमशेदपुर के बाद रांची पहुंची। जमशेदपुर में भी मंथन-डैन-डब्लू डब्लू आई एल- जीटीपीएल सहित इण्डिपैन्डैंट एम-एस-ओ- भी हैं।
इस प्रकार एम-एस-ओ- की तैयारियां डैस के द्वितीय चरण की ओर बढ़ रही है। रांची की स्थिति भी अलग नहीं है बल्कि यहां भी कोलकाता से मंथन व जीटीपीएल भी पहुंच गए हैं एवं इण्डिपैंडैंट भी अभी अपना झण्डा थामे जमे हुए हैं। भविष्य किधर जाएगा के लिए उनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि पूरी तरह से वह उन्हीं एम-एस-ओ- पर निर्भर हैं। कोलकाता या गुजरात से चलते हुए मंथन अथवा जीटीपीएल इतना बड़ा कैसे हो गया कि यहां तक पहुंच कर इन्हें भी गोद ले लिया, ये स्वयं अपने पैरों पर क्यों नहीं खड़ें हो सके, इन्होंने नहीं सोचा व ना ही चाहते है। झारखण्ड में मनोरंजन कर 50/- रुपए प्रति टीवी प्रति माह है, लेकिन केवल एक ही केबल टीवी ऑपरेटर मनोरंजन कर का भुगतान करता है बाकी नहीं, इसलिए शेष केबल टीवी ऑपरेटरों को मनोरंजन कर की कोई चिंता नहीं हैं, क्योंकि वह पे ही नहीं कर रहे हैं। रांची से यात्र हजारीबाग होते हुए बोघगया पहुंची।
हजारीबाग पूर्ण तथा डैन हो गया है अतः यहीं से डैन प्रमुख श्री एस-एन- शर्मा जी को बधाई देकर जब बोघगया पहुंचे तब वहां भी डैन को जपते पाया ऑपरेटरों को, लेकिन पटना की स्थिति बिल्कुल अलग है। पटना में इण्डिपैन्डैंट सुशील के सामने खड़े अलग-अलग हैडेण्ड अब मोर्या के बैनर तले एक ही हैैडेण्ड बन गए है। मोर्या के साथ कोलकाता के सुरेश सेतिया जुड़ गए हैं, अतः पटना में बार-बार ऑपरेटरों के बीच होने वाली बहुत सी समस्याओं का वह समाधान भी बन गए हैं। पटना में डैन मौके की प्रतिक्षा में बैठा हुआ है, लेकिन फिलहाल पटना के ग्राउण्ड में डैन की शुरूआत नहीं हो पाई है, फिर भी बिहार के एक-दो शहरों से डैन ने अपनी शुरुआत कर दी है। मुजफ्रफरपुर, भागलपुर सहित कई दूसरे शहर भी डैन के अन्तर्गत आने के लिए तैयार किए जा चुके हैं। पटना मीटिंग के बाद यात्र का रूट थोड़ा बदला गया क्योंकि पूर्व में बनाए गए यात्र के रूट में त्रुटिवश 31 अक्टूबर लिखना रह गया था, अतः एकदिन 31अक्टूबर का सदुपयोग करने के लिए बिहार को और निकट से देखने का निर्णय लिया गया। पटना से हाजीपुर-बरौनी-बेगूसराय पहुंची यात्र। हाजीपुर ऑपरेटरों के साथ मीटिंग कर सीधे बेगुसराय पहुंची यात्र, बेगुसराय में ही बरौनी के ऑपरेटरों को भी बुला लिया गया। उनके साथ मीटिंग कर यात्र सीधे मुंगेर पहुंची। मुंगेर एक हिस्टोरिकल शहर है बिहार का। यहां एक इंटरनेशनल योगा सेंटर भी है जहां दुनियाभर से लोग योगा सीखने आते हैं। मुंगेर में ही सरकारी शस्त्र निर्माण कारखाना भी है। यहां के ऑपरेटरों के साथ मीटिंग के बाद यात्र भागलपुर होते हुए सीधे कटिहार पहुंची।
उधर दिल्ली में सूचना व प्रसारण मन्त्री के रूप में कांग्रेस प्रवक्ता श्री मनीष तिवारी को शपथ दिलवादी गई है। ईद के दिन श्रीमती अम्बिका सोनी जी ने मन्त्रीपद से त्यागपत्र दिया था एवं उनके रिक्त स्थान को 29 अक्टूबर को मनीष तिवारी जी के द्वारा भर दिया सरकार ने, लेकिन ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इण्डस्ट्री मन्त्रियों के इस बदलाव को लेकर सकते में हैं। नए मन्त्री जी का निर्णय डैस के इम्प्लीमेंट पर क्या रहेगा, सब कपास लगाने मेें जुटे हुए हैं। इसी अहा-पोह में यात्र कटिहार पहुंच गई है। कटिहार के बारे में जैसा सुनने को मिला था उससे भी बहुत ज्यादा कटिहार पहुंचकर देखने को मिला। एक ब्लाइन्ड मैन ललित अग्रवाल केबल टीवी व्यवसाय में पूरी तरह से रमा हुआ है। पूर्णतया प्रोफेशनल, वह जानता है कि 31 दिसम्बर, 2014 के बाद देशभर से एनालॉग प्रणाली बंद करने की ठान रखी है सरकार ने अतः वह भी अभी से डिजीटल पर जाना शुरू हो गया है। 170 डिजीटल चैनलों का प्रसारण वह अपने नेटवर्क से कर रहे है। कोशी ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (केबीसी) न्यूज चैनल चला रहे अग्रवाल साहब की उस क्षेत्र में पूरी धाक है। इज्जत से केबीसी न्यूज लोकप्रियता में वहां नम्बर वन पर है। अभी तकरीबन 1300 सैटॉप बॉक्स वह लगवा चुके हैं, काम चालू है 80-80 चैनल करके वह चैनलों में वृद्धि करते जाएंगे।
ललित अग्रवाल भले ही आंखो से देख नहीं पाते हैं, लेकिन किसी भी प्रकार के नाजायज दबाव-शोषण के खिलाफ कैसे लड़ना है वह खूब अच्छी तरह से जानते हैं। स्टार के डिस्ट्रीब्यूटर के शोषण पूर्ण रवैये के खिलाफ उन्होंने डिस्ट्रीब्यूटर सहित स्टार के भारत स्थित प्रमुखों के वारण्ट निकलवा दिए थे। तीन बार वह अलग-अलग मामलों में टीडीसैट से केस जीत चुके हैं। अतः डरना तो उन्होंने सीखा ही नहीं है।
ललित अग्रवाल का जन्म 2 अक्टूबर, 1968 में एक रईस परिवार में हुआ था, वह जन्म से बिल्कुल स्वस्थ पैदा हुुए थे। जब वह मात्र 15 दिनों के ही थे तब चेचक ने उनकी एक आंख ही पूर्णतया ले ली थी जबकि दूसरी आंख से उन्हें थोड़-थोड़ा दिखता रहा। जैसे-जैसे वह बड़े होते गए उनकी एक आंख की रोशनी भी घटती ही चली गई, लेकिन तब तक किसी तरह से उन्होंने ग्रेजुएशन पूर्ण कर ली थी। आखिरकार उनकी आंख उनका साथ छोड़ रही थी तब मुम्बई में इलाज की हर सम्भव कोशिश की गई, लेकिन ईश्वर की मर्जी के सम्मुख सब लाचार हो गए और वह पूरी तरह से ब्लाइन्ड हो गए। उनका परिवार मुम्बई में बसा हुआ है, अपना ठीक-ठाक कारोबार है मुम्बई में, लेकिन ललित अग्रवाल ने वापिस कटिहार ही रहने का निर्णय लिया। स्वयं को अपने ही दमबूते पर खड़ा करने के लिए उन्होंने पहले एक एन-जी-ओ- कल्याण भारती के अन्तर्गत समाज सेवा के कार्य में सेवाएं दीं, लेकिन फिर मीडिया के क्षेत्र ने उनका ध्यान खींचा और 1999 में उन्होंने केबल टीवी व्यवसाय में कदम रखे। केबल टीवी में सफलतापूर्वक 2001 में अपना एक न्यूज चैनल भी शुरू कर दिया केबीसी न्यूज। देशभर के आंखो वाले केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए कटिहार का यह ब्लाइन्ड केबल टीवी ऑपरेटर एक ऐसा प्रेरणा स्त्रेत है जो कभी हारना नहीं जानता व न ही किसी से डरना। आंखे ना होने के बावजूद भी इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं में वह ठीक-ठाक देख लेते हैं। उनकी कार्य प्रणाली ही उन्हें इण्डस्ट्री में एक सही मुकाम की ओर लिए जा रही है। कटिहार में ललित अग्रवाल से मिलने के बाद बिहार दौरा सार्थक हो गया। अतः यात्र वहां से आगे बढ़ते हुए पूर्णिया-दरभंगा होते हुए मुजफ्रफरपुर ऑपरेटरों से मिलते हुए गोपालगंज पहुंची। बिहार-उत्तरप्रदेश सीमा पर स्थित गोपालगंज नेपाल सीमा के भी निकट है। यहां का केबल टीवी ऑपरेटर केबल से ज्यादा दूसरे कार्यो में व्यस्त होता है। गोपालगंज से कुशीनगर पहुंची यात्र। बुद्धिज्म शिक्षा पर यह शहर विश्व भर में प्रसिद्ध है। कुशीनगर से अयोध्या होते हुए फैजाबाद मार्ग से गोरखपुर पहुंची यात्र।
अयोध्या में शाम का कर्फ्रयू लगा हुआ है, क्योंकि दशहरा के अवसर पर निकलने वाली शोभायात्र में कुछ गड़बड़ किए जाने के कारण वहां साम्प्रदायिक दंगे हो गए थे। अब स्थिति नियन्त्रण में है, इसलिए धीरे-धीरे कर्फ्रयू की समय सीमा बढ़ाई जा रही है। बाजारों में भीड़ बढ़ती ही जा रही है। फैजाबाद से गोरखपुर होकर यात्र सीधे लखनऊ पहुंच गई। बिहार से उत्तर प्रदेश की स्थिति बिल्कुल अलग है, यहां तकरीबन तमाम शहरों में डैन ही हो गए हैं ऑपरेटर। डब्लू-डब्लू आई एल एवं डीजी की मौजूदगी भर ही रह गई है। उत्तर प्रदेश में मनोरंजनकर की स्थिति बहुत पीड़ादायक है, जबकि बिहार में 15/- रुपए प्रति सब्स्क्राईबर है। उत्तर प्रदेश में 2009-2010 में कुल कलैक्शन का 25» टैक्स देना होता था जो कि 2010-2011 में 30» वृद्धि कर दी गई थी। 2011-2012 में पुनः 10» वृद्धि की गई थी जबकि अब साल 2012-2013 के लिए भुगताई जाने वाली टैक्स की राशि में 30» की और वृद्धि कर दी गई है। इस प्रकार से मात्र 5 वर्षाे में ही 70» की वृद्धि उत्तर प्रदेश की सरकार ने केबल टीवी पर मनोरंजन कर के रूप दी है। डैन का वर्चस्व समूचे उत्तर प्रदेश में कायम है, साथ ही डिजीटल का काम भी तेजी से चल रहा है। डैस के द्वितीय चरण के लिए लखनऊ-कानपुर पूरी तरह से तैयार है।
लखनऊ मीटिंग के बाद सीधे कानपुर पहुंची यात्र जहां केबल टीवी ऑपरेटरों में डैन क्रिकेट लीग टूर्नामेंट खेला जा रहा था। संजीव दीक्षित द्वारा ऑर्गेनाइज्ड यह क्रिकेट टूर्नामेंट कानपुर स्टेडियम में खेला जा रहा था जिसका आज सेमीफाइनल एवं फाइनल मैच था। सभी ने गर्मजोशी के साथ यात्र का स्वागत किया। कानपुर ऑपरेटरों से मिलकर यात्र सीधे इटावा पहुंची। यहां का ऑपरेटर डीजी अनुबंध के सहारे बैठा है वही स्थिति मैनपुरी की भी है। यात्र इटावा से शैफई होते हुए मैनपुरी के रास्ते फिरोजाबाद पहुंची। ऑपरेटरों से भेंट करते हुए इसी मार्ग से आगरा होकर मथुरा पहुंच गई आज यात्र। मथुरा में भी यात्र का भव्य स्वागत किया गया। यहां से वापिस दिल्ली के लिए नोएडा होकर पहुंची यात्र। नोएडा में कर्नल (रिटायर्ड) वी-सी-खेर जी की कुशल क्षेम जानने के साथ-साथ उनकी शुभशीष लेते हुए साठ दिनों का सफर सफलता पूर्वक पूर्ण कर यात्र दिल्ली पहुंच गई, जहां भारी संख्या में प्रतीक्षारत लोगों ने यात्र का स्वागत किया।
इस प्रकार चेतना यात्र का एक और दौर सम्पन्न हुआ।
इस यात्र में कुल 20 राज्यों व 5 यूनियन टैरिटरी सहित साढ़े चार सौ से अधिक शहरों में गई यात्र, तकरीबन 30 हजार किलोमीटर का सफर साठ दिनों में पूर्ण हुआ। किसी भी प्रकार का कोई भी विघ्न इस चेतना यात्र-8 में नहीं आया। 60 दिनों यात्र की तमाम खट्टी-मीठी स्मृतियों में से कुछेक अंश इस तरह से आप तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है, जबकि भारत भ्रमण की स्मृतियों के खजाने में चेतना यात्र-8 की समृतियां शामिल हो गई है। प्रकृति ने इतना कुछ दे रखा है हमारे देश को कि बार-बार देखने से भी मन नहीं भरता है।