चेतना यात्रा-7

‘चेतना यात्रा-7’ 5 सितम्बर से 25 अक्टूबर 2011
भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री की बहुप्रतीक्षित ‘चेतना यात्र-7’ का शुभारम्भ देश की राजधानी दिल्ली से 5 सितम्बर को हुआ। यात्र की सपफ़लता और सुरक्षा की शुभकामनाएँ देने के लिए मीडिया इंडस्ट्री के तमाम जाने-माने प्रतिनिधियों ने भााग लिया। गो ग्रीन-गो डिजीटल का स्लोगन लिए यह यात्र देश के सभी राज्यों में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति देशवासियों को जागरूक करने के साथ-साथ शहर दर शहर वृक्षारोपण के कार्यक्रम भी आयोजित करवाएगी। भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री में संलग्न व्यक्तियों सहित प्रिन्ट मीडिया एवं देश के कोने-कोने में विद्यमान विभिन्न चैनलों के रिपोर्ट्स व स्टिंगर्स भी चेतना यात्र के प्रयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते हैं। पूर्व में की जा चुकी छः सपफ़ल यात्रओं में किए गए वृक्षारोपण के परिणाम भी अब नजर आने लगे हैं। तमाम शहरों में रोपे गए उन पौधों ने अपनी जड़ें पकड़ ली हैं और अब वो मजबूत पेड़ बनते जा रहे हैं। इसी प्रकार इलैक्ट्रॉनिक कचरे (ईवेस्ट) पर की गई चर्चाओं के भी अब आंशिक परिणाम कई शहरों में दिखाई देने लगे हैं। केबल टीवी ऑपरेटरों ने अपनी खराब हो गई केबल को उन कबाड़ियों के सुपुर्द न करने का निर्णय लिया है जो इसमें से कॉपर निकालने के लिए केबल को जलाया करते थे, बल्कि अब ऐसी केबल उन्हीं लोगों को दी जाती है जो इसे छील कर इसमें से कॉपर निकालते हैं। ऑपरेटरों के साथ-साथ उन कबाड़ियों की समझ में भी धीरे-धीरे यह बात आ रही है कि केबल को जलाकर कॉपर निकालने की प्रक्रिया में जितनी जहरीली गैसें हमारे अन्दर चली जाती हैं, उसके मुकाबले में प्राप्त होने वाले कॉपर की कीमत का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है।
ग्लोबल वार्मिंग के खतरों और उनसे बचाव के उपायों पर लोगों में जागरूकता लाने की जितनी भी कोशिशें की जाएं उतनी ही कम हैं, लेकिन इसके लिए किए जाने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रमों में आने वाली भीड़ से भी ज्यादा अहम होता है कि कितने पौधे जीवित रहे। पौधों की बच्चों की तरह से देखभाल करने वाले भी चेतना यात्र के दरमियान अनेक लोग मिलते हैं एवं लगाए गए पौधों को गोद लेने वाले बच्चों का भी उत्साह कार्यक्रम को ऊर्जा प्रदान करता है। ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री में संलग्न लोग जिनके प्रयासों से ही ढ़ेर सारे चैनल देश के करोड़ों दर्शकों तक पहुंच रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे के उन लोगों का उन दर्शकों के साथ बहुत कम ही सम्पर्क का मौका मिल पाता है। अनेक शहरों व क्षेत्रें में तो दर्शकों को केबल तकनीशियन्स के अलावा किसी और से कोई ताल्लुक ही नहीं होता है व न ही दर्शक यह जानते हैं कि उन्हें ऐसी सेवा उपलब्ध करवाने वाले है कौंन\ केबल वार में संलिप्त विभिन्न ऑपरेटरों की एक-दूसरे पर तनातनी की खबरों का भी दर्शकों में बुरा प्रभाव पड़ता है, लेकिन उन्हीं दर्शकों को जब इंडस्ट्री द्वारा किए जाने वाले ऐसे जनहित कार्यों का पता लगता है तब इंडस्ट्री के लोगों के प्रति आश्चर्य के साथ सम्मान का भी भाव आता है। देश के करोड़ों लोगों तक केबल टीवी सेवा उपलब्ध करवाना एक चुनौतीपूर्ण और बड़ा व्यवसाय है, लेकिन उन करोड़ों देशवासियों की भावी पीढ़ियों को भी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे पृथ्वी के तापमान के प्रति जागरूक करना एवं इसके खतरों से बचाव के उपाय करने में उनको भी निमन्त्रित करना सम्मान सहित जोड़ता भी है।
इसके लिए विभिन्न शहरों में स्कूलों, अदालत परिसरों, अस्पतालों व थानों सहित प्रमुख सार्वजनिक संस्थानों पर वृक्षारोपण कार्यक्रमों का आयोजन कर सबको शामिल किया जाता है। पृथ्वी को बचाने की मुहिम में जनसहयोग के साथ-साथ आपस में भी तालमेल बढ़ता है। केबल टीवी व्यवसाय में संलग्न हर किसी के लिए आवश्यक है कि वह सार्वजनिक जीवन में सम्मान भी पाए। पर्यावरण के बिगड़ते सन्तुलन के कारण दिन ब दिन प्रकृति में भारी बदलाव आ रहे हैं। निरन्तर प्रकृति हमें संकेत दे रही है कि हम कैसे भयानक भविष्य की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। अपनी ही दुनिया में मशगूल हम तमाम शानोशौकत के सामान तो बटोरने में लगे हुए हैं, लेकिन कुदरत के कहर से हम कतई नहीं डर रहे हैं। निरन्तर बढ़ता जा रहा जनसंख्या का सैलाब पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को नोचता-खसोटता जा रहा है। पीने के पानी से लेकर शुद्ध हवा के भी अब टोटे पड़ते जा रहे हैं। इन्सानों के बढ़ते जा रहे जन सैलाब के जीवित रहने में प्राकृतिक संसाधनों का सबसे बड़ा योगदान है। उसे सब कुछ प्रकृति से ही लेना होता है, इसीलिए पेड़ों का कटान बढ़ता गया और अब पहाड़ नंगे होते जा रहे हैं। खेत बड़ी तेजी के साथ कंक्रीट में बदलते जा रहे हैं। आदमी की जरूरत की पूर्ति के लिए बड़े-बड़े कारखाने लगते जा रहे हैं, रोजाना नई-नई गाड़ियों की खेप आ रही है, एयरकण्डीशन्स की संख्या में दिनों-दिन वृद्धि होती जा रही है, अर्थात हर तरीके से वायुमण्डल का तापमान लगातार बढ़ाया ही जा रहा है। पेड़-पौधों को लगाने की जगह ही मिलनी मुश्किल होती जा रही है, यही कारण है कि कई बीमारी नवजात शिशु साथ ही लेकर आ रहे हैं। वायुमण्डल के तापमान का प्रभाव सीधे-सीधे ग्लेशियर्स पर दिखाई दे रहा है, वह तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे कि समुंद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। समूची पृथ्वी पर प्राकृतिक बदलाव का बड़ा खतरा मण्डरा रहा है, लेकिन मानव जाति बगैर किसी परवाह के वर्तमान को ही हर तरह से भोग लेने तक ही सिमटी हुई है। हालांकि बदलते मौसम के मिजाज डर और कोतुहल तो पैदा किए हुए है इन्सानों में, लेकिन पृथ्वी के प्रति भी उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है या पिफ़र वह ऐसा कुछ कर सकते हैं क्या कोई जिसका प्रभाव पृथ्वी पर पड़े के प्रति वह अनभिज्ञ है। आवश्यकता है कि अधिकाधिक लोगों को इस समस्या के प्रति जागरूक किया जाए। उनकी जागरूकता से ही उपाय सम्भव है। उन्हें पृथ्वी के निरन्तर बढ़ते जा रहे तापमान में उनकी भूमिका का भी ज्ञान कराया जाना चाहिए, तभी स्वयं से सुधार की कोशिशें भी हो सकती हैं अन्यथा पर उपदेश---। मीडिया व्यवसाय में संलग्न देश की हरेक कड़ी जब स्वयं इस समस्या को समझ जाएगी एवं इस समस्या के समाधान का बीड़ा अपने हाथों में उठा लेगी तब करोड़ों लोगों को जागरूक करना और उन्हें भी इस अभियान में जोड़ लेना मुश्किल नहीं रह जाएगा। इसीलिए मीडिया व्यवसाय पर केन्द्रित ‘चेतना यात्र’ की शुरूआत की गई थी। सर्वप्रथम तो देश के समस्त मीडिया कार्मियों सेे मिलना व उन्हें जोड़ना ही प्राथमिकता रही, लेकिन इनसे मिलना और जोड़ना ही पर्याप्त नहीं था। इनकी परेशानियों-समस्याओं को समझना-सुलझाना भी प्राथमिकता में रहा। एक-एक करके लगातार छः सपफ़ल यात्रओं में देश के गांव-गांव तक पहुंचाने की कोशिशें की गई हैं चेतना यात्रओं में। मीडिया व्यवसाय में संलग्न हरेक कड़ी को मिलने एवं जोड़ने का प्रयास किया गया है हरेक चेतना यात्र में। देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों सहित हॉर्डवेयर व्यवसाय में संलग्न व्यवसायी भी यात्र के साथ सहभागी बन लाभ उठाते हैं।
चेतना यात्र के दौरान तमाम शहरों में होने वाली बैठकों एवं विभिन्न आयोजनों में इंडस्ट्री के विभिन्न पक्ष तो शामिल होते ही हैं, बल्कि साथ में प्रिन्ट मीडिया सहित विभिन्न-चैनलों के रिपोर्टर-ब्यूरो व स्टिंगर्स भी सहभागिता किया करते हैं। अर्थात् समूचा मीडिया जगत मिलकर ग्लोबल वार्मिंग के प्रति आम जनमानस को जागरूक करने के लिए चेतना यात्र में सहभागी बन जाते हैं।
‘चेतना यात्र-7’ देश की राजधानी दिल्ली से आरम्भ होकर हरियाणा व पंजाब से होकर जम्मू-कश्मीर पहुंचेगी। वहां से हिमाचल-चण्डीगढ़ होते हुए उत्तराखण्ड के बाद उत्तरप्रदेश में प्रवेश करेगी। इस दरमियान कई शहरों के स्कूलों, अदालत परिसरों सहित प्रमुख सरकारी संस्थानाें में वृक्षारोपण कार्यक्रमों का आयोजन होगा। उत्तरप्रदेश से यात्र मध्यप्रदेश होकर पुनः उत्तरप्रदेश के मार्ग से बिहार में प्रवेश करेगी। बिहार-झारखण्ड से होकर यात्र वेस्ट बंगाल के रास्ते उड़ीसा पहुंचेगी। उड़ीसा से छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र के रास्ते आन्ध्रप्रदेश में प्रवेश करेगी। आन्ध्रप्रदेश में तिरूपति बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त कर तमिलनाडु के रास्ते पांडिचेरी होकर पुनः तमिलनाडु होते हुए केेरल जाएगी। केरल से यात्र कर्नाटक होते हुए गोवा पहुंचेगी। गोवा से पुनः महाराष्ट्र में मुम्बई होते हुए यात्र गुजरात का दौरा करेगी। गुजरात से राजस्थान होकर यात्र पुनः उत्तरप्रदेश के रास्ते वापिस दिल्ली पहुंचेगी।
5 सितम्बर 2011 को आरम्भ होकर ‘चेतना यात्र-7’ देश के विभिन्न राज्याें के तमाम शहरों-कस्बों व गांवों में मीडिया कर्मियों की सहभागिता के साथ देशभर में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करते हुए वृक्षारोपण के भी अनेक कार्यक्रमों में भाग लेगी। इसी के साथ-साथ भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी व्यवसाय में संलग्न लोगों की समस्याओं के समाधान पर भी चर्चाएं हाेंगी। इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर तकनीकी एवं कानूनी तैयारियों पर भी विस्तृत चर्चाएं होंगी। एनालॉग से डिजीटल टैक्नोलॉजी पर जाने की जरूरत के साथ-साथ डिजीटल तकनीक अपनाने के तरीकों पर भी चर्चाएं होंगी। ‘चेतना यात्र-7’ का गो ग्रीन-गो डिजीटल के अन्तर्गत इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं में भी अहम महत्व होगा, क्योंकि वर्तमान हालातों में यह समूची इंडस्ट्री अपनी सही दिशा तलाशने पर लगी हुई है, जबकि इंडस्ट्री के विभिन्न पक्ष इसे अपने-अपने तरीके से हांकने पर उतारू हैं। समूची इंडस्ट्री के हित में संयुक्त प्रयासों का अभाव ही इस इंडस्ट्री को सही दिशा नहीं दे सका है।
वही सिलसिला बीते बीस वर्षों से चलते-चलते इंडस्ट्री को आज तक ले आया है, लेकिन यहां से आगे का रास्ता भी अभी उसी ढ़र्रे से होता हुआ अभी कितना समय और जाया करेगा, यह कहना कठिन है। बहरहाल! चेतना यात्र-7 देश के कोने-कोने तक विद्यमान इंडस्ट्री की हरेक कड़ी तक पहुंच सके एवं उन को आपस में जोड़ सके, साथ ही सबकी सहभागिता में पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान एवं उससे होने वाले खतरों के प्रति आम जनमानुष को जागरूक कर सके इन्हीं आशाओं के साथ गो ग्रीन-गो डिजीटल की यह ‘चेतना यात्र-7’ निर्विघ्न सकुशल सम्पन्न हो की आशा सहित आरम्भ हुई।

चेतना यात्रा-7 के सहभागी बनने का अवसर
मीडिया के अंश के रूप में देश के कोने-कोने में विद्यमान वर्तमान युग के संजय जिन्हें अब केबल टीवी ऑपरेटर कहा जाता है, उनकी पहुंच से कुछ भी बाहर नहीं रह गया है। उनकी क्षमता-प्रतिभा एवं योग्यता जिससे वह स्वयं भी पूरी तरह से वाकिपफ़ नहीं है, उसी का भान करवाने के लिए निरन्तर उनके साथ जुड़े रहना, समय-समय पर उनसे सीधे-सीधे रूबरू होना और उनको सामाजिक कार्यों के प्रति प्रेरित करना भी हर साल की जाने वाली चेतना यात्र का एक अहम हिस्सा है। केबल टीवी सेवा में संलग्न देश की हरेक कड़ी आज देशवासियों की आंख-कान बन गई है। देखना या सुनना क्या है उसका निर्णय उन्हें स्वयं ही करना होता है। केबल टीवी ऑपरेटरों ने हर तरह के चैनलों को आम आदमी तक पहुंचा दिया है।
चौबीसों घन्टों परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए उसकी पसंद का प्रोग्राम उपलबध करवाने वाला केबल टीवी ऑपरेटर स्वयं की उपलब्धि से अभी भी अनजान है, यही कारण है कि मीडिया का मजबूत कंधा माध्यम होने के बावजूद भी वह अपना वह स्थान हांसिल नहीं कर पाया है। जिसका वह हकदार है। मीडिया का कोई हिस्सा भी वह है या नहीं इस सच को स्वयं वह भी अभी जान नहीं पाया है, क्योंकि एक केबल टीवी ऑपरेटर के रूप में उसकी क्षमता क्या है का ज्ञान उसे अभी हो नहीं सका है। विश्व का सबसे बड़ा खजाना उपभोक्ताओं के रूप में जो उसके पास है वैसा किसी और की झोली में नहीं है। उपभोक्ताओं से लबालब भरी झोली के साथ-साथ मीडिया का भी नियन्त्रण उन्हीं के हाथों में है। चौबीसों घन्टों उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच के लिए भी ऑपरेटर सदैव उनकी पहुंच में है। मुकम्मिल कार्यालय चिर-परिचित कर्मचारी, लेकिन अभी ऑपरेटर सिर्फ केबल टीवी सेवा ही तो अपने उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवा रहा है, जबकि उपभोक्ताओं की जरूरत यहीं पर नहीं निबट जाती है, उसे तमाम सेवाओं सहित भिन्न प्रोडक्ट भी उपलब्ध करवा सकता है केबल टीवी ऑपरेटर। अपने उपभोक्ताओं को केवल एक ही सेवा पहुंचाने वाला केबल टीवी ऑपरेटर इसी कार्य को बहुत बड़ा समझ बैठा है, जैसे थक सा गया हो, जबकि उपभोक्ताओं तक कुछ भी पहुंचाने के लिए उसके पास तकनीशियन्स के रूप में विशिष्ट मैनपावर भी है, इसकी प्रतिभा योग्यता अद्भुत है, जिसका अभी पूरी तरह से इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका है। यह ऐसी पफ़ौज है जिन्होंने सब कुछ अनुभवों से ही सीखा है, किसी शिक्षण/ संस्थान में नहीं, बल्कि ग्राऊण्ड में आवश्यकतानुसार स्वयं प्रैक्टिकल कर करके कड़ा परिश्रम कर ज्ञान हांसिल किया है। इन्होंने उपभोक्ताओं का विश्वास एवं ऑपरेटरों का भान बनाए रखा है। यही वह सीढ़ी है जो देश के करोड़ों उपभोक्ताओं को ससम्मान ऑपरेटरों के साथ जोडे़ हुए है। अवसर आने पर ऑपरेटरों की यही शक्ति बहुआयामी भूमिका निभाएगी।
जीविकोपार्जन के लिए शुरू किए गए केबल टीवी व्यवसाय से पूर्ण सन्तुष्टि आय अर्जित हुई है, अतः इस व्यवसाय को अपनाने पर पछतावा बिल्कुल नहीं किया जा सकता है आय एवं किए गए कार्य के अनुसार जिस सम्मान के हकदार हैं वह ना मिल पाने के लिए स्वयं ऑपरेटर ही जिम्मेदार भी हैं। इसलिए ऑपरेटरों को अपने कार्य के अनुसार सम्मान भी हांसिल करने के लिए स्वयं प्रयत्न करने होंगे। लेकिन यह तभी सम्भव है जब वह पैसे से आगे निकल कर इसकी जरूरत समझेंगे। यह तभी सम्भव है जब उनकी समझ में यह आ जाएगा कि केबल टीवी सेवा के रूप में बिना किसी सरकारी गैर सरकारी सहायता के उन्होंने जो कर दिया है वह अद्भुद है। आज सारी दुनिया को चकाचौंध कर देने वाली हजारों करोड़ की एक नई इंडस्ट्री का निर्माण किया है उन्होंने। केबल टीवी के माध्यम से ही कई चैनल दर्शकों तक पहुंचा है, अन्यथा उसके अस्तित्व में आने का कोई सवाल ही नहीं था। एक चैनल से आरम्भ होकर अनेक चैनलों तक पहुंच जाने के बाबजूद भी ऑपरेटरों की गति थमी नहीं है, बल्कि आवश्यकतानुसार निरन्तर विकास की सीढ़िया चढ़े जा रहे हैं ऑपरेटर।
तकनीकी क्रान्ति का एक नया इतिहास रच रहा है केबल टीवी ऑपरेटर लेकिन विडम्बना यह है कि चैनल हों या पिफ़र सरकार सब अपना उल्लू साध रहे हैं, ऑपरेटर की भी कोई जरूरतें हैं उस पर कहीं कोई गम्भीरता नहीं है। उपभोक्ताओं का रवैया भी कुछ अलग नहीं है, बल्कि वहां भी सरकार ने सीमाएं खींच रखी हैं। इस सबके बावजूद भी ऑपरेटर बगैर किसी परेशानी के अपने कार्यक्षेत्र में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है, वह सरकार का, चैनलों का और उपभोक्ताओं का भी मान रखे हुए है। उसके प्रति भी नजरिया बदलना चाहिए, लेकिन उसके लिए स्वयं ऑपरेटरों को ही प्रयास करने होंगे। कैसे होंगे वह प्रयास\
‘चेतना यात्र-7’ में कुछ इसी तरह के प्रयासों को शुरू किया जाएगा, जिसमें सबसे अहम होगा समाज के प्रति ऑपरेटरों का सामाजिक दायित्व। इसके अन्तर्गत केबल टीवी ऑपरेटर अपने तकनीशियन्स के सहयोग से अपने-अपने कार्यक्षेत्रें में विश्व की सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता लाने के प्रयास करेंगे। भावी पीढ़ियों को स्वच्छ हवा उपलब्ध हो सके उसके लिए वृक्षारोपण करवाएंगे। साथ ही देश को इलैक्ट्रॉनिक कचरे का गटर बनने से भी बचाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए लोगों में बस जागरूकता लाने की आवश्यकता है। सरकार ऐसे कार्यों में मोटे-मोटे बजट खपा देती है, लेकिन स्थितियां बद से बद्तर ही होती जाती हैं। गंगा-यमुना की सपफ़ाइयों में देश का कई करोड़ रूपया सरकारी खजाने से बहाया जा चुका है, लेकिन परिणाम---\ ग्लोबल वार्मिंग एवं वृक्षारोपड़ के नाम पर भी अरबों-खरबों खर्च किए जाते हैं, लेकिन परिणाम---\ खेत-खलिहान और पशु धन सिमटता जा रहा है, जंगल कटते जा रहे हैं, पहाड़ नंगे होते जा रहे हैं, जमीन कंक्रीट बनती जा रही है और आबादी मल्टीप्लाई हो रही है, समाधान की दिशा में तो बढ़ ही नहीं पा रहा है वर्तमान। ऐसी विषम स्थितियों में अपनी भावी पीढ़ियों की चिंता स्वयं ही करनी होगी और इसके लिए सिपफ़र् जागरूकता की ही जरूरत है, बाकी काम लोग स्वयं कर लेंगे।
लोगों में जागरूकता के लिए देशभर के केबल टीवी ऑपरेटर एक महत्वपूर्ण और बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसी के लिए हर वर्ष ‘चेतना यात्र’ का आयोजन किया जाता है। बीती छः यात्रओं में देश के कोने-कोने तक पहुंच कर अधिकाधिक ऑपरेटरों को इस मुहिम में जोड़ने का प्रयास किया गया है, लेकिन लक्ष्य बड़ा है और देश भी, अतः छः यात्रएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसे प्रयासों की निरन्तर जरूरत है। लगातार छः यात्रओं की सपफ़लता के बाद अब ‘चेतना यात्र-7’ की समूची इंडस्ट्री को प्रतीक्षा है। चेतना यात्र के अन्तर्गत देश के दूरदराज क्षेत्रें में स्थित केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर विशिष्ट मन्त्रणाओं में तकनीकी एवं कानूनी जानकारियों का आदान-प्रदान तो होता ही है, साथ ही केबल टीवी सेवा के साथ-साथ उपभोक्ताओं को अन्य सेवाएं उपलब्ध करवाने एवं अतिरिक्त आय के नए-नए मार्ग खोलने पर भी विचार विमर्श होते हैं। इसी यात्र में ऑपरेटरों को आपस में एक-दूसरे से जुड़ने एवं राष्ट्रीय स्तर पर समस्त कड़ियों को जोड़ने का भी प्रयास किया जाता है।
भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी व्यवसाय में अहम् भूमिका निभा रहे देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को इंडस्ट्री में वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे, उनका सिपफ़र् और सिपफ़र् इस्तेमाल ही किया गया है, जबकि उन्हीं की कड़ी मेहनत और सूझ-बूझ का परिणाम आज विश्वभर के धनकुबेरों को चका-चौंध किए है। उपभोक्ताओं का इतना विशाल जखीरा देश के इन्हीं केबल टी-वी- ऑपरेटरों की झोली में है। मात्र 20 वर्ष के अल्प समय में बगैर किसी की मदद के स्वयं की ही सूझ-बूझ से हजारों करोड़ की इतनी विशाल इंडस्ट्री का निर्माण कर इन्होेंने जो काम किया है उसका सम्मान पाने का भी अब समय आ गया है, अतः चेतना यात्र-7 में ऑपरेटरों की तमाम कड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे में गूंथ कर एक नए समाज की संरचना का भी प्रयास किया जाएगा। एक ऐसा समाज जो समाज के प्रति पूर्णतया समर्पित हो। समाज को अच्छे-बुरे का आईना दिखलाते हुए श्रेष्ठ भविष्य के मार्ग पर ले जा सके। एक ऐसा समाज जिसका दायरा किसी शहर अथवा राज्य या देश तक ही ना सिमटा हो अपितु वसुधैव कुटुम्बकम् की भांति समूची मानव जाति के हित में पृथ्वी की सुरक्षा के लिए पूर्णतया समर्पित है।
‘चेतना यात्र-7’ के अन्तर्गत देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों की सहभागिता में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ तमाम शहरों में भारी संख्या में वृक्षारोपण भी किया जाएगा। इसके लिए स्कूल-अदालती परिसर, पुलिस-प्रशासनिक कार्यालयों सहित तमाम निजी व सरकारी प्रतिष्ठानों का चयन किया जाएगा, जहां सबको एकत्रित कर ग्लोबल वार्मिंग के प्रति उनकी जिम्मेदारी का अहसास एवं वृक्षारोपण का कार्य किया जाएगा। ग्लोबल वर्मिंग के साथ-साथ अब ईकचरे (इलैक्ट्रॉनिक कचरे) के प्रति भी लोगों को चेतना बहुत जरूरी हो गया है। हर घर परिसर में ई कचरा बढ़ता जा रहा है, जिसका समाधान भी तुरन्त ही करना होगा, अन्यथा दुनिया की आबादी के लिए इलैक्ट्रानिक वेस्ट भी कभी ना खत्म होने वाली एक बड़ी समस्या बन जाएगी। समस्याएं भले ही कितनी भी विकराल क्यों ना हो उनका समाधान हो सकता है। लेकिन आवश्यकता जागरूकता की है। जागरूकता स्वयं नहीं आती बल्कि उसे लाना पड़ता है। एक बार लोगों में जब जागरूकता आ जाती है तब समस्या का स्वयं ही समाधान होने लगता है। यही जागरूकता लाने का दायित्व केबल टीवी ऑपरेटर उठा सकते हैं। इन्होंने ही समाज को मीडिया का एक नया संसार दिया है, नई चेतना, नई उमंग एक नई संस्कृति के रचयिता बन गए हैं, यही अब समाज को जन कल्याण की भी एक नई दिशा दिखा सकते हैं, आशाएं सदैव जीवित रहनी चाहिए, मंजिल स्वयं मिल जाती हैं।
अपने उपभोक्ताओं को केवल एक ही सेवा पहुंचाने वाला केबल टीवी ऑपरेटर इसी कार्य को बहुत बड़ा समझ बैठा है, जैसे थक सा गया हो, जबकि उपभोक्ताओं तक कुछ भी पहुंचाने के लिए उसके पास तकनीशियन्स के रूप में विशिष्ट मैनपावर भी है, इसकी प्रतिभा योग्यता अद्भुत है, जिसका अभी पूरी तरह से इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका है। यह ऐसी पफ़ौज है जिन्होंने सब कुछ अनुभवों से ही सीखा है, किसी शिक्षण/ संस्थान में नहीं, बल्कि ग्राऊण्ड में आवश्यकतानुसार स्वयं प्रैक्टिकल कर करके कड़ा परिश्रम कर ज्ञान हांसिल किया है। यही वह सीढ़ी है जो देश के करोड़ों उपभोक्ताओं को ससम्मान ऑपरेटरों के साथ जोडे़ हुए है।

उपभोक्ताओं का रवैया भी कुछ अलग नहीं है, बल्कि वहां भी सरकार ने सीमाएं खींच रखी हैं। इस सबके बावजूद भी ऑपरेटर बगैर किसी परेशानी के अपने कार्यक्षेत्र में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है, वह सरकार का, चैनलों का और उपभोक्ताओं का भी मान रखे हुए है।

बीती छः यात्रओं में देश के कोने-कोने तक पहुंच कर अधिकाधिक ऑपरेटरों को इस मुहिम में जोड़ने का प्रयास किया गया है, लेकिन लक्ष्य बड़ा है और देश भी, अतः छः यात्रएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसे प्रयासों की निरन्तर जरूरत है। लगातार छः यात्रओं की सपफ़लता के बाद अब ‘चेतना यात्र-7’ की समूची इंडस्ट्री को प्रतीक्षा है। चेतना यात्र के अन्तर्गत देश के दूरदराज क्षेत्रें में स्थित केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर विशिष्ट मन्त्रणाओं में तकनीकी एवं कानूनी जानकारियों का आदान-प्रदान तो होता ही है, साथ ही केबल टीवी सेवा के साथ-साथ उपभोक्ताओं को अन्य सेवाएं उपलब्ध करवाने एवं अतिरिक्त आय के नए-नए मार्ग खोलने पर भी विचार विमर्श होते हैं।

चेतना यात्रा-7 दिल्ली से नैनीताल (हरियाणा-पंजाब-जम्मू-कश्मीर-हिमाचल-चण्डीगढ़-उत्तराखण्ड)
भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री की समस्त कड़ियों को एक सूत्र में पिरोने एवं भावी सम्भावनाओं की तमाम जानकारियां उन तक पहुंचाने के लिए बीते छः वर्षाें से लगातार प्रत्येक वर्ष की जा रही चेतना यात्र की सातवीं यात्र 3 सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली से आरम्भ हुई। यात्र की शुरूआत के लिए दिल्ली में कोई आडम्बर ना करके सीधे-सीधे यात्र को बड़ी सादगी के साथ शुरू किया गया। घर-परिवार-समाज से भावभीनी विदाई लेकर यात्र बहादुरगढ़ होते हुए रोहतक पहुंची, जहां सिटी केबल संचालकों ने भारी स्वागत सत्कार किया। यहीं पर जिंद से भी ऑपरेटर पधारे हुए थे, क्योंकि यात्र के रूट में इस बार जिंद का दौरा नहीं था।
जिंद से हरफूल सिंह एवं रोहतक से नरेश जैन आदि के साथ इंडष्ट्री के भविष्य पर लम्बी चर्चा कर यात्र हांसी होते हुए हिसार पहुंची। सिटी केबल के आपिफ़स में ही आपरेटरों के साथ बैठक हुई, जिसमें विशेष तौर पर डिजीटल को लेकर आशकाओं का निवारण किया गया। हिसार में ही पाले राम जी के साथ भी इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा के बाद यात्र भिवानी पहुंची, जहां राजकुमार-प्रदीप चौहान आदि ने गर्मजोशी के साथ यात्र का स्वागत किया। चेतना यात्र-7 का यह पहला पड़ाव भी बना। भिवानी में रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह वृक्षारोपण कर यात्र सिरसा-भण्डीडब वाली के रास्ते पंजाब में दाखिल हुई। अगली यात्र का दूसरा पड़ाव पंजाब में भटिण्डा बना। शेरे पंजाब के रूप में, सन्नी गिल सहित पफ़ास्ट वे के भटिण्डा आपिफ़स में यात्र का का भव्य स्वागत किया एवं पंजाब में डिजीटल पर विस्तार से चर्चा की गई। भटिण्डा में ही आमन्त्रण से बाबी 8 टीम के द्वारा भी यात्र का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। भटिण्डा पड़ाव की अगली सुबह आमन्त्रण के द्वारा आयोजित वृक्षारोपण कार्यक्रम के बाद यात्र लुधियाना पहुंची, जहां फास्ट वे प्रमुख गुरदीप सिंह जी के साथ डिजीटिलाईजेशन एवं इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा हुई। गुरदीप सिंह ने बताया कि केबल टीवी इंडष्ट्री को खतरा डी-टी-एच से है, पंजाब इसके लिए पूरी तरह से तैयार है। पफ़ास्ट वे पूरी तरह से डिजीटिलाईजेशन पर काम कर रहा है, जिसके बेहतर परिणाम भी आने लगे हैं। पंजाब के साथ-साथ पफ़ास्ट वे के साथ अब हरियाणा व हिमाचल भी जुड़ गए हैं। पफ़ास्ट वे की सर्विसेस डी-टी-एच से कापफ़ी बेहतर भी हैं इसीलिए उपभोक्तागण डी-टी-एच को टाटा-बाय-बाय कर पफ़ास्ट वे की सर्विसेस लेना ज्यादा पसंद करते हैं। केबल टीवी पर लोगों को शिक्षित करने के लिए भी पफ़ास्ट वे काम कर रहा है एवं अन्य एम-एस-ओ- को भी कम्प्टीटर नहीं बल्कि सहभागी के रूप में साथ-साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।
पफ़ास्ट वे के प्रांगण में वृक्षारोपण कर यात्र सीधे जालन्धर पहुंची। जालन्धर में ही गाड़ी की पहली सर्विस 1000 किमी पर भी करवाई, क्योंकि चेतना यात्र-7 के लिए ली गई नई गाड़ी इन्नोवा क्रिस्टा 30 अगस्त को ही ली गई थी। जिसकी पहली सर्विस 1000 कि-मी- पर होनी थी। जालंधर में ही यात्र का तीसरा पड़ाव हुआ। मालूम हुआ कि दिल्ली हाईकोर्ट में बम ब्लास्ट हुआ, जिसमें कापफ़ी लोग मारे गए एवं घायलों की संख्या भी बहुत ज्यादा रही। ना जाने कितने लोग ऐसे हादसों की भेंट चढ़ चुके हैं, लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृति ना हो उसका कोई भी बन्दोबस्त देश पर राज करने वाले नहीं कर सके हैं। दिल्ली बम ब्लास्ट से देशभर के नागरिक आहत हैं। बहरहाल टीवी चैनलों पर टीआरपी बटोर रही अन्ना खबरों का दिल्ली ब्लास्ट ने पूरी तरह से पीछे धकेल दिया। है। जालंधर में आपरेटरों के साथ विचार गोष्ठी कर यात्र अमृतसर पहुंची, जहां गुरिन्दर सिंह बब्बी भाई सिटी-पफ़ास्ट वे, दोनों का दायित्व सम्भाले हुए हैं। अमृतसर से बाघा बार्डर पर भारत-पाकिस्तान की ध्वज ड्रिल के गवाह बनने के बाद सीधे पठानकोट पंहुची यात्र। पठानकोट से सीधे जम्मू पहुंचकर वृक्षारोपण कार्यक्रम एवं डिजीटल पर विस्तृत चर्चा के बाद यात्र ऊधमपुर होते हुए पटनी टाप पहुंची, वहीं रात्रि विश्राम के बाद आगे की बहुत ही कठिन यात्र के लिए रवाना हो गई यात्र।
पटनीटाप से आगे के रास्ते की कठिनाईयां एक नहीं बल्कि अनेक थीं। जैसे कि यही नहीं कन्पफ़र्म हो पा रहा था कि आगे के मार्ग से हम ओग भी कहीं पहुंच पाएंगे या इतनी लम्बी यात्र करके भी आगे जाने के लिए लिए इसी रास्ते से वापिस जम्मू होकर पठानकोट से ही हिमाचल जाना होगा\
सपफ़र पर आगे बढ़ते हुए सबसे बड़ी दिक्कत हमेें इसी बात को लेकर चिन्ता हो रही थी कि इतनी दूर खतरनाक दुर्गम पहाड़ी रास्ते का सफर करने के बाद भी यदि इसी रास्ते से वापिस आना पड़ गया तब यात्र की परेशानी के साथ-साथ हमारा समय भी बहुत ज्यादा व्यर्थ हो जाएगा। कापफ़ी कोशिश के बावजूद भी कहीं से भी यह कन्पफ़र्म नहीं हो पाया कि जिस मार्ग से यात्र आगे बढ़ रही है वह रास्ता हिमाचल भी पहुंचा सकेगा या नहीं। रूकने या पिफ़र वापिस मुड़ने से यही बेहतर था कि उस पर आगे बढ़ते रहो, यात्र आगे बढ़ती हुई डोडा-बटोट-भदरबा तक पहुंच गई। भदरवा पहुंच जाने के बाद ही यह कन्पफ़र्म हो पाया कि एटलस में दिए गए रोड मैप के अनुसार जम्मू एण्ड कश्मीर से जो मार्ग भदरवा से चलकर हिमाचल में चम्बा तक पहुंचता है वह चालू ही नहीं है। भदरवा से चम्बा का मार्ग बन्द होने के कारण एक ही रास्ता बचा था कि हम पठानकोट से जिस रास्ते से होते हुए यहां पहुंच हैं सीधे-सीधे उसी रास्ते से वापिस पठानकोट पहुंचे और वहीं से हिमाचल की ओर बढ़े। जम्मू एण्ड कश्मीर की खूबसूरत वादियों में देवदार-चीड़ टेढ़ी-मेढ़ी संकरी पहाड़ी रास्ता भी आसान नहीं था, लेकिन इतनी ऊपर पहुंच जाने के बाद भी खाली हाथ वापसी की सम्भावनाएँ ज्यादा थकाने लगी थीं कि उम्मीद की एक किरण दिखाई दी। भदरवा टैक्सी एण्ड पर एक ड्राइवर ने बताया कि इधर से एक रास्ता है तो जो आपको हिमाचल निकाल सकता है लेकिन सड़क कैसी होगी, नहीं मालूम, कहीं-कहीं बहुत ज्यादा खराब भी हो सकती है, लेकिन यह रास्ता हिमाचल तक पहुंचता जरूर है आप चाहे तो ट्राई कर सकते हैं। हमने दूसरे ड्राइवर एवं भदरवा के लोगों से भी उस रास्ते पर बाते कीं लेकिन कच्ची-पक्की ही जानकारी मिल सकी। भदरवा के आपरेटर भी उस रास्ते पर निश्चित तौर से कुछ कहने से बचते ही नजर आए, जबकि इस रास्ते से हिमाचल में जहां निकला जा सकता था वहां के आपरेटर ने हमें पहले ही कह दिया था कि इधर के लिए सीधा रास्ता पठानकोट से ही आता है उधर से कोई नहीं आता है। तमाम निगेटिविटी के बावजूद भी हमने वापिस जाने की अपेक्षा आगे ही बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि यह तो हमे कन्पफ़र्म हो गया था कि यहां से एक रास्ता हिमाचल को जोड़ता तो है लेकिन रास्ता कैसा होगा, कितना कठिन होगा उसका स्वाद केवल वही जान सकता है जो उसे पार करेगा। भदरवा से हिमाचल पहुंचने के लिए वापिस जम्मू-पठानकोट ना जाकर हमने वह बीहड़ मार्ग चुना जिसके बारे में वहां के स्थानीय लोग भी ज्यादा जानकारी नहीं दे पाते है। भदरवा से यह मार्ग बनी पहुंचाता है और बनी से िभसोली या पिफ़र हिमाचल में नूरपुर-शाहपुर होकर रानीखेत के रास्ते डलहौजी पहुंचा जा सकता हैं। हमने इसी मार्ग से यात्र को आगे बढ़ाया। सड़क के नाम पर यह एक संकरा सा सुनसान-ब्यावान एैसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर बैलगाडियां और टैªक्टर तो आ जा सकते हैं लेकिन इन्नोवा गाड़ी नहीं। बडे़-बड़े पत्थरों के ऊपर से जब टेढी में दी कर इन्नोवा को आगे निकाला जाता था। जब नई-नई ली गई गाड़ी जो आवाज निकालती थी वह वहां से गुजरते हुए हमें सापफ़-सापफ़ महसूस होती थी। वापिसी के सारे मार्ग छोड़ कर हम आगे तो बढ़ते जा रहे थे, लेकिन रास्ते में कहीं-कहीं सीमा सुरक्षा बल की तैनाती एवं उनकी बख्तर बन्द गाडियों की मौजूदगी उस दुर्गम क्षेत्र की हकीकत बता देती थी। इस मार्ग पर दूर दराज ही कहीं कोई बंकर सा आधा जमीन के अन्दर और थोड़ा सा ऊपर निकला हुआ इंसानी डेरा दिखाई दे जाता था, नहीं तो दूर तलक किसी इन्सान की उपस्थिति का पता भी नहीं लगता था। जंगल ही जंगल और उनके बीच से गुजरते। यह पहाड़ी पगडण्डी जिसमें जगह-जगह उपर से गिरते झरने और झरनों से बनते बड़े-बड़े नाले जिन्हें पार करना हर बार और कठिन होता जाता था। तभी सुरक्षा बलों की एक विशेष (गुप्त सी) चौकी सामने दिखाई दी। उनकी मुस्तैदी देखकर हमें भी आश्चर्य हुआ, लेकिन शीघ्र ही यह भी समझ में आ गया कि यह क्षेत्र मिलिटेंसी ग्रस्त है यहां आम नागरिकों की आवाज ही नहीं हुआ करती है, इसीलिए हमें वहां देखकर वह भी भौंचक्के रह गए। इस तरह से ऐसे मार्ग से आगे बढ़ने से उन्हाेंने हमे रोका तो नहीं लेकिन बता दिया कि रास्ता ठीक नहीं है, यह मार्ग हिमाचल भी पहुंचा सकता है। दूर तक सन्नाटा, धीरे-धीरे दिन की रोशनी भी अब धुंधलाने लगी थी और गाड़ी में डीजल भी कापफ़ी कम रह गया था, लेकिन आगे का रास्ता अभी कितना लम्बा है, नहीं मालूम था, पिफ़र भी हम चले जा रहे थे। चलते-चलते बनी भी पहुंच गए और बनी से नूरपुर-शाहपुर होते हुए डलहौजी भी पहुंच गई यात्र लेकिन रात्रि विश्राम डलहौजी से 27 कि-मी आगे बढ़ कर खज्जियार में किया।
हालांकि डलहौजी भी अपने आप में एक बहुत ही खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां सैलानियों की भारी भीड़ होती है। अन्य हिल स्टेशनों की ही भांति यहां भी गाड़ियों की खचा-खच और कन्धे से कन्धा टकराती भीड़ होती है, लेकिन मिनी स्विटजरलैण्ड कहा जाने वाला खज्जियार अपनी अलग ही खूबसूरती लिए है। देवदार के घने वृक्षों से घिरा खज्जियार का शान्त वातावरण का आकर्षण अद्भुद है। जम्मू एण्ड कश्मीर से हिमाचल पहुंचने के लिए हमने जिस बीहड़ रास्ते को पार किया था उस की थकान डलहौजी से बेहतर खज्जियार में उतारी जा सकती थी, इसीलिए डलहौजी से 27 कि- मी- और आगे बढ़ कर रात्रिविश्राम खज्जियार में करने के बाद हिमाचल में आगे के सपफ़र पर रवाना हुई यात्र। गग्गल-धर्मशाला होकर कागड़ा में लगाए गए वृक्षों को वयस्क होते देख आनन्द की अनुभूति हुई। कांगड़ा में संजीव (रिंकू भाई) एवं अन्य आपरेटरों से भेंट कर बिलासपुर पहुंची यात्र। बिलासपुर डैम अब पूरी तरह से लबालब भरा हुआ दिखाई दिया, लेकिन पफ़ारेस्ट रेस्ट हाऊस की घास झंकाड़ बन गई थी, वहां लगाए गए पौधों का कुछ पता नहीं लग सका। बिलासपुर के स्कूल में लगाए गए पौधों की देखभाल ठीक-ठाक हो रही है। बिलासपुर से सीधे शिमला पहुंच खन्ना जी के साथ डिजीटल पर लम्बी चर्चा के बाद सोलन होते हुए चण्डीगढ़ पहुंची यात्र। चण्डीगढ़ क्लब में सभी पौधे सुरक्षित लहलहाते मिले। चण्डीगढ़ में सिद्दू-सन्दीप-राजेश मलिक आदि से भेंट कर यात्र नहान-पौन्टा साहिब के मार्ग से देहरादून होते हुए त्रफ़ृषिकेष पहुंची। हेमन्त गांधी अर्शपफ़ के साथ इंडष्ट्री पर विस्तृत चर्चा के बाद हरिद्वार मार्ग से नजीबाबाद, जमीना से घासपुर पहुंची यात्र, यहां अमरजीत सिंह से भेंट वाली के बाद यात्र का स्योहारा में चल रहे मुस्लिम समाज के धार्मिक सम्मेलन इजतमा के गर्मजोशी से स्वागत किया गया। इजतमा पर वहां के आमीर सहिब से जानकारी मिली एवं यात्र की जानकारी उनको दी गई, तत्पश्चात यात्र सीधेे मुरादाबाद पहुंची। मुरादाबाद आर-एन हन्टरकालिज में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन राजीव जौहरी द्वारा रोटरी कल्ब अध्यक्ष एम एम गर्ग (सिविल लाइन मुरादाबाद) के सहयोग से किया गया। आर-एन- इन्टर कालिज मुरादाबाद का बहुत ही पुराना कलिज है, कालिज के प्रिंसिपल श्री गुप्ता जी के हाथों से कई पौधे कालिज में लगवाए गए। वृक्षारोपण कार्यक्रम में अजय टंडन, पुष्किन शर्मा, नवीन रस्तोगी, संजय बजाज एवं हिमांशु रस्तोगी आदि भी सहभागी बने। तत्पश्चात सीधे नैनीताल पहुंची यात्र। मुरादाबाद से नैनीताल के लिए मार्ग की दशा कापफ़ी खराब मिली क्योंकि अभी पिछले ही दिनों इस क्षेत्र में बाढ़ आई हुई थी। दिल्ली से यात्र पर रवाना होने के बाद घर-परिवार सब बहुत पीछे रह गया था, लेकिन अनुराग-सोनल सहित माही (पोती) के साथ कुछ क्षण नैनीताल में व्यतीत कर आगे की यात्र के लिए ताजगी समेट कर नैनीताल में बाबी भाई आदि के साथ इंडष्ट्री पर लम्बी चर्चा के बाद वहां से आगे बढ़ गई यात्र 5 सितंबर से 15 सितम्बर तक की यात्र का यह प्रथम चरण कहा जाएगा। यहां से आगे यात्र हाल जानने की लिए ‘यात्र-भाग दो’ की प्रतीक्षा करें।
भदरवा से हिमाचल पहुंचने के लिए वापिस जम्मू-पठानकोट ना जाकर हमने वह बीहड़ मार्ग चुना जिसके बारे में वहां के स्थानीय लोग भी ज्यादा जानकारी नहीं दे पाते है। भदरवा से यह मार्ग बनी पहुंचाता है और बनी से भिसोली या पिफ़र हिमाचल में नूरपुर-शाहपुर होकर रानीखेत के रास्ते डलहौजी पहुंचा जा सकता हैं। हमने इसी मार्ग से यात्र को आगे बढ़ाया। सड़क के नाम पर यह एक संकरा सा सुनसान-ब्यावान एैसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर बैलगाडियां और टैªक्टर तो आ जा सकते हैं लेकिन इन्नोवा गाड़ी नहीं। बडे़-बड़े पत्थरों के ऊपर से जब टेढी में दी कर इन्नोवा को आगे निकाला जाता था। जब नई-नई ली गई गाड़ी जो आवाज निकालती थी वह वहां से गुजरते हुए हमें सापफ़-सापफ़ महसूस होती थी।

चेतना यात्रा-7 (द्वितीय भाग) नैनीताल से नागपुर तक
दिल्ली से हरियाणा-पंजाब जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड का सपफ़र खासा थकान भरा रहा, लेकिन नैनीताल से पुनः ताजगी लिए यात्र आगे बढ़ी तो सबसे पहले हल्द्वानी में हुई बैठक में जानकारी मिली कि उत्तराखंड राज्य सरकार ने केबल टीवी आपरेटरों को एक दुधारू गाय मानते हुए लोकल चैनलों पर अलग ही तरह से कर लगाया है। प्रति चैनल 2000/ व 2400 रूपए एव 100/ रूपया अलग से प्रति कनैक्शन वार्षिक थोपा गया है। उनके आपरेटरों के खिलापफ़ अब सरकार के रिकवरी नोटिस भी जारी हो चुके हैं तब यह सूचना मिली है। जबकि अधिकांश आपरेटरों से सरकार वसूली कर भी रही है। इस कर के संदंर्भ में उत्तराखंड सरकार माननीय उच्चतम न्यायालय तक से अपने पक्ष में पफ़ैसला ले आई है, लेकिन हल्द्वानी के आपरेटर भाई तारीक का तर्क अलग ही है, उन्हें विश्वास है कि वह इस मामले में उत्तराखंड सरकार को हरा ही देंगे, हालांकि उनको भी सरकार का रिकवरी नोटिस मिल चुका है।
हल्द्वानी लम्बी वार्तालाप के बाद रूद्रपुर पहुंचते-पहुंचते कापफ़ी रात हो चुकी थी एवं रूद्रपुर में भी मिलना आवश्यक था। अतः यात्र के द्वितीय भाग का यहा पहला पड़ाव हुआ। अगली सुबह वहां के एक मात्र आपरेटर विनोद चावला जी के साथ इंडष्ट्री एवं अन्य मामलों पर लम्बी बातचीत कर यात्र आगे के लिए रवाना हुई। चावला जी को रिकवरी नोटिस नहीं आया है, क्योंकि एक सुधरे हुए व्यवसायी की तरह वह केबल टीवी व्यवसाय में संलग्न हैं और उन्होंने सरकारी पफ़रमान के साथ समझौता कर लिया है। रूद्रपुर से आगे बढ़ते हुए सीधे बरेली पहुंची यात्र, जहां कौशल भाई कई साथियाें सहित पफ़ूलों की मालाएं लिए यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षारत थे। पूर्व में रोपे गए पौधे भी बरेली में लहलहा रहे हैं जानकर प्रसन्नता हुई। यहां भी डैन का झण्डा पफ़हरा दिया गया। डिजीटल पफ़ीड भी शीघ्र ही आरम्भ होने वाली हैं एवं सभी एल-सी-ओ के साथ एम-एस-ओ- एल-सी-ओ- एग्रीमैंट भी हो गए हैं। एग्रीमेंट के कुछ प्वाइन्ट्स को लेकर जो किन्तु-परन्तु था उसका निवारण कर यहा से आगे बढ़ते हुए सीधे शाहजहांपुर पहुंची यात्र। चलते-चलते शाहजहांपुर के आपरेटर रविभाई के साथ भेंट-वार्ता कर कर लखनऊ के लिए बढ़ चली यात्र। शाहजहांपुर किसकी झोली में जाएगा यह अभी पफ़ाइनल नहीं हो सका है, लेकिन बिल्कुल पके आम की भांति ही प्रतीत हो रहा है। इसका श्रेय चैनल डिष्ट्रीब्यूटर्स को जाता है क्योंकि बार-बार बढ़ाई जाने वाली वसूली से निजात पाने का एकमात्र यही उपाय आपरेटराें को निकालना पड़ता है।
लखनऊ पहुंचते-पहुंचते रात ज्यादा ही हो चुकी थी अतः रात्रि भोज की दिक्कत रही। शाहजहांपुर से लखनऊ के मार्ग में कई जगह सड़क पर कछुए अपनी गर्दने बाहर निकाले आसमान की ओर निहारते दिखाई दिए, उनका सदेश समझ से परे था, लेकिन प्रतीत यही हो रहा था कि जैसे वह इस तरह कोई संदेश दे रहे हों। लखनऊ में डैन के प्रमुखों सुनील जौली, ओमेश्वर सहित तमाम अन्य आपरेटरों से भी इंडष्ट्री के भविष्य पर लम्बी चर्चा हुई। अनिल कपूर कमालिया जी सहित अन्य तमाम आपरेटरों के पूर्व में लगाए गए पौधों का निरीक्षण कर यात्र लखनऊ से कानपुर के लिए रवाना हो गई। कानपुर में सिटी केबल प्रमुख गोड साहब द्वारा बड़ी गर्म जोशी के साथ यात्र का स्वागत किया गया। सभी आपरेटरों के साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर गहन चिंतन हुआ एवं कानपुर केबल टीवी दर्शर्कों के लिए ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता के लिए विशेष संदेश रिकार्ड किया गया जिसे बाद में प्रसारित किया जाएगा। केबल टीवी दर्शकों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक करने के लिए तकरीबन सभी शहरों में संदेश दिए जाने की कोशिश की जाती है।
आज बड़े वजन का भूकम्प भी भारत में आया है जिसका केंद्र सिक्किम रहा, वहां भूकम्प से भारी तबाही की खबरे आ रहा है। भूकम्प के झटके देश के अन्य क्षेत्रें में भी महसूस किए गए लेकिन सबसे ज्यादा क्षति सिक्किम में ही हुई है। बहरहाल कानपुर से पफ़तेहपुर होते हुए देर रात इलाहाबाद पहुंची यात्र। कानपुर में निकलते-निकलते संजीव दीक्षित से भी भेंट-वार्ता हुईं गंगा-यमुना, सरस्वती का संगम स्थान इलाहाबाद जहां कुम्भ मेला होता है उसी पवित्र शहर में यात्र का पड़ाव हुआ और सुबह वहां के आपरेटरों का स्वागत सत्कार स्वीकार कर भदोही के रास्ते वाराणसी पहुंच गई यात्र। यात्र का यह सपफ़र बार-अपनी गाड़ी की सेहत की ओर ध्यान खींच रहा था, क्योंकि लखनऊ अम्बर होटल की पार्किग में खड़ी अन्य इन्नोवा में हमारी गाड़ी कुछ ज्यादा ही बैठी हुई लग रही थी। इसी समस्या को लेकर हमने इलाहाबाद की टोयटा वर्कशाप में गाड़ी दिखलाई, तब उन्होंने सुझाव दिया कि यह वर्कशाप अभी हाल ही में ख्ुाली है, बेहतर रहेगा कि आप वाराणसी में दिखलाएं वहां यहा से ज्यादा काबिल मैकेनिक है। हमने वाराणसी पहुंच कर टोयाटा वर्कशाप में गाड़ी खड़ी की। गाड़ी को जैक पर लेकर जब ऊपर चढ़ाया गया तब यह भी जानकारी हुई कि फ्रयूल टैंक भी लीकेज है।
गाड़ी पूरी तरह से खाली कर देने के बावजूद भी जब दूसरी इन्नोवा की भांति नहीं उठ सकी तब उन्होंने शोकर चेंज किया लेकिन गाड़ी तब भी उतनी नहीं उठी, तब उन्हाेंने स्प्रिंग निकाल कर चैक किया जो दुरूस्त पाया गया, लेकिन प्रोब्लम बनी ही रही। अन्य इन्नोवा के मुकाबले में हमारी नई इन्नोवा पीछे से कापफ़ी बैठी हुई दिख रही थी, तब उन्होंने स्प्रिंग के नीचे एक-एक रबर गुटका का लगा दिया, तब भी दूसरी गाड़ियाें के मुकाबले में हमारी गाड़ी उन्नीस ही रही। आखिरकार वर्कशाप वालों ने एक दिन रूकने के बात की तब हमने उन्हें असमर्थता जता दी। इसी तरह फ्रयूल टैंक की लीकेज को भी उन्होंने एम-सील लगाकर टेम्प्रेरी किया, जबकि हम उनसे फ्रयूल टैंक बदल देने के लिए कह रहे थे। टोयोटा की गाड़ियां तो ठीक हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत गाड़ी के सामान को बदलने में आती है। छोटा-मोटा सामान तो महंगी कीमत पर सभी वर्कशाप में मिल जाता है, लेकिन कुछ बड़ी प्रोब्लम आ जाए तब आर्डर पर सामान बंगलौर से ही आता है, तब तक प्रतीक्षा करे। फ्रयूल टैंक के लिए भी स्थिति यही बनी हुई है। हालांकि यह गाड़ी अभी 30 अगस्त को ही दिल्ली टोयोटा शो रूम से ली गई हैं। वाराणसी टोयोटा से किया गया टैम्प्रेरी ट्रीटमेंट किसी काम नहीं आया, बल्कि वाराणसी में हाल्ट कर सुबह ज्यों ही आगे के लिए बढ़े तब टैंक की लीकेज बरकरार थी।
बहरहाल वाराणसी की प्रसिद्ध कचौड़ी का नाश्ता कर यात्र मुगल सराय के रास्ते बिहार की ओर बढ़ चली। वाराणसी में आलोक पारीख सहित अन्य आपरेटर भी दिल्ली गए हुए थे। अतः उनसे बिना मिले ही आगे बढ़ना हुआ। बिहार में मोहनिया आशा होते हुए पटना पहुंच आपरेटरों के साथ बैठक कर सीधे गया-बोधगया पहुंची यात्र, लेकिन बोधगया के आपरेटर भी कहीं अन्य व्यस्त दिखाई दिए, तब बिहार से झारखण्ड की ओर बढ़ गई यात्र। बिहार से झारखण्ड का यह रास्ता नैक्सलाइट एक्टिविटी के कारण कापफ़ी दुर्गम माना जाता है, तिस पर रात्रि पहर में यात्र आगे बढ़ रही थी। सड़के भी पूरी तरह से दुरूस्त नहीं थी, अचानक बड़े गहरे गड्ढे सामने आ जाते थे परन्तु आगे बढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। गया से डोबी होते हुए चम्पारन-बरही होते हुए सीधे हजारी बाग पहुंची यात्र, लेकिन हजारीबाग के आपरेटर बहुत जल्दी सोने के आदि है, अतः वह एडवास में होटल की बुकिंग नहीं करवा सके। मध्य रात्रि में किसी भी होटल में ठहर पाना। इस शहर हजारीबाग में बहुत कठिन था, परन्तु एक उपकार नामक होटल में सिक्योरिटी वाले को यह विश्वास दिलाने में हम सपफ़ल हो गए कि हमसे उन्हें कोई खतरा नहीं है, इतना समझ आने के बाद उस सिक्योरिटी वाले ने हमारे लिए होटल की एन्ट्री खोल दी।
हजारीबाग होटल उपकार का वहां ठहरने का उपकार तो मिल गया लेकिन वाराणसी की कचौड़ियां अब तक पेट में कही गुम हो चुकी थी, भूख जोराें से लगी हुई थी, लेकिन खाने लिए पाने की कहीं कोई उम्मीद नहीं थी। वैसे भी इस क्षेत्र में रात्रि में लोग घरों से बाहर नहीं निकलते, लेकिन गाड़ी लेकर कुछ किलोमीटर इधर-उधर तलाशा तो खाने का एक ढाबा खुला मिल गया, वहां जो भी दाल-भात मिला लिया और पिफ़र होटल में आकर पेट भर लिया। दिनभर की थकान ने जल्द ही नींद में ले लिया। सुबह हजारी बाग के आपरेटरों के साथ बैठक कर शीघ्र ही आगे के सपफ़र के लिए बढ़ चली यात्र। हजारीबाग से रामगढ़ होते हुए रांची पहुंच कर आपरेटरों को यात्र संदेश देते हुए बन्दू-तामर चाण्डिल होते हुए जमशेदपुर पहुंची यात्र। जमशेदपुर के आपरेटरों सहित गुड्डू भाई द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया। इंडष्ट्री पर विस्तृत चर्चा के बाद रात्रि विश्राम जमशेदपुर में हुआ पिफ़र सुबह वहां निकट ही डालमा वाइल्ड लाइपफ़ देखने का मोह हम नहीं छोड़ सके। वाइल्ड लाइपफ़ से वापिस जमशेदपुर पहुंच कर शाम को इंडष्ट्री पर लम्बी वार्तालाप के कारण एक और रात वहीं ठहर जाना पड़ा, जबकि वहीं रूकने के लिए भारी बारिश ने भी अपना काम किया। एक रात अतिरिक्त जमशेदपुर में लगा दिए जाने के कारण दुर्गापुर से कोलकाता का रास्ता कट करते हुए सीधा उड़ीसा के लिए रवाना हो गई यात्र। कोलकाता में मंथन के साहा साहब एवं सिटी केबल के सुरेश सेतिया जी भी उपलब्ध नहीं थे, इसलिए बैस्ट बंगाल को कट करते हुए जमशेदपुर से रायरनगंज-जशीपुर शिमलीपाल होते हुए शिंगटाोड़ से केन्दुझर की ओर बढ़ती यात्र का रास्ता वैतरणी नदी ने रोक दिया।
उड़ीसा में भारी बारिस के कारण कई क्षेत्रें में बाढ़ आई हुई थी, जबकि कोलकाता-मुम्बई हाईवे को वैतरणी नदी के विकराल रूप ने दो दिनाें से रोका हुआ था। नेशनल हाईवे बन्द हो जाने के कारण मार्ग के दोनाें ओर हजाराें वाहन ट्रक जहां के तहा रूके हुए थे। मार्ग पर स्थित दाबों का राशन पानी खत्म हो चुका था। मार्ग पर आगे बढ़ना तो सम्मव ही नहीं था, क्योंकि वैतरणी पुल से भी 10-12 पफ़ुट ऊपर बह रही थी। अगर ओर बारिस हो गई तब हालात बद से बदतर हो सकते थे, लेकिन गनीमत यह थी कि बारिस पूरी तरह से बन्द थी और पानी तेजी से बह रहा था। सभी को उम्मीद थी कि कल दोपहर तक वैतरणी रास्ता दे सकती है, अतः हमें भी वहीं कही रात्रि विश्राम का ठिकाना तलाशना पड़ा क्योंकि वहां से पीछे जाने का भी कोई औचित्य नहीं था।
शिगटामोड़ से 20-24 किलोमीटर अन्दर जाकर एक करजिया कस्बा था। जहां ठहरनेे के लिए कोई इन्तजाम होने की उम्मीद थी। अतः वैतरणी के विकराल रूप एवं उसके कारण वहां पफ़ंसे वाहनों की स्मृतियों को समटते हुए हम शीघ्र ही करजिया पहुंचे। कराजिया में रात्रि विश्राम के लिए एक अच्छा गेस्ट हाऊस हमें मिल गया। यह गैस्ट हाऊस भी केन्दुझर आपरेटर जो कि अब कान्सुलर बन चुका है संदीप बेहरा के मामा जी का निकला, इसलिए वहां पर बाकी कोई परेाानी नहीं हुई। रात्रिविश्राम करंजिया में करने के बाद सुबह शीध्र ही अगले पड़ाव की ओर बढ़ गई यात्र। वैतरणी बिल्कुल शान्त अपनी हद में बह रही थी, जिसे पार कर केन्दुझर पहुंच संदीप बेहरा को बाद पीड़ितों से घिरा पाया, वहां बरसाती आदि का वितरण किया जा रहा था, लेकिन लेने वालों की लाइने खत्म नहीं हो पा रही थी। दोपहर का खाना संदीप बेहरा परिवार के साथ कर यात्र आगे के लिए बढ़ चली। आगे के सपफ़र में दुर्गम पहाड़ियों के साथ सड़कों का हाल भी बहुत ज्यादा खराब हो रहा था लम्बा-लम्बा जाम लगा हुआ था, बामुश्किल बारकोट-दबगढ़ -ऊषाकोठी होकर देर रात यात्र सम्बलपुर पहुंची। यह पूरा रास्ताा नक्सलवादी क्षेत्र भी कहलाता है, इसी मार्ग पर चेतना यात्र-5 में एक रात ढाबे पर ही गुजारनी पड़ी थी, लेकिन लम्बा-लम्बा जाम और सड़कों पर गहरे गड्ढ़ाें के आलावा अन्य कोई परेशानी नहीं पड़ी हम सीधे-सीधे सम्बलपुर पहुंच गए। वहीं विश्राम कर अगली सुबह बारागढ़-सरायपल्ली-बासना, पिथौरा-तुमगांव अरंग होते हुए सीधे रायपुर (छत्तीसगढ़ं)पहुंच गई यात्र। सम्बलपुर से रायपुर का यह मार्ग भी नक्सल वादियों से पीड़ित क्षेत्र है। यहां तुमकुर में आज ही नकसल वादी हमला हुआ है जिसमें किसी सरपंच की हत्या हो गई है। रात्रि विश्राम रायपुर में किया। यहा तक पहुंचते-पहुंचते गाड़ी के फ्रयूल टैंक का टपकना निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। नागपुर टोयोटा वर्कशाप को सूचित कर एडवांस में गाड़ी की सर्विस एव फ्रयूल टेंक बदलने के लिए कह दिया है। रायपुर से अहले सुबह निकलकर सीधे नागपुर टोयोटा वर्कशाप पहुंच कर गाड़ी सर्विस के लिए दी एवं उनसे फ्रयूल टैंक बदले देने की भी रिक्वेस्ट की, लेकिन सर्विस तो उन्होने का दी, लेकिन फ्रयूल टैंक उपलब्ध ना होने का रोना रोकर पिफ़र वही टैम्प्रेरी ट्रीटमैंट कर गाड़ी हमें थमा दी। नागपुर की टीम भी अब नागपुर से आगे महाराष्ट्र में हमारे साथ हो गई ऐसा पहली बार हुआ कि हमने नागपुर हाल्ट नहीं किया। शाम को टोयटा वर्कशाप से गाड़ी लेने के बाद नागपुर आपरेटरों द्वारा गर्मजोशी से यात्र का स्वागत किया गया, उनके साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर गहन चर्चा के बाद यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। महाराष्ट्र में अहमद नगर-पून मार्ग पर रलिगांव सिद्धि (अन्ना हजारे के गांव) की ओर यात्र बढ़ चली।
टोयोटा की गाड़ियां तो ठीक हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत गाड़ी के सामान को बदलने में आती है। छोटा-मोटा सामान तो महंगी कीमत पर सभी वर्कशाप में मिल जाता है, लेकिन कुछ बड़ी प्रोब्लम आ जाए तब आर्डर पर सामान बंगलौर से ही आता है, तब तक प्रतीक्षा करे। फ्रयूल टैंक के लिए भी स्थिति यही बनी हुइ्र्रं है। हालांकि यह गाड़ी अभी 30 अगस्त को ही दिल्ली टोयोटा शो रूम से ली गई हैं। वाराणसी टोयोटा से किया गया टैम्प्रेरी ट्रीटमेंट किसी काम नहीं आया, बल्कि वाराणसी में हाल्ट कर सुबह ज्यों ही आगे के लिए बढ़े तब टैंक की लीकेज बरकरार थी।

कराजिया में रात्रि विश्राम के लिए एक अच्छा गेस्ट हाऊस हमें मिल गया। यह गैस्ट हाऊस भी केन्दुझर आपरेटर जो कि अब कान्सुलर बन चुका है संदीप बेहरा के मामा जी का निकला, इसलिए वहां पर बाकी कोई परेाानी नहीं हुई। रात्रिविश्राम करंजिया में करने के बाद सुबह शीघ्र ही अगले पड़ाव की ओर बढ़ गई यात्र। वैतरणी बिल्कुल शान्त अपनी हद में बह रही थी, जिसे पार कर केन्दुझर पहुंच संदीप बेहरा को बाद पीड़ितों से घिरा पाया, वहां बरसाती आदि का वितरण किया जा रहा था, लेकिन लेने वालों की लाइने खत्म नहीं हो पा रही थी। आगे के सपफ़र में दुर्गम पहाड़ियों के साथ सड़कों का हाल भी बहुत ज्यादा खराब हो रहा था लम्बा-लम्बा जाम लगा हुआ था, बामुश्किल बारकोट-दबगढ़ -ऊषाकोठी होकर देर रात यात्र सम्बलपुर पहुंची।

चेतना यात्रा-7 (तृतीय भाग) नागपुर से मुम्बई तक
नागपुर से आगे के सपफ़र में सुभाष बान्तै नरेन्द्र, राजठाकरे आदि भी शामिल हो गए, क्योंकि नागपुर से सीधे रालेगण सिद्धी पहुंचकर अन्ना हजारे जी का आशीर्वाद लेना था। नागपुर से निकलते-निकलते शाम ढल चुकी थी और अन्धेरा छाने लगा था, लेकिन सपफ़र लम्बा था अतः तय यही किया गया कि नागपुर हाल्ट ना मारकर आगे का सपफ़र शुरू किया जाए। यहां से आगे मालेगांव अहमद नगर के रास्ते अन्ना हजारे जी के गांव रालेगांव सिद्धी तक का वर्णन ‘दो दिन अन्ना के गांव में’ किया गया है, अतः रालेगण सिद्धी से आगे की यात्र को चेतना यात्र-7 का तृतीय भाग कहा जाएगा।
अन्ना जी की शुभकामनाएँ आशीर्वाद लिए रालेगण सिद्धी से सीधे आन्ध्रप्रदेश जाने के लिए जलगांव करमाल के रास्ते कुर्दुवाडीमोहोल होते हुए देर रात सोलापुर पहुंची यात्र। सोलापुर के मार्ग से पहली बार ही हम सपफ़र कर रहे थे। आन्ध्रप्रदेश-महाराष्ट्र के बार्डर का क्षेत्र होने के कारण यहा सभ्यता की मिक्सिंग दिखाई देनी शुरू हो गई थी, जबकि तेलंगाना आन्दोलन में आन्ध्रप्रदेश की एन्ट्री करने वाला यह क्षेत्र पूरी तरह से डिस्टर्ब था। रात्रि विश्राम सोलापुर में ही किया गया, लेकिन अगली सुबह सोलापुर के रवि पाटिल जो कि मीडिया प्रो के डिस्ट्रीब्यूटर होने के साथ-साथ इन केबल की भी यहां जिम्मेदारी सम्भाल रहे हैं उन्हाेंने यात्र का स्वागत किया, गो ग्रीन-गो डिजीटल सहित इंडस्ट्री पर विस्तृत चर्चा के बाद पूर्वनिर्धारित आन्ध्रप्रदेश के प्रोग्राम में परिवर्तन कर यात्र को कर्नाटक के मार्ग पर बढ़ाया गया, जबकि सोलापुर से जाहिराबाद होते हुए हैदराबाद पहुंचना था। तेलंगाना आन्दोलन इस कदर उग्र रूप धारण कर चुका था कि अनेक टेªन एवं बस सेवा भी उस क्षेत्र में बन्द की जा चुकी थी। सोलापुर से मात्र 100 कि-मी- दूरी पर ही कर्नाटक का शहर बीजापुर है, वहां सीनियर आपरेटर शहर में ना होने के बावजूद भी जूनियर द्वारा पफ़ूलों से यात्र का स्वागत किया गया। बीजापुर की लोकल मिठाई भी भेंट की गई, लेकिन बीजापुर में हाल्ट ना करते हुए यात्र सीधे हास्पेटबल्लारी मार्ग से होकर आन्ध्रप्रदेश में दाखिल हुई। आन्ध्रप्रदेश का यह क्षेत्र कर्नाटक-आन्ध्रा बार्डर एरिया कहलाता है। यहां तेलंगाना आन्दोलन की आग तो नहीं है, लेकिन जानकारी मिली कि नक्सलवादी गतिविधियां गाहेबगाहे इस क्षेत्र में हो जाती हैं। सभ्यता की मिक्सिंग यहां भी भिन्न है अन्धेरा जल्दी ही छा गया, इसलिए वाया गूटी ना जाकर सीधे-सीधे अनन्तपुर पहुंची यात्र। रात्रिविश्राम अनन्तपुर में किया पिफ़र सुबह वहां अयूबपाशा के साथ भेंट की तकरीबन चार लाख की पापुलेशन वाले इस शहर में मासूम बाबा निजी नैटवर्क एनालाग टैक्नालाजी पर चला रहे हैं। मासूम बाबा कुल 104 चैनलों का प्रसारण कर रहे हैं, यहां आपरेटरों की सख्या सवा सौ के करीब है, जबकि केबल दर 180 / रूपए (एवरेज) है। चैनल डिष्ट्रीब्यूशन मोहन एवं गोपाल सम्भाल रहे हैं। अनन्तपुर आपरेटरों के साथ इंडष्ट्री पर लम्बी चर्चा के बाद यात्र आन्ध्रप्रदेश के ही हिन्दुपुर पहुंची। कर्नाटक बार्डर पर आंध्रा का यह आखिरी कस्बा है, लेकिन टी-आर पी टाऊन में शामिल है हिन्दूपुर।
कोआपरेटिव स्टाईल में कुल 38 आपरेटर यहां केबल व्यवसाय में सलंग्न हैं। हिन्दूपुर केबल टीवी वैल्पफ़ेयर एसोसिएशन भी यहां बनाई हुई है। एक ही हैडेण्ड से 88 चैनलों का प्रसारण किया जा रहा है। यहा की पापुलेश मात्र सवा दो लाख के करीब पहुंच गई है जिसमें 25 प्रतिशत अर्बन तो 75 प्रतिशत रूरल ऐरिया है। 150 रू प्रति कनैक्शन केबल दर है, लेकिन टोटल 65 आपरेटर केबल सेवा प्रदान कर रहे हैं। हिन्दूपुर में सचिव खलील भाई एवं अध्यक्ष वैंकटेश हैं। आन्ध्रा में मनोरंजन कर क्पेजज-/5/-ए ैनइ-क्पअ-/4/ , ज्मी/3ध है एवं कनैक्शनों का डिक्लेयरिशन जेमिनी टीवी की भांति होता है। हालांकि राज्य सरकार द्वारा लगाए गए मनोरन्जन कर के विरूद्ध मामला आन्ध्राप्रदेश उच्च न्यायालय में चल रहा है। हिन्दूपुर आपरेटरों से मिलने के बाद पिफ़र आन्ध्रा से कर्नाटक के लिए बढ़ चली यात्र। हिन्दूपुर से आन्ध्रा बार्डर क्रास करते हुए कर्नाटक के बगंलौर शहर पहुचने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगा, साझ ढ़लने के साथ-साथ यात्र भी बंगलौर के मालेश्वरम क्लब पहुंच गई, जहां भारी संख्या में कर्नाटक केबल टीवी एसोसिएशन के सदस्य प्रतीक्षा में खड़े मिले।
आंध्रा में तेलंगाना आन्दोलन के कारण वहां की एसो- से मीटिंग ना हो पाने के कारण 2दक अक्टूबर को आन्ध्रा कर्नाटक-तमिलनाडू सहित केरल की भी एसोसिएशन को बंगलौर आने का निमन्त्रण दिया गया। कर्नाटक केबल टीवी आपरेटर्स एसोसिएशन द्वारा यात्र का मैसूर स्टाईल में गर्मजोशी से स्वागत किया गया। वहीं पर मीडिया को भी निमन्त्रित किया गया एवं गो ग्रीन-गो डिजिटल के साथ-साथ पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान पर भी लोगों को जागरूक करने पर विस्तृत चर्चा की गई। गांधी जयन्ती भी है आज यानि कि दो अक्टूबर यानि पूर्ण छुट्टी, सब कुछ बन्द। बंगलौर के मालेश्वरम् क्लब में ही सबके साथ विस्तृत चर्चा में निकल गए यात्र के यह दो दिन। 3तक वबज की सुबह बंगलौर से आगे बढ़ यात्र, सीधे मैसूर पहुंच कर वहां के आपरेटरों के साथ बैठक रखी गई। मैसूर में दशहरा पफ़ैस्टिवल के कारण सभी अतिव्यस्त होने के बावजूद भी यात्र के स्वागत में तत्पर रहें। 3तक को मैसूर में भाई रगांनाथ जी के मेहमानबाजी में रही यात्र। शाम को मैसूर पैलेस में दशहरा पफ़ैस्टिवल पर आयोजित विशेष सास्कृंतिक कार्यक्रम देखा। जहा प्रसिद्ध गीतकार उदित नारायण अपना प्रोग्राम प्रस्तुत कर रहे थे। पैलेस मैसूर के रंगारंग कार्यक्रम में भारी संख्या में लोग आए हुए थे, लेकिन रंगानाथ द्वारा अपनी प्रबन्ध वहां सर्वोत्तम किया गया था। रात्रि विश्राम रंगानाथ के गैस्टहाऊस में किया।
अगली सुबह मैसूर के निकट शिवसमुन्द्र पफ़ाल्स एवं विशिष्ट देवी मां का मन्दिर देखने के बाद बान्दीपुर नेशनल पार्क पहुंचे, जहां पफ़ारेस्ट रैस्ट हाऊस में ही ठहरने का बन्दोबस्त करवाया गया था। समय से पहुंचने का पूरा लाभ उठाते हुए बान्दीपुर पहुंचते ही हम सपफ़ारी पर चले गए। वन्यजीवों के लिए आरक्षित यह जंगल तीन प्रदेशों में पफ़ैला हुआ विशाल जंगल है। कर्नाटक-तमिलनाडू से केबल तक पहुंचता है यह जंगल। यहा कभी वीरप्पन का ठिकाना भी हुआ करता था। लैन्टिना की घनी-उंची-ऊंची झाड़ियों सहित भारी मात्र में यहा बांस के जंगल भी हैं अतः जंगली हाथियों की संख्या यहां बहुतायत में है। वन्य जीवों में टाईगर-वाइल्ड डोग-जंगली भैंसे-रीछ आदि भी इस जंगल में आने वालों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं, जबकि स्पोटेड डियर और साम्भर की संख्या भी बहुत अधिक है। मैसूर से ऊटी जाने वालों के लिए यहीं से सड़क का रास्ता है। यह मार्ग शाम 7 बजे से आवागमन के लिए बन्द कर दिया जाता है, क्याेंकि रात्रि में वन्य जीव सड़क पर स्वछन्द विचरण करते हैं। हाथियों के झुण्ड तो अक्सर वहां से गुजरने वालों को दिखाई देते हैं। कभी-कभी टाइगर और जंगली भैंसे भी सड़क पर ही विचरण करते हुए मिल जाते हैं, लेकिन वाइल्डडोग एवं रीछ मुकद्दर वालों को ही मिल पाते हैं। हिरनों की वहां कोई कमी नहीं है, वह कहीं भी अपनी क्रीड़ाएं करते नजर आ सकते हैं। यहां बिच्छू-नेवले, साही भी पर्यटकों का ध्यान खींच लेते हैं, जबकि सांप की भी कई प्रजातियां इस जगंल में होती हैं। यहां के बन्दरों की पूंछ लम्बी एवं सिर पर मांग निकली होती है जबकि लंगूर भी बन्दरों के साथ-साथ बैठे मिल जाते हैं।
जंगल सपफ़ारी के लिए बांदीपुर पफ़ॉरिस्ट की ओर से विशेष प्रकार बसों की व्यवस्था होती है, लेकिन बान्दीपुर के नजदीक बनी बहुत सारी रिर्सोट्स द्वारा अपने पर्यटकों की खुली जिप्सियां भी उपलब्ध करवाई जाती हैं। आज 5 अक्टूबर की सुबह हो चुकी है यानिकि दशहरा से एक दिन पूर्व, आज प्रातः की सपफ़ारी से वापिस आने पर दिखाई दिया कि पफ़ारेस्ट के समस्त वाहनों सहित पालतू जानवरों की भी पूजा-अर्चना की जा रही है। वाहनों के साथ-साथ वहां के हाथियों को भी खूब अच्छी तरह सजाया गया है एवं उनकी भी पूजा-अर्चना की जा रही है। यह सब उत्तरी भारत से बिल्कुल भिन्न प्रथा है। साऊथ रीजन में दशहरा के अवसर पर ठीक दशहरा से एक दिन पूर्व यहा अपने-अपने व्यावसायिक अथवा निवास परिसर के बाहर नजर ना लगे के लिए पेठा पफ़ोड़ा जाता है, जबकि वाहनों पर केले के पेड़ों सहित पफ़ूल मालाओं से सजाने की प्रथा है। जगल से पुनः मैसूर पंहुची यात्र, जहां विशेष रूप में सजाए गए पूरे मैसूर की छटा ही निराली दिखाई देती है। मैसूर को पफ़ूलों के साथ-साथ पूरी तरह से लाइटों से भी सजाया जाता है। मैसूर का कोई भी सिरा ऐसा नही मिलेगा जिसे दशहरा पर्व के लिए विशेष रूप में सजाया संवारा ना गया हो। भिन्न चौराहों पर अलग-अलग झांकियां वहां आने वालों का मनमोह लेती हैं। आज की रात मैसूर में विश्राम कर कल मैसूर का विशेष आयोजन देखने के लिए विशिष्ट पास का बन्दोबस्त रंगानाथ द्वारा किया गया।
6जी अक्तूबर अर्थात् विजयदशमी यानिकि दशहरा महोत्सव वह भी मैसूर का दशहरा महोत्सव, जिसे देखने के लिए दुनियाभर से लाखों लोग मैसूर पहुंचे हैं। हम भी उन्हीं लाखों लोगों में इस दशहरा महोत्सव पर वहां की संख्या में दर्ज हो गए। बेहिसाब भीड़ को सम्भालने के लिए शहर के अनेक मार्गों पर वाहनों की एन्ट्री बन्द की जा चुकी थी, जहां कोई वाहन आ जा भी रहे थे वहां जाम की परेशानी विवश किए हुई थी, जबकि चारों तरपफ़ से किसी भी सड़क से भीड़ का रेला बढ़ा जा रहा था। हर कोई आज पैलेस के उस स्थान तक पहुंच जाना चाहता था जहां मैसूर का दशहरा महोत्सव कार्यक्रम होना है। जगह-जगह सिक्योरिटी चैकिंग, सामान्य वाहनाें की डाईवर्टिंग, लेकिन विशेष पास वाली गड़ियों की संख्या भी बहुतायत में थी। लाखों लोगों का जमावड़ा, हर कोई सबसे आगे पहुंचने की होड़ में दिखाई दे रहा था, जबकि आगे की सीटें पहले से ही पफ़ुल हो चुकी थीं। जिसको जहां जगह मिल रही थी वह वहा सैट हो रहा था, हमें साई रगांनाथ के प्रयासों से सबसे आगे बनाए गए मीडिया मंच पर जगह मिल गई थी। अतः मैसूर के दशहरा महोत्सव को नजदीक से देखने एवं उसे पिफ़ल्माने का अवसर मिल गया। धूप में कापफ़ी गर्मी थी, कोई छाया भी नहीं थी इसी कारण लगातार पसीना टप-टप कर रहा था, परन्तु दशहरा महोत्सव को देखने की लालसा में धूप-गर्मी सब हल्की साबित हो रही थीं।
कर्नाटक के मुख्यमन्त्री सहित अनेक विशिष्ट अतिथि इस महोत्सव के विशेष मेहमानों में थे। ज्यों ही वहां मुख्यमन्त्री जी का कापिफ़ला आया उसी ओर सभी मीडिया कर्मियों के कैमरे घूम गए। विशेष प्रकार से सजे-धजे हाथियों की परेड भी शुरू हो गई। दशहरा महोत्सव में भिन्न सुरक्षा दल ऊंट-घोडे़ और हाथियों पर सवार थे, जबकि पैदल सेना के जवानों की लकझक करतीं वर्दियां पयर्टकों को लुभा रही थीं। महोत्सव में अनेक प्रकार की झांकियों सहित नाना प्रकार के लोक नृत्य भी लोगों का आकर्षण बने हुए थे। देश की राजधानी दिल्ली में जिस प्रकार से छब्बीस जनवरी की परेड निकलती हे, वैसा ही मनमोहने वाला दृश्य कुछ मैसूर दशहरा महोत्सव का था। बैक ग्राऊण्ड में से अब तोपों द्वारा दी जाने वाली सलामी की भी गूंज सुनाई देने लगी थी। सबसे आखिर में वह हाथी भी परेड में उतर आया जिस पर मैसूर पैलेस का सोना लदा हुआ था। कितना सोना लदा हुआ था उस पर सबके अपने-अपने कयास थे, लेकिन 750 किलो ग्राम साढ़े सात सौ किलो ग्राम सोना लदा होता है इस तरह की बातें वहां की जा रही थीं। सोने से लदे हाथी को दो हाथियों के बीच में लेकर चला जा रहा था, जिसके लिए घुड़सवार सेना रास्ता बनाती जा रही थी। परेड का आंखों देखा हाल लाऊडस्पीकर पर लगातार दिया जा रहा था, हरेक झांकी कर्नाटक की जीवन शौली व शौर्यता की प्रतीक थी, जबकि रंग-बिरंगी वेशभूषा में अपने-अपने करतब दिखलाते हुए गुजर रहीं टोलियां भी सबके आकर्षण का केन्द्र बनी हुई थीं। तकरीबन चार-साढ़े चार घन्टे चली इस परेड-कार्यक्रम का हरेक लम्हा अपना विशेष आकर्षण रखता था। जिस तरह से कार्यक्रम आरम्भ हुआ था उसी भांति समापन भी आकर्षक अन्दाज में हुआ।
मैसूर दशहरा महोत्सव की यादों को समेटते हुए यात्र मैसूर से अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। वापिसी बान्दीपुर होते हुए कर्नाटक बार्डर पार कर तमिलनाडू के ऊटी शहर पहुंची यात्र। मैसूर से ऊटी की दूरी तकरीबन 200 किमी- के करीब हो जाती है, लेकिन घने जंगलाें से गुजरते हुए जो घुमाओदार खड़ी चढ़ाई के रास्ते ऊटी पहुंचाते हैं वहां गाड़ियों के इन्जन की जान और ड्राइवर की दक्षता दोनों के लिए कड़ी परीक्षा की घड़ी होती है, जबकि बेहतर सड़कें तेज रफ्रतार के लिए ललचाती हैं। पहाड़ी रास्तों में ऊटी की चढ़ाई के साथ-साथ उतराई भी खासी रोमान्चक होती है। दशहरा के कारण पर्यटकों की खासी भीड़ से भर गई है ऊटी, अतः होटलों में बामुश्किल ही जगह मिल पाई। सुबह नाश्ता नहीं मिल सका ऊटी में क्योंकि यहां लोग समय से काम समेट देते हैं। ऊटी के पफ़ारूख भाई से सम्पर्क नहीं हो सका, लेकिन मालूम पड़ गया है कि तमिलनाडू सरकार द्वारा लाए गए कानून से ऊटी भी अछूता नहीं रहा है। ऊटी से नोलाम्बर मार्ग से होकर केरल के मज्जेरी शहर छभ्-213 होते हुए सीधे कोजीकोड पहुंची यात्र, यहां से छभ्-17 पकड़ कर आगे बढ़ी यात्र। केरल के आपरेटरों के साथ मुम्बई में मिलना तय हुआ। अन्धेरा कापफ़ी बढ़ने लगा था और सड़क भी ठीक नहीं थी अतः पथोली कालीकट शहर में एक अच्छी सी रिसोर्ट हाईवे पर ही दिखाई दी तब वहीं हाल्ट कर सुबह आगे के सपफ़र पर बढ़ चली यात्र।
छभ्-17 के इस मार्ग पर समुन्द्र भी साथ-साथ चलता है, अतः लीजार्ड (गोय) सड़कों पर वाहनों से कुचली मिलीं। केरल के कालीकट जिले में पायोली एक छोटा सा कस्बा होने के बावजूद भी यहां हाईवे पर एक अच्छा रिसोर्ट रात्रि पड़ाव के लिए पर्यटकों को आकर्षित करता है। सुबह पिफ़र शुरू हुई यात्र पायोली से छभ्-17 पर चलते हुए केरल में ही एक शहर माहे पड़ा, जहां शराब की दुकानें ज्यादा संख्या में खुली हुई थीं। पता लगा कि माहे पान्डुचेरी का भाग है ना कि केरल का यानि कि यह छोटा सा कस्बा एक यूनियन टैरिटरी (पान्डुचेरी) का हिस्सा है। माहे से डीजल लेकर यात्र छभ्-17 पर ही आगे बढ़ते हुए केरल के कन्नर-कसार गोड होते हुए पुनः कर्नाटक में दाखिल हो गई। कर्नाटक के मंगलौर में श्रीनिवास सी-केनी यात्र का स्वागत करने के लिए परिवार सहित प्रतीक्षा करते मिले। केनी ने अपनी नैनों का एक नया लुक दिया हुआ था पेन्ट करके। केनी का केबल टीवी के साथ-साथ पेंट की भी पफ़ैक्ट्री है जबकि गाड़ियों की कलैक्शन उनकी हाबी। मंगलौर से उडीपी-माल्पे बीच होते हुए यात्र उडीपी जिले की तहसील कुन्डापुरा के हेम्माडी कस्बे पहुंची यहां भी छभ्-17 पर ज्वैल पार्क नाम से एक अच्छी रीसोर्ट है। रात्रि विश्राम के लिए यहीं रूक कर सुबह मारवान्थै उस स्थान पर पहुंचे जहां छभ्-17 के एक साईड में दूर तक शान्त नहीं चलती है तो दूसरी ओर विशाल समुन्द्र की लहरें कुछ इस तरह कुलांच मारती हैं जैसे
छभ्-17 को पार कर नदी को ही निगल लेना चाहती हों। भारत की पृथ्वी पर प्रकृति का यह अद्भुत नजारा है।
यहां से आगे बढ़ते हुए कारवाड़ से गोवा में प्रवेश किया जहां गोवा की ओर से मडगांव में आपरेटरों ने यात्र का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। गो ग्रीन-गो डिजीटल पर विस्तृत चर्चा के बाद यात्र पणजी पहुंची, वहा आपरेटरों से भेंट कर यात्र सीधे महाराष्ट्र के लिए बढ़ चली। गोवा से महाराष्ट्र का यह मार्ग कोंकण कहलाता है, जबकि महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी सिंघुदुर्ग भी इसी क्षेत्र में स्थित है। गोवा से सावंतवाड़ी-कुडाल के रास्ते कनकवली पहुंची यात्र। कनकवली एक छोटा सा कस्बा सा है लेकिन इस क्षेत्र का औद्योगिक रूप में तेजी से विकास हो रहा है। नारायण राणे (पूर्व मुख्यमन्त्री महाराष्ट्र) का क्षेत्र होने के कारण यहां खासा विकास दिखाई देता है। सड़कों की प्रशंसा के साथ-साथ छभ्-17 पर स्थित नारायण राणे के होटल नीलम कन्ट्रीसाईड भी प्रशंसनीय है। इसी होटल में रात्रिविश्राम कर सुबह पूर्व सी-एम-की कार्यस्थली को भी बारीकी से अध्ययन करने का प्रयास किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में राणे जी का इन्जीनियरिंग कालिज ैैच्ड कापफ़ी बड़ी जगह में स्थित है जहां देश के कोनेे-कोनेे से छात्र पढ़ने आते हैं। छात्र-छात्रओं के लिए अलग-अलग होस्टल सहित जिम और तैराकी के लिए स्वीमिंग पुल भी बना हुआ है। कालेज के छात्रें सहित प्रिंसिपल-स्टापफ़ से भेंट कर उन्हें भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण एवं ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता का संदेश देते हुए यात्र राणेजी के सिंधुदुर्ग महिला भवन (एक दूरगामी योजना) पहुंची, जिसे अब सिपफ़र् उद्घाटन की प्रतीक्षा है।
यहां से सीधे छत्रपति शिवाजी के सिंधुदुर्ग किले पहुंचे। किला देखने के लिए केवल मीटर बोट से ही जाया जा सकता है, क्योंकि किला चारों तरपफ़ से समुन्द्र से घिरा हुआ हैं सिंधुदुर्ग किले को देख कर उसकी बुलान्दियों का आगास होता है। समुन्द्र के बीच बने हुए हैं। शिवाजी की विशाल प्रतिमा के साथ-साथ उनकी तलवार भी किले में मौजूद है। शिवाजी के साथ से उनके साथ रहने वालों की सातवीं पीढ़ी अभी भी वहीं किले के भीतर रहती है। सिन्धुदुर्ग किले को देख आने के बाद पुनः नीलम कन्ट्रीसाइड रिसोर्ट कनकवली आकर रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह मुम्बई के लिए रवाना हो गई यात्र। कनकवली के बाद रत्नागिरी -चिपलूण के रास्ते यात्र आगे बढ़ रही थी कि तभी दो साइकिल सवार जो कि कन्याकुमारी से कश्मीर के भ्रमण पर थे दिखाई दिए। साइकिल से यात्र पर निकले दोनो यात्री सिख एवं रिश्ते में भाई थे। इनमें एक कृष्णा वासुदेवा मैसूर से एवं अश्विन गुरूराज बंगलौर से थे। इनकी यात्र का आज 16 वां दिन था। इनकी साइकिल 16 गेयर वाली थी और इन्हाेंने प् ैनचवतज ।ददं का एक बैज भी लगाया हुआ था। दोनाें साइकिल सवारों को साथ बैठाकर थोड़ा सा अल्पाहार करवा कर यात्र पुनः आगे बढ़ चली यात्र।
साइकिल सवारों के साथ अल्पाहार के समय से आरम्भ हुई भारी बारिश के कारण आगे बढ़ पाना बहुत कठिन हो रहा था, लेकिन आगे बढ़ने की जैसे-जैसे कोशिश कर रहे थे, वैसे-वैसे बारिश भी तूपफ़ानी बनती जा रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली कड़कने की गति बहुत ही भयावह रूप धारण किए थी। जब बिल्कुल ही सामने का दिखना कठिन हो गया तब पुनः छभ्-17- पर एक रैस्ट्रा में कुछ मिनट रूक कर यात्र पुनः आगे बढ़ी। तभी सड़क पार कर रहे एक बड़े सांप को रास्ता देने के लिए गाड़ी रोकी और पिफ़र पुनः मुम्बई के लिए यात्र आगे बढ़ती रही। आखिरकार अर्धरात्रि में मुम्बई पहुंच ही गई यात्र। महानगरी मुम्बई में इंडष्ट्री के अनेक प्रमुखों से मिलने का कार्यक्रम है एवं इंडष्ट्री पर एक प्रदर्शनी भी हो रही है, वहां भी भिन्न क्षेत्रें से आए अनेक आपरेटरों से मिलने का कार्यक्रम है। अतः मुम्बई दो दिन कापफ़ी व्यस्त रहेंगे। अतः चेतना यात्र-7 के तृतीय भाग को यहीं विराम दिया जाता है, शेष भाग के लिए यात्र के चतुर्थ भाग की प्रतीक्षा करें।
बेहिसाब भीड़ को सम्भालने के लिए शहर के अनेक मार्गों पर वाहनों की एन्ट्री बन्द की जा चुकी थी, जहां कोई वाहन आ जा भी रहे थे वहां जाम की परेशानी विवश किए हुई थी, जबकि चारों तरपफ़ से किसी भी सड़क से भीड़ का रेला बढ़ा जा रहा था। हर कोई आज पैलेस के उस स्थान तक पहुंच जाना चाहता था जहां मैसूर का दशहरा महोत्सव कार्यक्रम होना है। जगह-जगह सिक्योरिटी चैकिंग, सामान्य वाहनाें की डाईवर्टिंग, लेकिन विशेष पास वाली गड़ियों की संख्या भी बहुतायत में थी। जिसको जहां जगह मिल रही थी वह वहा सैट हो रहा था, हमें साई रगांनाथ के प्रयासों से सबसे आगे बनाए गए मीडिया मंच पर जगह मिल गई थी।

यहां से आगे बढ़ते हुए कारवाड़ से गोवा में प्रवेश किया जहां गोवा की ओर से मडगांव में आपरेटरों ने यात्र का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। गो ग्रीन-गो डिजीटल पर विस्तृत चर्चा के बाद यात्र पणजी पहुंची, वहा आपरेटरों से भेंट कर यात्र सीधे महाराष्ट्र के लिए बढ़ चली। गोवा से महाराष्ट्र का यह मार्ग कोंकण कहलाता है, जबकि महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी सिंघुदुर्ग भी इसी क्षेत्र में स्थित है। गोवा से सावंतवाड़ी- कुडाल के रास्ते कनकवली पहुंची यात्र। कनकवली एक छोटा सा कस्बा सा है लेकिन इस क्षेत्र का औद्योगिक रूप में तेजी से विकास हो रहा है। नारायण राणे (पूर्व मुख्यमन्त्री महाराष्ट्र) का क्षेत्र होने के कारण यहां खासा विकास दिखाई देता है।

बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली कड़कने की गति बहुत ही भयावह रूप धारण किए थी। जब बिल्कुल ही सामने का दिखना कठिन हो गया तब पुनः छभ्-17- पर एक रैस्ट्रा में कुछ मिनट रूक कर यात्र पुनः आगे बढ़ी। तभी सड़क पार कर रहे एक बड़े सांप को रास्ता देने के लिए गाड़ी रोकी और पिफ़र पुनः मुम्बई के लिए यात्र आगे बढ़ती रही। आखिरकार अर्धरात्रि में मुम्बई पहुंच ही गई यात्र। महानगरी मुम्बई में इंडष्ट्री के अनेक प्रमुखों से मिलने का कार्यक्रम है एवं इंडष्ट्री पर एक प्रदर्शनी भी हो रही है, वहां भी भिन्न क्षेत्रें से आए अनेक आपरेटरों से मिलने का कार्यक्रम है। अतः मुम्बई दो दिन कापफ़ी व्यस्त रहेंगे।

चेतना यात्रा-7, (चौथा भाग) मुम्बई से दिल्ली
देश के गांव-गांव तक पहुंच कर लोगों को पर्यावरण की रक्षा करने का संदेश देना यूं तो सरल कार्य नहीं है, लेकिन जब मालूम हो कि देश के हरेक कोने में केबल टीवी ऑपरेटर भी अवश्य मिलेगा, उत्साह बढ़ाता है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए केबल टीवी ऑपरेटर भला क्याें इन्कार करेगा, हरेक ऑपरेटर ऐसे अभियान में अपना योगदान कर गर्व महसूस करता है। यही कारण है कि एक-दो नहीं बल्कि हर वर्ष लगातार की जाने वाली चेतना यात्र की यह सातवीं कड़ी है। 5 सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली से आरम्भ होकर हरियाणा-पंजाब-जम्मू व कश्मीर, हिमाचल, चण्डीगढ़, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, वैस्ट बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, गोवा, होते हुए मुम्बई पहुंच चुकी है यात्र। मुम्बई की चमक-धमक के आकर्षण में लोग स्वयं खिंचे आते हैं। यहां उत्तरी भारत की तरह से आवभगत कम ही देखने को मिलती है। भाग-दौड़ में अधिक व्यस्त दिखते हैं यहां के लोग, लेकिन सीधी और खरी बात कहने में मुम्बई का जवाब नहीं। ग्लोबल वार्मिंग के प्रति, अच्छी जागरूकता भी है, वैसे भी सामाजिक चेतना मुम्बई वासियों की जैसे सभ्यता में ही समाया हुआ है। इसीलिए लोग जहां भी जरूरत हो स्वयं व्यवस्था निर्माण कर लेते हैं। महानगरी मुम्बई देश की फिल्म नगरी के साथ-साथ कमर्शियल राजधानी भी कहलाती है। देश के, नामचीन रईसों का बसेरा भी फिल्म नगरी के साथ-साथ यहीं है। महिलाएं यहां देश की राजधानी दिल्ली के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं। वैसे तो आपराधिक गतिविधियां देश के हरेक शहर में ही होती रहती है, लेकिन मुम्बई लोकल हो या फिर कोई अन्य सार्वजनिक स्थान गर कोई जेबकतरा या झपटमार पकड़ा गया तब उसकी पिटाई भी उतनी ही सार्वजनिक होती है। मुम्बई वासी अभी भी पूर्णतया संवेदनशील हैं जबकि दिल्ली के हालातों को देखकर तो यही लगता है कि दिल्ली वासियों की संवेदनशीलता शायद लुप्त ही हो गई है तभी तो दिल्ली में खुले आम अपराध होते हैं। मैट्रो हो या कोई भी लोकल एरिया कहीं भी किसी भी महिला से बदतमीजी की जाती है या फिर उसकी ज्यूलरी छीन ली जाती है या जेब काट ली जाए या मोबाइल छीन लिया जाए या फिर किसी भी चौराहै रैडलाईट पर रूकी कार में से बैग उड़ा लिया जाए, चाकू मार दिया जाए आदि सामान्य सी घटनाएं बनकर रह गई हैं। बहरहाल! मुम्बई महानगर में चेतना यात्र का गर्म जोशी के साथ स्वागत करने के लिए भिन्न शहरों से भारी संख्या में से ऑपरेटर वहां लगी एक प्रदर्शनी के बाहर इकट्ठे हुए थे। इन ऑपरेटरों के मुम्बई आकर भारी संख्या में मिलने का एक कारण यह भी रहा कि केबल टीवी के डिजीटिलाइजेशन पर केन्द्रीय सरकार द्वारा आर्डिनेंस जारी कर दिया गया है। यह आर्डिनेंस केबल टीवी में एनालाग टेक्नोलॉजी को खत्म कर पूर्णतया डिजीटल टेक्नोलॉजी पर ले जाने के लिए है। इस आर्डिनेंस के कारण भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी में नई सम्भावनाओं के मार्ग खुलने है। इसका देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों पर क्या प्रभाव पडे़गा, एवं इसके लिए उन्हें कैसी तैयारियां करनी चाहिए, यही जानने के लिए मुम्बई में केबल टीवी ऑपरेटरों का जमावड़ा लगा है। साथ ही साथ ट्रेड एक्जीबिशन भी उनका आकर्षण बना। गुजरात-महाराष्ट्र, केरल, गोवा, आन्ध्र प्रदेश सहित राजस्थान से पहुंचे ऑपरेटरों से भी यहां आर्डिनेंस को लेकर इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर सारे दिन विस्तृत चर्चा हुई। व्यावसायिक चर्चा के साथ-साथ केबल ऑपरेटराें को सामाजिक कार्याें में भी, भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। ग्लोबल वार्मिंग के प्रति आम लोगों को जागरूक करने के लिए ऑपरेटर अपने नैटवर्क का इस्तेमाल करें, इसी के साथ-साथ भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण में भी उन्हें, अपना दायित्व निर्वाह करना चाहिए, का सन्देश देकर मुम्बई स्थित भिन्न चैनलों के दफ्रतरों में यात्र पहुंची। चैनल वालों (ब्रॉडकास्टर्स) के साथ-साथ भिन्न एम-एस-ओ- से भी आर्डिनेंस पर उनके नजारे को जानने की कोशिश की गई। मीडिया प्रोन्वन अलाईन्स- फूड-फूड, सहारा, संस्कार आदि चैनल प्रमुखों के साथ आर्डिनेंस पर विस्तृत चर्चा के साथ चेतना यात्र की सफलता की ढेरों शुभकामनाएं साथ लिए यात्र मुम्बई स्थित प्रमुख एम-एस-ओ हिन्दुजा समूह के इन केबल प्रमुख नागेश छाबड़िया का आर्डिनेंस पर विचार जानने के लिए पहुंची, वहां गर्म जोशी के साथ यात्र का भव्य स्वागत छाबड़िया सहित, वहां पहुंचे ऑपरेटरों ने भी किया। उन्हीं ऑपरेटरों में से नोएडा से रूक्कू भाई एवं देहरादून के आर-के- बहल भी शामिल थे। ऑपरेटरों में आन्ध्र से आए ऑपरेटर भी यात्र के स्वागत में शामिल थे। इन केबल से शुभकामनाएं लिए यात्र डी-जी- केबल पहुंची वहां योगेश शाह, योगेश राधाकृष्णन, सहित शिशिर पिल्लई, जुजेर राजा, एन-पी- सिंह आदि सभी ने गर्म जोशी से स्वागत किया। आर्डिनेंस पर विस्तार से बातें हुई और फिर ढेर शुभकामनाओं सहित यात्र मुम्बई आपरेटरों से मिलते-मिलते इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर अन्य सबके विचार लेते हुए मुम्बई से गुजरात की ओर बढ़ चली। मुम्बई से आगे बढ़ते हुए यात्र को भारी वर्षा का सामना करना पड़ा, जबकि मुम्बई में अनेक फ्रलाइट्स खराब मौसम के कारण देर से उड़ीं। मुम्बई से निकलते-निकलते ही यूं तो काफी देर हो गई थी, तिसपर भारी बारिश यात्र की गति थाम रही थी, फिर भी रात्रि विश्राम के लिए समय रहते दमन पहुंच गई यात्र। दमन के मिन्टू भाई की पत्नी होस्पिटल में एडमिट होने के कारण दमन का कार्यक्रम स्थगित किया गया। बाद में मालूम हुआ कि मिन्टू की पत्नी का देहान्त हो गया है। यात्र के दौरान ही उनके शोक में केवल मन से ही शामिल हो सके हम। ऐसी लम्बी यात्र में कभी-कभी ऐसेे क्षण भी आ ही जाते हैं जब कभी खुशी तो कभी गम में भी शामिल हो जाती है यात्र। दमन में भी वह क्षण आए लेकिन यात्र लगातार आगे बढ़ती रहती है। दमन से सीधे सूरत पहुंची यात्र, जहां पहले से ही यात्र का स्वागत करने के लिए भावेश, मनोज विपुल भाई आद के साथ अन्य ऑपरेटर भी प्रतीक्षारत थे। सूरत में पूर्व यात्रओं में किए गए वृक्षारोपड़ का नतीजा अब देखने को मिला, रोपे गए पौधे बड़े हो गए हैं। आर्डिनेंस पर अब समूची कम्युनिटी चिन्तित दिखाई दे रही है। जहां जो भी ऑपरेटर मिलते हैं आर्डिनेंस पर अवश्य बात करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग से भी बड़ा मुद्दा अब भ्रष्टाचार बन गया है। सूरत से भरूच होकर बड़ोदरा पहुंचने तक रात हो गई, जबकि, हाईवे बना हुआ है, लेकिन सुपर एवन हाईवे के बावजूद भी एक पुल का सुपर निर्माण ना हो पाने के कारण साढ़े चार-पांच घण्टे का जाम इस रूट पर रोजाना की कहानी है। रात्रि विश्राम बडोदरा में ही वहां के आपरेटर जे-बी- गांधी की मेहमाननवाजी में करना पड़ा। बडोदरा से यूं तो मध्य प्रदेश के लिए रवाना हुई थी यात्र, लेकिन जीटीपीएल प्रमुख बापूभाई (कनक सिंह राना) के विशिष्ट अनुरोध पर सीधे अहमदाबाद पहुंची यात्र। बापू भाई का एक माइनर आप्रेशन हुआ है अतः दोपहर का भोजन उनके घर पर ही करके यात्र मेहसाना पहुंची जहां आशीष पाण्डया अन्य ऑपरेटरों के साथ यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षा में थे।
चेतना यात्र 7 के रूट मैप में मेहसाना नहीं था अतः वृक्षारोपड़ आदि कार्यक्रम अगले वर्ष किया जायेगा, लेकिन यात्र के उद्देश्य में उस क्षेत्र को भी पूरी तरह से शामिल कर लिया गया है। अहमदाबाद से यह मार्ग मुख्य मार्ग गांधीनगर-हिम्मतनगर से हटकर मेहसाना होते हुए राजस्थान में बाड़मेर-जैसलमेर की ओर पहुंचता है। इसी मार्ग से यात्र देश के मरूस्थल में पहुंचनी है।
मेहसाना से विदा लेकर यात्र बाड़मेर के लिए रवाना हो गई। यह मार्ग देश के मरूस्थल क्षेत्र की ओर लिए जा रहा है। ऐसा एहसास मेहसाना से थोड़ा आगे बढ़ते हुए ही प्रतीत होने लगता है क्योंकि पेड़-पौधे दिखने बन्द होते लगते हैं। रात का अन्धेरा बढ़ता जा रहा है, अभी काफी दूर है। एक छोटा सा कस्बा दीसा गुजरात-राजस्थान बार्डर पर विश्रामालय बना यात्र का। दीसा के ऑपरेटरों को चेतना यात्र पहुंचने की सूचना मिल चुकी थी अतः वह सब प्रतीक्षा करते मिले। यात्र के स्वागत-सत्कार के बाद इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर चर्चा हो जाने के बाद ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने का सन्देश दीसा के ऑपरेटरों को दिया। सुबह सवेरे ही यात्र बाड़मेर के लिए रवाना हो गई। दीसा से बाड़मेर का रास्ता बिल्कुल सुनसान सा था। सड़कें तो बहुत बढ़िया थीं लेकिन टैªफिक बिल्कुल भी नहीं था, दूरतलक, खाली-खाली सड़कें। दीसा से संचोर-काबुली होकर बाड़मेर दोपहर बाद ही पहुंच गई यात्र। बाड़मेर का नैटवर्क कन्हैया लाल डलोरा सम्भाले हुए हैं। डलोरा भी मुम्बई से आज ही वापिस पहुंचे हैं। वह बता रहे थे कि आप की चेतना यात्र को हमने मुम्बई में देखा तो था, लेकिन वहां हम समझ नहीं सके थे, बल्कि सच पूछें तो हम काफी देर तक आपकी यात्र को लेकर चुटकियां ले रहे थे। हमें आपके आने का पहले से मालूम होता तब हम यहां भी बडे़ कार्यक्रम रखते। बहरहाल ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करना कितना जरूरी है यह बात उनकी समझ में आ गई और भारत को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने में मीडिया का योगदान कैसे हो सकता है उन्हें समझा कर यात्र बाड़मेर से जैसलमेर के लिए रवाना हो गई। बाड़मेर के निकट पाकिस्तान बार्डर देखने के लिए वह कुछ बन्दोबस्त कर सूचित करें एैसा उन्हें निर्देश देकर यात्र जैसलमेर के लिए चल पड़ी। बाड़मेर से जैसलमेर का रास्ता और भी सुनसान है। दोनों तरफ रेत ही रेत या यूं कहिए कि मरूस्थल के बीच में से सड़क से सड़क का निर्माण किया गया था। रेगिस्तानी खेतों में फसल नाम की कोई चीज तो दूर तक दिखाई नहीं देती थी, लेकिन हल्की फुल्की हरी झाड़ियों के बीच तरबूज की बेल दीख जाती थीं। तरबूज-फूट जैसे कंटीले फल यहां चिंकारा हिरणों का भोजन होता है। इसीलिए इस मार्ग पर कहीं-कहीं हिरण भी कुलांचे मारते दिखाई दे जाते हैं, जबकि सड़क दूर तक बिल्कुल सुनसान ही है। टैªफिक बिल्कुल ना के बराबर लेकिन मिलैट्री की गाड़ियां कहीं-कहीं आती जाती मिल जाती है। शाम होते-होते यात्र जैसलमेर पहुंच गई, वहां का ऑपरेटर पुष्प भाटिया निगम पार्षद भी हैं। जैसलमेर में सबसे मिल लेने के बाद जैसलमेर का डेजर्ड सफारी वाला मरूस्थल देखने के लिए होटल में चैक इन कर, हम सीधे वहीं चले गए। वहां मरूस्थल देखने का आनन्द लेने के लिए भी विश्वभर के सैलानी पहुंचते हैं। सैलानियों के लिए बाकायदा कई ठिकाने उस मरूस्थल में बने हुए हैं। अधिकांश टूरिस्ट वहीं टैण्टों में नाइट हाल्ट भी करते हैं। भोजन आदि के साथ-साथ सैलानियों के मनोरंजन के लिए वहां, राजस्थानी डांस-कला का भी प्रदर्शन किया जाता है। रेत के सागर मे ऊंटों की सवारी के साथ-साथ वे डूबते सूरज का दश्य वहां का मुख्य आकर्षण होता है। डैजर्ट के टीलों पर ऊंट की सवारी एक अद्मुत आनन्द देती है, लेकिन सैलानियों के पीछे-पीछे दूर तलक भीख मांगने वालों की टोलियों विदेशियों के सम्मुख किसी भी भारतीय को बहुत शर्मिंदा करती है। भारत का विशिष्ट डैजर्ट क्षेत्र कहलाता है जैसलमेर का यह क्षेत्र। वापिस होटल पहुंच विश्राम के बाद अगली सुबह पुनः बाड़मेर के लिए निकले, क्योंकि बाड़मेर से सूचना मिली है कि, भारत-पाकिस्तान बार्डर मुनाबाऊ जाने की इजाजत ले ली गई है। अटारी बार्डर की ही भांति भारत-पाकिस्तान का यह बार्डर भी दोनों देशों के आवागमन के लिए खुला हुआ है। इस बार्डर से एक ट्रेन जोधपुर से मुनाबाऊ सप्ताह में एक बार आती-जाती है। मुनाबाऊ स्टेशन भारत का पाकिस्तान बार्डर पर अन्तिम रेलवे स्टेशन है। यह स्टेशन ही पाकिस्तन से भारत आने वाले मुसाफिरों के होश उड़ा देता है क्योंकि पाकिस्तान रेलवे स्टेशनों के मुकाबलें में भारत का मुनाबाऊ रेलवे स्टेशन ही बहुत भव्य है। स्टेशन की सफाई, स्वच्छ पानी का इन्तजाम एवं साफ-सुथरे महकते टायलेट भी मुसाफिरों को प्रभावित करते हैं, जबकि पाकिस्तान का रेलवे स्टे"ान ना तो साफ-सुथरे हैं व ना ही वहां के टायलेट ही लोगों को प्रभावित करते हैं, तिसपर एक गन्दे से मटके में रखा पीने का पानी भी वहां जाने वालाेंं को अखरता है। वहां के प्लेटफार्म भी हमारे देश के प्लेटफार्म की भांति नहीं होते हैं। वहां का प्लेटफार्म सीधे जमीन पर ही उतर कर आता हैं जबकि हमारे यहां ट्रेन की बोगियों से सीधे प्लेटफार्म पर निकलती हैं सवारियां। यह सारा वृतान्त बाड़मेर के आपरेटर डलोरा जी के अनुभव से जान पड़ा, उन्हीं के साथ हमें भी मुनाबाऊ पहुंच कर बी-एस-एफ- के जवानों से मिलने का अवसर मिला।
जैसलमेर से बाड़मेर का सफर डेढ़ सौ किलोमीटर और बाड़मेर से पाकिस्तान बार्डर मुनाबाऊ का भी सफर तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर ही पड़ता है, लेकिन बिल्कुल सुनसान रास्ता। कहीं बीच-बीच में इक्का-दुक्का गांव जरूर आ जाते हैं लेकिन अधिकांश रास्ता दूर तलक सुनसान और साफ-सुथरी सड़कों वाला है। दिन में खांसी चुभन भरी गर्मी में बी-एस-एफ- के जवान कैसे दे"ा की सीमाओं की रक्षा करते हैं, इसका अनुभव वहां पहुंचकर हो जाता है। बार्डर से पुनः बाड़मेर आकर यात्र उदयपुर के लिए रवाना हो जाती है। उदयपुर की दूरी तकरीबन साढ़े चार सौ किलोमीटर है बाड़मेर से, जबकि जैसलमेर से डेढ़ सौ किलोमीटर बाड़मेर और बाड़मेर से बार्डर का आना-जाना तकरीबन तीन सौ किलोमीटर का सफर करते -करते शाम तो बाड़मेर में ही हो गई थी, फिर भी बाड़मेर से आगे की यात्र का फांसला लम्बा होने के साथ-साथ मुख्य मार्ग भी नहीं था व ना ही इस सफर की सड़कें बेहतर थी, अतः रात्रि विश्राम के लिए बीच में आए एक छोटे से कस्बे जालौर में हाल्ट मारना पड़ा। अगली सुबह पुनः उदयपुर के लिए यात्र आरम्भ हुई। जालौर से सिरोही-शिवगंज होते हुए यात्र उदयपुर पहुंची। उदयपुर में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कार्यक्रम का आयोजन नरे"ा माली एवं अजय पोरवाल द्वारा किया गया। अजय पोरवाल उदयपुर में एक निगम पार्षद भी हैं। उदयपुर से पिण्डवाड़ा चित्तौड़ गढ़ होते हुये कोटा पहुंची यात्र।
पिण्डवाड़ा क्षे=ा से गुजरना पूर्व में बड़ा जोखिम भरा हुआ करता था क्योंकि इस क्षेत्र में आदिवासियों द्वारा लूटमार की वारदातों को अंजाम दिया जाता था, लेकिन अब उन पहाड़ियों को काट-कर नेशनल हाईवे बना दिया गया है, अतः वह दुर्गम रास्ता भी अब आराम का सफ बन गया है। इस क्षेत्र में शरीफों के घने जंगल हैं इसीलिए इस हाईवे पर छोटे-छोटे बच्चे टोकरियों में शरीफे लिए कई जगह बेचते दिखाई दे जाते हैं। उदयपुर से चित्तौड़ गढ़ होते हुए कोटार पहुंची यात्र, जहां कपिल अरोड़ा, अजय सिंह आदि ने गर्म जोशी के साथ यात्र का स्वागत किया। वही डिजनी चेनल प्रमोद एवं के विशाल सहित ट्टषिकेश के अजय चौधरी भी भेंट एवं इण्डष्ट्री पर आर्डिनेंस पर चर्चा हुई । भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण एवं ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरुकता अभियान में उनकी भूमिका पर संदेश देते हुए यात्र कोटा से सवांई माधो पुर की ओर बढ़ चली । यह मार्ग भी ठीक-ठाक नहीं है, जबकि एक डैम भी इस मार्ग पर पड़ता है, जंगल तो घना है, लेकिन सड़कें ठीक-ठाक नहीं हैं। सवांई माधो पुर पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो गई है । रात्रि विश्राम के बाद सुबह-सुबह रणथम्भौर की सैर की लेकिन जंगल के हिसाब से वन्य जीव कम मिले। रणथम्भौर विजिट के लिए, यहां केवल ओपन बस ही उपलब्ध थी, जबकि टूरिस्ट लेकर जंगल में जिप्सी जाती है। जिप्सी के लिए हमने खासी कोशिश की तब कहीं जाकर शाम की राइड हम जिप्सी से कर पाए।
जिप्सी से जंगल में जाना हमारे लिए बहुत ही "ाुभ रहा, क्योंकि रणथम्भौर के टाइगर को फिल्माने का मौका मिल गया। खूबसूरत जंगल खूबसूरत बाघ को नजदीक से फिल्माने के अवसर जीवन में बड़ी मुशिकल से ही मिला करते है विश्व भर से हजारों टूरिस्ट प्रत्येक वर्ष भारतीय जंगलो में वन्य जीवों को देखने के लिए लाखों रुपये खर्च कर आते हैं। ऐसे सौभाग्यशाली विरले ही होते हैं जिन्हें इन जंगलों में बाघ के दर्शन हो पाते हैं। रणथम्भौर भी भारत का एक बड़ा और घनाँ जंगल है, यहां साम्भर-चीतल भी भारी संख्या में हैं। हाथी यहाँ नहीं हैं क्योकि ना तो उनके खाने के लिए यहाँ पर्याप्त भोजन है व ना ही यहाँ विचरण के लिए अनुकूल वातावरण है । इस जंगल में नील गाय भी दिखाई दे जाती है । सांपों की अनेक प्रजाति हैं । मगरमच्छ भी है एवं लेपार्ड भी दिखाई दे जाते हैं जबकि पक्षी प्रेमियों के लिए यहां अनेक प्रकार के पक्षी भी मिलते हैं। रणथम्भौर घूमने का आनन्द जिप्सी से ही आता है, लेकिन खुली बसों में भी वन विभाग टूरिस्ट को रणथम्भौर घुमाता है। रणथम्भौर की रोमान्चक स्मृतियाें को समेटकर यात्र सवाई माधोपुर से ग्वालियर के लिए रवाना हो गई।
राजस्थान से मध्यप्रदेश की सीमाओं पर स्थित यह क्षेत्र उतनी तरक्की नहीं कर सका है जितनत कि देश के अन्य क्षेत्रें में दिखाई देती है। सवाई-माधोपुर से शिवपुरी का मार्ग कहीं-कहीं बहुत ज्यादा खराब है, लेकिन जहां थोड़ा ठीक-ठाक भी है तो सुनसान सा ही है। हाईवे पर ढ़ाबे आदि इधर बिल्कुल नहीं हैं। गाँवों मे दीपावली की तैयारियों में लोग अपने घरों की सफाई- पुताई मे व्यस्त है । शिवपुरी पहुँचने पर यात्र का गर्मजोशी के साथ भव्य स्वागत किया गया। इण्डस्ट्री पर आए ऑर्डनेंस से आरम्भ हुई चर्चा ग्लोबल वार्मिंग और फिर भ्रष्टाचार मुक्त निर्माण तक पहुँची। फरकान अली, मो- अफजल खान, दिनेश शर्मा, एवं अनिल आदि सहित अन्य आपरेटरों के साथ लंच कर यात्र ग्वालियर के लिए रवाना हो गई। दीपावली के कारण बाजारों में भीड़ के साथ-साथ बाजारों की सजावट भी बढ़ती जा रही है । शिवपुरी से ग्वालियर मार्ग ठीक-ठाक है अतः समय से ग्वालियर पहुँच गई यात्र।
ग्वालियर रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन यात्र के स्वागत सत्कार का बड़ा कार्यक्रम प्रमोद मिश्रा जी ने आयोजित किया। मिश्रा जी ग्वालियर में विन केबल चलाने के साथ-साथ मीडिया प्रो- की भी जिम्मेदारी देख रहे है। ग्लोबल वार्मिंग एवं भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण के प्रति लोगों को जागरुक करने का संदेश सशक्त तरीके से ग्वालियर वासियों तक पहुँने के लिए मिश्रा जी ने प्रिण्ट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया सभी को बुला रखा था। नीलेश, रवीन्द्र चतुर्वेदी सहित प्रेस ब्रीफिंग के साथ-साथ इण्डष्ट्री के भविष्य पर भी विस्तृत चर्चा करने के बाद वहाँ सबसे विदा एवं शुभकामनाएँ लिए यात्र चम्बल क्षेत्र से होते हुए गरा पहुँची। भिण्ड-मुरैना-थौलपुर होते हुए आगरा पहुँच गई यात्र लेकिन दीपावली व रविवार होने के कारण आगरा कार्यक्रम नहीं हो सका। वैसे भी शायद आज धन तेरस है इस कारण भी बाजारों में काफी भीड़ है, दीपावली की तैयारियों व खरीदारी में व्यस्त हैं लोग। आगरा से सीधे मथुरा के लिए यात्र बढ़ी, लेकिन रास्ते पर लम्बे जाम के कारण मथुरा पहुंचने में बहुत ज्यादा समय लग गया। रात्रि विश्राम कैलाश गुप्ता जी के विशिष्ट अनुरोध पर मथुरा में ही किया। पूर्व यात्र के दौरान मथुरा में लगाए गए पौधे तो अब नहीं दिखाई दिए, लेकिन उनकी जगह कैलाश भाई ने कई और पौधे लगवा कर ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता अभियान में अपना सहयोग दिया है।
मथुरा से हाथरस, अलीगढ़, खुर्जा होते हुए दीपावली से पूर्व दिल्ली के लिए यात्र जारी थी। सभी बाजार सजे-धजे और भारी भीड़ से भरे थे। आपरेटर से भेंट कर पाना भी अब कठिन हो गया था क्योंकि हर कोई अब दीपावली की तैयारियों में मग्न हो गया था। सभी जगह जाम लगे हुए थे। हाथरस के आपरेटरों ने यात्र का स्वागत किया लेकिन अलीगढ़ किसी से मिलना नहीं हो सका। खुर्जा में चीनी मिट्टी के बर्तनों एवं अन्य सामानों के बड़े-बड़े डिस्प्ले लगे हुए थे। खुर्जा से बुलन्दशहर, सिकन्दराबाद मार्ग से गाजियाबाद होते हुए देर शाम दिल्ली पहुंच गई यात्र। इस प्रकार 5 सितम्बर को दिल्ली से आरम्भ हुई चेतना यात्र 7 भी पूर्व निर्धारित समयानुसार पूरा दे"ा घूमते हुए दीपावली की पूर्व संध्या पर 25 अक्तूबर को समूची कम्युनिटी की ढेरों शुभकामनाएं और प्यार लिए पूर्ण सफलता के साथ निर्विध्न सम्पना दिल्ली में हो गई यह यात्र। यात्र की वापिसी का सहर्ष पूरी गर्म जोशी के साथ दिल्ली में स्वागत किया गया। यात्र की खट्टी-मीठी स्मृतियों से भरी हुई इस झोली के कुछेक अंश ही पाठ कों की समर्पित किए जा सके हैं, जबकि यादों के खजाने में तो हर पल एक नया एहसास दिलाता है। इस यात्र में भी दे"ा के अधिकांश शहरों व गांव-कस्बों में आपरेटरों ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण एवं ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता अभियान में अपना खुलकर योगदान दिया है। इण्डस्ट्री की अनेक समस्याओं व समाधान पर भी बेबाक चर्चाएं हुईं। इस संदर्भ में इण्डस्ट्री एक मत नहीं है, सब अपनी-अपनी तरह से इसके मायने निकाल रहे है। आपरेटरों के साथ-साथ एम-एस-ओ- की स्थिति भी बंटी हुई हैं।
कुल 50 दिन की इस यात्र में तकरीबन बीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया गया। गाड़ी में मात्र एक पंचर हुआ, लेकिन ऊबड़-खाबड़ सड़कों से गुजरते हुए डीजल टैंक लीक हो गया। टोयटर की इनोवाक्रिस्टा गाड़ी 30 अगस्त को ही दिल्ली से ली गई थी, जो कि 5 सितम्बर से यात्र पर थी। गाड़ी के डीजल टैंक को बदले जाने का कोई भी बन्दोबस्त टोयटा कम्पनी के द्वारा यात्र के दौरान नहीं करवाया जा सका। अतः टेंक वापिस दिल्ली पहुंच कर ही बदलवाया जा सका।
मुम्बई वासी अभी भी पूर्णतया संवेदनशील हैं जबकि दिल्ली के हालातों को देखकर तो यही लगता है कि दिल्ली वासियों की संवेदनशीलता शायद लुप्त ही हो गई है तभी तो दिल्ली में खुले आम अपराध होते हैं। मैट्रो हो या कोई भी लोकल एरिया कहीं भी किसी भी महिला से बदतमीजी की जाती है या फिर उसकी ज्यूलरी छीन ली जाती है या जेब काट ली जाए या मोबाइल छीन लिया जाए या फिर किसी भी चौराहै रैडलाईट पर रूकी कार में से बैग उड़ा लिया जाए, चाकू मार दिया जाए आदि सामान्य सी घटनाएं बनकर रह गई हैं।

मेहसाना से विदा लेकर यात्र बाड़मेर के लिए रवाना हो गई। यह मार्ग देश के मरूस्थल क्षेत्र की ओर लिए जा रहा है। ऐसा एहसास मेहसाना से थोड़ा आगे बढ़ते हुए ही प्रतीत होने लगता है क्योंकि पेड़-पौधे दीखने बन्द होते लगते हैं। रात का अन्धेरा बढ़ता जा रहा है, अभी काफी दूर है। एक छोटा सा कस्बा दीसा गुजरात-राजस्थान बार्डर पर विश्रामालय बना यात्र का। दीसा के ऑपरेटरों को चेतना यात्र पहुंचने की सूचना मिल चुकी थी अतः वह सब प्रतीक्षा करते मिले। यात्र के स्वागत-सत्कार के बाद इण्डस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर चर्चा हो जाने के बाद ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने का सन्देश दीसा के ऑपरेटरों को दिया।



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