चेतना यात्रा-6

‘चेतना यात्रा-6’ (प्रथम भाग) दिल्ली से चण्डीगढ़ के रास्ते रुद्रपुर तक
पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान के कारण प्रकृति में आ रहे बदलावों का संदेश भले ही हर एक शख्स ना समझ पा रहा हो लेकिन बदलाव तो आते ही रहेंगे, बशर्तें उन बदलावों के कारण को समझ कर जब तक मानव जाति निवारण की ओर कदम नहीं बढ़ाएगी। दुनिया भर के तमाम देश प्रकृति के उन बदलावों के प्रति गाहे-बगाहे चिन्ता जताते रहते हैं लेकिन अकेले उनकी चिन्ता समाधान नहीं बन सकती है। धीरे-धीरे समस्या ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि अब पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लगने लगे हैं। आवश्यकता समूची मानव जाति को जागरूक करने की है, अन्यथा हमारी भावी पीढ़ियां स्वयं को बहुत ही भयानक वातावरण में पाएंगी। हम बहुत ही तेजी के साथ उस भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के साथ-साथ हमारा देश इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भी ढे़र बनता जा रहा है। दुनिया भर के देशों से यह कचरा भारत में डम्प हो रहा है। इस ई कचरे के कारण भी हमारे देश के वातावरण में विषैली गैसों का मिश्रण बढ़ता जा रहा है। अब वह दिन दूर नहीं रह गए हैं जब शुद्ध श्वांस लेने के लिए तमाम ऑक्सीजन चैम्बर उपलब्ध होंगे। जिस प्रकार से अब डॉक्टर के पास पहुंचते ही अनेक टैस्टों की पर्ची थमा दी जाती है, उसी प्रकार से वही डॉक्टर मरीजों को ऑक्सीजन चैम्बर में घन्टे-दो घन्टे सुबह-शाम या पिफ़र केवल सुबह के समय या पिफ़र सिपफ़र् शाम को ऑक्सीजन चैम्बर का मशविरा भी देने लगेंगें। यह निरी कल्पना नही है बल्कि जिस प्रकार से हम अपने वायुमण्डल को दूषित होने के प्रति सजग नही हैं, उस स्थिति में जिन्दा रहने के लिए हमें ऑक्सीजन तो किसी ना किसी रूप में लेनी ही होगी। हो भी सकता है कि भविष्य में जब आप डॉक्टर के यहां जाएं तब वह यह भी कहे कि आप की कौन से सैल्स में ऑक्सीजन की मात्र कापफ़ी कम है, बेहतर होगा कि आप ऑक्सीजन चैम्बर में जाकर ऑक्सीजन लें। पिफ़लहाल हमें केवल पैसा और बस पैसा इकट्ठा करने की ही हवस लगी हुई है। इसी पैसे से तमाम सुविधाओं के साथ हमें या फिर हमारी पीढ़ियों ने कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी, उसकी हमने कल्पना भी नहीं की है।
बहरहाल पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान एवं इलैक्ट्रॉनिक कचरे के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए आरम्भ की गई ‘चेतना यात्र-6’ को ‘ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग चेतना यात्र-6’ नाम दिया गया है। ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग से अभिप्राय है कि समूची ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री इस अभियान में पूर्ण ईमानदारी के साथ लोगों में जागरूकता लाने के लिए एक जुट होकर योगदान करें, क्योंकि यह इण्डष्ट्री मीडिया की सशक्त भूमिका में बहुत प्रभावशाली बन गई है। प्रिन्ट मीडिया के मुकाबले में इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जनमानस को ज्यादा प्रभावित करता है, अतः समूची मानव जाति की रक्षार्थ मिीडया की भूमिका एक बड़ा बदलाव ला सकती है। ब्रॉडकास्टर से लेकर लास्टमाईल ऑपरेटर तक समस्त कड़ियां इस पर कुछ ना कुछ योगदान करें तो निश्चित ही आम जनमानस में बड़ी जागरूकता लाई जा सकती है।
भिन्न समाचार चैनलों का इस मामले में योगदान नहीं मिल सका, शायद समूची मानव जाति पर मण्डरा रहे खतरे की घन्टी के मुकाबले में खान-क्रिकेट-मुन्नी बदनाम हुई कॉमनवैल्थ गेम्स, डेंगू या पिफ़र बाढ़ से डराने का सिलसिला ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि ब्रॉडकास्टर को ऐसी चेतना यात्र के लिए प्रायोजक भी मिल सकते थे, लेकिन अभी उनके लिए ग्लोबल वार्मिंर्ग से भी ज्यादा जरूरी शायद अन्य मामले रहे होंगे। ‘ग्रीन ब्रॉडकस्टिंग चेतना यात्र-6’ की शुरूआत देश के प्रथम हिन्दी मनोरंजन चैनल जी टीवी के सहयोगी, हिन्दी भाषी क्षेत्रें में सर्वाधिक देखे जाने वाले समाचार चैनल ‘जी न्यूज’ ने प्रसारित कर हौसला अफजाई की। 5 सितम्बर से 31 अक्टूबर तक देश के करोड़ों लोगों तक ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता के सन्देश पहुंचाने के लिए चेतना यात्र-6 दिल्ली से भिवानी पहुंची।
ग्लोबल वार्मिंग पर चेतना यात्र भिवानी पत्रकारों के लिए अनेक प्रश्न लिए हुई थी, जबकि भिवानी व नजदीकी क्षेत्रें से आए केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग सवाल बना हुआ था, तमाम प्रश्नों के उत्तर मिल जाने पर बात इण्डष्ट्री के भविष्य की ओर बढ़ गई, तब इण्डष्ट्री में होने वाली उथल-पुथल व भावी सम्भावनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सबकी सन्तुष्टि हुई। भिवानी में वृक्षारोपड़ भी किया गया, तत्पश्चात यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ गई। अगला पड़ाव हरियाणा से निकल कर राजस्थान के बीकानेर में होना था। भिवानी से बीकानेर तक का सफर कुछ लम्बा रहा, लेकिन हरियाली से रेगिस्तान की ओर जाने का भी अनुभव हुआ। भिवानी से चल कर हरियाणा राजस्थान सीमा पर हरियाणा के आखिरी कस्बे बहल के केबल टीवी ऑपरेटर को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने का सन्देश देते हुए राजस्थान की सीमा में प्रवेश किया चेतना यात्र ने।
राजस्थान में केबल टीवी व्यवसाय में खासा बदलाव देखने को मिला। झुंझनू, सीकर,चुरू आदि अनेक कस्बों में केबल टीवी का संचालन तकरीबन एक ही जगह से होता है। छोटे-छोटे कस्बों में छोटे-छोटे नेटवर्क लगे हुए हैं। यात्र जैसे-जैसे आगे बढ़ती रही हरियाली उतनी ही दूर होती रही। बीकानेर तक पहुंचते-पहुंचते सारा क्षेत्र मरूस्थल नजर आने लगा। ऐसे क्षेत्र में हरियाली के लिए दुबई से प्रेरणा लेकर ही राजस्थान सरकार चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन सरकारों के लिए ऐसे कार्य प्राथमिकता पर नहीं हुआ करते हैं। इन क्षेत्रें में केबल टीवी ऑपरेटरों का स्थान निजी कर्मचारियों ने ले लिया है अतः उनसे यात्र में किसी सहयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। भिवानी से बीकानेर और पिफ़र बीकानेर से श्रीगंगानगर तक की यात्र ने पूर्णरूप से रेगिस्तान थकावट को हर लिया। मुस्कान केबल के मनोज द्वारा ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के प्रयासों का आश्वासन लेकर यात्र भटिण्डा के लिए रवाना हो गई।
राजस्थान में केबल टीवी में संलग्न लोगों से अपील की गई कि वह अपनी खराब केबल कबाड़ियों को ना बेचें, क्योंकि कबाड़ी केबल में से कापर-धातु निकालने के लिए उन्हें खुले में जलाते हैं, जिससे जहरीली गैसें निकल कर वायुमण्डल में मिलती हैं। वायुमण्डल को प्रदूषित ना होने दें व ना ही वह ऐसा कोई काम करें जिसके कारण वायुमण्डल प्रदूषित हो। बीकानेर से पंजाब की ओर बढ़ती यात्र में राजस्थान का हरियाणा पंजाब सीमा पर स्थित कस्बा श्री गंगानगर हरा-भरा समृद्ध व राजस्थान में होते हुए भी राजस्थान से भिन्न लगा। गंगानगर पर राजस्थान से ज्यादा हरियाणा और पंजाब का प्रभाव दिखाई देता है। इस मार्ग से खुशहाल पंजाब के प्रमुख शहर भटिण्डा पहुंचने पर यात्र का भव्य स्वागत हुआ। सर्वप्रथम तो भटिन्डा का आमन्त्रण पफ़ूड कोर्ट यात्र के स्वागत की प्रतीक्षा में मिला। दरअसल भटिण्डा में नया-नया शुरू हुआ मित्तल माल का प्रमुख आकर्षण बना।
आमंत्रण पफ़ूड कोर्ट माल में आने वाले हर किसी को आकर्षित करता है। इसी आमन्त्रण ने चेतना यात्र-6 को भी निमन्त्रित किया एवं ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने व प्रदूषण को रोकने के लिए यथासम्भव योगदान का आश्वासन दिया। आमन्त्रण में आने वाले तमाम ग्राहकों को भी ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता अभियान में सहयोग देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। भटिण्डा में मदन जिन्दल आदि के साथ वृक्षारोपड़ भी किया गया। वृक्षारोपड़ कार्यक्रम के बाद मोगा के रास्ते यात्र लुधियाना पहुंची। पफ़ास्टवे मीडिया ग्रुप द्वारा लुधियाना में यात्र के भव्य स्वागत सहित वृक्षारोपड़ एवं मीडिया कवरेज के द्वारा पूरे पंजाब में यात्र का सन्देश पहुंचाया गया। लुधियाना के बाद चेतना यात्र जालन्धर पहुंची, जहां दर्शन कपूर आदि यात्र के स्वागत में तत्पर मिले।
रात्रि विश्राम जालन्धर में कर दिन में वहां के प्रमुख उद्योगपति शीतल विज जी के साथ भेंटवार्ता में कापफ़ी सकारात्मक आशाएं लिए यात्र अमृतसर पहुंची। अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर दर्शन कर जालियांवाला बाग की स्मृतियों का अनुभव किया। अमृतसर में ही रात्रि विश्राम कर अगले दिन वहां भी वृक्ष लगाए, ग्लोबल वार्मिंग के प्रति की जा रही यात्र को जलियांवाला बाग के शहीदों को समर्पित करते हुए। अमृतसर में वृक्षारोपड़ का बन्दोबस्त राजूभाई के निर्देशन में बब्बी भाई के द्वारा किया गया। अमृतसर से यात्र जम्मू पहुंची, जहां सुभाष चौधरी के साथ दिल्ली से पधारे इंडष्ट्री के कई अन्य प्रमुख ब्रॉडकास्टिंग एण्ड चैनल डिस्ट्रीब्यूशन में संलग्न लोगाें ने भी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। सभी ने प्राथमिकता के साथ यात्र में सहभागी बन वृक्षारोपड़ में भी सहयोग दिया। एक प्रकार से इस यात्र का जम्मू ही एक ऐसा पड़ाव रहा जहां वास्तव में ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री के लोग एक साथ मौजूद रहे। जम्मू से गुदगुदाती स्मृतियों के साथ सबसे विदाई लेकर पठानकोट के रास्ते नूरपुर होते हुए सीधे पहुंची यात्र। डलहौजी की प्राकृतिक सौन्दर्यता से भी ज्यादा स्वास्थ्य वर्धक प्राकृतिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध ‘खाज्जियार’ पहुंच विश्राम किया, जबकि वृक्षारोपण की यहां कोई गुंजाईश नहीं दिखाई दी। देवदार के घने वन और उनकी महक जादू सा असर कर रही थी, लेकिन चेतना यात्र-6 को तो आगे ही बढ़ते रहना है, इसलिए भारत का स्विट्जरलैण्ड कहे जाने वाले खज्जियार से रवाना होकर चम्बा की ओर बढ़ी यात्र। यहां यह उल्लेख किया जाना जरूरी है कि जम्मू के बाद पठानकोट होकर नूरपुर से डलहौजी,खज्जियार,सुल्तानपुर,चम्बा से मैक्लोरगंज के मार्ग में ऐसे तमाम पहाड़ दिखाई दिए जो बिल्कुल नंगे हो चुके हैं। बिना हरियाली के वह पहाड़ दीमक की बड़ी बाम्बी जैसे प्रतीत होते हैं। उन पहाड़ों की स्थिति भविष्य पर मण्डरा रहा खतरा दर्शाती है। घने वन भी पहाड़ों की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन इन्ही घने वनों के बीच-बीच में उन नंगे हो चुके पहाड़ों की स्थिति चिंताजनक है। खज्जियार में डलहौजी पब्लिक स्कूल की छात्रओं के साथ ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता अभियान का सन्देश देते हुए यात्र चम्बा की ओर बढ़ी।
इस पूरे मार्ग पर रास्ता ढ़लाव वाला ज्यादा रहा, अतः खज्जियार से उतरते हुए गाड़ी के अगले पहियों में से रबड़ जलने की बदबू के साथ पहिये गर्म होने लगे हैं। लगातार घुमावदार ढ़लाव मार्गों से गुजरते हुए सबसे बड़ा खतरा गाड़ी के ब्रेक पफ़ेल होने का लगा हुआ था, लेकिन दूर तलक कोई ऐसा साधन नही था जहां इलाज सम्भव हो। इसी स्थिति में गाड़ी को चम्बा तक ले जाना विवशता थी, अतः बहुत ही सावधानी के साथ गाड़ी को धीमी गति पर चलाते हुए किसी तरह रास्ता पूर्ण कर चम्बा से सटे सुल्तानपुर तक पहुंचाया गया, वहां गाड़ी ठीक करवाकर ऐतिहासिक देवभूमि चम्बा पहुंची यात्र। वहां श्री आशाराम जी के प्रवचन चल रहे थे, पूर्णतया छुट्टी का माहौल बना हुआ था चम्बा में। चम्बा के केबल टीवी ऑपरेटरों को इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं के साथ-साथ इन नंगें पहाड़ों के प्रति भी आगाह कर यात्र धर्मशाला के लिए आगे बढ़ी।
धर्मशाला की ऊंचाईयों को पार कर यात्र दलाई-लामा नगरी मैक्लोटगंज पहुंची। हिमाचल प्रदेश के अन्य शहरों से बिल्कुल ही अलग दिखाई दिया मैक्लोटगंज। यहां विदेशी सैलानियों की भारी मौजूदगी बहुत कुछ बयान कर रही थी। इतनी भारी संख्या में यहां पहुंचने वाले विदेशी सैलानियों का दलाईलामा भक्त होना कारण नहीं है, उनकी पूजा-पाठ, सभ्यता-संस्कृति जानने की जिज्ञासा तो हमें भी रही, लेकिन वहां पहुंचने वाले सभी विदेशी पर्यटकों का आकर्षण लामा जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी है ऐसा प्रतीत हुआ। मैक्लोटगंज में लामा की दिनचर्या, मठ, मन्दिर पूजा खान-पान के दर्शन कर यात्र बिलासपुर पहुंची। पूर्वयात्र में बिलासपुर के जिस गांधीसागर डैम का जिक्र हमने एक सूखी बरसाती नदी की भांति किया था, वह डैम अब पानी से लबालब भरा मिला। निरन्तर बारिस में यात्र आगे बढ़ रही है, लेकिन कई जगह पहाड़ गिरे हुए और उनका मलबा हटाने के काम में लगे लोग दिखाई देते हैं।
बिलासपुर से शिमला पहुंच वहां के ऑपरेटरों एस-एन-खन्ना एवं मुकेश मल्होत्र के साथ पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान के प्रति जागरूकता अभियान में सहभागिता करने के साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर भी लम्बी चर्चा हुई, तत्पश्चात शिमला से सोलन पहुंची चेतना यात्र। सोलन से आगे का रास्ता हरियाणा में अम्बाला यमुनानगर से सहारनपुर का पूर्व नियोजित था लेकिन बाढ़ के पानी के कारण अवरूद्ध हो चुके उस मार्ग को बदलना पड़ा। सोलन से पंचकुला पहुंच राजेश मलिक व चण्डीगढ़ में मनमोहन सिंह बाजवा एवं टीम के साथ यात्र का मकसद शेयर कर यात्र नाहान-पौन्टा साहिब मार्ग से देवभूमि उत्तराखण्ड देहरादून पहुंची। देहरादून के मार्ग में भी पौन्टा साहब से पूर्व भूस्खलन के कारण घन्टों मार्ग अवरूद्ध रहा।
वायस ऑपफ़ नेशन (टव्छ) चैनल प्रमुख मनीष वर्मा द्वारा यात्र के देहरादून पहुंचने पर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करते हुए सीधा प्रसारण भी किया गया। टव्छ चैनल के समस्त कर्मचारियों के स्वागत सत्कार के बाद चेतना यात्र-6 पर चैनल द्वारा लिया गया साक्षात्कार भी सीधे प्रसारित किया गया। देहरादून में यात्र वायस ऑपफ़ नेशन चैनल की मेहमान नवाजी में रही। देहरादून से आगे के सपफ़र पर चलने से पहले गाड़ी की पूर्णतया मरम्मत का कार्य करवाया गया, इस कार्य में सारा दिन ही बीत गया, अतः गाड़ी ठीक करवाने के बाद देहरादून से रवाना होकर हरिद्वार ही पहुंच सकी यात्र। हालांकि टैन स्पोटर्स द्वारा आयोजित देहरादून पार्टी का निमन्त्रण भी मिला, जहां इस क्षेत्र के बहुत सारे ऑपरेटरों के साथ एक ही स्थान पर भेंट का अवसर था, लेकिन पूर्व नियोजित कार्यक्रमानुसार यात्र का ठहरना बहुत कठिन है।
हरिद्वार में कैप्टन गुप्ता एवं हरीश मल्होत्र आदि के साथ ग्लोबल वार्मिंग पर्यावरण सम्बन्धित जागरूकता पर लम्बी चर्चा के साथ-साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर जानकारी देकर यात्र अगले पड़ाव बिजनौर पहुंची। बिजनौर में बिजनौर जिले के भिन्न क्षेत्रें के ऑपरेटरों से एक स्थान पर ही बैठक हो गई। उन्हें पर्यावरण को स्वच्छ रखने एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी पर लगने वाले प्रश्न चिह्न के प्रति आम जनमानस में जागरूकता लाने के लिए विशेष अभियान चलाने का आह्वाहन कर स्यौहाराकांठ मार्ग से यात्र मुरादाबाद पहुंची। मुरादाबाद बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य वकीलों, भिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं एव प्रैस क्लब मुरादाबाद के साथियों को पृथ्वी पर बढ़ते जा रहे खतरे के प्रति आगाह करते हुए समूची मानव जाति की सुरक्षार्थ हर शख्स को इसके लिए अपनी योगदान देने का आग्रह किया। इलैक्ट्रानिक कचरे के कारण वायुमण्डल में बढ़ते जा रहे प्रदूषण के बारे में जानकारी दी गई एवं वहां वृक्षारोपड़ का कार्यक्रम भी किया गया। मुरादाबाद बार एसोसिएशन के साथ-साथ केबल टीवी ऑपरेटर पिफ़रासत खां एवं प्रैस क्लब के सदस्यों से भी आग्रह किया गया कि इस अभियान में वह एकजुट होकर प्राथमिकता पर कार्य करें।
मुरादाबाद से विदाई लेकर यात्र नैनीताल की ओर बढ़ी, लेकिन इस क्षेत्र में प्राकृतिक तबाही बाढ़ के रूप में कहर बरपा रही है। मुख्य मार्गों पर बाढ़ का पानी भर गया है। आगे बढ़ते रहना सम्भव नहीं रह गया है, नैनिताल के लिए सभी मार्ग बंद हो चुके हैं, अतः मुरादाबाद से रवाना होकर बाढ़ के पानी को देखने वाले लोगों के हुजूम से निकलते हुए बाजपुर तक ही पहुंच सकी यात्र। बाजपुर में बाढ़ के पानी ने आगे का रास्ता रोक दिया अतः रूद्रपुर के रास्ते यात्र नैनीताल के लिए बढ़ी। रूद्रपुर में भी बाढ़ के पानी ने सड़कों को डुबो लिया अतः आगे बढ़ने की कोई गुंजाईश नहीं रही। रात्रि विश्राम रूद्रपुर में ही किया गया।
मुरादाबाद हरिद्वार,बिजनौर,रामनगर, अल्मोड़ा, हरिद्वार, श्रषिकेश, काशीपुर, नैनीताल, हल्द्वानी आदि सभी क्षेत्रें में निरन्तर बारिस के कारण बाढ़ के पानी ने लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। कोशी-राम गंगा आदि अनेक नदियों ने विकराल रूप धारण किया हुआ है, जबकि अल्मोड़ा में बादल पफ़टने से जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। बरेली-रूद्रपुर, रामपुर, मुरादाबाद सहित दिल्ली,लखनऊ राजमार्ग भी बन्द हो गया है। स्थिति पूर्णतया बाढ़ ग्रस्त है, इसलिए रूद्रपुर से आगे की स्थिति का पूर्वानुमान अभी नहीं लगाया जा सकता है।
‘ग्रीन ब्रॉडकस्टिंग चेतना यात्र-6’ की शुरूआत देश के प्रथम हिन्दी मनोरंजन चैनल जी टीवी के सहयोगी, हिन्दी भाषी क्षेत्रें में सर्वाधिक देखे जाने वाले समाचार चैनल ‘जी न्यूज’ ने प्रसारित कर हौसला अफजाई की। 5 सितम्बर से 31 अक्टूबर तक देश के करोड़ों लोगों तक ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता के सन्देश पहुंचाने के लिए चेतना यात्र-6 दिल्ली से भिवानी पहुंची। ग्लोबल वार्मिंग पर चेतना यात्र भिवानी पत्रकारों के लिए अनेक प्रश्न लिए हुई थी, जबकि भिवानी व नजदीकी क्षेत्रें से आए केबल टीवी ऑपरेटरों के लिए ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग सवाल बना हुआ था, तमाम प्रश्नों के उत्तर मिल जाने पर बात इण्डष्ट्री के भविष्य की ओर बढ़ गई, तब इण्डष्ट्री में होने वाली उथल-पुथल व भावी सम्भावनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सबकी सन्तुष्टि हुई।

बीकानेर तक पहुंचते- पहुंचते सारा क्षेत्र मरूस्थल नजर आने लगा। ऐसे क्षेत्र में हरियाली के लिए दुबई से प्रेरणा लेकर ही राजस्थान सरकार चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन सरकारों के लिए ऐसे कार्य प्राथमिकता पर नहीं हुआ करते हैं। इन क्षेत्रें में केबल टीवी ऑपरेटरों का स्थान निजी कर्मचारियों ने ले लिया है अतः उनसे यात्र में किसी सहयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

देवदार के घने वन और उनकी महक जादू सा असर कर रही थी, लेकिन चेतना यात्र-6 को तो आगे ही बढ़ते रहना है, इसलिए भारत का स्विट्जरलैण्ड कहे जाने वाले खज्जियार से रवाना होकर चम्बा की ओर बढ़ी यात्र। यहां यह उल्लेख किया जाना जरूरी है कि जम्मू के बाद पठानकोट होकर नूरपुर से डलहौजी, खज्जियार, सुल्तानपुर, चम्बा से मैक्लोरगंज के मार्ग में ऐसे तमाम पहाड़ दिखाई दिए जो बिल्कुल नंगे हो चुके हैं। बिना हरियाली के वह पहाड़ दीमक की बड़ी बाम्बी जैसे प्रतीत होते हैं। उन पहाड़ों की स्थिति भविष्य पर मण्डरा रहा खतरा दर्शाती है। घने वन भी पहाड़ों की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन इन्ही घने वनों के बीच-बीच में उन नंगे हो चुके पहाड़ों की स्थिति चिंताजनक है।

हिमाचल प्रदेश के अन्य शहरों से बिल्कुल ही अलग दिखाई दिया मैक्लोटगंज। यहां विदेशी सैलानियों की भारी मौजूदगी बहुत कुछ बयान कर रही थी। इतनी भारी संख्या में यहां पहुंचने वाले विदेशी सैलानियों का दलाईलामा भक्त होना कारण नहीं है, उनकी पूजा-पाठ, सभ्यता-संस्कृति जानने की जिज्ञासा तो हमें भी रही, लेकिन वहां पहुंचने वाले सभी विदेशी पर्यटकों का आकर्षण लामा जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी है ऐसा प्रतीत हुआ। मैक्लोटगंज में लामा की दिनचर्या, मठ, मन्दिर पूजा खान-पान के दर्शन कर यात्र बिलासपुर पहुंची।

‘चेतना यात्रा-6’ (भाग-दो) रुद्रपुर से कानपुर तक
ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग चेतना यात्र-6 पर अपनी इंडष्ट्री से जुडे अधिकांश लोगों के साथ-साथ अन्य लोग भी पूछ लिया करते हैं ें कि भाई चेतना यात्र-6 तो समझ में आता है लेकिन यह ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग का क्या मतलब है\ ब्रॉडकस्टिंग एण्ड केबल टीवी उद्योग से जुड़े लोगाें के सहयोग से समूची मानव जाति को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक करने के इस अभियान को ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग नाम दिया गया है। यही इस चेतना यात्र में किया भी जा रहा है। अभी तक की यात्र में दिल्ली से लेकर रूद्रपुर तक जितने भी कार्यक्रम हुए वह सभी ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी उद्योग में संलग्न व्यक्तियों के विशेष योगदान के कारण ही हो पाए हैं। मुरादाबाद में वरिष्ठ वकीलों के सानिध्य में आयोजित बार कौंसिल मुरादाबाद का आयोजन एक ऐसा उदाहरण है, जिसे स्वयं आर्गेनाईज कर पाना सम्भव ही नहीं था, लेकिन मुरादाबाद में केबल टीवी की कमान सम्भाल रहे पिफ़रासत खान के प्रयासों से बार कौंसिल में चेतना यात्र-6 के भव्य स्वागत सत्कार के बाद-वृक्षारोपड़ भी किया गया। हमें पूरी उम्मीद है पिफ़र मुरादाबाद बार कौसिल में रोपे गए पौधे चेतना यात्र का इतिहास बनेंगे।
बाढ़ की आशंकाओं के साथ-साथ यात्र रूद्रपुर पहुंची क्योंकि भूस्खलन और निरन्तर बारिस के चलते नैनीताल जाने के सभी रास्ते
पूर्णतया बन्द हो चुके थे। स्वयं नदीम बाबी भाई नैनीताल से बाहर होने के कारण अचानक आए प्राकृतिक बदलाव के कारण नैनीताल पहुंचने की मशक्कत कर रहे थे। रूद्रपुर में बाढ़ की विभीषिका की खबरें मिल रही थीं। टैलिविजनों पर भिन्न समाचार चैनलों द्वारा प्रसारित खबरों में पूरा पफ़ोकस बाढ़ की विनाशलीला पर ही था। रामगंगा की कोशी का विकराल रूप लोगों को भयभीत किए था जबकि कालागढ़ बांध भी भयानक हो गया था, गंगा अपने साथ हरिद्वार की विशाल शिवमूर्ति ही वहीं ले गई जबकि टिहरी बांध ओवरफ्रलो की स्थिति को छूने लगा था, उधर यमराज की बहन यमुना शान्त होने का नाम ही नहीं ले रहीं थी, पिफ़र एक बार 7-44 लाख क्युसेक पानी हथिनीकुण्ड से छोड़ा जा चुका था।
हरियाणा के तमाम जिलों सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बाढ़ का प्रकोप जनता-जनार्दन को डरा रहा था। तमाम मवेशी बाढ़ में बह गए तो तैयार खड़ी पफ़सल पूर्णतया बहा ले गई बाढ़।
चार धाम की यात्र रूक गई, यहां-वहां यात्री फंस गए। पहाड़ों का गिरना, सड़कों का धंसना जारी था। खबरें लोगों को डरा रहीं थीं। क्या-पहाड़ या क्या प्लेन सारा पानी मय हो गया। मुरादाबाद-रामनगर, बिजनौर, बाजपुर, रामपुर, हरिद्वार, ऋषिकेश सभी क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ गए। कार्बेट पार्क के जीव-जन्तुओं पर पानी का कहर बरपा रही तो उसके बाहर बनी कई पांच सितारा रिसोर्ट् बाढ़ मेें बह गई। चार हाथियों के बाढ़ में बह जाने की खबरें भी आई।
प्रकृति में हो रहे बदलाव की यह तस्वीरें एक नया इतिहास रचने की दिशा में बढ़ने लगी। कहा जा रहा है कि ऐसी बारिस और बाढ़ ने 140 साल का रिकॉर्ड तोड़ा है जबकि दिल्ली को डुबो रही यमुना भी अपना नया रिकॉर्ड दर्ज कर रही है। प्रकृति का यह प्रकोप अभी थमा नहीं है, लेकिन सत्ताधीशों के दौरे , घड़ियाली आंसू और सरकारी खजाने की लूट-खसोट शुरू हो चुकी है। उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य में हुई क्षति के लिए केन्द्रीय सरकार से कुछ हजार करोड़ की मदद की गुहार लगाई है। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश की माया मेमसाहब ने भी केन्द्रीय सरकार से भारी राशि की मदद मांगी है। क्षेत्रें के हवाई-दौरे शुरू हो गए हैं। राहत कार्याें के दावे जोर-शोर से किए जा रहे हैं। यात्र रूद्रपुर से बरेली होते हुए शाहजहांपुर पहुंची। बरेली भी बाढ़ की आशंकाओं में डूबा मिला, लेकिन केबल टीवी कम्युनिटी को ग्रीन सन्देश देते हुए यात्र का शाहजहांपुर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया। शाहजहांपुर में भी बाढ़ का भय स्पष्ट दिखाई दिया। रात्रि विश्राम के बाद हरदोई मार्ग
उत्तराखण्ड का हरेक मार्ग प्रकृति के प्रकोप से प्रभावित हो गया। से सीतापुर होते हुए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहच गई यात्र। लखनऊ में बाढ़ से ज्यादा 24 सितम्बर के खतरे से भयभीत दिखाई दिए लोग। रामजन्मभूमि विवाद पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद में चल रहे वर्षाें पुराने मुकदमे पर फैसला सुनाए जाने की घोषणा के बाद से समाचारों में विशेष सुरक्षा बन्दोबस्त का ऐसा वातावरण तैयार किया जा रहा है जैसे कि देशभर में भारी दंगे होने वाले है। आम आदमी एक ओर तो प्रकृति के प्रकोप की ही मार झेल रहा है तिस पर आप्रकृतिक आशंकाओं के बादल छाने लगे हैं। समाचार चैनलों द्वारा इस सन्दर्भ में अमन-शान्ति के नाम पर जिस प्रकार से विशिष्ट वाद-विवाद कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा रहा है, उसे देखते हुए प्रशासनिक सतर्कता बढ़ाए जाने के कारण आम आदमियों में दहशत बढ़ती जा रही है।
विशेष पफ़ोर्स की गस्त आम आदमी की अटकलों को पुख्ता किए दे रही है, कि वास्तव में ही यदि दंगों की आशंकाएं नहीं होती तब विशेष पफ़ोर्स को बुलाने पर उनके गस्त लगाने की जरूरत ही ना होती, शायद दंगे होंगे और बड़े पैमाने पर आयोजित हो, इसी को देखते हुए ऐसी तैयारियां भी की जा रही है।। लखनऊ के शान्त वातावरण में अब रहस्यमय चुप्पी सी व्याप्त दिखाई दे रही है। यात्र का सन्देश देते हुए लखनऊ से कानपुर पहुंची यात्र, लेकिन कानपुर की स्थिति भी लखनऊ से अलग नहीं थी। कानपुर में भी रैपिड एक्सन पफ़ोर्स कापफ़ी संख्या में अपनी जिम्मेदारी सम्भाले हुए थी। 24 सितम्बर को क्या होगा को लेकर जितने मुंह उतनी ही बातें थीं, लेकिन गणेशोत्सव का विसर्जन उत्सव बड़े गाजे-बाजे के साथ हरेक चौराहों प्रमुख मार्गाें पर दिखाई दिया।
कानपुर में बाढ़ से ज्यादा ध्यान 24 सितम्बर पर अटका दिखा। ग्लोबल वार्मिंग पर ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी कम्युनिटी की जिम्मेदारी के प्रति भिन्न-भिन्न बैठकें हुई। यात्र के सन्देश के साथ- साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर अगर-मगर, किन्तु-परन्तु पर भी चर्चाएँ की गई।
कानपुर में ही जानकारी मिली कि 24 सितम्बर की मुसीबत टल गई है, क्योंकि माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा इस मामले में एक अपील स्वीकार कर ली है, जिस पर 28 सितम्बर को सुनवाई होगी, अतः पिफ़लहाल 28 सितम्बर तक के लिए मामला टाल दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के रूख से देशवासियों को बड़ी राहत मिली है अन्यथा जिस प्रकार से देशभर में दंगों की सम्भावनाओं को लेकर दहशत का वातावरण बना हुआ था उसके परिणाम कुछ भी हो सकते थे।
प्राकृतिक आपदा के तौर पर बाढ़-बारिस की तबाही की खबरों के बीच दिल्ली में होने वाले कॉमनवैल्थ गेम्स की दुर्दशा के समाचारों ने भी देशवासियों का दुनिया के सम्मुख शर्मिन्दा होने का डर सताता प्रतीत हो रहा है। वहां भी तमाम अटकलों का बाजार गर्म है। एक के बाद एक-एक करके तमाम खामियां गेम्स आयोजन पर बट्टा लगा रही है। गेम्स शुरू होने में अब कुछ घन्टे बचे हैं जबकि तैयारियों के लिए अभी भी लम्बा समय लग सकता है। गेम्स के आयोजन से पूर्व ही दिल्ली में आतंकवादी घटना को भी अंजाम दे दिया गया है जबकि गंदगी-बीमारी और अनियमितताओं से भरी तमाम खामियां तो शार्मिदा कर ही रही हैं। दुनिया के सम्मुख भ्रष्टाचार के एक नए कीर्तिमान के रूप में दर्ज हो चुके इस आयोजन पर पैरवी के लिए अब प्रधानमंत्री भी आगे आए हैं, लेकिन रोजाना नई-नई खबरें-खुलासे देशवासियों को शर्मिंदा किए दे रहे हैं।
लखनऊ के शान्त वातावरण में अब रहस्यमय चुप्पी सी व्याप्त दिखाई दे रही है। यात्र का सन्देश देते हुए लखनऊ से कानपुर पहुंची यात्र, लेकिन कानपुर की स्थिति भी लखनऊ से अलग नहीं थी। कानपुर में भी रैपिड एक्सन पफ़ोर्स कापफ़ी संख्या में अपनी जिम्मेदारी सम्भाले हुए थी। 24 सितम्बर को क्या होगा को लेकर जितने मुंह उतनी ही बातें थीं, लेकिन गणेशोत्सव का विसर्जन उत्सव बड़े गाजे-बाजे के साथ हरेक चौराहों प्रमुख मार्गाें पर दिखाई दिया।
कानपुर में बाढ़ से ज्यादा ध्यान 24 सितम्बर पर अटका दिखा। ग्लोबल वार्मिंग पर ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी कम्युनिटी की जिम्मेदारी के प्रति भिन्न-भिन्न बैठकें हुई। यात्र के सन्देश के साथ- साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर अगर-मगर, किन्तु- परन्तु पर भी चर्चाएँ की गई।

(23 सितम्बर से 8 अक्टूबर) - (भाग तृतीय) ग्वालियर से आगे भोपाल के रास्ते नागपुर
अयोध्या मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले को लेकर यूं तो सारे देश में ही तनाव का वातावरण बना हुआ था, लेकिन उ-प्र- की राजधानी लखनऊ में जिस प्रकार से रैपिड एक्सन पफ़ोर्स सहित अन्य सुरक्षाबलों की विशेष टुकड़ियां शहर में मार्च करती दिखाई दे रही थीं, उन्हें देखकर नवाबों के शहर में अजीब-सा सन्नाटा व्याप्त था। लखनऊ में उड़ती-उड़ती खबरें मिल रही थीं कि 23 तारीख की मध्य रात्रि से ही यहां कफ्रर्यू लगाया जा सकता है। लेकिन इसी दरमियान इस पफ़ैसले को लेकर एक याचिका कर्ता देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुका था। माननीय उच्चतम् न्यायालय में उस याचिका पर 28 सितम्बर को सुनवाई का निर्णय ले लिया, और तब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के पफ़ैसले पर रोक लगाए जाने से 24 सितम्बर को लेकर बढ़ते जा रहे तनाव में कापफ़ी राहत देखने को मिली। लखनऊ से कानपुर और पिफ़र कानपुर से आगरा के लिए रवाना हो गई यात्र। कानपुर में पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों से निबट कर जब कानपुर से आगरा के लिए यात्र बढ़ी तब इटावा में यात्र का गर्मजोशी से स्वागत हुआ। इटावा-मैनपुरी अब अपराध उद्योग से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन एक समय था कि इस क्षेत्र में डकैती अपहरण जैसे अपराध उद्योग बन गए थे। इटावा से शिकोहाबाद होते हुए पिफ़रोजाबाद ऑपरेटरों के साथ पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान पर चर्चा कर आगरा रवाना होने से पूर्व पिफ़रोजाबाद की प्रसिद्ध चूड़ियां भी खरीदीं। पिफ़रोजाबाद-शिकोहाबाद या इटावा जैसे शहर भी यह तो जानते हैं कि केबल टीवी को एनालाग से डिजीटल पर ले जाने की कोशिशें की जा रही हैं परन्तु वह आपरेटर ये कैसे करें उनकी समझ से परे है व ना ही हम उनके सवालों का पिफ़लहाल कोई उत्तर ढूंढ पा रहे हैं। रात्रिविश्राम आगरा में हुआ, यहां विदेशी सैलानियों की संख्या में कोई कमी नहीं दिखी, लेकिन 24 सितम्बर को लेकर हर एक होटल पर प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया।
आगरा 24 सितम्बर की दहशत से मुक्त दिखाई दिया क्योंकि उच्चतम न्यायालय में इस सन्दर्भ में आई एक याचिका पर 28 सितम्बर को सुनवाई होगी तत्पश्चात ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय कोई पफ़ैसला दे पाएगा। आगरा में वृक्षारोपण कार्यक्रम सहित मीडिया से भी रूबरू होकर ग्लोबल विार्मंग के प्रति जागरूकता कार्यक्रम रखा गया। आगरा में नीरजवहीं आगरा में पढ़ाई के दौर के सहपाठी पारस जैन ने भी कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा योगदान किया। आगरा तक पहुंचते-पहुंचते दिल्ली से लेकर चले कापफ़ी सामग्री खत्म होने के कगार तक पहुंच चुकी थी एवं डिजीकेबल द्वारा भेजी गई सामग्री भी अभी तक नहीं मिल सकी थी। अतः वह सब देने के लिए दिल्ली से दूसरी गाड़ी भी आगरा पहुंची। सभी सामग्री प्राप्त कर आगरा कार्यक्रम निबटा कर यात्र ग्वालियर की ओर बढ़ चली। दिल्ली से चला यमुना का पानी अब तक आगरा पहुंचने लगा था, यमुना जी ताज महल की पिछली ओर ताज को छूते बह रही थीं, जिसे देखने वालों की आगरा में भी भीड़ उमड़ी हुई थी।
भिण्ड-मुरैना के बीहड़ाें से गुजरते हुए यात्र ग्वालियर पहुंच गई। रात्रि में ही वहां अशोक पमनानी जी के बोस श्री एस-एल-राठौर प्रमुख ज्ञडश्र न्यूज से भेंट हुई, उन्होने बहुत ही गर्मजोशी से यात्र का स्वागत कर ज्ञडश्र न्यूज पर साक्षात्कार प्रसारित किया। रात्रि विश्राम के सुबह ज्ञडश्र न्यूज में पुष्प मालाओं से लाद दिया गया। मीडिया कवरेज के बाद वृक्षारोपण कार्यक्रम भी रखा गया एवं यात्र को विदा करते हुए माननीय राठौर जी ने 21000 रुपये की राशि सम्मान स्वरूप भेंट की। तत्पश्चात यात्र शिवपुरी के लिए रवाना हो गई। रास्ते में घाटी गांव व मोहाना के ऑपरेटरों से भेंट करते हुए शिवपुरी पहुंचे। शिवपुरी में वृक्षारोपण किया गया एवं पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान पर लोगों का ध्यान खींचते हुए इसे रोकने में योगदान देने पर चर्चा की गई। ग्वालियर से आगे की यात्र में स्वयं अशोक पमनानी यात्र के सहचर बन गए।
शिवपुरी से गुना के लिए बढ़ चली यात्र एवं गुना के बीच पड़ने वाले कस्बों में केबल कर्मियों से भेंट करते हुए रात्रि विश्राम गुना में ही किया, लेकिन गुना पहुंचते-पंहुचते ग्वालियर से गुना के बीच हाइवे की सड़के मध्यप्रदेश की बदहाली पर आंसू बहा रही थीं। गाड़ी के दो टायर गुना तक दम तोड़ बैठे। दोनाें ही टायरों में सैप्रेशन आ गया और उनमें से एक टायर बस्ट भी हो गया, जबकि दिल्ली से चलते वक्त चारों टायर नए डलवाए गए थे। टायरों की समस्या गुना में सुलझ पानी मुश्किल लग रही थी क्योंकि ट्यूबलैस टायरों की गुना में कोई मांग ना होने के कारण दो टायर मिलना कठिन हो गया था, आखिरकार ढूँढ़-ढाढ़ कर एक एम-आर-एपफ़ व एक जे-के-टायर ही लगवाना पड़ा।
नए टायर लगवाने के बाद जिला अदालत परिसर गुना में वृक्षारोपण कार्यक्रम रखा गया। जिला अदालत गुना के रजिस्ट्रार श्री मुकेश दांगी सहित बार एसोसिएशन अध्यक्ष श्री रामपाली सिंह परमार एवं प्रमुख वकीलों के साथ गणमान्य व्यक्तियों ने भी कार्यक्रम में भागीदारी की। वृक्षारोपण में गुना अदालत के रजिस्ट्रार की बिटिया के योगदान से वृक्षारोपण कार्यक्रम अविस्मरणीय बन गया। मीडिया कवरेज ज्ञडश्र चैनल द्वारा किया गया जबकि प्रिन्ट मीडिया की मौजूदगी भी कापफ़ी संख्या में रही। गुना कार्यक्रम में परविन्द्र सिंह, बैजू, रवींद्र रघुवंशी, सुनील सारस्वत, सहित अभिभावक संघ सचिव एच-के-गौड, सदस्य मनोज पालिया (एडवोकेट), शपफ़ीक खान आदि सहित अनेक लोगों ने भाग लिया।
गुणा से राघोगढ़, बीनागंज-ब्यावरा, नरसिंह गढ़ के केबल टीवी ऑपरेटरों से मिलते हुए यात्र भोपाल पहुंच गई। भोपाल पहुंचते-पहुंचते पिफ़र से माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अयोध्या मामले पर दिए जाने वाले निर्देश को लेकर कयास लगाए जाने लगे क्योंकि धीरे-धीरे समय 28 सितम्बर की ओर बढ़ता जा रहा था। भोपाल में भास्कर टीवी (वर्तमान में हैथवे) एवं डीजी केबल के सामूहिक योगदान से सरकारी अस्पताल के प्रांगण में वृक्षारोपण कार्यक्रम हुआ, जिसमें गिरीश शर्मा (पार्षद एवं ऑपरेटर डिजी केबल, भोपाल) व पफ़ूलसिंह (प्रमुख हैथवे केबल) आदि ने भी योगदान दिया। भोपाल में वृक्षारोपण आदि कार्यक्रम के बाद यात्र इन्दौर के लिए रवाना हुई। सीहोर-आष्टा-देवास होते हुए यात्र इन्दौर के निकट पहुंच रही थी कि गाड़ी में कुछ खराबी के संकेत मिलने शुरू हो गए।
इन्दौर पहुंचते ही गाड़ी को सबसे पहले टोयटा की वर्कशाप ‘राजपाल टोयाटा’ ले जाया गया। वर्कशाप में बताया गया कि गाड़ी में कहीं पानी मिला डीजल भर गया है, अतः पानी के कारण गाड़ी में परेशानी आ रही है। उन्हाेंने एयर पम्प मारकर पानी निकाल कर भी दिखलाया, और पिफ़र वह पिफ़ल्टर-पम्पादि चेन्ज कर गाड़ी ओके कर थमा दी। राजपाल टायेटा वर्कशाप से गाड़ी ठीक करवा कर रात्रि विश्राम के लिए होटल इन्पिफ़नीटी पहुंचे। यह भव्य होटल बाम्बे हास्पिटल के सामने स्थित है जिसे बहुत ही किपफ़ायती शुल्क में आनन्द प्रकाश गुप्ता के द्वारा दिलवाया गया। पिछली यात्र में भी इसी होटल में रात्रि विश्राम किया था हमने। होटल में ही इन्दौर के कई साथी आ गए जिनके साथ कल के कार्यक्रम की रूपरेखा बन कर गाड़ी की थोड़ी ट्राई लेने के लिए निकले, लेकिन गाड़ी में वही समस्या पुनः आ गई जिसके लिए गाड़ी को टोयटा वर्कशाप ले जाया गया था।
आज 28 सितम्बर को माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी अयोध्या मामले में लगी याचिका पर अपना मत स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले पर से रोक हटा ली। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका पर न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि पचास साल से आप कहा चुप बैठे थे, जो कि अब जब न्यायालय इस पर फैसला सुनाने जा रहा है तब आप जागे, वास्तव में आप समय से बहुत पीछे चल रहे हैं। उच्चतम न्यायालय की प्रतिक्रिया के बाद तुरन्त ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 30 सितम्बर को 3ः30 बजे पफ़ैसला सुनाने की घोषणा कर दिए जाने से देश भर में एक बार पिफ़र से वातावरण गर्माने लगा। पिफ़र सारा देश ही जैसे तनाव में आ गया और आशंकाओं के घने कोहरे ने देश को पूरी तरह से ढांप ही लिया। चारों ओर चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा कर्मियों की कदमताल असुरक्षा में सुरक्षा की गारन्टी-सी देने की कोशिशें करने लगे, लेकिन वास्तव में चंहुओर दहशत का वातावरण पूरी तरह से तनाव बढ़ाता जा रहा था।
गाड़ी की उसी खराबी की सूचना राजपाल टोयाटा वर्कशाप को दे दी गई, तब भी दोपहर बाद वह टोह करके गाड़ी अपनी वर्कशाप में ले जा पाए। सारे दिन गाड़ी राजपाल टोयटा वर्कशाप में रखने के बाद ठीक करने बजाय दो रात इन्दौर में गुजार कर पिफ़र इटारसी के लिए रवाना हो गए। इन्दौर से छापरा, खातेगांव, नेभावर, हरदा, भानपुरी होते हुए इटारसी पहुंच गई यात्र। इन्दौर में वृक्षारोपण एवं मीडिया से मुलाकात कार्यक्रम गाड़ी के बगैर ही किया गया, क्योंकि गाड़ी राजपाल टोयटा वर्कसाप में रिपेयर हो रही थी। इटारसी में महेश भिहानी यात्र के स्वागत में लम्बी प्रतीक्षा में थे।
इटारसी में यात्र स्वागतोपरांत अगले दिन नागपुर के लिए कूच करना तय था, रात्रि विश्राम इटारसी में हुआ। नागपुर रवाना होने के लिए पहले सुबह जब गाड़ी स्टार्ट की तो वही प्रोब्लम इन्दौर वाली आ गई और गाड़ी ने स्टार्ट होने से ही सापफ़-सापफ़ मना कर दिया, तब मिहानी जी के प्रयासों से मैकेनिक के हवाले की गई कार। इटारसी से नागपुर के लिए रवानगी का दिन भारतीय इतिहास के लिए विशेष महत्व रखता था, क्योंकि यह वही 30 सितम्बर का दिन था जब अयोध्या मामले पर माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए जाने वाले पफ़ैसले और पफ़ैसले पर देशवासियों की प्रतिक्रिया पर विश्वभर की निगाहें टिकी हुई थीं। पफ़ैसला 30 सितम्बर को 3ः30 बजे सुनाए जाने की घोषणा की जा चुकी थी। पफ़ैसले पर प्रतिक्रिया के अंदेशे में देशभर में शान्ति-सौहार्द बनाए रखने के लिए भारी सुरक्षा बन्दोबस्त किए गए थे सारे देश में। देश के 36 शहरों को अति संवेदनशील क्षेत्रें की श्रेणी में रख कर अतिरिक्त सुरक्षा बन्दोबस्त किए गए थे। सम्भावनाओं का आंकलन कर पाना कठिन था, लेकिन अटकलों के वातावरण में सारा देश तनाव में था। मीडिया के लिए भी यह चुनौती भरी परीक्षा की घड़ी थी।
पूर्व निर्धारित समयानुसार न्यायालय ने पफ़ैसला सुनाना शुरू किया, जिसे बहुत ही संयम के साथ देशवासियों ने ग्रहण किया। धर्म-आस्था पर न्यायालय द्वारा सुनाया गया यह पफ़ैसला समझदारी के साथ सारा देश पचा गया, कहीं कोई छोटी-सी भी वारदात नहीं हुई। पूर्णतया शान्ति बरकरार है। यही भारतीय नागरिकों दुनिया को सन्देश गया कि साहस और संयम में देशवासियों का कोई सानी नहीं है। पफ़ैसले की व्याख्या मीडिया द्वारा बहुत ही सूझबूझ के साथ की गई एवं धार्मिक प्रतिनिधियों ने भी बहुत धैर्य से अपने-अपने पक्ष अवाम के सम्मुख बयान किए। साथ ही ऐसे मामले पर हर मौके का पफ़ायदा उठाने वाले भिन्न राजनीतिज्ञों ने भी सम्भाल-सम्भाल कर मुंह खोले। धीरे-धीरे ऊहा-पोह के बादल छंट गए एवं बहुत तेजी के साथ सारे देश में स्थितियां सामान्य हो गइंर्। पूर्णतया शान्ति के साथ सारा तनाव छूमन्तर हो गया।
अयोध्या पफ़ैसले के तनाव से मुक्त होते हुए देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले कामनवैल्थ गेम्स की शुरूआत ने मीडिया में जगह हथिया ली जिसके कारण अयोध्या मामले पर लम्बी-लम्बी बहसों के लिए समय ही नहीं मिल पाया मीडिया को। बहरहाल एक ऐतिहासिक न्यायिक प्रक्रिया और उस पर देशवासियों की प्रतिक्रिया पर सारा विश्व ही स्तब्ध रह गया है। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में चेतना यात्र-6 इटारसी में गाड़ी की मरम्मत में सारे दिन व्यस्त रही। इन्दौर टोयोटा वर्कशाप में हमें यह तो बता दिया गया था कि गाड़ी में पानी मिला डीजल होने के कारण प्रोब्लम आ रही है, लेकिन दो दिन उनकी वर्कशाप में रहने के बावजूद भी उन्होने गाड़ी को पानी रहित नहीं किया था। यह काम इटारसी में करवाया गया। 30 सितम्बर को कहीं जाना तो सम्भव नहीं था, अतः गाड़ी का डीजल टैंक भी पूरी तरह से सापफ़ करवा लेने के बाद गाड़ी स्टार्ट तो हुई लेकिन प्रोब्लम खत्म नहीं हो सकी। आखिरकार एक रात और इटारसी में रूकना पड़ा। तब अगली सुबह इटारसी से भोपाल गाड़ी को टोह कर ले जाना पड़ा।
भोपाल टोयोटा वर्कशाप में एक अक्टूबर को गाड़ी भर्ती करवा देने के बाद वर्कशाप के सामने बने ‘द मार्क’ होटल में चैकइन किया क्योंकि अगले दिन दो अक्टूबर और पिफ़र उसके बाद रविवार का अवकाश था। सोमवार को पफ़ाल्ट तलाशा गया, तब फ्रयूल इन्जेक्शन पम्प और पिफ़र पम्प के बाद किसी एक इन्जेक्टर में भी खराबी की सम्भावना व्यक्त की टोयटा वर्कशाप वालों ने। 70 हजार का पम्प एवं 27 हजार का एक इन्जेक्टर बताते हुए उन्होंने पांच-छः दिन सामान मंगवाने में लगेंगे कहकर यात्र को भोपाल में ही रूके रहने को विवश कर दिया, तब हमने शीघ्र ही पम्प व चार इन्जेकटर दिल्ली से मंगवाए, जिसे लेकर अगली सुबह दिल्ली से भोपाल पहुंच गया बन्दा। स्वयं टोयटा मैकेनिक भी हतप्रभ हो गए पम्प व इन्जेक्टर देखकर। अगला सारा दिन टोयटा मैकेनिक ने पम्प व इंजेक्टर डालने में ही लगा दिया, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। भोपाल टोयटा वर्कशाप के मैकेनिक पूर्णतया निपुण मैकेनिक नहीं थे। वह इन्दौर के मैकेनिक के दिशा निर्देशों पर ही सारा काम कर रहे थे।
मध्यप्रदेश वासियों के लिए टोयटा की गाड़ियां खरीदना कितनी बड़ी सजा थी यह सब हम भोपाल टोयटा वर्कंशाप में लगातार देख रहे थे, क्योंकि हमारे सामने ही वहां कई गाडियों में पम्प व इजेंक्टर बदलने की सलाह दी जा रही थीं। तकरीबन दो लाख रूपए का इस्टीमेट कार मरम्मत का हो, तब कार वालों की स्थिति कैसी होती है। यह भोपाल की टोयटा वर्कशाप में बार-बार देखने को मिल रहा था। मध्यप्रदेश के लिए यह भी अभिशाप की बात है कि यहां कुल दो ही शहरों इन्दौर व भोपाल में ही टोयटा की वर्कशाप हैं और इन दोनाें का मालिक भी एक ही है। जबलपुर की टोयटा वर्कशाप बन्द हो चुकी है। इन्दौर की टोयटा वर्कशाप में काम ज्यादा होने के कारण निपुण व अनुभवी मैकेनिक होते हैं, जबकि भोपाल टोयटा वर्कशाप एक प्रकार से पाठशाला के रूप में काम करती है। आवश्यकतानुसार इन्दौर से भोपाल भी बुलाए जाते हैं मैकेनिक, इसीलिए हमने भी इन्दौर से अनुभवी मैकेनिक को भोपाल बुलवाने की कापफ़ी गुजारिशें की, लेकिन उन्होंने हमारे इन्जेक्टर में खराबी बताते हुए अपने इन्जेक्टर बेचने पर जोर दिया। तब अगले दिन छः नए इन्जेकटर हमने और मंगवा लिए दिल्ली से। पिफ़र एक और दिन ढल गया, शाम होने को आ गई, पम्प व इन्जेक्टर डाल कर गाड़ी ट्रायल पर गई तब टोयटा का मैकेनिक पम्प इन्जेक्टर के बाद गाड़ी की क्लच प्लेट बदलने की बात करने लगे, जिससे हमारा धैर्य टूट गया, क्योंकि भोपाल के टोयाटा वर्कशाप में एक अक्टूबर से सात अक्टूबर तक गाड़ी खड़े-खड़े ठीक होने की दिशा में एक कदम भी बढ़ती नहीं दिखाई दे रही थी। वहां की पाठशाला में सिपफ़र् प्रयोग ही किए जा रहे थे गाड़ियों पर। ऐसे कई लोगों से इसी तरह की शिकायतें हमें मिलीं, जो आए तो गाड़ी ठीक करवाने थे, लेकिन मजबूरन उन्हें वहां से बीमारी ही लेकर जानी पड़ी।
भोपाल की वर्कशाप के मैकेनिकों से भी हमें यही जानकारी मिली कि वह रिपेयर का नहीं बल्कि रिप्लेसिंग का काम करते हैं। उन्हें इसी की टेªनिंग दी गई है, कि पुर्जा बदलों उसकी रिपेयर नहीं। अधिक से अधिक बिल बैठाने वाले मैकेनिकों को सैलरी के साथ इन्सैटिव भी दिया जाता है यह भी हमे जानने को मिला, तब अपनी गाड़ी वहां की वर्कशाप से मुक्त करवाना ही हमने ज्यादा बेहतर समझा। तब भी साढ़े तेरह हजार का बिल हमें थमा दिया गया। बगैर कोई पुर्जा डाले सिपफ़र् लेबर का यह बिल था जिसे भुगताए बगैर गाड़ी मुक्त नहीं करवाई जा सकती थी। टोयटा की वर्कशाप से बामुश्किल अपनी गाड़ी को खराब हालात में ही मुक्ति दिलवाकर हमने अगले दिन भोपाल की एक प्राइवेट वर्कशाप में रिपेयर करवाया तब कहीं जाकर उससे आगे की यात्र शुरू की जा सकी। भोपाल से नागपुर के लिए रवाना हुए लेकिन नागपुर-भोपाल के बीच बैतूल में पिफ़र उसी खराबी के कारण यात्र में विघ्न पड़ गया। बैतूल में पिफ़र से एक मैकेनिक ने जोर-आजमाइश की, लेकिन वहां से टोह कर नागपुर लानी पड़ी गाड़ी। भोपाल में हाइथ वे सम्भाल रहे पफ़ूल सिंह निरन्तर हमारा उत्साह बढ़ाए रहे एवं अपना पूरा समय हमारी समस्या के समाधान में लगाया।
बैतूल का ऑपरेटर शहर से बाहर होने के कारण उपलब्ध नहीं हो पाया लेकिन यात्र का संदेश उन तक भिजवा दिया गया। नागपुर में लम्बी प्रतीक्षा के बाद भाई सुभाष बान्ते को जरूरी कार्यवश मुम्बई-अहमदाबाद जाना पड़ा, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में नरेन्द्र महेषकर व राज ठाकरे बराबर आखिर तक हमारे साथ बने रहे। नागपुर के केबल व्यवसाय में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते सबसे एक साथ मिलना सम्भव नहीं था, अतः जी-टी-पी- एल- व यू-सी-एन- से अलग-अलग भेंट कर उन्हें समूची मानव जाति के लिए ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता लाने में सहयोग देने की अपील की। इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर विस्तृत चर्चा के बाद वहां के गरबा का भी आनन्द लिया। पृथ्वी के बढ़ते तापमान एवं प्राकृति में आ रहे बदलावों के प्रति सबको जागरूक करते हुए दैनिक भास्कर प्रमुख प्रकाश दुबे से भेंट वार्ता के साथ-साथ गाड़ी रिपेयर करवाने में पूरे दो दिन बीत गए। फिर से पम्प व इन्जेकटर की समस्या के कारण गाड़ी वही निजी वर्कशाप में रिपेयर के लिए छोड़कर नई गाड़ी किराए पर लेकर यात्र पर आगे बढ़ने की तैयारी की। पिफ़र से गाड़ी पर नए स्टिकर आदि लगा कर नागपुर से रायपुर के लिए रवाना हो गई यात्र। सुभाष बान्ते शीघ्र ही हमेें सहयोग देने के लिए वापिस नागपुर लौट आए। ग्लोबल वार्मिंग व पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिए कार्यक्रम का आयोजन कर सुभाष बान्ते एवं अन्य साथियों ने जागरूकता लाने में भरपूर सहयोग दिया। गाड़ी सुभाष बान्ते को सुपुर्द कर यात्र दूसरी गाड़ी से आगे बढ़ी। इस बार गाड़ी के मामले में हम वह गलती नहीं करना चाहते जो पूर्व में की जा चुकी हैं, क्योंकि पूर्व में हमने सबसे बड़ी गलती तो यही की कि गाड़ी ठीक करवाने के लिए हम इन्दौर की टोयटा वर्कशाप में चले गए। दूसरी सबसे बड़ी गलती यह रही कि गाड़ी ठीक किए जाने के बाद वहीं रूक कर ठीक तरह से गाड़ी की ट्रायल लेने की बजाए आगे बढ़ते गए। इन्दौर से गाड़ी ली और सीधे इटारसी पहुंच गए। इसी प्रकार भोपाल गाड़ी ठीक करवाई और सीधे नागपुर के लिए रवाना हो गए। अब नागपुर से भी गाड़ी ठीक करवाकर यदि हमने बगैर तसल्ली के साथ ट्रायल लिए बिना आगे बढ़ना जारी रखा तब पिफ़र से खराबी आने पर एक नए मैकेनिक को दिखलाने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा। अतः सावधानी बरतते हुए यात्र हेतु दूसरी गाड़ी ली है, जबकि अपनी गाड़ी को तसल्ली से ठीक करवाकर 22 अक्टूबर को मुम्बई ले आएंगे सुभाष भाई।
इटारसी-
यह एक ऐसा शहर है जिसका जिक्र करना आवश्यक है पाठकों के लिए, क्योंकि 30 सितम्बर को अयोध्या मामले पर आये ऐतिहासिक न्यायालय के पफ़ैसले के कारण हमें इस शहर को बारीकी से जानने का भरपूर अवसर मिल गया। इटारसी में हमारे सहयोगी बने महेष मिहानी का अधिकांश समय इसी भांति दूसरों को सहयोग देने में बीतता है, क्योंकि प्रतिदिन यहां से 160 पैसेन्जर टेªन गुजरती हैं। देश की चारों मैट्रो सिटी को जोड़ने वाली टेªनों का यह एक मात्र बड़ा जंक्शन भी है। यहां से तमाम रेलगाड़ियों में भोजन-पानी आदि भी लिया जाता है। इस जंक्शन से गुजरने वाली तमाम टेªन तकरीबन पन्द्रह-बीस मिनट तो यहां रूकती ही हैं। रेलवे स्टेशन के निकट ही यहां अनेक बारबर शाप है, जिनकी अधिकतम ग्राहकी इधर से गुजरने वाली टेªनों से ही है।
टेªनों में पैसेंजर्स के लिए भोजन-पानी उपलब्ध करवाना भी यहां एक बड़ी इंडष्ट्री के रूप में पफ़ैला हुआ है। एक प्रकार से देखा जाए तो इटारसी रेलवे का बड़ा जंक्शन है। यहां कुल छः प्लेटपफ़ॉर्म हैं। अधिकांश इटारसी वासियों का जीवन यापन रोजगार रेलों की आवाजाही पर ही निर्भर है। ठहरने के लिए बहुत अच्छे होटल भले ही ना हों, लेकिन खाना और खाने की पैकिंग यहां उतम मिलती है। यहां से गुजरने वाली अधिकांश रेलगाडियों को खाना उपलब्ध करवाने वाला शहर इटारसी कृषि उपज में भी विशेष स्थान रखता है। सोयाबीन की यहां अच्छी खेती होती है। जबकि दूसरे नम्बर पर यहां उत्तम गेहूँ उगाया जाता है। खेती-बाड़ी और रेलों की रेलमपेल की बीच व्यस्त रहते हैं, इटारसी वासी।
इटारसी के केबल टीवी ऑपरेटर अनिल मिहानी के दूसरे भाई महेष मिहानी ने बताया कि वह कुल दस सगे भाई हैं। सभी भाई इटारसी में ही रहते हैं, बड़ा परिवार है, भाईयों के बच्चे भी बड़े हो गए हैं अतः जूते के काम को छोड़कर तकरीबन हरेक व्यवसाय से जुडा है मिहानी परिवार। मीडिया-पोलिटिक्स से लेकर खेती बाड़ी सभी क्षेत्रें में मिहानी परिवार की पैठ है इटारसी में। इसी इटारसी में 30 सितम्बर को अयोध्या मामले पर आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का पफ़ैसला सुनने को मिला और प्रतिक्रिया में पूर्णतया शान्ति भी देखने को मिली। कुल दो रातें इटारसी में बीती, लेकिन गाड़ी को टोह करके ही भोपाल ले जाना पड़ा इटारसी से।
इटारसी में यात्र स्वागतोपरांत अगले दिन नागपुर के लिए कूच करना तय था, रात्रि विश्राम इटारसी में हुआ। नागपुर रवाना होने के लिए पहले सुबह जब गाड़ी स्टार्ट की तो वही प्रोब्लम इन्दौर वाली आ गई और गाड़ी ने स्टार्ट होने से ही सापफ़-सापफ़ मना कर दिया, तब मिहानी जी के प्रयासों से मैकेनिक के हवाले की गई कार। इटारसी से नागपुर के लिए रवानगी का दिन भारतीय इतिहास के लिए विशेष महत्व रखता था, क्योंकि यह वही 30 सितम्बर का दिन था जब अयोध्या मामले पर माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए जाने वाले पफ़ैसले और पफ़ैसले पर देशवासियों की प्रतिक्रिया पर विश्वभर की निगाहें टिकी हुई थीं। पफ़ैसले पर प्रतिक्रिया के अंदेशे में देशभर में शान्ति-सौहार्द बनाए रखने के लिए भारी सुरक्षा बन्दोबस्त किए गए थे सारे देश में।

‘‘यही भारतीय नागरिकों दुनिया को सन्देश गया कि साहस और संयम में देशवासियों का कोई सानी नहीं है। पफ़ैसले की व्याख्या मीडिया द्वारा बहुत ही सूझबूझ के साथ की गई एवं धार्मिक प्रतिनिधियों ने भी बहुत धैर्य से अपने-अपने पक्ष अवाम के सम्मुख बयान किए।’’

सोमवार को पफ़ाल्ट तलाशा गया, तब फ्रयूल इन्जेक्शन पम्प और पिफ़र पम्प के बाद किसी एक इन्जेक्टर में भी खराबी की सम्भावना व्यक्त की टोयटा वर्कशाप वालों ने। 70 हजार का पम्प एवं 27 हजार का एक इन्जेक्टर बताते हुए उन्होंने पांच-छः दिन सामान मंगवाने में लगेंगे कहकर यात्र को भोपाल में ही रूके रहने को विवश कर दिया, तब हमने शीघ्र ही पम्प व चार इन्जेकटर दिल्ली से मंगवाए, जिसे लेकर अगली सुबह दिल्ली से भोपाल पहुंच गया बन्दा। स्वयं टोयटा मैकेनिक भी हतप्रभ हो गए पम्प व इन्जेक्टर देखकर।

नागपुर के केबल व्यवसाय में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते सबसे एक साथ मिलना सम्भव नहीं था, अतः जी-टी-पी- एल- व यू-सी-एन- से अलग-अलग भेंट कर उन्हें समूची मानव जाति के लिए ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता लाने में सहयोग देने की अपील की। इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर विस्तृत चर्चा के बाद वहां के गरबा का भी आनन्द लिया।

ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग- (चौथा भाग) ‘चेतना यात्रा-6’ नागपुर से आगे...
भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री में जिस प्रकार से समस्याएँ बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गई हैं, उसी प्रकार से इंडस्ट्री की यह चेतना यात्र-6 भी खासे संकटाें से गुजर रही है। इससे पूर्व की गई पांचों यात्रओं में कष्ट तो आए लेकिन ऐसे नहीं कि यात्र के लिए पहाड़ ही बन गए हों। इस बार की यात्र में तो आरम्भ से ही चुनौतियां मिलनी शुरू हो गई जो अन्त तक साथ-साथ चलीं। बहरहाल गाड़ी में आ रही खराबियों को देखते हुए यही निर्णय करना पड़ा कि अपनी गाड़ी को नागपुर में ही छोड़कर दूसरी गाड़ी से आगे की यात्र को सुचारू रखा जाए। गाड़ी ठीक हो जाने के बाद नागपुर के सहयोगी गाड़ी लेकर 22 अक्टूबर को मुम्बई ले आएंगे, तभी यात्र भी मुम्बई पहुंचेगी। दूसरी इनोवा गाड़ी को भी यात्र के नए स्टीकर्स से चेतना यात्र वाहन बनाकर यात्र आगे बढ़ी। नागपुर में दशहरा महोत्सव के हर्षोल्लास में चहुंओर गरबा की धूम मची हुई थी। गरबे महोत्सव में यात्र का गर्मजोशी के साथ स्वागत सत्कार हुआ। नागपुर के भिन्न एम-एस-ओ के साथ खुलकर क्वालिटी सर्टिफिकेशन प्रतिक्रया एवं इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर खुलकर चर्चाएं हुई ।
नागपुर के ही एम-एस-ओ यू-सी-एन द्वारा भारत सरकार से सर्टिफिकेशन के लिए अप्लाई किया गया है जिसका ऑडिट बेसिल द्वारा किया जा रहा है, इसी सन्दर्भ में यू-सी-एन के डायरेक्टर्स से अलग-अलग यह जानकारी ली गई कि सरकारी सर्टिपिफ़केशन की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी---\ इसके लिए मांगा गया शुल्क पांच लाख रूपए क्या उचित है\ एवं बेसिल द्वारा किए जा रहे ऑडिट से उन्हें क्या हांसिल हुआ\ नागपुर के एक एम-एस-ओ- यू-सीएन के डायरेक्टर्स से मिले जबाब बहुत ही पॉजीटिव थे। उन्हाेंने बताया कि स्वयं को सच की कसौटी पर जांचने-परखने के लिए भारत में यही एक मात्र उपाय है, इसीलिए हमने भी अपने नैटवर्क के लिए सरकार को पांच लाख रूपए पफ़ीस जमा करवाकर ऑडिट की मांग की। नैटवर्क पर करोड़ों रूपया लगा हो तब सरकारी पफ़ीस पांच लाख ज्यादा नहीं है। बेसिल द्वारा किए गए पहले ही विजिट में हमे अपने नैटवर्क का वह आईना दिखाई दे गया, जिसके बारे में हमें कुछ ज्ञाान ही नहीं था। अपनी खामियां जानने को मिलीं और उनमें सुधार का मार्गदर्शन भी दिया गया। यू-सी-एन को पूर्णतया सन्तुष्ट पाकर हमारा वह भ्रम भी दूर हो गया, जोकि ट्राई की बैठको में उठा था, यू-सी-एन के आई-सी-सी- पूना के डायरेक्टर्स ने भी बेसिल सर्टिपिफ़केशन पर बहुत सकारात्मक उत्तर दिया। लेकिन हां आश्चर्यजनक पहलू यह है कि सम्पूर्ण भारत से मात्र पांच नैटवर्क द्वारा ही बेसिल सर्टिपिफ़केशन के लिए आवेदन किया गया है, जिनमें से ओरटैल (भुवनेश्वर उड़ीसा) आई-सी-सी- (पुणे) को उनके नैटवर्क का क्वालिटी सर्टिपिफ़केट जारी हो चुका है जबकि यू-सी-एन (नागपुर), (चैन्नई) व (बंगलौर) की ऑडिट प्रक्रिया अभी जारी है।
नागपुर से आगे के पूर्व निर्धारित रूट में भी परिवर्तन किया गया, अब यात्र भण्डारा के रास्ते राजनंद गांव-दुर्ग-भिलाई होते रायपुर पहुंची। इसी दरमियान विजय दशमी त्यौहार की तैयारियां भी सभी जगह देखने को मिल रही हैं। अष्टमी होने के कारण ऑपरेटर भी हवन-पूजा में व्यस्त हैं अतः उनके साथ बैठकें अथवा ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग कार्य को रफ्रतार नहीं मिल पा रही है। त्यौहार के माहौल में सभी की अतिव्यस्तता एवं समय की कमी को देखते हुए यात्र छत्तीसगढ से आन्धप्रदेश की ओर बढ़ी। रायपुर से धमतरी पहुंच ऑपरेटरों का गर्मजोशी के साथ स्वागत सत्कार मिला, जबकि सारे रास्ते बारिस होती रही एवं जगह-जगह नवमी के कार्यक्रमों में व्यस्त दिखाई दे रहे थे लोग। धमतरी से कांकेर होते हुए कोड़ागांव पहुंची यात्र। यह पूरा क्षेत्र नक्सलवादियों की बैल्ट के रूप में विख्यात है। यहां की भौगोलिक स्थिति भी नक्सलवादियों के लिए पूर्णतया मददगार है। कोण्डागांव से सिवनीगुड़ा बस्तर होते हुए जगदल पहुंच गई यात्र। जगदलपुर में डीजी का नैटवर्क है जानकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि यह क्षेत्र एक तो पूरी तरह से नक्सलवादियों से घिरा हुआ है, दूसरे बिल्कुल उड़ीसा की बार्डर लाइन पर है। उड़ीसा में ओरटैल का लगभग एकछत्र राज है लेकिन ओरटैल भी अब पड़ोसी राज्यों में अपना नैटवर्क बढ़ाने में लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ में रायपुर डीजी -ओरटैल कम्प्टीशन से ग्रस्त है ही, यही कम्प्टीशन जगदलपुर में भी देखने को मिल सकता है।
बहरहाल, जगदलपुर में एक रात पड़ाव कर अगली सुबह आन्ध्र की ओर बढ़ी यात्र। हालांकि अगले ही दिन विजय दशमी (दशहरा) होने के कारण जगदलपुर में एक बड़े मेले का आयोजन हमारे कदम रोक रहा था, लेकिन समयाभाव के कारण यात्र को एक अतिरिक्त दिन नहीं रोका जा सका परन्तु मेले का आकर्षण हमें बार-बार रूकने के लिए ललचा रहा था। जगदलपुर में विजय दशमी के अवसर पर लगने वाले मेले में विशिष्ट आकर्षण उस मेले में आने वाले आदिवासी की पारंपरिक वेशभूषा श्रृंगार आदि होता है। भारी संख्या में यहां आदिवासी इस अवसर पर इकट्ठे होते हैं। मेले का मोह छोड़ आन्ध्रा की ओर बढ़ती यात्र जगदलपुर से आगे डोबी-सुकमा-कोणा होते हुए मद्राचलम (आन्ध्रप्रदेश) पहुंची यात्र। यह पूरा मार्ग पूर्णतया बीहड-जंगल और नक्सलवादी गढ़ के रूप में जाना जाता है। विजयदशमी पर्व की तैयारियां आन्ध्रा में भी जोर-शोर के साथ चल रही थीं। आन्ध्रा के ऑपरेटर भी विजयदशमी की तैयारियों में व्यस्त दिखाई दिए, क्योंकि दशहरा आन्ध्रप्रदेश के लिए भी एक बड़ा पर्व होता है। दशहरा पर यहां विशिष्ट पूजन-हवन करते हैं। सभी वाहनों को केले के पत्तों व पफ़ूलों से सजाया जाता है व व्यवसायिक परिसरों में विशेष हवन-पूजन कर नारियल पफ़ोड़े जाते हैं।
भद्राचलम के रास्ते छोटे-छोटे गांवों से गुजरते हुए यात्र विजयवाडा पहुंची। विजयवाड़ा पहुंचते-पहुंचते रात का अंधेरा कुछ ज्यादा ही गहरा गया, तिस पर विजय दशमी। ठहरने के लिए एक ठीक-ठाक सा होटल तो किसी तरह मिल गया लेकिन खाने के लिए कुछ भी मिल पाना कठिन हो गया, जबकि भूख भी अच्छी-खासी लगी हुई थी, क्योंकि सुबह जगदलपुर से ही चलते समय जो नाश्ता करके चले थे वह भी जंगल के बीहड़ों में सफर के दौरान पूरी तरह से हजम हो चुका था। विजयवाडा रैलवे स्टेशन से खाना मिला तब कहीं रात ठीक से कट पाई अगले दिन चहुंओर विजय दशमी की रौनक थी, ऑपरेटरो से मिल पाना या पिफ़र ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग पर कोई प्रोग्राम कर पाना यहां सम्भव नहीं था अतः यात्र सीधे चैन्नई के लिए रवाना हो गई, क्योंकि चैन्नई के ऑपरेटरों से दशहरा से अगले दिन मीटिंग तय हो गई थी। विजयवाड़ा से चैन्नई हाईवे बहुत ही बेहतरीन है अतः लम्बा सपफ़र समय से नाप लिया गया।
चैन्नई में किशोर भाई के साथ-साथ अन्य ऑपरेटरों व चैनल डिस्ट्रीब्यूटर्स से मीटिंग आदि से निबट कर यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। चैन्नई में तमिलनाडु केबल टीवी ऑपरेटर के साथ बैठक नहीं हो सकी क्योंकि वह सभी चैन्नई से बाहर थे। चैन्नई से कांचीपुरम वैल्लोर होते हुए कृष्णागिरी पहुंची यात्र। रास्ते में ऑपरेटरों द्वारा यात्र का गर्मजोशी से स्वागत, सत्कार किया जाता रहा, इसी मार्ग से होसूर होते हुए बंगलौर पहुंच गई यात्र। बंगलौर में यात्र का बड़ी गर्मजोशी के साथ स्वागत हुआ। रात्रि विश्राम महाबलेश्वर क्लब में हुआ वहीं ऑपरेटरों के साथ बड़ी बैठक भी हुई। अगले दिन बगंलौर में ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग का संदेश देते हुए यात्र आगे बढ़ी। बंगलौर ,बेल्लूरू, हसन, सक्लेशपुर के रास्ते मंगलौर पहुंची यात्र। मंगलौर में भाई कीनी ने परिवार सहित यात्र का गर्मजोशी से स्वागत किया। यात्र आगे बढ़ती रही, उडूपी, माल्पे बीच होते हुए भटकल के ज्वैल रिसोर्ट पहुंच कर रात्रि विश्राम किया। ज्वैल रिसोर्ट से मात्र 5-6 किमी- नजदीक ही वह स्थान है जहां दूर तक एक तरपफ़ उछालें मारता समुन्द्र है तो दूसरी ओर शान्ति के साथ बहती नदी स्थित है। दोनों के बीच एक्सप्रैस हाईवे पर ड्राईविंग का आनन्द अद्भुद होता है। रिसोर्ट से रवाना होकर कुछ दूर समुन्द्र की उफनती लहरों के सम्मुख चुपचाप बह रही नदी को निहारना बहुत ख्ुाबसूरत लगता है।
यात्र गोवा की ओर बढ़ते हुए मुरदेशवाडा, कुमठा, अंकोला कारवाड़ शहरों से गुजरी। गोवा में मडगांव होते हुए सीधे पणजी पहुंचकर सर्वप्रथम वहां बी-सी-एस- रत्ना अवॉर्ड के लिए वैन्यु देखने का काम किया। कई वैन्यु में से सबसे श्रेष्ठ वैन्यु पणजी की कला-अकादमी ही लगी, जिसे इत्त्ेापफ़ाकन वहां के अकादमी के वाइस चैयरमैन से भेंट हो जाने के कारण उनके निर्देश पर अच्छी तरह से दिखला दी गई।
गोवा की कला अकादमी बी-सी-एस- रत्ना अवार्ड 2011 के लिए पूरी तरह से बेहतर वैन्यु है। इस वैन्यु को बुक करने की प्रक्रिया बाद में शुरू की जाएगी। गोवा में स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम भी बहुतायत में आयोजित होते हैं। गोवा से यात्र आगे बढ़ी, सावंतवाडी होते हुए कुडाल से आगे निकल कर गंगोह रिसोर्ट में रात्रि विश्राम किया। यात्र के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 22 अक्टूबर को यात्र ने मुम्बई होना था अतः कुडाल गंगोई रिसोर्ट से पफ़ोण्डा के रास्ते कोल्हापुर-कराड-सतारा होते हुए पूना पहुंची यात्र।
पूना में आई-सी-सी-नैटवर्क का निरीक्षण कर उनके डायरेक्टर्स एजाज ईनामदार एवं रज्जाक भाई के साथ लम्बी गुफ्रतगू कर यात्र मुम्बई की ओर बढ़ चली। आई-सी-सी-- पूने का नैटवर्क देखे बिना इस नैटवर्क की तारीपफ़ बेमानी सी लगती है, लेकिन इसे बारीकी से देखने के बाद आप इसे देश का नम्बर वन नैटवर्क कह सकते हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि आई सी-सी- टोटली डायरेक्ट प्वाइंट पर चल रहा है, यह एल-सी-ओ पर निर्भर नहीं है। यहां की क्वालिटी के कारण ही ग्राहक पेमेंट भी सम्मान के साथ करते हैं। देश में केबल टीवी का सबसे अधिक सब्स्क्रिप्शन यहीं लिया जाता है, 250/- रूपये ही सब्स्क्राईबर से ले सकते हैं ऑपरेटर को निगल पाना आई-सी-सी के लिए बहुत कठिन होगा। इसी नैटवर्क द्वारा कॉमनवेल्थ गेम्स के प्रसारण को हाईडेफिनिशन (भ्क्) पर प्रसारित किया गया।
रज्जाकभाई से लम्बी गुफ्रतगू के बाद यात्र सीधे मुम्बई के लिए रवाना हो गई। मुम्बई पहुंचते-पहुंचते आधी रात बीत गई, लेकिन समयानुसार मुम्बई पहुंच ही गई यात्र। रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन मुम्बई की स्केट प्रदशिर््ानी में पहुंच कर तमाम ऑपरेटरों से भेंट मंत्रणा चलती रही। सभी को गो ग्रीन, व गो डिजीटल का सन्देश देते-देते सुबह से शाम हो गई। दोनों वाहन प्रदर्शिनी वैन्यु के बाहर खड़े विशेष आकर्षण बने हुए थे, बार-बार जमा होती ऑपरेटरों की भीड़ वहां सबका ध्यान खींच रही थी। इंडस्ट्री की भावी सम्भावनाओं के साथ-साथ ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग के सही मायनों पर भी सारे दिन चर्चा होती रहीं, तत्पश्चात रात्रि विश्राम के लिए होटल पहुंचे। होटल पहुंच कर नागपुर से किराए पर ली गई गाड़ी का हिसाब-किताब निबटा कर उसे विदा किया और अपनी गाड़ी जो नागपुर से ठीक हो कर आई थी उसमें सारा सामान सैट किया।
मुम्बई में केबल टीवी पर स्कैट प्रदर्शिनी के अलावा एक प्रदर्शिनी ब्रॉडकास्टिंग पर भी गोरेगांव में प्रदर्शिनी मैदान में चल रही थी अतः उसको भी विजिट किया। मुम्बई में दिल्ली से पहुंचा शंकर भी साथ रहा एव प्रदर्शिनी में संजीव टण्डन। दोनाें ही प्रदशर्नियां ठीक-ठाक थीं, रेला-पेला भी दोनों ही प्रदशर्नियों में ठीक था, सबसे मिल-मिला कर मुम्बई से आगे बढ़ी यात्र। कई दिनों बाद पिफ़र से अपनी गाड़ी में थे हम, लेकिन गाड़ी अभी भी पूरी तरह से पिफ़ट नहीं थी। नागपुर से ठीक होकर गाड़ी किसी तरह से मुम्बई तक तो पहुंच गई लेकिन मुम्बई से यह दिल्ली तक की यात्र भी कर पाएगी इसका पूरा यकीन नहीं हो पा रहा था। गाड़ी में सबसे बड़ी परेशानी थी कि चलते हुए गर्म हुई गाड़ी को यदि बन्द कर दिया गया तब वह बिना ठण्डे हुए स्टार्ट नहीं होगी। ठण्डा होने के लिए गाड़ी को समय देना होगा अन्यथा धक्के मारकर उसे स्टार्ट किया जा सकता है। यह प्रोब्लम कहां से है इस पर हर किसी की राय अलग-अलग हैं। दूसरी समस्या यह है कि बोनट खोलने पर सीधे-सीधे कहीं से इंजन आयल जैसा कुछ लीकेज होने के निशान दिखाई दे रहे हैं। यह लीकेज कहां से है या पिफ़र इसी लीकेज के कारण ही तो नहीं हो रही है स्टार्टिंग की प्रॉब्लम यह जांच का विषय है।
इन्हीं हालातों में मुम्बई से नासिक के लिए बढ़ चली यात्र। नासिक पहुंच कर सीधे-सीधे मैकेनिक को दिखलाने पर उसने स्टार्टिंग समस्या के लिए सैल्पफ़ खोल कर सर्विस कर लगा दिया, जबकि ऑयल लीकेज की प्रोब्लम नासिक में ठीक नहीं हो सकी, लेकिन रिसे हुए ऑयल को सापफ़ करने के लिए गाड़ी की सर्विस (धुलाई) करवा ली गई। रात्रि विश्राम नासिक में कर अगले दिन महाराष्ट्र से गुजरात का सपफ़र शुरू हुआ। नासिक के ऑपरेटरों के साथ मुम्बईं में ही मीटिंग हो चुकी थी एवं धुले के ऑपरेटरों से भी मुम्बई में ही भेंट हो चुकी थी, इसीलिए नासिक से सापू तारा होते हुए सूरत की ओर बढ़ी यात्र। सूरत में भरत भाई आज ही अस्पताल से वापिस घर पहुंचे हैं अतः यात्र सीधे बड़ोदरा के लिए आगे बढ़ गई जहां जीटीपीएल के डायरेक्टर कनक सिंह रणा (बापूभाई) यात्र की प्रतीक्षा कर रहे थे। बड़ोदरा में रात्रि विश्राम के बाद सुबह बापू भाई के साथ गो ग्रीन व गो डिजीटल पर लम्बी बैठक के बाद दर्शकाें के लिए ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग पर संदेश रिकॉर्ड करवा कर यात्र बड़ोदरा से आगे की यात्र के लिए बढ़ चली।
टोयोटा की वर्कशॉप बड़ोदरा में भी थी अतः गाड़ी को पिफ़र एक बार टोयोटा वर्कशॉप भेजा गया, लेकिन उनका वही पुराना रवैया कि छोड़ जाओ शाम को मिलेगी, के कारण वापिस आ गई। गाड़ी में ऑयल लीकेज प्रोब्लम निबटाने के लिए जो सामान चाहिए था वह बामुश्किल सिफारिशी पफ़ोन करवाकर उनसे खरीद कर यात्र आगे बढ़ चली। बड़ोदरा से तारापुर, नाडियाद के रास्ते यात्र भावनगर पहुंच गई, जहां एक अच्छी वर्कशॉप में गाड़ी ठीक करने के लिए दी गई। भावनगर का ऑपरेटर सुरेश तिवारी स्वयं सूरत रवानगी पर था लेकिन हमारा पूरा प्रबन्ध कर वह अपनी यात्र पर गया। भावनगर की वर्कशॉप रात में भी काम करती है, अतः अपनी गाड़ी की ऑयल लीकेज प्रोब्लम का काम रात में ही निबटा दिया गया। रात्रि विश्राम भावनगर में ही कर सुबह वर्कशॉप से गाड़ी लेकर आगे की यात्र शुरू की।
भावनगर से सीधे सासन गीर के वन हमारा पड़ाव था, जहां भारत का प्रतीक सिंह (शेर) निर्भय होकर विचरण करते हैं। वहां के ऑपरेटर जितेन्द्र कुमार से हम बराबर सम्पर्क में रहे। गीर के निकट ही तलाला गांव में ऑपरेटर का नैटवर्क है। जितेन्दर हमारे स्वागत में सासनगीर पहुंच चुका था। सासनगीर के फारेस्ट रैस्ट हाऊस श्रीनाथ में यात्र का पड़ाव हुआ। गिरीवन के क्षेत्र में केबल टीवी आपरेटरों को अलर्ट किया जा चुका था कि कहीं भी लायन की गतिविधि की जानकारी मिले तो सूचित किया जाए, अतः लायन द्वारा एक गांव की बाहरी सड़क पर ही बैल किल करने की सूचना आ चुकी थी। श्री नाथ पफ़ारेस्ट रैस्ट हाऊस में पड़ाव कर खानादि खाकर हम उस स्पॉट पर पहुंचे जहां लायन ने किल किया हुआ था। थोड़ी देर संयम के साथ प्रतीक्षा करने पर लायन को किल खाते हुए हमें कैमरे में कैद करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एशिया में सिर्फ भारत में ही लायन होते हैं, जिनके लिए गिरीवन बहुत ही सुरक्षित स्थान हैं, इनकी संख्या भी यहां लगातार बढ़ रही है, क्योंकि गिरी पफ़ारेस्ट के लोग यहां के निवासियों के साथ लगातार सम्पर्क बनाए रखते हैं और उन्हें जल-जंगल और वन्य जीवों के प्रति शिक्षित करते रहते हैं। गिरीवन के तमाम गार्ड्स व कर्मचारियों के साथ हुई हमारी लम्बी बातचीत से ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग के अंतर्गत ग्लोबल वार्मिंग के प्रति चलाए जा रहे अभियान में उन सबने सहयोगी बनने की सहमति दी।
गिरीवन के शेर विश्वभर के पशु प्रेमियों को गुजरात आने के लिए आकर्षित करते हैं। शेर यहां के निवासियों के साथ बहुत ही फैमिलिया हो चुके हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि यहां के निवासियों के लिए भी यह शेर उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन गए हैं। यहां यह जान कर आश्चर्य हुआ कि इन शेराेें ने कभी इन्सानों पर हमला नहीं किया। इन्सानों से यहां के शेर निडर होकर गिरीवन में विचरण करते हैं, जबकि इन्सान भी इन शेरों से कुछ दूरी बनाए रखते हैं। वैसे पेट भरे शेराें को इस जंगल में अक्सर आराम करते हुए देखा जा सकता है। परिवार में रहने वाले इन सिंहों को देखते हुए भय नहीं लगता है, जबकि टाईगर को देखने में भय भी साथ होता है। गुजरात के क्षेत्र के एक ओर समुन्द्र है एवं सोमनाथ मन्दिर और कृष्ण की द्वारिका भी यहीं है। यही दीव का खूबसूरत समुन्द्र भी सैलानियों को आकर्षित करता है। इस क्षेत्र में सोयाबीन और कपास भारी मात्र में होती है। एवं आम की भी यहां उम्दा पफ़सल होती है। यहां के केसर, आम की मांग विश्वभर में है।
गिरीवन में सिंहों के साथ-साथ यहां की अपफ़्रीकन प्रजाति भी भारत में सिपफ़र् यहीं पर है। कहा जाता है कि अंग्रेजों के राज में रेलवे लाईन बिछाने के लिए अपफ़्रीका से कुछ लोगों को यहां लाया गया था तब से वह लोग यहीं बस गए हैं। उनकी अगली पीढ़ियां भी यहां के लोगों और समाज के साथ-साथ बसर कर रही हैं। वह अब गुजराती भाषा भी बोलने लगे हैं। उनके बच्चों को यहां शिक्षा भी दी जा रही है। उनकी वेशभूषा-सभ्यता, संस्कृति एवं रहन-सहन भी गीर पहुंचने वालों के लिए आकर्षण होता है, अतः विशेष तौर पर हमने उनके गांव व घरों का दौरा किया और पिफ़र उनके परम्परागत डांस को भी कैमरे में कैद किया। इस प्रकार ‘टू नाइट इन गिरीवन’ में हमने कापफ़ी कुछ बटोर लिया। गिरी पफ़ारेस्ट द्वारा बनाई गई लायन से वापिसी में विजिट की, जहां पशु अस्पताल भी बनाया हुआ। मीलों वर्ग क्षेत्र में पफ़ैली इस सैंचुरी में जानवरों को प्राकृतिक वातावरण मिलता है। यहां लायन और नील गाय हिरण आदि सभी प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं। इसी सेन्चुरी में यहां आने वाले स्कूली छात्रें एवं क्षेत्रीय निवासियों को भी वाइल्ड लाइपफ़ के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है।
गिरीवन से स्मृतियां समेटते हुए यात्र सीधे अहमदाबाद पहुंची। अहमदाबाद में जीटीपीएल (एम-एस-ओ-) का आतिथ्य ग्रहण कर अगले दिन उदयपुर के लिए रवाना हो गई यात्र। गुजरात के अधिकांश क्षेत्रें में जीटीपीएल का ही प्रसारण नैटवर्क है, अतः गो ग्रीन-गो डिजिटल का संदेश रिकॉर्ड करवा कर यात्र ने राजस्थान में प्रवेश किया। अहमदाबाद से उदयपुर हाईवे बहुत अच्छा मिला इसलिए समय से ही उदयपुर पहुंच गई यात्र, लेकिन वहां के ऑपरेटरों से भेंट अगले दिन ही हो सकी। चैनल डिस्ट्रीब्यूटर एवं ऑपरेटरों के साथ बैठक के बाद यात्र सीधे जयपुर पहुंची। राजस्थान में दीपावली की विशेष तैयारियां दिखाई दीं। बाजार में विशेष सजावट और बिजली की रोशनी में सारे शहर जगमग हो रहे थे। रात्रि विश्राम जयपुर में कर अगले दिन अर्थात पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार 31 अक्टूबर की शाम दिल्ली पहुंच गई यात्र। इस प्रकार 5 सितम्बर को दिल्ली से आरम्भ होकर पचपन दिनों बाद 31 अक्टूबर को सारे देश में गो ग्रीन व गो डिजीटल का सन्देश देते हुए ‘ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग चेतना यात्र-6’ सकुशल वापिस दिल्ली पहुंची। दिल्ली में भारी स्वागत-सत्कार के लिए लोग उमड़ पड़े, सभी ने यात्र की सफलता पर बधाईयां दीं।
इस प्रकार ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री की सहभागिता में पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए लोगों को जागरूक करने का एक और अभियान सपफ़लता पूर्वक सम्पन्न हो गया, लेकिन अभियान निरन्तर जारी रहेगा, यह तो छठीं यात्र का बस एक पड़ाव हुआ है। इस अभियान में जितना भी किया जा सके वह कम है। जरूरत समूची मानव जाति को ऐसे अभियान में जुट जाने की है। अपने और अपनाें के लिए ही जीने वालों को आने वाली पीढ़ियों के बारे में भी अब ऐसा ही कुछ करना चाहिए अन्यथा यदि उन्हें स्वस्थ वातावरण ही ना मिल सका तब आज का किया धरा उनके किस काम आएगा---\ जरा सोचिए-- एवं प्रतीक्षा कीजिए अगले वर्ष सितम्बर-अक्टूबर में की जाने वाली चेतना यात्र-7 की!!
नागपुर से आगे के पूर्व निर्धारित रूट में भी परिवर्तन किया गया, अब यात्र भण्डारा के रास्ते राजनंद गांव-दुर्ग-भिलाई होते रायपुर पहुंची। इसी दरमियान विजय दशमी त्यौहार की तैयारियां भी सभी जगह देखने को मिल रही हैं। अष्टमी होने के कारण ऑपरेटर भी हवन-पूजा में व्यस्त हैं अतः उनके साथ बैठकें अथवा ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग कार्य को रफ्रतार नहीं मिल पा रही है। त्यौहार के माहौल में सभी की अतिव्यस्तता एवं समय की कमी को देखते हुए यात्र छत्तीसगढ से आन्धप्रदेश की ओर बढ़ी। रायपुर से धमतरी पहुंच ऑपरेटरों का गर्मजोशी के साथ स्वागत सत्कार मिला, जबकि सारे रास्ते बारिस होती रही एवं जगह-जगह नवमी के कार्यक्रमों में व्यस्त दिखाई दे रहे थे लोग।

रात्रि विश्राम महाबलेश्वर क्लब में हुआ वहीं ऑपरेटरों के साथ बड़ी बैठक भी हुई। अगले दिन बगंलौर में ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग का संदेश देते हुए यात्र आगे बढ़ी। बंगलौर ,बेल्लूरू, हसन, सक्लेशपुर के रास्ते मंगलौर पहुंची यात्र। मंगलौर में भाई कीनी ने परिवार सहित यात्र का गर्मजोशी से स्वागत किया।

रात्रि विश्राम नासिक में कर अगले दिन महाराष्ट्र से गुजरात का सपफ़र शुरू हुआ। नासिक के ऑपरेटरों के साथ मुम्बईं में ही मीटिंग हो चुकी थी एवं धुले के ऑपरेटरों से भी मुम्बई में ही भेंट हो चुकी थी, इसीलिए नासिक से सापू तारा होते हुए सूरत की ओर बढ़ी यात्र। सूरत में भरत भाई आज ही अस्पताल से वापिस घर पहुंचे हैं अतः यात्र सीधे बड़ोदरा के लिए आगे बढ़ गई जहां जीटीपीएल के डायरेक्टर कनक सिंह रणा (बापूभाई) यात्र की प्रतीक्षा कर रहे थे। बड़ोदरा में रात्रि विश्राम के बाद सुबह बापू भाई के साथ गो ग्रीन व गो डिजीटल पर लम्बी बैठक के बाद दर्शकाें के लिए ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग पर संदेश रिकॉर्ड करवा कर यात्र बड़ोदरा से आगे की यात्र के लिए बढ़ चली।

गिरीवन के क्षेत्र में केबल टीवी आपरेटरों को अलर्ट किया जा चुका था कि कहीं भी लायन की गतिविधि की जानकारी मिले तो सूचित किया जाए, अतः लायन द्वारा एक गांव की बाहरी सड़क पर ही बैल किल करने की सूचना आ चुकी थी।

गिरीवन में सिंहों के साथ-साथ यहां की अपफ़्रीकन प्रजाति भी भारत में सिपफ़र् यहीं पर है। कहा जाता है कि अंग्रेजों के राज में रेलवे लाईन बिछाने के लिए अपफ़्रीका से कुछ लोगों को यहां लाया गया था तब से वह लोग यहीं बस गए हैं। उनकी अगली पीढ़ियां भी यहां के लोगों और समाज के साथ-साथ बसर कर रही हैं। वह अब गुजराती भाषा भी बोलने लगे हैं। उनके बच्चों को यहां शिक्षा भी दी जा रही है। उनकी वेशभूषा-सभ्यता, संस्कृति एवं रहन-सहन भी गीर पहुंचने वालों के लिए आकर्षण होता है, अतः विशेष तौर पर हमने उनके गांव व घरों का दौरा किया और पिफ़र उनके परम्परागत डांस को भी कैमरे में कैद किया।

ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग एण्ड ई वेष्ट निदान
पृथ्वी ही जब खतरे में प्रतीत हो रही हो तब पृथ्वी पर रहने वालों के लिए इससे बड़ी व गम्भीर समस्या अथवा चिंता कोई और नहीं हो सकती है। अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा हो क्या गया जो पृथ्वी पर ही खतरा खड़ा हो गया है\ हालांकि पृथ्वी के भिन्न भागों को हमने अलग-अलग द्वीपों के रूप में बांट लिया है। भिन्न भूखण्डों के नाम हमने देशों के रूप में रख लिया है। इन्हीं देशों की सीमाएं सुरक्षित रखने के लिए हमने सुरक्षा के नाम पर बड़े-बड़े हथियार, गोला, बारूद, बम, लड़ाकू विमान व पनडुब्बियों सहित जल,थल,नभ सेनाओं का गठन किया हुआ है। देश पर बाहरी खतरों के लिए और अन्दरूनी मामलों के लिए अलग से संविधानिक संरचनाएं की हुई हैं। इसी को तो मानव विकास यात्र कहा जा सकता है। आदिमानव से आधुनिक मनुष्य बनने तक के सपफ़र में सैकड़ों हजारों साल गुजर गए हैं। मानवी सोच ने खोजी प्रवृत्ति के कारण जमीन से आसमान तक और आकाश से पाताल तक सब कुछ नाप लिया है। समूचे ब्रहमाण्ड में इन्च भर भी नापे बिना अब नहीं रह गया है।
अपनी ही जरूरतों को साधते-साधते इन्सान इतना आगे निकल गया है कि पृथ्वी ही जैसे पीछे रह गई हो। प्रकृति से लेते-लेते इन्सान जब प्रकृति पर ही भारी पड़ने लगे हैं, तब स्वाभाविक ही था कि पृथ्वी पर खतरा मण्डराए, लेकिन अच्छी बात यह है कि इन्सानों ने इस खतरे को भांप लिया है। इन्सानों को यह संकेत मिल गए हैं कि जिस तरह से पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है उसका सीधा-सीधा प्रभाव प्रकृति पर पड़ रहा है। पृथ्वी तीन हिस्से पानी से घिरी हुई है जबकि उत्तरी ध्रुव पर बपफ़र् ही बपफ़र् है। बढ़ते तापमान के कारण यह बपफ़र् बहुत तेजी से पिघल रही है, जिससे कि पानी का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से आज विश्व की समूची मानव जाति चिन्तित है, लेकिन सिपफ़र् चिंता से तो निदान सम्भव नहीं है। समूची मानव प्रजाति इसकी रोकथाम में अपना योगदान दे तब इस समस्या से निबटा भी जा सकता है और पृथ्वी को बहुत खूबसूरत भी बनाया जा सकता है।
विश्वभर में ग्लोबल वार्मिंग पर अनेक तरह से तमाम देश काम कर रहे हैं, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानव विकास का सपफ़र तो रोका नहीं जा सकता है, लेकिन हरेक क्षेत्र में विकास की गति बनाए रखने के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के प्रयास भी किए जा सकते हैं। इसके लिए सबसे बड़ी जरूरत लोगों में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता लाने की भी है। ऐसे कार्याें में लोग अपना योगदान देना भी चाहें तो वह क्या कर सकते हैं, इसके प्रति उन्हें जागरूक करना बहुत जरूरी है। अन्यथा खतरे का तो मालूम है लेकिन उस खतरे को कम करने के लिए कोई क्या कर सकता है, इसके लिए लोगों में बडे़ पैमाने पर जागरूकता लाने के प्रयास करने भी अति महत्व रखते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए पेड़ों की कटाई रोकनी चाहिए एवं नए-नए पेड़-पौधे लगाने चाहिए। यह तो मोटी सी
बात है, लेकिन लोगों में यह कार्य एक सामाजिक परम्परा के रूप में अपना लिया जाए, उसके लिए ऐसे कार्य को व्यक्ति की
दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा, उसके लिए एक जागरूकता अभियान चलाना होगा, जिसमें लोग तमाम शुभ अवसरों पर अपने प्रियजनों को गिफ्रट के रूप में पेड़-पौधे भेंट करें। प्रत्येक स्कूल में हरेक छात्र के जन्मदिवस के अवसर पर एक पौधा लगवाने का प्रचलन हो, स्कूल छात्रें की शिक्षा पीरियड में एक पीरियड प्रकृति के प्रति प्रेम-समर्पण का भी शामिल किया जाए। स्कूल टाईम से ही बच्चों में प्रकृति प्रेम के भाव बोए जाएंगे तभी उनका प्रभाव उनके युवा होने तक दिखने लगेगा। इसी तरह के अनेक अभियान ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के सन्दर्भ में चलाए जा सकते हैं, जिनमें लोगों से उपलब्ध एनर्जी को कम से कम खर्चने के लिए समझाया जा सकता है एवं उसके स्थान पर वैकल्पिक अथवा प्राकृृतिक संसाधनों से उत्पन्न एनर्जी के इस्तेमाल के प्रचलन को बढ़ाया जा सकता है। हालांकि सरकार करोड़ों रूपए ऐसे कार्यांे पर पानी की तरह बहाती है, करोड़ों के विज्ञापन कर प्रचार-प्रसार भी करती है, लेकिन सरकार की करनी-भरनी पर ही गर यह काम भी छोड़ हम हाथ पर हाथ धरे बैठ उस भविष्य की प्रतीक्षा करने लगे तब निश्चित ही हमे उस भयावह परिणाम की ओर बढ़ते रहने से कोई नहीं रोक सकेगा। इसके लिए तो बगैर किसी निर्देश या मदद के स्वयं ही क्षमतानुसार जितना हो सके सहयोग देना होगा।
सर्वप्रथम तो हमें अपने ही वर्ग में टटोल कर देखना चाहिए कि कहीं हमारे किन्हीं कार्यों के कारण तो ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि नहीं हो रही है। कुछ ना कुछ अवश्य ऐसा मिलेगा जिसमें थोड़ी सी हेर-पफ़ेर से हम स्वयं के द्वारा किए जा रहे ग्लोबल वार्मिंग को नियन्त्रित कर सकते हैं। हम बेवजह लाइट, पंखा ना चलता रहने दें, एयर कण्डीशन कम से कम चलाएं एवं निजी गाड़ी के स्थान पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही अधिकाधिक इस्तेमाल करें। पानी की बर्बादी रोकें आदि-आदि। कितने ही ऐसे सामान्य तरीके हैं, जिनको अपनी आदतों में शुमार कर हम पृथ्वी के बढ़ते जा रहे तापमान को रोकने में सहयोग दे सकते हैं।
हम अपने व्यवसायिक वर्ग में किस तरह से लोगों को ऐसेे अभियान का हिस्सा बना सकते हैं\ ऐसेे सवालों पर सोचना अब आवश्यक सा हो गया है, क्योंकि समस्या इतनी गम्भीर हो चुकी है कि अकेले-अकेले नहीं बल्कि समुदाय के समुदाय संयुक्त प्रयास करेंगे तब ही पृथ्वी के बढ़ते तापमान को नियन्त्रित करने की दिशा में बढ़ा जा सकता है। हमारा व्यवसायिक वर्ग वर्तमान दौर में मीडिया के रूप में एक मजबूत एवं विशिष्ट जिम्मेदारियों से भरा हुआ वर्ग है। मीडिया का भी यह विजुअल यानि कि इलैक्ट्रानिक स्वरूप है, जिसका सीधे-सीधे हर उम्र के तबके पर असर होता है। मीडिया के रूप में मनोरंजन बिजनेस, खेल, समाचारों सहित तमाम जानकारियों का खजाना तो उडेल ही रहा है मीडिया, इसी मीडिया ने ही आज आम आदमी तक इस जानकारी को पहुंचाया है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। जिसके कारण पृथ्वी पर बड़ा खतरा मण्डरा रहा है। सूचना पहुंचाने के काम में कतई कोताही नहीं की मीडिया ने लेकिन अब एक नई पहल भी मीडिया इंडष्ट्री को ही करनी होगी कि एक विशिष्ट वर्ग या इंडष्ट्री के रूप में हम क्या कर सकते हैं\ मीडिया होने के कारण सिपफ़र् दूसरों को जानकारी पहुंचाने का दायित्व बड़ी जिम्मेदारी के साथ निभा रहा है मीडिया, लेकिन अब ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए समूची ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री को संयुक्त रूप से योगदान देना होगा।
इसके लिए सर्वप्रथम तो इस इंडस्ट्री से जुड़े हुए जितने भी ऑपिफ़स, दुकानें, पफ़ैक्ट्री बिल्डिंगें हैं सभी को अपने एयरकण्डीशंस से निकलने वाली गर्मी को एब्जार्ब करने के लिए पर्याप्त ग्रीनरी का बन्दोबस्त करना चाहिए। मीडिया इंडस्ट्री से जुडे़ समूचे समुदाय को अपने व्यवसायिक परिसर सहित रिहायसी परिसरों में भी एसी से निकलने वाली हीट को एब्जार्ब करने के लिए अधिक से अधिक ग्रीनरी का बन्दोबस्त करना चाहिए, उसी प्रकार से अपने वाहनों के एसी भी कम से कम ही इस्तेमाल करने चाहिए, लेकिन यदि ऐसा सम्भव नहीं हो पाए तो किसी ना किसी सार्वजनिक पार्क को गोद लेकर उसमें ग्रीनरी बढ़ाने पर जोर देना चाहिए अथवा अपने आने जाने वाले मार्ग के किसी भी दूरी के हिस्से में हरियाली बढ़ानी चाहिए। साथ ही पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा ‘ई वेष्ट’ अर्थात इलैक्ट्रानिक कचरा’ भी बन गया है, इसके प्रति अब सबको गम्भीर हो जाना चाहिए। इस इलैक्ट्रानिक कचरे के प्रति जागरूकता अभियान की बड़े पैमाने पर जरूरत है, क्योंकि आम आदमी को तो अभी यह मालूम ही नहीं है कि ऐसा कोई खतरा सामने खड़ा भी है जबकि किसी भी घर या ऑपिफ़स में ई कचरा इकट्ठा होता जा रहा है, जिसमें मोबाइल चार्जर्स से लेकर पुराने खराब पड़े पफ़ोन के अतिरिक्त ट्रांजिस्टर, रेडियो, वी-सी-आर-, कम्प्यूटर, मॉनीटर्स कीबोर्ड, प्रिन्टर्स, आदि से लेकर ढे़राें बच्चों के इलैक्ट्रानिक खिलौने, वीडियो गेम्स आदि-आदि तमाम ऐसा इलैक्टाªनिक कचरा जो घरों व दफ्रतरों में इकट्ठा हो गया है उसे सही तरीके से ठिकाने लगाना। ऐसे ई कचरे के निपटारे के लिए जब तक कोई पूर्णतया हानि रहित तकनीक नहीं आ जाती तब तक ऐसे कचरे के निदान के लिए बजाए कबाड़ियों को बेंच देने के उन्हें ई वेस्ट या पिफ़र ‘ई कचरा पार्क’ के रूप में कुछ ऐसा स्थान बनाया जाना चाहिए जहां लोग ई कचरा दान करने की आदत डालें। ऐसे कचरे को कबाडियों को बेंच देने से घर या दफ्रतरों से तो कचरा बाहर निकल गया लेकिन उस इलैक्ट्रानिक कचरे में से काम की धातुएं निकालने के लिए जब वह जलाया जाएगा तब उससे निकलने वाली जहरीली गैसें पूरे वातावरण में जहर घोलेंगी, जिससे पर्यावरण दूषित होगा। गो ग्रीन-गो डिजीटल के साथ-साथ ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडस्ट्री का नारा ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग या पिफ़र ग्रीन इलैक्ट्रानिक भी होना चाहिए। ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग अभियान के अन्तर्गत जब स्वयं ही अपनाएंगे तब लोगों को जागरूक करना आसान हो जाएगा। ऐसे कार्य के लिए ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री को किसी से अनुमति की आवश्यकता नहीं है, बस एक पहल करने की ही देर है बाकी सब तो जैसे प्रतीक्षा में ही हैं, यही महसूस होगा शुरूआत करने के बाद। ब्रॉडकास्टर्स अब कई चैनलों के बुके बनकर आपस में जुड़कर देशभर में चैनल डिस्ट्रीब्यूशन भी करते हैं। चैनल डिस्ट्रीब्यूटर्स को भी ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग अभियान में शामिल कर लिया गया तब निश्चित ही देशभर के एम-एस-ओ- सहित केबल टीवी ऑपरेटर भी इसके हिस्से बन जाएंगे तब परिणाम वास्तव में चौंकाने वाले होंगे।

इस पथ का उद्देश्य नहीं है, शान्त भवन में टिके रहना
किन्तु पहुँचना उस मंजिल पर जिसके आगे राह नहीं ॥
समूची धरती जल रही है, धरती की इस तपन को सम्पूर्ण विश्व महसूस कर रहा है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। खतरा एक-दो को नहीं बल्कि समूची मानव जाति को है इसलिए जरूरत है ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से उपज संकट से धरती को बचाने की। जब धरती के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग गये हों, तब इसमें मीडिया की भूमिका और बढ़ जाती है। यह मीडिया ही तो है, जो किसी भी क्रान्ति को जन्म दे सकता है, बस जरूरत है तो इसके साथ सभी के कदमताल मिलाने की।
वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग ) से उठे धरती पर संकट आज यूं तो पूरा विश्व जता रहा है। विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष इससे बचाव हेतु डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में मिल भी चुके हैं, लम्बी वार्ताएं भी हुई। लेकिन इससे निजात के रूप में कोई ठोस हल नहीं निकाला जा सका है। भारत में हर साल करीब 3,50,000 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट जमा हो जाता है और करीब 50,000 टन इंपोर्ट होता है। ई-वेस्ट का आयात गैरकानूनी है, इसलिए यह स्क्रैप, सेकंड हैंड इलेक्ट्रिकल एपलायंसेज एवं अन्य चीजों के रूप में भारत में आता है। यह सारा ई-वेस्ट हमारे देश में एकत्र हो जाता है। देश के अनियोजित क्षेत्र द्वारा इस ई-वेस्ट का 90 प्रतिशत हिस्सा रीसाइकल कर दिया जाता है, लेकिन अनियोजित तरीके से रीसाइकल करना कापफ़ी नुकसानदायक है। भारत में वर्ष 2007 में लगभग 3,30,000 टन ई-वेस्ट एकत्र हुआ था।
इधर मीडिया इन खबरों को प्रसारित कर इतिश्री समझ लेता है, जबकि वह स्वयं ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। हालांकि जी न्यूज के ‘माई अर्थ, माई ड्यूटी’ को कापफ़ी सराहा गया।
इस तरह के अभियान चलाने में देश-दुनिया के लोग कापफ़ी कंजूसी बरतते हैं। भले ही उनके लिए वायुमंडल का तापमान कितना ही शर्मा जाए। क्या लोग नहीं जानते कि उनके घरों, दफ्रतरों सहित गाड़ियों में लगे एयरकंडीशन अंदर तो ठंडा करते हैं, किन्तु बाहरी वातावरण को तपन से भर देते हैं। ऐसे लोगों को यह जानना होगा कि जाने-अनजाने में वे वातावरण का तापमान तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन इसे सुधारने अथवा क्षतिपूर्ति की एवज में क्या रहे हैं।
वातावरण की गर्मीं बढ़ाने में सहायक लोगों को जागरूक करने के लिए देशभर में चेतना यात्र-5 के जरिए लोगों को ‘वृक्षारोपण’ के लिए चेताया गया। इस बार ‘चेतना यात्र-6’ व ‘ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग’ के बैनर तले ब्रॉडकास्टर्स से लेकर लास्टमाइल ऑपरेटरों उपभोक्ताओं को ग्लोबल वार्मिंग ई-वेस्ट कचरा निदान के प्रति जागरूक किया जाएगा। निसंदेह इसका प्रभाव करोड़ाें लोगों पर पड़ेगा। लोगों को नवीनीकृत ऊर्जा के इस्तेमाल के प्रति जागरूक किया जाएगा। उन्हें ‘चेतना यात्र-6’ के अंतर्गत बताया जाएगा कि वे पेड़-पौधे लगाकर, पेड़-पौधे गोद लेकर विश्व के बढ़ते तापमान में कमी ला सकते हैं।
इसमें कोई शक-सुबह नहीं कि जब इस तरह का कैंपेन विभिन्न टीवी चैनलों के जरिए दर्शकों/ उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, तो वे सभी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। कहते हैं स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन बसता है, किन्तु शरीर तभी स्वस्थ रहेगा, जब हमें स्वस्थ वायु मिलेगी, स्वस्थ ऊर्जा मिलेगी। स्वस्थ ऊर्जा, स्वस्थ वायु के लिए जरूरी है कि धरती का तापमान संतुलित हो। ग्लोबल वार्मिंग में कमी आए। यह सब तभी संभव है, जब हम सभी इसके प्रति जागरूक हों। केन्द्र सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए योजनाएं तो बनाती है, उसके लिए पफ़ंड भी घोषित करती है लेकिन ऐसी योजनाएं, ऐसे पफ़ंड मूर्त रूप लेने से पहले ही ‘ठिकाने’ लगा दिए जाते हैं। लेकिन ठीक पहल तो होनी ही चाहिए।
समूची कम्यूनिटी को इसके प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी उठाई है डा-ए- के- रस्तोगी ने। इस बार वे चेतना यात्र-6 के माध्यम से एक बार पिफ़र लोगों के बीच पहुंच उन्हें ई-वेस्ट कचरा निदान, ग्लोबल वार्मिंग आदि के प्रति सचेत करेंगे। 5 सितम्बर 2010 से शुरू होने वाली ‘चेतना-यात्र-6’ दिल्ली से आरम्भ होकर हरियाणा-पंजाब के रास्ते देश के 300 से भी अधिक शहरों से होकर गुजरेगी। 25 हजार किलोमीटर का सपफ़र तय करने वाली एवं 55 दिनों तक चलने वाली इस यात्र में 100 से अधिक मीटिंगें की जाएंगी।
भारत में हर साल करीब 3,50,000 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट जमा हो जाता है और करीब 50,000 टन इंपोर्ट होता है। ई-वेस्ट का आयात गैरकानूनी है, इसलिए यह स्क्रैप, सेकंड हैंड इलेक्ट्रिकल एपलायंसेज एवं अन्य चीजों के रूप में भारत में आता है। यह सारा ई-वेस्ट हमारे देश में एकत्र हो जाता है। देश के अनियोजित क्षेत्र द्वारा इस ई-वेस्ट का 90 प्रतिशत हिस्सा रीसाइकल कर दिया जाता है। भारत में वर्ष 2007 में लगभग 3,30,000 टन ई-वेस्ट एकत्र हुआ था।
इधर मीडिया इन खबरों को प्रसारित कर इतिश्री समझ लेता है, जबकि वह स्वयं ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है।

उपभोक्ताओं की जरूरत मात्र चैनलों तक ही नहीं निबट जाती है---
भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री में भी अब भारी बदलावों की सम्भावनाएं बन रही हैं, निश्चित ही एक बहुत बड़ी तकनीकी क्रान्ति चौखट पर दस्तक दे रही है। बेशक केबल टीवी ऑपरेटरों को यह समझने में देर लग जाए लेकिन टैक्नोलॉजी को रोक पाना सम्भव नहीं होता। बीस वर्षों का लम्बा दौर इस इण्डष्ट्री को एक चैनल से हांकते हुए सैकडों चैनलों के प्रसारण तक ले आया है। जैसे कि ब्लैक एण्ड व्हाइट टैलीविजन से रंगीन टैलीविजन पर जाने में संकोच किया करते थे लोग। तब कहा जाता था कि रंगीन टैलीविजन देखने से आंखाें पर ज्यादा जोर पडे़गा, इसी प्रकार से स्टील के बर्तनों का जब प्रचलन शुरू हुआ था तब भी लोगों में स्टील के बर्तनों के विरूद्ध भारी भ्रांतियां थी, जबकि प्रेशर कुकर को अपनाने में तो खासा लम्बा समय लिया था लोगों ने। लेकिन समय बदलता गया और अब वह बातें हास्यास्पद सी लगेंगी।
केबल टीवी के मामले में भी कुछेक वर्षों बाद ऐसा ही बदलाव देखने को मिलेगा, जबकि उसकी शुरूआत हो चुकी है। टेलीपफ़ोन के लिए तो बुकिंग करवाने के बाद कई साल इंतजार करनी पडती थी, लेकिन अब---। कल्पनाओं में भी तब ऐसा सोच पाना बहुत मुश्किल था कि कभी ऐसा दौर भी आएगा जब आपके हाथों में पकड़ा चलेगा टेलीपफ़ोन। तकनीकी क्रान्ति के दौर में आवश्यकतानुसार आविष्कारों के लिए मानव मस्तिष्क में चौबीसों घन्टों कुलबुलाहट होती रहती है, ऐसी उठा-पटक केबल टीवी के क्षेत्र में भी देखने को मिलनी तय है। उपभोक्ताओं को सीधे-सीधे प्रभावित करने के लिए केबल टीवी बहुत ही सरल और सटीक माध्यम है इसीलिए इस तकनीक के द्वारा अब सैकड़ों चैनल उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाने भी मुमकिन हो गए हैं। उपभोक्ताओं की पसंदानुसार चौबीसों घन्टे कुलबुलाहट होती रहती है, ऐसी उठापटक केबल टीवी के क्षेत्र में भी देखने को मिलनी तय है। उपभोक्ताओं को सीधे-सीधे प्रभावित करने के लिए केबल टीवी बहुत ही सरल और सटीक माध्यम है। इसीलिए इस तकनीक के द्वारा अब सैकड़ों चैनल उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाने भी मुमकिन हो गए हैं। उपभोक्ताओं की पसंदानुसार चौबीसों घन्टे उनके टैलीविजनों पर नाना प्रकार के चैनलों का पहुंचना अब सामान्य सी बात हो गई है, जबकि केबल टीवी के आरम्भिक दौर में ऐसी कल्पना करना भी कठिन हुए करता था।
आज की सच्चाई की कडुवी हकीकत यह भी है कि एक नए व्यवसाय के रूप में जिन लोगों ने इसे व्यवसायिक तौर पर सींचा था उन्होंने भी तब यह कल्पना नहीं की थी कि एक मामूली सा व्यवसाय जिसे समाज भी हेय दृष्टि से देखता था, वह देखते ही देखते इतना बड़ा बन जाएगा कि सारी दुनिया के धनकुबेरों को ही ललचाने लगेगा---, तब यह कल्पनाओं से परे था। तब जब कोई सौ चैनलों की बात करता था, तब हर किसी के लिए यकीन से परे की बातें लगा करती थीं, क्योंकि तब भारत में प्रचलित टैलीविजन ही मात्र 8 या 12 चैनलों के ट्यूबर वाले हुआ करते थे। बहुत तेजी के साथ बदलाव आया, चैनलों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ केबल टीवी उपभोक्ताओं की संख्या भी खूब बढ़ती गई। धीरे-धीरे टेलिविजन ड्राइंग रूम के साथ-साथ हरेक कमरे में होते हुए रसोईघर तक पहुंच गए। चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों ने समाज को एक नई संस्कृति में ही रंगना शुरू कर दिया। घरेलू वातावरण भी धीरे-धीरे केबल रेड्डी सा होने लगा। हरेक वर्ग व उम्र के लिए अलग-अलग चैनल व कार्यक्रमों ने सबके लिए अलग-अलग टैलीविजन के रास्ते बनाए। इस प्रकार से बाजार की धारा में देश की सारी आबादी को ही बहा लिया जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं थी, लेकिन सच यही है। सवा सौ करोड़ से भी अधिक देश की आबादी आज विश्व के सबसे बडे उपभोक्ता प्रधान देश के रूप में सारी दुनिया को ललचा रही है।
जबकि इन उपभोक्ताओं को केवल कुछ चैनल पहुंचा कर ही केबल टीवी ऑपरेटरों ने मान लिया है कि उन्होंने अपना काम कर दिया है। इण्डष्ट्री में आने वाले बदलावों को देखते हुए अभी निश्चित तौर पर यह दावा भी नहीं किया जा सकता है कि भविष्य में यह उपभोक्ता केबल टीवी ऑपरेटरों पर निर्भर रहेंगे भी कि नहीं---\ हो भी सकता है कि टैक्नोलॉजिकल बदलाव के बाद केबल टीवी आपरेटरों पर निर्भरता बिल्कुल ही खत्म हो जाए---। उपभोक्ता ही ऑपरेटरों की मूल पूँजी है, लेकिन टैक्नोलॉजी ऑपरेटरों से उपभोक्ताओं को बिल्कुल अलग भी कर सकती है। इस सच्चाई से ऑपरेटरों का आंखें मूदना घातक साबित हो सकता है, लेकिन अभी उपभोक्ता पूर्णतया आपरेटरों पर ही निर्भर है, जबकि कुछेक उपभोक्ताओं ने केबल टीवी से अलग होकर अन्य तकनीक डीटीएच भी अपना लिए हैं।
डीटीएच की एक दो नहीं बल्कि सात कम्पनियां प्रचलन में हैं, जो टुकुर-टुकुर कर केबल टीवी ऑपरेटर खमोशी से अपने उपभोक्ताओं को अपने से अलग होते देख तो रहे हैं लेकिन उपभोक्ताओं से सदैव जुड़े रहने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं, जबकि चैनलों के अतिरिक्त उनकी जरूरतें भिन्न सेवाओं के साथ-साथ तमाम प्रोडक्ट्स भी हैं। ऑपरेटरों को चाहिए कि केबल टीवी के लिए भले ही उपभोक्ताओं की निर्भरता खत्म हो जाये लेकिन अन्य सेवाओं के लिए वह सदैव ऑपरेटरों से जुड़े रहेें। उपभोक्ताओं के खजाने से भरे होने के कारण ही आज ऑपरेटरों का महत्व है अन्यथा उनके प्रति नजरिए ठीक नहीं प्रतीत होते हैं किसी के भी।
केबल टीवी में तकनीकी बदलावों को समय के अनुरूप छोड़ कर उपभोक्ताओं के लिए अन्य सेवाओं की शुरूआत अब कर दी जानी चाहिए, क्योंकि अभी ऑपरेटरों के पास मीडिया का माध्यम भी है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी मर्जीनुसार कर सकते हैं। अन्य सेवाओं के लिए वह उपभोक्ताओं के साथ सदैव के लिए जुड़े रह सकते हैं, तब उपभोक्ताओं को वह कई प्रोडक्ट्स भी उपलब्ध करवा सकते हैं, लेकिन ऑपरेटरों को केबल टीवी के साथ-2 अन्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाने में अब और विलम्ब ना कर तुरन्त जुट जाना चाहिए।
अन्य सेवाओं के लिए ‘राष्ट्रव्यापी वृहत सेवा योजना’ की रूप रेखा आविष्कार मीडिया ग्रुप ने रची है, जो कि देशभर के केबल टीवी प्रदाताओं को केन्द्रीयकृत कर शुरू की जाएगी। केबल टीवी ऑपरेटरों के देशभर में करोड़ों उपभोक्ताओं को यह सेवा उपलब्ध होगी, जिसका मुख्य सूत्रधार ही ऑपरेटर होगा। आरम्भ में कुछ सीमित सेवाओं से शुरूआत की जाएगी, लेकिन आवश्यकतानुसार सेवाओं में वृद्धि की जाती रहेगी। चौबीसों घन्टों देश के किसी भी शहर-कस्बे गांव पहुंचने में केबल टीवी नैटवर्क को केन्द्रीयकृत किया जाएगा एवं उपलब्ध सेवाओं की जनकारी उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए केबल टीवी माध्यम सहायक बनेगा।
‘चेतना यात्र-5’ में जिस प्रकार से देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों के सहयोग से ग्लोबल वार्मिंग के प्रति लोगों में जागृति लाने के लिए देशभर में वृक्षारोपड़ अभियान चलाया गया, उसी प्रकार ‘चेतना यात्र-6’ के अन्तर्गत ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग एण्ड ई वेष्ट निदान के अन्तर्गत ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग एण्ड ई वेष्ट निदान पर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग के अर्न्तगत ब्रॉडकासि्ंटग इण्डष्ट्री में संलग्न भिन्न सैटेलाइट चैनलों सहित उनके प्रतिनिधियों का भी सहयोग इस मिशन में लिया जाएगा, जबकि प्रोडक्शन हाऊसेस एवं टेक्नीकल क्षेत्र में रिनेबल इनर्जी के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र व उससे जुडे़ समस्त सम्बन्धियों को मात्र इतना सा सन्देश देने का प्रयास किया जाएगा कि उनके द्वारा किए जाने वाले किन्हीं भी कार्यों से पृथ्वी के तापमान में होने वाली वृद्धि को रोकने एवं उसके एवज में पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए वह यथासम्भव योगदान दें।
इसी प्रकार देशभर के केबल टीवी ऑपरेटरों को अलग से यह सन्देश देने की कोशिश की जाएगी, कि केबल टीवी में खराब होने वाले पुराने तारों को वह जिस प्रकार से कबाड़ियों को बेंच देते हैं, कबाड़ी उन तारों में से कापर निकालने के लिए जब उन्हें जलाते हैं, तब कई जहरीली गैसें वातावरण में घुल जाती हैं जोकि वापिस हमारे ही श्वांस में पहुंचती हैं, ऐसी स्थितियों को पूर्णतया रोकने के लिए हमें मिलकर इलैक्ट्रानिक कचरे के प्रति लोगो में जागरूकता लानी होगी। जरूरत राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान की है, जिसे ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी क्षेत्र से जुड़े लोग बहुत ही बेहतर तरीके से निभा सकते हैं, शुरूआत बस एक पहल की है---!!
तकनीकी क्रान्ति के दौर में आवश्यकतानुसार आविष्कारों के लिए मानव मस्तिष्क में चौबीसों घन्टों कुलबुलाहट होती रहती है, ऐसी उठा-पटक केबल टीवी के क्षेत्र में भी देखने को मिलनी तय है। उपभोक्ताओं को सीधे-सीधे प्रभावित करने के लिए केबल टीवी बहुत ही सरल और सटीक माध्यम है इसीलिए इस तकनीक के द्वारा अब सैकड़ों चैनल उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाने भी मुमकिन हो गए हैं। उपभोक्ताओं की पसंदानुसार चौबीसों घन्टे कुलबुलाहट होती रहती है, ऐसी उठापटक केबल टीवी के क्षेत्र में भी देखने को मिलनी तय है। उपभोक्ताओं को सीधे-सीधे प्रभावित करने के लिए केबल टीवी बहुत ही सरल और सटीक माध्यम है।

केबल टीवी में तकनीकी बदलावों को समय के अनुरूप छोड़ कर उपभोक्ताओं के लिए अन्य सेवाओं की शुरूआत अब कर दी जानी चाहिए, क्योंकि अभी ऑपरेटरों के पास मीडिया का माध्यम भी है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी मर्जीनुसार कर सकते हैं। अन्य सेवाओं के लिए वह उपभोक्ताओं के साथ सदैव के लिए जुड़े रह सकते हैं, तब उपभोक्ताओं को वह कई प्रोडक्ट्स भी उपलब्ध करवा सकते हैं, लेकिन ऑपरेटरों को केबल टीवी के साथ-2 अन्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाने में अब और विलम्ब ना कर तुरन्त जुट जाना चाहिए।
अन्य सेवाओं के लिए ‘राष्ट्रव्यापी वृहत सेवा योजना’ की रूप रेखा आविष्कार मीडिया ग्रुप ने रची है, जो कि देशभर के केबल टीवी प्रदाताओं को केन्द्रीयकृत कर शुरू की जाएगी।

पर्यावरण एवं प्रदूषण
प्रदूषण फैलाने में प्लास्टिक की थैलियों का भी बड़ा हाथ है। इसके खतरे के मद्देनजर सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग वर्जित कर दिया है। लेकिन पिफ़र भी इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। दुकानों एवं आम जगह पर यह तो लिखा मिलता है-‘प्लास्टिक की थैलियां वर्जित हैं, कृपया अपना थैला लाएं, लेकिन इस पर अमल होता बहुत कम दिखता है। उपभोक्ता, ग्राहक घर से अपना थैला ले जाना जैसे चाहते नहीं। यदि वे अपना थैला घर से लाएं, तो इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। हालांकि बहुत से दुकानदारों ने जूट एवं कपड़ों से बने थैलों का प्रयोग कर, सराहनीय काम किया है। लोग इस तरह की समस्याओं का खुद हल निकाल सकते हैं। इसके अलावा वे अपने घरों के गीले एवं सूखे कूड़े को अलग-अलग करके भी प्रदूषण को रोक सकते हैं। जैसे खाली बोतलें, जूस के डिब्बे, आदि को वे अलग रख सकते हैं। इसके अलावा पफ़लों के छिलके, बचा हुआ खाना आदि को अलग कर, घर के पास एवं पेड़-पौधों के नजदीक गड्ढा बनाकर उनमें डाल सकते हैं। यह पेड़-पौधों में खाद का काम होगा। जबकि सूखे कूड़े वा कबाड़ आदि को बेचकर उसे पुनः रिसाइकिल किया जा सकता है।
ऐसे ही रिसाइकिल कचराें से बेंगलुरू में कई सड़कों का निर्माण किया गया है। यह अपने आप में एक अच्छा प्रयास है। वह कूड़ा जो प्रकृति को दूषित करता, उससे सड़क का निर्माण, सुनने वालों को अजीब लग सकता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। इसी तरह देश के अन्य हिस्सों में भी प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उपभोक्ताओं को जागरूकता दिखानी होगी। गीले एवं सूखे कूड़ों को अलग रखना होगा। इससे पर्यावरण की सुंदरता भी बढे़गी, स्वच्छता भी। बहरहाल इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति प्रकृति से कैसे कटता जा रहा है, पर्यावरण प्रदूषण इसकी एक मिसाल है। जहां साफ जगह दिखी वहां प्लास्टिक की थैलियां पफ़ेंक दीं, सड़कों पर चलते समय थूकना जैसे इंसान की आदत ही बन गयी है। इस पर ‘सु-सु कुमारों’ ने पर्यावरण को प्रदूषित करने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली हो या मुंबई, कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक देश में लोग इसी तरह प्रदूषण पफ़ैला रहे हैं।
दिल्ली जो कि देश की राजधानी भी है यहां का आलम तो और भी बुरा है। जल्द ही राष्ट्रमंडल खेल भी होने वाले हैं, जगह-जगह उठती बदबू, दुर्गंध, क्या तस्वीर पेश करेंगी हमारे दिल्ली की विदेशी पर्यटकों के सामने। हमें इस बात को गहराई से सोचना चाहिए कि ‘स्वच्छ दिल्ली’ विदेशी मेहमानों के दिलों में यहां से उनकी रूखसती के समय अच्छी यादें समेटेगी। लेकिन यदि उन्हें दिल्ली की सड़कों पर गन्दगी, खस्ता हाल सड़कें, दिखाई देंगी, तो यह न हमारे लिए अच्छा होगा और न ही देश के लिए।
इसके साथ-साथ यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली में पर्यावरण के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण यहां सडकों पर बढ़ते वाहन भी हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण को बढ़ावा देता है, वहीं वाहनों का शोर, इंजन की आवाज ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती है, हमें इन सब पर लगाम लगाना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी बात यह हो कि निजी वाहनों की तुलना में बस इत्यादि पर सपफ़र करें। ताकि सड़कों पर वाहनों की लम्बी कतारें लगने सेे बचे। इसके अलावा मैट्रो की सवारी भी प्रदूषण को कम करती है। हालांकि यह कहने में जितनी आसान है, अमल करने में उतना ही मुश्किल लेकिन एक कोशिश करने में क्या बुराई है। यूं भी कहते हैं न यदि आपने स्वयं को सुधार लिया, तो समझो सब सुधर गये। बस जरूरत है तो एक पहल करने की।
आज जिस तेजी से ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ा है, उससे लोगों को सचेत रहना होगा। इसे रोकने के लिए आप सभी मुख्य भूमिकाएं निभा सकते हैं। इसके लिए आप अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, अपने आस-पास सापफ़-सपफ़ाई का विशेष ध्यान रखें। जहां तक संभव हो निजी वाहनों की तुलना में सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें। बिजली कम खर्च करने वाले (स्टार माकई) उत्पाद खरीदें। देश में बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग एवं ई-वेस्ट कचरा निदान के प्रति आविष्कार परिवार के मुखिया डा-ए-के- रस्तागी चेतना यात्र-6 के जरिए आप लोगों के बीच हैं। 5 सितम्बर से 31 अक्टूबर तक चलने वाली इस यात्र में डा- रस्तोगी देश के समस्त केबल ऑपरेटरों, एमएसओ, ब्रॉडकास्टरों, उपभोक्ताओं, आदि को ग्लोबल वार्मिंग एवं ई-वेस्ट कचरा निदान के प्रति सचेत कर रहे हैं। इस यात्र में लोगों से पर्यावरण को हरा-भरा बनाये रखने के लिए शपथ ली जा रही है, पौधे लगाये जा रहे हैं, एवं जरूरी जानकारियां दी जा रही है।



**************X**************X**************X**************